पूर्णिया में वृद्धाश्रम पहुंचे डीएम अंशुल कुमार, बुजुर्ग महिला ने प्यार से मांगा चाट और फुचका बिहार के पूर्णिया में वृद्धाश्रम का औचक निरीक्षण करने पहुंचे डीएम अंशुल कुमार से एक बुजुर्ग महिला ने चाट और फुचके की मांग कर दी। अधिकारी ने भी तुरंत उनकी यह इच्छा पूरी करने का भरोसा दिया। प्रशासनिक अधिकारियों के दौरों के दौरान अमूमन फाइलों की जांच, सख्त समीक्षा और गंभीर चेहरे ही देखने को मिलते हैं। आम नागरिक भी अफसरों के सामने आते वक्त अक्सर किसी शिकायत, पेंशन की अर्जी या झिझक के साथ ही पेश आते हैं। हालांकि, बिहार के पूर्णिया जिले से सामने आई एक घटना ने इस पारंपरिक छवि को पूरी तरह बदल दिया है। पूर्णिया के जिलाधिकारी अंशुल कुमार जब हाल ही में एक वृद्धाश्रम का हालचाल जानने पहुंचे, तो वहां मौजूद एक बुजुर्ग महिला ने उनसे किसी सरकारी दफ्तर के काम या योजना की शिकायत करने के बजाय बड़ी मासूमियत से चाट और फुचका खिलाने की मांग रख दी। वृद्धाश्रम के निरीक्षण के दौरान सामने आया आत्मीय पल पूर्णिया के डीएम अंशुल कुमार जिले के एक वृद्धाश्रम में औचक निरीक्षण के लिए पहुंचे थे। इस दौरे का मुख्य उद्देश्य वहां रहने वाले वृद्धजनों की रहन-सहन की स्थिति, सुविधाओं और स्वास्थ्य व्यवस्थाओं का जायजा लेना था। आमतौर पर ऐसे दौरों में प्रशासनिक अमला सिर्फ औपचारिक खानापूर्ति और व्यवस्थाओं के मुआयने तक सीमित रहता है। इसके विपरीत, जिलाधिकारी ने आश्रम में रहने वाले वरिष्ठ नागरिकों के बीच बैठकर उनसे सीधे बातचीत शुरू की और उनके हालचाल पूछे। इसी संवाद के दौरान एक बुजुर्ग महिला ने बिना किसी संकोच के डीएम साहब से बड़े अपनेपन के साथ पूछ लिया कि वे उन्हें चाट और फुचका कब खिला रहे हैं। पेंशन या बुनियादी सुविधाओं की जगह सीधे चाट-गोलगप्पे की फरमाइश सुनकर वहां उपस्थित सभी लोग और खुद जिलाधिकारी अपनी हंसी नहीं रोक पाए। इस निश्छल मांग पर डीएम अंशुल कुमार ने भी फौरन आत्मीयता दिखाते हुए जवाब दिया कि वे आज ही और अभी उन्हें यह दावत खिलाएंगे। सोशल मीडिया पर साझा किए गए इस पल को लोग बेहद पसंद कर रहे हैं। श्रम विभाग के कर्मचारी के बेटे से आईएएस बनने का सफर प्रशासन में अपनी खास कार्यशैली के लिए पहचाने जाने वाले अंशुल कुमार मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। उनके पिता गाजियाबाद के श्रम विभाग में कार्यरत थे। अपने पिता के सपने को साकार करने की प्रेरणा लेकर उन्होंने सिविल सेवा में जाने का फैसला किया। उन्होंने अपनी तकनीकी शिक्षा प्रयागराज स्थित मोतीलाल नेहरू नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (MNNIT) से पूरी की, जहां से उन्होंने बीटेक की डिग्री हासिल की। इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी शुरू कर दी। उनकी मेहनत का पहला नतीजा 2014 में सामने आया जब उन्होंने एसएससी परीक्षा उत्तीर्ण की और एक्साइज इंस्पेक्टर के पद पर चयनित हुए। सरकारी सेवा में आने के बावजूद उनका मुख्य लक्ष्य यूपीएससी की सिविल सेवा परीक्षा को पास करना ही रहा। आखिरकार उनकी लगन रंग लाई और 2015 की यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा में उन्होंने 293वीं रैंक प्राप्त की, जिसके बाद उन्हें 