तीनों सेनाओं का सुरक्षा कवच बनने चली त्रिशूल मिसाइल सेना की अग्रिम पंक्ति से बाहर क्यों हुई इंटीग्रेटेड गाइडेड मिसाइल डेवलपमेंट प्रोग्राम के तहत विकसित त्रिशूल मिसाइल को समुद्र में सी-स्किमिंग लक्ष्यों को भेदने में तकनीकी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। 80 से अधिक परीक्षणों के बाद इसे एक्टिव वेपन सिस्टम के बजाय टेक्नोलॉजी डेमोंस्ट्रेटर घोषित किया गया। भारतीय रक्षा अनुसंधान के इतिहास में साल 1983 एक युगांतरकारी मोड़ लेकर आया, जब डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के नेतृत्व में इंटीग्रेटेड गाइडेड मिसाइल डेवलपमेंट प्रोग्राम की आधारशिला रखी गई। इस महत्वाकांक्षी मिशन के तहत पांच प्रमुख हथियारों के विकास का बीड़ा उठाया गया, जिनमें पृथ्वी, अग्नि, आकाश, नाग और त्रिशूल शामिल थे। भगवान शिव के अमोघ अस्त्र के नाम पर रखी गई त्रिशूल मिसाइल की संकल्पना एक ऐसे त्वरित रक्षा तंत्र के रूप में की गई थी जो थल सेना, नौसेना और वायुसेना तीनों के लिए एक अभेद्य ढाल साबित हो सके। वैज्ञानिकों का उद्देश्य एक ऐसा क्विक-रिएक्शन सरफेस-टू-एयर मिसाइल सिस्टम तैयार करना था, जो सीमा पर मंडराने वाले दुश्मन के लड़ाकू विमानों, हेलीकॉप्टरों और नीची उड़ान भरने वाली एंटी-शिप मिसाइलों को बेहद कम समय में हवा में ही नष्ट कर दे। शुरुआती सफलता और तकनीकी क्षमताएं त्रिशूल मिसाइल को कम दूरी और बेहद कम ऊंचाई पर उड़ने वाले लक्ष्यों को तेजी से गिराने के उद्देश्य से तैयार किया गया था। इस रक्षा प्रणाली की प्रारंभिक मारक क्षमता 9 से 12 किलोमीटर तय की गई थी, जबकि इसकी गति ध्वनि की रफ्तार से लगभग दोगुनी निर्धारित थी। इसका मुख्य कार्यक्षेत्र दुश्मन के आक्रामक जेट विमानों, अटैक हेलीकॉप्टरों और पानी की सतह के नजदीक उड़ने वाली मिसाइलों को ट्रैक करके तुरंत मार गिराना था। 5 जून 1989 को ओडिशा स्थित चांदीपुर के परीक्षण केंद्र से त्रिशूल ने अपनी पहली सफल उड़ान भरी। इस उड़ान में मिसाइल के सॉलिड प्रोपेलेंट इंजन ने सटीक प्रदर्शन किया और प्रणाली ने अपने डिकॉय लक्ष्य को सटीकता से भेद दिया। इस प्रारंभिक कामयाबी ने भारत को जमीन से हवा में मार करने वाली अत्याधुनिक मिसाइल तकनीक में महारत रखने वाले चुनिंदा वैश्विक देशों की कतार में ला खड़ा किया था। समुद्र की लहरों के बीच रडार की विफलता जमीन और आसमान में शुरुआती क्षमताएं साबित करने के बाद त्रिशूल के सामने सबसे जटिल चुनौती नौसेना के कठोर मानकों पर खरा उतरने की थी। नौसेना को अपने युद्धपोतों की रक्षा के लिए एक ऐसे सटीक हथियार की जरूरत थी जो सी-स्किमिंग यानी समुद्र की सतह से महज कुछ मीटर की ऊंचाई पर उड़कर आने वाली खतरनाक क्रूज मिसाइलों को हवा में ही खाक कर सके। यहीं से परियोजना में गंभीर तकनीकी अड़चनों का सिलसिला आरंभ हुआ। समुद्र की अशांत लहरों से टकराकर रडार की किरणें बिखर जाती थीं, जिससे त्रिशूल का कमांड गाइडेंस सिस्टम पानी की सतह के करीब पहुंचते ही भ्रमित हो जाता था। नौसेना की कार्यप्रणाली में सेकंड के दसवें हिस्से में सटीक प्रतिक्रिया और अचूक निशाने की आवश्यकता थी, परंतु त्रिशूल का ट्रैकिंग रडार और गाइडेंस सॉफ्टवेयर समुद्री वातावरण में बार-बार विफल साबित हो रहे थे। 