पूर्वी चंपारण के DM सौरभ जोरवाल की यादगार विदाई, बच्चों संग गांधी संग्रहालय पहुंचे और सत्याग्रह की कहानी सुनाई पूर्वी चंपारण के जिलाधिकारी सौरभ जोरवाल ने अपने आखिरी कार्यदिवस पर औपचारिक विदाई समारोह छोड़ मोतिहारी के गांधी संग्रहालय में बच्चों के साथ इतिहास का पाठ पढ़ा। तीन साल के कार्यकाल में दो बार राष्ट्रपति पुरस्कार पाने वाले जोरवाल की इस अनोखी विदाई की प्रशासनिक गलियारों से लेकर आम जन तक खूब चर्चा हो रही है। मोतिहारी में एक IAS अधिकारी की विदाई ने अलग ही मिसाल कायम की। पूर्वी चंपारण के जिलाधिकारी सौरभ जोरवाल अपने अंतिम कार्यदिवस पर न किसी भव्य समारोह में नजर आए, न दफ्तर की कुर्सी पर। वह अपने बच्चों का हाथ थामकर सीधे मोतिहारी के ऐतिहासिक गांधी संग्रहालय पहुंचे और वहां उन्हें महात्मा गांधी के जीवन संघर्ष, चंपारण सत्याग्रह और अहिंसा की शक्ति से परिचित कराया। जब अंतिम दिन बना इतिहास से मुलाकात का दिन आमतौर पर किसी अधिकारी के तबादले के आखिरी दिन दफ्तर में दौड़भाग, विदाई की तस्वीरें और औपचारिक बैठकें होती हैं। लेकिन सौरभ जोरवाल ने इस रवायत को तोड़ा। संग्रहालय में रखी पुरानी तस्वीरों, ऐतिहासिक दस्तावेजों और धरोहर वस्तुओं को दिखाते हुए उन्होंने बच्चों को बताया कि इसी चंपारण की माटी से महात्मा गांधी ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ अपना पहला सत्याग्रह शुरू किया था। सत्य, अहिंसा और संघर्ष की यह जीवंत कहानी उनकी विदाई का सबसे यादगार हिस्सा बन गई। 1917 में मोतिहारी से उठी थी क्रांति की लहर साल 1917 में किसान नेता पंडित राजकुमार शुक्ल के आग्रह पर महात्मा गांधी मोतिहारी पधारे थे। उस दौर में अंग्रेजों ने किसानों पर एक दमनकारी तिनकठिया प्रथा थोप रखी थी, जिसके तहत उन्हें जमीन के तय हिस्से पर नील की खेती करना अनिवार्य था। गांधी जी ने इस शोषण के खिलाफ आवाज उठाई और सत्याग्रह का वह मंत्र दिया जिसने आगे चलकर देश की आजादी की लड़ाई को नई दिशा दी। चंपारण की यह ऐतिहासिक विरासत आज भी देश-दुनिया को सत्य और अहिंसा का संदेश देती है। गांधी संग्रहालय इसी विरासत का जीवित प्रमाण है और सौरभ जोरवाल ने अपनी विदाई के दिन अपने बच्चों को उसी धरोहर से जोड़ने का काम किया। तीन साल का कार्यकाल और दो बार मिला राष्ट्रपति पुरस्कार सौरभ जोरवाल पिछले तीन साल से पूर्वी चंपारण के कलेक्टर के रूप में काम कर रहे थे। इस कार्यकाल में उनका नेतृत्व काफी सराहा गया। उनकी देखरेख में जिले में लोकसभा और विधानसभा दोनों चुनाव शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हुए, जिसके लिए उन्हें दो बार राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया गया। अब उनका तबादला पटना स्थित साउथ बिहार पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड (SBPDCL) में प्रधान निदेशक के पद पर हुआ है। सोमवार को पदभार संभालेंगे नए DM सौरभ सुमन यादव सौरभ जोरवाल की जगह 2019 बैच के IAS अधिकारी सौरभ सुमन यादव सोमवार को पूर्वी चंपारण के नए जिलाधिकारी के रूप में पदभार ग्रहण करेंगे। जाते-जाते सौरभ जोरवाल ने जो संदेश छोड़ा, वह केवल प्रशासनिक गलियारों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि आम नागरिकों के बीच भी उनकी इस विदाई की खूब तारीफ हो रही