# राजधानी में सरकारी शिक्षा का दोहरा संकट, एक तरफ जर्जर दो कमरों में 80 छात्र तो दूसरी ओर खाली पड़ी कक्षाएं

> पटना के प्राथमिक विद्यालयों में बुनियादी ढांचे का भारी असंतुलन देखने को मिल रहा है। गर्दनीबाग में 80 बच्चों को टपकती छतों वाले महज दो कमरों में बैठाया जा रहा है, जबकि महावीर नगर में पर्याप्त व्यवस्था के बाद भी छात्र नहीं मिल रहे हैं।

**Type:** article · **Category:** बिहार · **Published:** 2026-09-30 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/bihar/rajadhani-men-sarakari-shiksha-ka-dohara-snkata-eka-tarapha-jarjara-do-kamaron-men-80-chhatra-to-dusari-ora-khali-pari-kakshaen-40360 · **Language:** Hindi
**Tags:** पटना, बिहार शिक्षा, सरकारी स्कूल, गर्दनीबाग, महावीर नगर, प्राथमिक विद्यालय, मिड डे मील, शिक्षा ढांचा

बिहार की राजधानी पटना के प्राथमिक विद्यालयों से बुनियादी सुविधाओं और छात्रों की मौजूदगी को लेकर व्यवस्था की दो निहायत विरोधाभासी तस्वीरें सामने आई हैं। एक ही शहर की सीमा के भीतर जहां एक प्राथमिक विद्यालय में जगह की गंभीर तंगी के कारण एक ही कमरे के भीतर तीन-तीन कक्षाओं का संचालन मजबूरी बन चुका है, वहीं दूसरे विद्यालय में शिक्षकों की पर्याप्त तैनाती और पर्याप्त कमरों की मौजूदगी के बावजूद कक्षाएं लगभग वीरान नजर आ रही हैं। संसाधनों और नामांकन का यह असंतुलन गर्दनीबाग और महावीर नगर के दो अलग-अलग सरकारी प्राथमिक स्कूलों की पड़ताल में स्पष्ट रूप से उजागर हुआ है।

## दो छोटे कमरों में सिमटी 80 बच्चों की प्राथमिक शिक्षा
गर्दनीबाग इलाके में स्थित प्राथमिक विद्यालय में कुल 80 छात्र-छात्राओं का औपचारिक नामांकन दर्ज है। इतने बच्चों की उपस्थिति और प्राथमिक स्तर की पांच कक्षाओं की जिम्मेदारी संभालने के लिए पूरे विद्यालय परिसर में सिर्फ दो कमरे ही उपलब्ध हैं। कमरों की इस विकट कमी की वजह से विद्यालय प्रबंधन को सभी कक्षाओं को आपस में मिलाकर पढ़ाने की व्यवस्था करनी पड़ रही है। पहली कक्षा, दूसरी कक्षा और तीसरी कक्षा के सभी नामांकित बच्चों को एक ही कमरे में ठूंसकर बैठाया जाता है, जबकि विद्यालय के दूसरे कमरे में चौथी कक्षा और पांचवीं कक्षा के विद्यार्थियों को एक साथ बैठाकर पढ़ाई पूरी कराई जा रही है।

## एक शिक्षक के जिम्मे दो अलग-अलग ब्लैकबोर्ड और तीन कक्षाएं
एक ही चारदीवारी के अंदर तीन अलग-अलग शैक्षणिक स्तरों के बच्चों को संभालने के लिए स्कूल प्रबंधन ने बैठने का एक खास तौर-तरीका तैयार किया है। इस व्यवस्था के तहत पहली और दूसरी कक्षा के विद्यार्थियों को एक निश्चित दिशा की ओर मुंह करके बैठाया जाता है, जबकि ठीक उनके सामने वाली बेंचों पर तीसरी कक्षा के बच्चों को विपरीत दिशा में मुख करके बिठाया जाता है। दोनों दिशाओं में अध्ययनरत इन दो अलग-अलग समूहों के लिए दीवार पर दो अलग-अलग ब्लैकबोर्ड भी लगाए गए हैं।

