नागौर में मवेशियों पर ब्लैक क्वार्टर का साया, युवा बछड़ों की सुरक्षा के लिए जारी हुई चेतावनी मौसम में बदलाव और दूषित चारे-पानी से दुधारू पशुओं में ब्लैक क्वार्टर यानी लंगड़ा बुखार का जोखिम बढ़ गया है। विशेषज्ञ 6 महीने से 2 वर्ष के पशुओं की विशेष निगरानी और समय पर टीकाकरण की सलाह दे रहे हैं। मौसम में बदलाव की आहट, हल्की ठंड की शुरुआत और दूषित खानपान के चलते दुधारू पशुओं में घातक संक्रमणों का प्रकोप गहराने लगा है। नागौर क्षेत्र में पशुओं के स्वास्थ्य को लेकर लंगड़ा बुखार एक गंभीर चुनौती बनकर उभरा है, जिसे वैज्ञानिक भाषा में ब्लैक क्वार्टर के नाम से जाना जाता है। यह जानलेवा जीवाणु रोग आमतौर पर उन युवा मवेशियों को सबसे पहले अपनी गिरफ्त में लेता है जो शारीरिक रूप से हट्टे-कट्टे, स्वस्थ और सुगठित मांसपेशियों वाले होते हैं। मवेशी विशेषज्ञों के मुताबिक, 6 महीने से लेकर 2 वर्ष की आयु सीमा वाले बछड़े और बछड़ियां इस बैक्टीरिया के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील साबित होते हैं। जीवाणु संक्रमण का फैलाव और शरीर पर असर ब्लैक क्वार्टर एक घातक बैक्टीरियल संक्रमण है, जिसके जीवाणु बेहद जिद्दी होते हैं और जमीन की मिट्टी में वर्षों तक जीवित बने रह सकते हैं। जब कोई स्वस्थ पशु संक्रमित मिट्टी पर चरता है, जमीन सूंघता है अथवा दूषित चारा और गंदा पानी ग्रहण करता है, तो यह बैक्टीरिया तुरंत उसके शरीर में प्रवेश कर जाता है। अंदर दाखिल होते ही यह जीवाणु पशु की भारी और मजबूत मांसपेशियों वाले अंगों को अपना निशाना बनाता है। विशेषकर गर्दन, कंधे और पिछले पैरों की जांघों में तेजी से गैस युक्त सूजन उभर आती है। जब इन फूले हुए हिस्सों को हाथों से दबाया जाता है, तो अंदर मौजूद गैस के कारण चट-चट जैसी स्पष्ट ध्वनि सुनाई पड़ती है। यह संक्रमण बेहद आक्रामक गति से पूरे शरीर में फैलता है, जिससे तत्काल चिकित्सा न मिलने पर मवेशी कुछ ही घंटों में दम तोड़ सकता है। लंगड़ा बुखार के प्रमुख लक्षण और पहचान के तरीके पशु चिकित्सक विशाल प्रजापति के अनुसार, जब यह बीमारी पशु पर हमला करती है तो उसका शरीर भीषण बुखार की चपेट में आ जाता है। तेज ताप के कारण मवेशी सुस्त पड़ जाता है, उसका दाना-पानी पूरी तरह छूट जाता है और वह जुगाली करना भी बंद कर देता है। जैसे-जैसे संक्रमण रगों में फैलता है, पशु की श्वसन गति असामान्य रूप से तेज हो जाती है और उसकी आंखें सुर्ख लाल दिखाई देने लगती हैं। इसके साथ ही मांसपेशियों में कड़ापन और जकड़न आने लगती है। बीमारी के शुरुआती चरण में पशु लंगड़ाकर कदम बढ़ाता है, लेकिन जैसे ही कंधे, पिछले पैरों और गर्दन में गैस भरी सूजन बढ़ती है, वह चलने-फिरने की ताकत खो बैठता है और जमीन पर गिर पड़ता है। जब रोग अपनी अंतिम और गंभीर अवस्था में पहुंचता है, तो पशु के शरीर का तापमान अचानक सामान्य से भी नीचे लुढ़क जाता है, जिसके बाद मवेशी की जान बचाना नामुमकिन हो जाता है। मृत मवेशियों का वैज्ञानिक और सुरक्षित निस्तारण विशाल प्रजापति ने आगाह किया है कि लंगड़ा बुखार से जान गंवाने वाले पशुओं के शवों को लावारिस या खुले मैदानों में फेंकना पूरे इलाके के लिए भारी आफत बन सकता है। खुले में पड़ा शव आसपास की जमीन और घास को लंबे समय के लिए संक्रामक बना देता है। पशुपालकों को मवेशी की मौत होने पर स्थानीय प्रशासन और पशु चिकित्सकों की सीधी देखरेख में ही वैज्ञानिक निस्तारण करना चाहिए। संक्रमण की रोकथाम के लिए मृत शरीर को 5 से 6 फीट गहरे गड्ढे में चूना और नमक की पर्याप्त मात्रा डालकर दफनाने का पारंपरिक तरीका अपनाया जाता है। इससे दूसरे जानवर उसके संपर्क में आने से बच जाते हैं और बैक्टीरिया जमीन के भीतर ही दब जाता है। हालांकि, निस्तारण की सटीक प्रक्रिया स्थानीय पशु चिकित्सा अधिकारियों के तय दिशा-निर्देशों के मुताबिक ही पूरी की जानी चाहिए। टीकाकरण, स्वच्छता और प्राथमिक सावधानियां इस जानलेवा बीमारी से मवेशियों को बचाने का सबसे अचूक उपाय समयबद्ध टीकाकरण है। सभी पशुपालकों को अपने मवेशियों को ब्लैक क्वार्टर का टीका अवश्य लगवाना चाहिए। इसके