2016 बैच के तहत बिहार कैडर आवंटित हुआ। इसी परीक्षा सत्र में उनकी योग्यता का एक और प्रमाण देखने को मिला, जब उन्होंने भारतीय वन सेवा की परीक्षा में भी 97वीं रैंक हासिल की थी। संवेदनशीलता और जनता के साथ भरोसे का रिश्ता प्रशासनिक व्यवस्था में जब उच्च पदस्थ अधिकारी जनता के इतने निकट पहुंच जाते हैं कि आम लोग बिना किसी हिचक या भय के अपनी बात कह सकें, तो व्यवस्था और समाज के बीच दूरी मिट जाती है। पूर्णिया के वृद्धाश्रम की यह घटना बताती है कि प्रशासनिक जिम्मेदारी केवल नियमों और कागजों तक सीमित नहीं होती, बल्कि उसके केंद्र में मानवीय संवेदनशीलता भी होनी चाहिए। जब कोई अफसर लोगों के बीच जाकर उनके सुख-दुख को साझा करता है, तो शासन के प्रति जनता का विश्वास और गहरा होता है। सिविल सेवा और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में जुटे अभ्यर्थियों के लिए भी यह प्रसंग एक अहम संदेश देता है। बड़ी डिग्रियां हासिल करने और कठिन परीक्षाएं पास करने के साथ-साथ एक संवेदनशील इंसान बनना प्रशासनिक सेवा की सबसे बड़ी जरूरत है। जनता की समस्याओं को समझकर उनके साथ सहज संबंध बनाना ही एक कुशल अधिकारी की असली पहचान होती है, जिसकी मिसाल इस वाकये में देखने को मिली। इसका आप पर असर यह घटना दर्शाती है कि संवेदनशील प्रशासनिक कार्यशैली से सरकारी व्यवस्था और नागरिकों के बीच का संवाद कितना सरल और सहज बन सकता है। • भारत में: यह प्रसंग रेखांकित करता है कि जब सिविल सेवक औपचारिक सीमाओं से बाहर निकलकर संवेदनशीलता दिखाते हैं, तो जनता का शासन तंत्र पर भरोसा बढ़ता है। विभिन्न परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्रों के लिए यह मानवीय दृष्टिकोण को समझने का एक व्यावहारिक उदाहरण है। • पूर्णिया में: जिले के वृद्धाश्रमों और अन्य कल्याणकारी केंद्रों में अधिकारियों की निरंतर मौजूदगी से वरिष्ठ नागरिकों की देखरेख और बुनियादी सुविधाओं में सुधार सुनिश्चित होता है। स्थानीय लोग अपनी समस्याएं या आवश्यकताएं बिना किसी भय या झिझक के सीधे अधिकारियों के समक्ष रखने के लिए प्रेरित होते हैं। • वरिष्ठ नागरिकों के लिए: ऐसे दौरे यह भरोसा दिलाते हैं कि समाज के सबसे कमजोर वर्ग की आवाज और भावनात्मक जरूरतें उपेक्षित नहीं हैं। इससे संस्थागत आश्रमों में रहने वाले बुजुर्गों के मानसिक स्वास्थ्य और जीवन स्तर पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। • प्रशासनिक सेवा के लिए: औचक निरीक्षणों में कागजी खानापूर्ति के बजाय जमीनी बातचीत को प्राथमिकता देने से व्यवस्था में पारदर्शिता आती है। इससे अन्य कर्मचारियों और अधिकारियों को भी जनता के प्रति अधिक उत्तरदायी और विनम्र बनने की प्रेरणा मिलती है। ऐसा क्यों हुआ पूर्णिया के जिलाधिकारी वृद्धाश्रम की व्यवस्थाओं का प्रत्यक्ष मूल्यांकन करने पहुंचे थे, जहां बातचीत के दौरान यह सहज संवाद सामने आया। • सीधा कारण: जिलाधिकारी अंशुल कुमार वृद्धाश्रम के औचक निरीक्षण पर पहुंचे थे ताकि वहां की व्यवस्थाओं और वृद्धजनों की स्वास्थ्य सुविधाओं की वास्तविक स्थिति जांची जा सके। फाइलों की समीक्षा के बजाय उन्होंने सीधे बुजुर्गों के बीच बैठकर बातचीत की, जिससे यह अनौपचारिक माहौल