कक्षा में पढ़ाने के दौरान शिक्षक को लगातार कमरे के एक छोर से दूसरे छोर तक फेरे लगाने पड़ते हैं। शिक्षक पहले एक ब्लैकबोर्ड की तरफ खड़े होकर एक समूह के बच्चों को पाठ समझाते हैं और फिर उन्हें अपनी कॉपी में लिखने या याद करने का काम सौंपकर तुरंत दूसरे ब्लैकबोर्ड की तरफ मुड़ जाते हैं। वहां पहुंचकर वे दूसरी कक्षा के पाठ्यक्रम के अनुसार अध्यापन शुरू करते हैं। इस कवायद का मुख्य उद्देश्य यही है कि एक ही कमरे में बैठे होने के बावजूद अलग-अलग पाठ्यक्रम की पढ़ाई कर रहे बच्चों का ध्यान एक-दूसरे की तरफ न भटके, लेकिन इस जुगत में शिक्षक और छात्र दोनों के लिए एकाग्रता बनाए रखना बेहद चुनौतीपूर्ण साबित हो रहा है।

## चौथी और पांचवीं कक्षा का भी एक ही छत के नीचे संचालन
विद्यालय के दूसरे कमरे का हाल भी पहले कमरे से कतई अलग नहीं है। वहां चौथी और पांचवीं कक्षा के बच्चों को एक ही छत के नीचे बैठाया जाता है। यहां भी दोनों कक्षाओं के छात्र बेंचों की समानांतर पंक्तियों में एक-दूसरे के विपरीत दिशा में बैठते हैं। पढ़ाने वाले शिक्षक को बारी-बारी से दोनों तरफ जाना पड़ता है, जहां पहले वे चौथी कक्षा के छात्रों को विषय समझाते हैं और फिर पीछे घूमकर पांचवीं कक्षा के विद्यार्थियों को आगे का सबक सिखाते हैं। इस तरह पूरे विद्यालय की प्राथमिक शिक्षा का पहिया महज दो कमरों की संकरी जगह में उलझकर चल रहा है।

## सीलिंग का प्लास्टर टूटने और छत से पानी टपकने का खतरा
गर्दनीबाग के इस प्राथमिक विद्यालय में कमरों का अभाव ही इकलौती मुश्किल नहीं है। दोनों कमरों की स्थिति बेहद जर्जर और खतरनाक बनी हुई है। कमरों की छत की सीलिंग जगह-जगह से चटक चुकी है और उसका प्लास्टर अक्सर टूटकर नीचे गिरता रहता है। विद्यालय में उपस्थित लोगों का कहना है कि कई बार बच्चों के ऊपर ही छत का मलबा गिरने की नौबत आ जाती है। इसके अलावा बरसात के मौसम में छत से पानी टपकने लगता है, जिससे पूरे फर्श पर पानी भर जाता है। सीलन और टपकते पानी के बीच छोटे बच्चों का बैठना न केवल उनकी पढ़ाई में रुकावट बनता है, बल्कि उनकी शारीरिक सुरक्षा के लिए भी गंभीर खतरा पैदा करता है।

## महावीर नगर में शिक्षक और कमरे पर्याप्त, मगर कक्षाएं खाली
गर्दनीबाग से अलग महावीर नगर के एक अन्य प्राथमिक विद्यालय की स्थिति एकदम विपरीत देखने को मिली है। इस परिसर में कमरों और पढ़ाने वाले शिक्षकों की कोई कमी नजर नहीं आती, लेकिन यहां विद्यार्थियों की संख्या अप्रत्याशित रूप से काफी कम है। इस विद्यालय में कुल 5 शिक्षक पदस्थापित हैं, जबकि पूरे स्कूल में कुल मिलाकर सिर्फ 45 बच्चों का ही नामांकन है। सरकारी मानकों के अनुसार यहां औसतन एक शिक्षक के हिस्से में केवल 9 छात्र आते हैं।