80 से अधिक परीक्षण और इजराइल से बराक-1 का सौदा रक्षा वैज्ञानिकों ने इस गाइडेंस विफलता को दूर करने के लिए लगातार प्रयास किए। इस दौरान 80 से अधिक परीक्षण किए गए और मिसाइल के कई तकनीकी मॉडल्स बदले गए। थल सेना और वायुसेना के बुनियादी मानकों के अनुरूप प्रदर्शन करने के बावजूद त्रिशूल नौसेना के अत्यधिक संवेदनशील और सख्त परीक्षणों में वांछित सटीकता हासिल नहीं कर सका। दूसरी तरफ आईजीएमडीपी के तहत तैयार किए जा रहे अन्य हथियार, जैसे पृथ्वी और अग्नि, क्रमिक विकास के बाद सेनाओं के बेड़े में सफलतापूर्वक शामिल हो रहे थे। 1999 के कारगिल युद्ध के बाद नौसेना अपनी सुरक्षा प्राथमिकताओं और समुद्री तैयारियों में किसी भी प्रकार की देरी का जोखिम नहीं उठा सकती थी। स्वदेशी परियोजना में हो रहे तकनीकी विलंब को देखते हुए भारतीय नौसेना ने तत्काल समाधान के तौर पर इजराइल से बराक-1 मिसाइल प्रणाली खरीदने का निर्णय लिया, जिससे त्रिशूल के सक्रिय भविष्य को गहरा धक्का लगा। एक्टिव हथियार से टेक्नोलॉजी डेमोंस्ट्रेटर में बदलाव जैसे-जैसे समय बीता, तीनों सशस्त्र सेनाओं की आधुनिक परिचालन आवश्यकताएं त्रिशूल के तत्कालीन विकास स्तर से काफी आगे निकल चुकी थीं। दशकों तक खिंचते प्रोजेक्ट, बढ़ते वित्तीय बजट और सेनाओं के घटते रुझान को ध्यान में रखते हुए 2007-08 में रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन और सरकार ने एक कड़ा प्रशासनिक फैसला लिया। त्रिशूल को अग्रिम पंक्ति के सक्रिय हथियार के रूप में सेना में तैनात करने के बजाय आधिकारिक तौर पर टेक्नोलॉजी डेमोंस्ट्रेटर का दर्जा दे दिया गया। इसका सीधा अर्थ यह था कि त्रिशूल युद्धपोतों या सीमा पर तैनात नहीं होगी, परंतु इसके अनुसंधान से प्राप्त तकनीकी ज्ञान, डाटा और प्रयोग आने वाले भविष्य के उन्नत रक्षा प्रोजेक्ट्स के लिए आधार का काम करेंगे। भविष्य के रक्षा प्रोजेक्ट्स को मिला मजबूत आधार सैन्य हथियारों के इतिहास में कई बार कोई विशेष प्रोजेक्ट सीधे मैदान में नहीं उतर पाता, लेकिन वह अगली पीढ़ी के उन्नत हथियारों के विकास की दिशा तय कर देता है। त्रिशूल परियोजना ने भारत के मिसाइल वैज्ञानिकों को बेहद मूल्यवान तकनीकी समझ प्रदान की। इसके लिए तैयार की गई सॉलिड रॉकेट मोटर्स ने देश को तीव्र गति से त्वरित होने वाली रैपिड एक्सेलरेशन तकनीक में दक्ष बनाया। समुद्र में परीक्षणों के दौरान सामने आई रडार और सॉफ्टवेयर की कमियों से सीख लेकर ही भारत ने अपने आधुनिक ट्रैकिंग रडार और क्लोज-इन वेपन सिस्टम विकसित किए। स्वदेशी आईजीएमडीपी और इजराइल के संयुक्त सहयोग से विकसित की गई बराक-8 मिसाइल प्रणाली की तकनीकी बुनियाद और प्रारंभिक सीख काफी हद तक त्रिशूल के परीक्षणों और प्रयोगशालाओं में ही तराशी गई थी। इसका आप पर असर त्रिशूल मिसाइल परियोजना का यह ऐतिहासिक विश्लेषण भारत के स्वदेशी रक्षा अनुसंधान और सैन्य खरीद प्राथमिकताओं की वास्तविक कार्यप्रणाली को स्पष्ट करता है। • सैन्य आत्मनिर्भरता: जटिल हथियारों के विकास में आने वाली तकनीकी बाधाओं को समझना यह दिखाता है कि पूर्ण स्वदेशी तकनीक के निर्माण में कितना समय और संसाधन लगता है। इससे नागरिकों को रक्षा बजट के आवंटन और अनुसंधान की लंबी प्रक्रिया का यथार्थवादी परिप्रेक्ष्य मिलता है। • आपातकालीन रक्षा तैयारी: जब घरेलू हथियार प्रणाली समयसीमा पर खरी नहीं उतरती, तो सुरक्षा जरूरतों को पूरा करने के लिए विदेशी हथियारों की खरीद अनिवार्य हो जाती है। यह प्रक्रिया बताती है कि सामरिक सुरक्षा हमेशा विकास की अनिश्चितताओं से ऊपर रखी जाती है। • तकनीकी विकास का लाभ: भले ही कोई मिसाइल सेना में शामिल न