बना। • परिस्थितियों की भूमिका: आमतौर पर प्रशासनिक अधिकारी सख्त और औपचारिक दूरी बनाकर रखते हैं, जिससे नागरिक खुलकर बात नहीं कर पाते। जिलाधिकारी के सहज व्यवहार ने बुजुर्ग महिला को बिना किसी झिझक के अपनी पसंदीदा खाने की चीज मांगने का आत्मविश्वास दिया। • पूर्व पृष्ठभूमि: प्रशासनिक अधिकारी पहले भी विभिन्न पदों और परीक्षाओं में अपनी प्रतिभा साबित कर चुके हैं। अपने पिता की प्रेरणा से सिविल सेवा में आने के बाद से वे जनता से सीधे संवाद और सहज आचरण के लिए जाने जाते हैं। सवाल-जवाब 1. पूर्णिया के डीएम अंशुल कुमार वृद्धाश्रम क्यों गए थे? वे वृद्धाश्रम का औचक निरीक्षण करने और वहां रहने वाले वरिष्ठ नागरिकों के रहन-सहन और सुविधाओं का हालचाल जानने पहुंचे थे। 2. बुजुर्ग महिला ने डीएम साहब से क्या मांग की? बुजुर्ग महिला ने किसी सरकारी शिकायत के बजाय डीएम साहब से बड़े अपनेपन से चाट और फुचका (गोलगप्पे) खिलाने की जिद की। 3. बुजुर्ग महिला की बात पर डीएम अंशुल कुमार ने क्या जवाब दिया? महिला की मासूमियत भरी मांग सुनकर डीएम हंस पड़े और उन्होंने तुरंत कहा कि वे आज ही और अभी उन्हें चाट-फुचका खिलाते हैं। 4. आईएएस अंशुल कुमार ने यूपीएससी में कौन सी रैंक हासिल की थी? अंशुल कुमार ने 2015 की यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा में 293वीं रैंक हासिल की थी और उन्हें बिहार कैडर मिला। 5. सिविल सेवा में आने से पहले अंशुल कुमार किस पद पर कार्यरत थे? 2014 में एसएससी परीक्षा पास करने के बाद वे एक्साइज इंस्पेक्टर के पद पर चयनित हुए थे। 6. अंशुल कुमार ने अपनी उच्च शिक्षा कहां से पूरी की थी? उन्होंने प्रयागराज स्थित मोतीलाल नेहरू नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (MNNIT) से बीटेक की डिग्री प्राप्त की थी। प्रेरणा और सबक अंशुल कुमार की शैक्षणिक और प्रशासनिक यात्रा से युवाओं और सिविल सेवा अभ्यर्थियों के लिए कई व्यावहारिक सीख मिलती हैं। • निरंतर लक्ष्य पर ध्यान: एसएससी परीक्षा उत्तीर्ण कर एक्साइज इंस्पेक्टर बनने के बाद भी उन्होंने अपने बड़े लक्ष्य को नहीं छोड़ा। सरकारी सेवा में रहते हुए निरंतर पढ़ाई जारी रखी और यूपीएससी में 293वीं रैंक हासिल की। • पारिवारिक मूल्यों का सम्मान: गाजियाबाद के श्रम विभाग में कार्यरत अपने पिता के सपने को पूरा करने की लगन ने उन्हें लगातार कठिन परिश्रम करने की प्रेरणा दी। पारिवारिक प्रेरणा को अपनी ताकत बनाकर उन्होंने इस कठिन मुकाम को हासिल किया। • तकनीकी ज्ञान के साथ संवेदनशीलता: एमएनएनआईटी प्रयागराज से इंजीनियरिंग करने के बावजूद उन्होंने केवल तकनीकी या औपचारिक सोच तक खुद को सीमित नहीं रखा। प्रशासनिक जिम्मेदारियों में मानवीय संवेदना को सबसे आगे रखना उनके आचरण से स्पष्ट झलकता है। • जनता के साथ आत्मीय जुड़ाव: उच्च पद और अधिकारों के बावजूद सादगी बनाए रखना एक सफल प्रशासक की असली पहचान है। लोगों के बीच जाकर उनकी भाषा में सुनना और संवाद करना व्यवस्था को मानवीय बनाता है। https://trendkia.com/bihar/purnia-men-vriddhashrama-pahunche-dm-anshul-kumar-bujurga-mahila-ne-pyara-se-manga-chata-aura-phuchaka-43136 TrendKia — Har trend, sabse pehle.