छात्रों की कम संख्या का असर यह है कि कक्षाओं में सन्नाटा पसरा रहता है। किसी कक्षा में महज पांच बच्चे मौजूद मिले, तो किसी अन्य कक्षा में केवल चार विद्यार्थी ही बैठे दिखाई दिए। विद्यालय के कमरों में से एक कमरे का इस्तेमाल प्रधानाध्यापक के कार्यालय के रूप में किया जा रहा है। इसके बावजूद कमरों की उपलब्धता पर कोई असर नहीं पड़ता, क्योंकि बच्चों की कुल संख्या ही इतनी सीमित है। दोपहर में जब मिड डे मील के वितरण की घंटी बजी, तब पूरे परिसर में केवल 25 बच्चे ही भोजन करने के लिए कतार में उपस्थित नजर आए।

## बस्तियों के हटने और परिवारों के पलायन से घटी बच्चों की संख्या
महावीर नगर के इस विद्यालय में बच्चों को दाखिले के लिए प्रेरित करने और उन्हें स्कूल तक लाने का दायित्व तालीम मरकज से जुड़ी एक महिला कार्यकर्ता के पास है। उन्होंने विद्यालय में छात्रों की कम संख्या के पीछे के स्थानीय कारणों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि विद्यालय के आसपास घनी आबादी और झुग्गी-झोपड़ियों की संख्या बहुत कम है।

इसके साथ ही, उन्होंने एक अन्य प्रमुख कारण का उल्लेख करते हुए बताया कि जब प्रशासन या पुलिस द्वारा आसपास की झुग्गी बस्तियों को हटाया जाता है, तो वहां रहने वाले दिहाड़ी मजदूर परिवार अपने ठिकाने बदलकर अन्य स्थानों पर चले जाते हैं। परिवारों के इस तरह अचानक विस्थापित होने और दूसरी जगहों पर चले जाने के कारण उनके बच्चे भी विद्यालय छोड़ देते हैं। बस्तियों के हटने से सीधे तौर पर सरकारी स्कूलों में दर्ज उपस्थिति और नियमित नामांकन का आंकड़ा घट जाता है।

## इसका आप पर असर
सरकारी स्कूलों में बुनियादी ढांचे का यह असंतुलन गरीब परिवारों के बच्चों की सुरक्षा और शिक्षा की गुणवत्ता पर सीधा असर डालता है।

- **भारत में:** समग्र शिक्षा अभियान और सरकारी बजट के बावजूद प्राथमिक स्कूलों में ढांचागत विषमता देशव्यापी चिंता बनी हुई है। सही योजना न होने से कहीं शिक्षकों पर अत्यधिक बोझ पड़ता है तो कहीं सरकारी संसाधन पूरी तरह उपयोग नहीं हो पाते।
- **पटना में:** गर्दनीबाग स्कूल में पढ़ने वाले छात्रों के अभिभावकों को जर्जर छतों और टपकते पानी के कारण बच्चों की शारीरिक सुरक्षा को लेकर सतर्क रहना होगा। वहीं महावीर नगर के आसपास रहने वाले अभिभावक अपने बच्चों को कम छात्र संख्या वाले इस स्कूल में भेजकर बेहतर शिक्षक अनुपात का लाभ उठा सकते हैं।
- **छात्रों की शिक्षा पर असर:** एक ही कमरे में दो ब्लैकबोर्ड पर कई कक्षाएं चलने से बच्चों की एकाग्रता और बुनियादी सीखने की क्षमता पर बुरा असर पड़ता है। छोटे बच्चे अलग-अलग पाठ्यक्रमों के शोर के बीच जरूरी बुनियादी गणित और भाषा कौशल सीखने से वंचित रह जाते हैं।
- **मिड डे मील योजना:** महावीर नगर में 45 में से केवल 25 बच्चों का भोजन के समय मौजूद होना पोषण योजना के कवरेज में भारी गिरावट को दर्शाता है। इससे यह साफ होता है कि बस्तियों के उजड़ने से गरीब बच्चों का नियमित पोषण सीधे तौर पर प्रभावित हो रहा है।

