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  "title": "राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को पसंद आई भागलपुर के कारीगरों की कलाकृति, कांजीवरम साड़ी पर उकेरी गई अंग की प्रसिद्ध मंजूषा पेंटिंग",
  "summary": "भागलपुर के सिल्क उद्योग में एक नया प्रयोग करते हुए बुनकरों ने दक्षिण भारत की कांजीवरम साड़ी पर पारंपरिक मंजूषा कला को उकेरा है, जिसे हाल ही में राष्ट्रपति भवन में भी सराहना मिली।",
  "content": "बिहार के सिल्क सिटी के रूप में पहचाने जाने वाले भागलपुर के बुनकरों और कलाकारों ने हस्तकला के क्षेत्र में एक अनूठा प्रयोग किया है। दक्षिण भारत की मशहूर कांजीवरम साड़ी पर अंग प्रदेश की पारंपरिक मंजूषा कला को उकेरकर एक नई पहचान दी जा रही है। इस नवीन कारीगरी की धमक अब राष्ट्रीय स्तर पर भी देखने को मिल रही है, जब देश की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने इस खास संयोजन वाली साड़ी को पहनकर स्थानीय लोककला का मान बढ़ाया।\n\nराष्ट्रपति भवन में दिखी भागलपुर की सांस्कृतिक झलक\nहाल ही में राष्ट्रपति भवन परिसर में आयोजित आर्टिस्ट इन रेजीडेंसी कार्यक्रम के दौरान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू इस विशेष मंजूषा पेंटिंग वाली कांजीवरम साड़ी में नजर आईं। यह मनमोहक साड़ी उन्हें भागलपुर के विख्यात मंजूषा गुरु मनोज पंडित द्वारा उपहार स्वरूप भेंट की गई थी। पूरी तरह हाथ से तैयार की जाने वाली इस डिजाइनिंग प्रक्रिया से कांजीवरम की स्वाभाविक सुंदरता कई गुना बढ़ जाती है। इस पहल से न केवल रेशमी वस्त्रों को नया आकर्षण मिल रहा है, बल्कि क्षेत्र के पारंपरिक कलाकारों के लिए नए अवसर भी पैदा हो रहे हैं।\n\nरोजगार के नए अवसर और लोककला का वैश्विक प्रसार\nभागलपुर लंबे समय से अपने रेशमी कपड़ों और सिल्क उद्योग के लिए दुनिया भर में जाना जाता है। यहां के कुशल कारीगर अब समय की मांग के अनुसार डिजाइनों में आधुनिक बदलाव कर रहे हैं। कांजीवरम जैसी प्रतिष्ठित साड़ियों पर हर पीस में हाथ से मंजूषा आकृतियां बनाने का काम तेजी से बढ़ रहा है। इस अनोखे संगम से स्थानीय स्तर पर बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर सृजित हो रहे हैं। इसके साथ ही, व्यापारिक और सांस्कृतिक मंचों के माध्यम से अंग क्षेत्र की ऐतिहासिक कला का प्रसार देश और विदेश दोनों जगह हो रहा है।\n\nसती बिहुला की पौराणिक कथा और रंगों का गहरा अर्थ\nमंजूषा कला अंग क्षेत्र की एक प्राचीन और समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर है, जिसका जुड़ाव पौराणिक मान्यताओं से है। लोक कथाओं के अनुसार, सती बिहुला अपने मृत पति के प्राण वापस लाने के लिए मंजूषा में बैठकर ही कठिन यात्रा पर निकली थीं। इस लोक चित्रकला में पारंपरिक रूप से तीन मुख्य रंगों का उपयोग किया जाता है, जिनमें हरा, नारंगी और पीला रंग शामिल हैं। ये तीनों रंग क्रमशः सुख, समृद्धि और विकास के प्रतीक माना जाते हैं। भागलपुर जिले के लगभग प्रत्येक घर में इस ऐतिहासिक कला की सुंदर झलक देखने को मिल जाती है।\n\nइसका आप पर असर\nभारत में: कांजीवरम और मंजूषा कला का यह संगम देश में पारंपरिक हस्तशिल्प और सिल्क साड़ियों के प्रेमियों के लिए एक नया आकर्षक विकल्प पेश करता है।\n\nभागलपुर में: स्थानीय बुनकरों और मंजूषा कलाकारों के लिए रोजगार तथा आय के नए साधन खुल रहे हैं, जिससे क्षेत्रीय लोककला को राष्ट्रीय पहचान मिल रही है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. भागलपुर में कांजीवरम साड़ियों पर कौन सा नया प्रयोग किया गया है?\nभागलपुर के कारीगरों ने दक्षिण भारत की कांजीवरम सिल्क साड़ियों पर बिहार के अंग क्षेत्र की प्रसिद्ध मंजूषा लोककला को हाथ से पेंट करके उकेरा है।\n\n2. राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को यह विशेष साड़ी किसने भेंट की थी?\nयह मंजूषा पेंटिंग वाली कांजीवरम साड़ी भागलपुर के प्रसिद्ध मंजूषा गुरु मनोज पंडित द्वारा राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को भेंट की गई थी।\n\n3. राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने यह साड़ी किस अवसर पर पहनी थी?\nउन्होंने राष्ट्रपति भवन में आयोजित 'आर्टिस्ट इन रेजीडेंसी' कार्यक्रम के दौरान यह साड़ी पहनी थी।\n\n4. मंजूषा कला में मुख्य रूप से कौन से रंगों का उपयोग होता है?\nमंजूषा कला में मुख्य रूप से तीन रंग (हरा, नारंगी और पीला) उपयोग किए जाते हैं, जो सुख, समृद्धि और विकास के प्रतीक हैं।\n\n5. मंजूषा कला का पौराणिक महत्व क्या है?\nयह कला सती बिहुला की कथा पर आधारित है, जो अपने मृत पति के प्राण वापस लाने के लिए मंजूषा में बैठकर यात्रा पर निकली थीं।\n\nप्रेरणा और सबक\nसफलता के मुख्य सबक:\n\n• परंपरा और आधुनिकता का मेल: दो अलग-अलग सांस्कृतिक शैलियों (कांजीवरम और मंजूषा) को जोड़कर नया बाजार तैयार किया जा सकता है।\n• स्थानीय कला का मूल्य: अपनी जड़ों से जुड़ी लोककला को सही मंच मिले तो वह देश के सर्वोच्च पद तक पहुंच सकती है।\n• कारीगरों का नवाचार: निरंतर प्रयोग और कौशल विकास से पारंपरिक उद्योगों को पुनर्जीवित किया जा सकता है।",
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  "category": "बिहार",
  "publishedAt": "2026-08-08",
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