अलावा बाड़े की साफ-सफाई पर विशेष ध्यान देना जरूरी है। पशुओं को केवल ताजा, स्वच्छ पेयजल ही दें और सड़ा-गला या फफूंद लगा चारा बिल्कुल न परोसें। जहां मवेशी बंधते हैं, वहां जलभराव या कीचड़ न होने दें। यदि किसी भी पशु में अचानक तेज बुखार, लंगड़ापन अथवा कंधों और जांघों पर सूजन दिखाई दे, तो देसी टोटकों या घरेलू उपायों में समय नष्ट किए बिना फौरन नजदीकी पशु चिकित्सक को बुलाएं। समय रहते लक्षणों की पहचान और तुरंत इलाज ही पशुधन की जान बचा सकता है। इसका आप पर असर यह बीमारी पशुपालकों की आजीविका और उनके मवेशियों के जीवन पर सीधा वित्तीय और स्वास्थ्य प्रभाव डालती है। • भारत में: ब्लैक क्वार्टर जैसी संक्रामक बीमारियां दुधारू पशुओं की उत्पादकता और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान पहुंचाती हैं। सभी पशुपालकों को मौसमी बदलाव के दौरान समय पर बछड़ों का टीकाकरण पूरा करा लेना चाहिए ताकि आर्थिक बर्बादी से बचा जा सके। • नागौर में: स्थानीय मवेशी बाड़ों और चरागाहों में संक्रमण रोकने के लिए दूषित पानी और खुले शवों के निस्तारण पर कड़ा पहरा रखना जरूरी है। यदि किसी बछड़े में अचानक लंगड़ापन दिखे, तो तुरंत स्थानीय पशु अस्पताल से संपर्क करें और घरेलू नुस्खों से परहेज करें। • वित्तीय पहलू: युवा और तंदुरुस्त मवेशी की अकाल मृत्यु से किसान को 40 से 50 हजार रुपये तक की सीधी संपत्ति हानि हो सकती है। बचाव के लिए कुछ रुपयों का टीका और स्वच्छता बनाए रखना बड़े वित्तीय नुकसान से सुरक्षित रखता है। • दैनिक प्रबंधन: पशुपालक चारे और पानी के बर्तनों की नियमित धुलाई सुनिश्चित करें और बाड़े में जलजमाव न होने दें। 6 माह से 2 साल के बछड़ों के शरीर और चाल पर रोजाना नजर रखना सबसे आसान बचाव है। ऐसा क्यों हुआ यह प्रकोप मौसम के बदलाव, जमीन में मौजूद सुप्त जीवाणुओं और दूषित चारे-पानी के संपर्क से फैलता है। • सीधा कारण: यह संक्रमण मिट्टी में वर्षों तक जीवित रहने वाले घातक जीवाणुओं के शरीर में प्रवेश करने से फैलता है। जब पशु चरते समय दूषित मिट्टी, पानी या फफूंदयुक्त चारा निगलते हैं, तो बैक्टीरिया मांसपेशियों में पहुंचकर गैस युक्त सूजन पैदा करता है। • अनुकूल परिस्थितियां: मौसम में परिवर्तन और हल्की ठंड की दस्तक पशुओं की रोग प्रतिरोधक क्षमता को प्रभावित करती है। साथ ही जलभराव और अस्वच्छ बाड़ों में बैक्टीरिया का प्रसार बहुत आसानी से हो जाता है। • संवेदनशीलता का स्तर: 6 महीने से 2 वर्ष के तंदुरुस्त बछड़ों में रक्त संचार और मांसपेशियों का विकास अधिक होता है, जिसके चलते यह बैक्टीरिया उनकी भारी मांसपेशियों को तेजी से संक्रमित कर देता है। • अनदेखी का खतरा: मृत पशुओं के शवों को खुले में फेंकने से उस क्षेत्र की मिट्टी लंबे समय के लिए संक्रामक बन जाती है, जिससे आने वाले मौसमों में भी नए पशु इसकी चपेट में आते रहते हैं। सवाल-जवाब 1. लंगड़ा बुखार या ब्लैक क्वार्टर किस कारण से होता है? यह एक जीवाणु जनित बीमारी है, जिसके बैक्टीरिया मिट्टी, दूषित चारे और गंदे पानी में वर्षों तक जीवित रह सकते हैं। 2. इस रोग का सर्वाधिक खतरा किन मवेशियों को रहता है? यह बीमारी खासतौर पर 6 महीने से लेकर 2 वर्ष तक की उम्र के तंदुरुस्त और भारी मांसपेशियों वाले बछड़े-बछड़ियों को अपना शिकार बनाती है। 3. बीमारी की पहचान के प्रमुख लक्षण क्या हैं? शुरुआत में तेज बुखार, लंगड़ापन, कंधे और जांघों पर गैस भरी सूजन आती है, जिसे दबाने पर चट-चट की आवाज सुनाई देती है। 4. मृत पशु के शव का निस्तारण कैसे किया जाना चाहिए? शव को खुले में न फेंकें; इसे 5 से 6 फीट गहरे गड्ढे में चूना और नमक डालकर स्थानीय पशु चिकित्सक के निर्देशानुसार दबाना चाहिए। 5. लंगड़ा बुखार से बचाव के क्या उपाय हैं? पशुओं का समय पर टीकाकरण करवाएं, साफ पानी व चारा दें, बाड़े में स्वच्छता रखें और लक्षण दिखते ही तुरंत पशु चिकित्सक से संपर्क करें। https://trendkia.com/bihar/nagaur-men-maveshiyon-para-black-quarter-ka-saya-yuva-bachharon-ki-suraksha-ke-lie-jari-hui-chetavani-54982 TrendKia — Har trend, sabse pehle.