## ऐसा क्यों हुआ
राजधानी पटना के प्राथमिक विद्यालयों में इस तरह का विरोधाभास प्रशासनिक नियोजन की विफलता और तेजी से बदलते स्थानीय जनसांख्यिकीय कारकों के कारण बना हुआ है।

- **कमरों की गंभीर कमी:** गर्दनीबाग विद्यालय में सिर्फ दो कमरे होने के कारण शिक्षकों को पहली, दूसरी और तीसरी कक्षा को एक ही कमरे में विपरीत दिशा में बैठाकर पढ़ाने की विवशता झेलनी पड़ रही है। शहरी आबादी के विस्तार के अनुरूप अतिरिक्त कमरों का निर्माण न होने से यह संकट गहरा गया है।
- **भवनों का खराब रखरखाव:** विद्यालयों के भवनों की मरम्मत समय पर न होने से गर्दनीबाग स्कूल की छत का प्लास्टर चटक चुका है और बारिश में कमरों में पानी टपकता है। बुनियादी रख-रखाव के अभाव में यह स्कूल बच्चों की सुरक्षा के लिए खतरा बन चुका है।
- **बस्तियों का उजड़ना और पलायन:** महावीर नगर के स्कूल में पर्याप्त कमरे और शिक्षक होने के बावजूद छात्रों की कमी की मुख्य वजह आसपास से कच्ची बस्तियों का हटाया जाना है। पुलिस और प्रशासन द्वारा झुग्गियां हटाए जाने के बाद मजदूर परिवार दूसरी जगहों पर विस्थापित हो जाते हैं।
- **असंतुलित संसाधन आवंटन:** शहर के भीतर ही एक स्कूल में 80 बच्चों पर 2 कमरे हैं जबकि दूसरे में 45 बच्चों पर 5 शिक्षक तैनात हैं। शिक्षा विभाग द्वारा छात्र संख्या के आधार पर शिक्षकों और कमरों का युक्तिसंगत पुनर्वितरण न किए जाने से यह असंतुलन बना हुआ है।

## सवाल-जवाब

### 1. गर्दनीबाग के प्राथमिक विद्यालय में कुल कितने बच्चे नामांकित हैं?
गर्दनीबाग के इस प्राथमिक विद्यालय में कुल 80 बच्चों का औपचारिक नामांकन है, जिनके लिए केवल दो कमरे उपलब्ध हैं।

### 2. एक कमरे में तीन कक्षाओं को शिक्षक कैसे पढ़ाते हैं?
कमरे में कक्षा 1 और 2 के बच्चों को एक दिशा में और कक्षा 3 के बच्चों को विपरीत दिशा में बैठाया जाता है, जहां शिक्षक दो अलग-अलग ब्लैकबोर्ड के जरिए बारी-बारी से पढ़ाते हैं।

### 3. गर्दनीबाग विद्यालय के कमरों की भौतिक स्थिति कैसी है?
विद्यालय के कमरों की छत की सीलिंग का प्लास्टर टूटकर गिरता रहता है और बरसात के समय छतों से पानी टपकने की समस्या बनी रहती है।

### 4. महावीर नगर के विद्यालय में कितने शिक्षक और बच्चे हैं?
महावीर नगर के प्राथमिक विद्यालय में 5 शिक्षक पदस्थापित हैं, जबकि वहां कुल 45 बच्चों का नामांकन दर्ज है।

### 5. महावीर नगर में मिड डे मील के समय कितने छात्र उपस्थित मिले?
मिड डे मील की घंटी बजने के दौरान महावीर नगर के स्कूल परिसर में केवल 25 बच्चे ही मौजूद दिखाई दिए।

### 6. महावीर नगर स्कूल में बच्चों की कम संख्या का मुख्य कारण क्या बताया गया?
तालीम मरकज की कार्यकर्ता के अनुसार आसपास कम झुग्गियों का होना और पुलिस द्वारा बस्तियों को हटाने के बाद परिवारों का विस्थापित होना बच्चों की कमी की मुख्य वजह है।

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