है। उन्होंने यह जता दिया कि प्रशासनिक पद बदल सकते हैं, जिम्मेदारियां बदल सकती हैं, लेकिन जो व्यक्ति अपनी जड़ों, इतिहास और मूल्यों से जुड़ा रहता है, उसकी असली पहचान कभी नहीं बदलती। इसका आप पर असर • भारत में: यह घटना यह याद दिलाती है कि सरकारी अधिकारी अपनी नियुक्ति वाले क्षेत्र की ऐतिहासिक विरासत को आम जन से जोड़ने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। • मोतिहारी में: गांधी संग्रहालय पर नई सुर्खियां आने से स्थानीय नागरिकों और देशभर से आने वाले पर्यटकों में इस ऐतिहासिक धरोहर के प्रति रुचि बढ़ सकती है। सवाल-जवाब 1. सौरभ जोरवाल का तबादला किस पद पर और कहां हुआ है? उनका तबादला पटना स्थित साउथ बिहार पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड (SBPDCL) में प्रधान निदेशक के पद पर हुआ है। 2. उन्होंने विदाई के आखिरी दिन औपचारिक कार्यक्रम क्यों नहीं किया? उन्होंने फाइलों और औपचारिकताओं की बजाय अपने बच्चों को मोतिहारी के गांधी संग्रहालय ले जाकर महात्मा गांधी के संघर्ष और चंपारण सत्याग्रह की कहानी सुनाना जरूरी समझा। 3. महात्मा गांधी मोतिहारी कब और किसके आग्रह पर आए थे? 1917 में किसान नेता पंडित राजकुमार शुक्ल के आग्रह पर महात्मा गांधी मोतिहारी आए थे और तिनकठिया प्रथा के खिलाफ सत्याग्रह छेड़ा था। 4. सौरभ जोरवाल को राष्ट्रपति पुरस्कार क्यों और कितनी बार मिला? पूर्वी चंपारण में लोकसभा और विधानसभा दोनों चुनाव शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न कराने के लिए उन्हें दो बार राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 5. पूर्वी चंपारण के नए DM कौन होंगे और वह कब पदभार संभालेंगे? 2019 बैच के IAS अधिकारी सौरभ सुमन यादव सोमवार को नए जिलाधिकारी के रूप में पदभार ग्रहण करेंगे। 6. सौरभ जोरवाल कितने साल पूर्वी चंपारण के कलेक्टर रहे? वह 3 साल पूर्वी चंपारण के कलेक्टर रहे। 7. तिनकठिया प्रथा क्या थी जिसके खिलाफ गांधी जी ने आंदोलन किया? यह अंग्रेजों की एक दमनकारी प्रथा थी जिसके तहत किसानों को जमीन के एक निश्चित हिस्से पर नील की खेती करना अनिवार्य था। प्रेरणा और सबक सौरभ जोरवाल की इस विदाई से हर कोई कुछ ठोस सीख सकता है। • पद से बड़े होते हैं मूल्य: जब पद छोड़ने का वक्त आया, तो उन्होंने समारोह नहीं, इतिहास चुना। यह बताता है कि असली पहचान ओहदे में नहीं, विचारों में होती है। • बच्चों को दें जड़ों का अनुभव: उन्होंने अपने बच्चों को किताब नहीं, जगह दी। ऐतिहासिक स्थल पर जाकर संघर्ष की कहानी सुनाना एक मजबूत परवरिश का तरीका है जो जिंदगीभर याद रहता है। • उपलब्धि के बाद भी सादगी चुनें: दो बार राष्ट्रपति पुरस्कार मिलने के बाद भी उन्होंने शांत और सादगी से विदाई ली। यह सिखाता है कि असली सफलता को शोर की जरूरत नहीं होती। • जिस जमीन पर काम करें, उससे जुड़ें: तीन साल तक चंपारण की सेवा करने वाले जोरवाल उस जमीन के इतिहास को अपने दिल में लेकर गए। यह जुड़ाव किसी भी काम को सिर्फ नौकरी से ऊपर उठाकर एक मिशन बना देता है। https://trendkia.com/bihar/purvi-champaran-ke-dm-saurabh-jorwal-ki-yadagara-vidai-bachchon-snga-gandhi-sngrahalaya-pahunche-aura-satyagraha-ki-kahani-sunai-2430 TrendKia — Har trend, sabse pehle.