हो, उससे विकसित प्रोपल्शन और रडार तकनीक अन्य रक्षा प्रणालियों को सशक्त बनाती है। इससे देश के रक्षा उद्योग और निजी विनिर्माण क्षेत्र में रोजगार और नवाचार के नए अवसर पैदा होते हैं। • करदाताओं के धन का प्रबंधन: पुराने अनुसंधानों को समय रहते टेक्नोलॉजी डेमोंस्ट्रेटर में बदलना वित्तीय संसाधनों को नए प्रोजेक्ट्स में लगाने का मार्ग प्रशस्त करता है। इससे रक्षा बजट की बर्बादी रुकती है और भविष्य के उन्नत प्रोजेक्ट्स को गति मिलती है। ऐसा क्यों हुआ त्रिशूल परियोजना को अग्रिम मोर्चे के हथियार के रूप में शामिल न करने का मुख्य कारण समुद्री परीक्षणों में रडार और गाइडेंस प्रणाली का लगातार विफल होना था। यह फैसला कई तकनीकी और परिचालन परिस्थितियों के बाद लिया गया। • सी-स्किमिंग और रडार बिखराव: समुद्र की उठती लहरों से टकराकर रडार की किरणें बिखर जाती थीं, जिससे पानी की सतह के बेहद करीब उड़ने वाले लक्ष्यों पर मिसाइल का कमांड गाइडेंस भटक जाता था। इस वजह से नौसेना के तय मानकों के अनुसार आवश्यक सटीकता हासिल नहीं हो सकी। • 80 से अधिक असफल परीक्षण: वैज्ञानिकों ने कई मॉडल बदले और 80 से ज्यादा टेस्ट किए, लेकिन ट्रैकिंग रडार और सॉफ्टवेयर की कमियां पूरी तरह दूर नहीं हो पाईं। थल और वायुसेना की तुलना में नौसेना की परिचालन आवश्यकताएं बहुत सख्त थीं। • कारगिल युद्ध के बाद तत्काल विकल्प: 1999 के कारगिल संघर्ष के बाद नौसेना अपनी सुरक्षा तैयारियों में कोई ढिलाई नहीं चाहती थी। त्रिशूल के परीक्षणों में हो रही देरी के चलते नौसेना ने इजराइल से बराक-1 मिसाइल खरीद ली, जिससे त्रिशूल की मांग घट गई। • बजट और समयसीमा का दबाव: दशकों की देरी और बढ़ते रक्षा खर्च के कारण 2007-08 में इसे एक्टिव वेपन सिस्टम के बजाय टेक्नोलॉजी डेमोंस्ट्रेटर घोषित करने का आधिकारिक निर्णय लिया गया। सवाल-जवाब 1. त्रिशूल मिसाइल को किस बड़े रक्षा कार्यक्रम के तहत विकसित किया गया था? त्रिशूल का विकास 1983 में डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के नेतृत्व में शुरू हुए इंटीग्रेटेड गाइडेड मिसाइल डेवलपमेंट प्रोग्राम के तहत किया गया था। 2. त्रिशूल की मारक क्षमता और गति क्या थी? प्रारंभिक दौर में त्रिशूल की मारक क्षमता 9 से 12 किलोमीटर और इसकी रफ्तार ध्वनि की गति से दोगुनी तय की गई थी। 3. त्रिशूल ने अपनी पहली सफल परीक्षण उड़ान कब भरी थी? त्रिशूल मिसाइल ने 5 जून 1989 को चांदीपुर के परीक्षण केंद्र से अपनी पहली सफल उड़ान भरी थी। 4. त्रिशूल को नौसेना के मानकों पर खरा उतरने में क्या तकनीकी दिक्कत आई? समुद्र की लहरों से टकराकर रडार किरणें बिखर जाती थीं, जिससे सी-स्किमिंग मिसाइलों को ट्रैक करने में इसका गाइडेंस सिस्टम भटक जाता था। 5. त्रिशूल में देरी के बाद भारतीय नौसेना ने कौन सी विदेशी मिसाइल खरीदी? त्रिशूल के ट्रायल में हो रहे विलंब के चलते भारतीय नौसेना ने इजराइल से बराक-1 मिसाइल प्रणाली खरीदने का फैसला किया। 6. त्रिशूल को टेक्नोलॉजी डेमोंस्ट्रेटर कब और क्यों घोषित किया गया? लगातार देरी, बजट वृद्धि और तकनीकी सीमाओं के चलते 2007-08 में डीआरडीओ और सरकार ने इसे टेक्नोलॉजी डेमोंस्ट्रेटर घोषित किया ताकि इसकी तकनीक भविष्य के प्रोजेक्ट्स में काम आ सके। https://trendkia.com/bihar/tinon-senaon-ka-suraksha-kavacha-banane-chali-trishul-missile-sena-ki-agrima-pnkti-se-bahara-kyon-hui-36517 TrendKia — Har trend, sabse pehle.