# अक्षय कुमार से छोटी उम्र में बनी थीं उनकी ऑनस्क्रीन मां, शेफाली शाह ने खोला फिल्म वक्त से जुड़ा दिलचस्प किस्सा

> फिल्म वक्त में अक्षय कुमार की मां का किरदार निभाने वाली शेफाली शाह ने खुलासा किया है कि उनके नाम की सिफारिश अमिताभ बच्चन ने की थी, जबकि मेकर्स पहले किसी अन्य दिग्गज अभिनेत्री को लेना चाहते थे।

**Type:** article · **Category:** बॉलीवुड · **Published:** 2026-10-05 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/bollywood/akshay-kumar-se-chhoti-umra-men-bani-thin-unaki-naskrina-man-shefali-shah-ne-khola-philma-waqt-se-jura-dilachaspa-kissa-43361 · **Language:** Hindi
**Tags:** शेफाली शाह, अमिताभ बच्चन, अक्षय कुमार, विपुल शाह, वक्त द रेस अगेंस्ट टाइम, बॉलीवुड, सिनेमा

सिनेमा जगत में कई बार ऐसे दिलचस्प संयोग बनते हैं जो किसी फिल्म की पूरी दिशा बदल देते हैं। वर्ष 2005 में रिलीज हुई पारिवारिक ड्रामा फिल्म 'वक्त: द रेस अगेंस्ट टाइम' की कास्टिंग को लेकर भी ऐसा ही एक बेहद रोचक वाकया सामने आया है। इस फिल्म में अभिनेत्री शेफाली शाह ने एक ऐसी मां का किरदार निभाया था, जो उम्र में अपने ऑनस्क्रीन बेटे अक्षय कुमार से असल जिंदगी में काफी छोटी थीं। उस दौरान शेफाली महज 30 से 32 वर्ष की थीं। अब अपनी नई पुस्तक 'द ओडेसिटी ऑफ बीइंग: ए सॉर्ट-ऑफ मेमॉयर' के जरिए अभिनेत्री ने इस फिल्म में अपने चयन और पर्दे के पीछे की पूरी कहानी साझा की है।

## जया बच्चन और हेमा मालिनी के नामों पर हुआ था विचार
फिल्म में सुमित्रा यानी सुमी का किरदार पूरी पटकथा की रीढ़ माना गया था, जो पिता और पुत्र के जटिल रिश्तों के बीच एक शांत मगर मजबूत कड़ी बनकर मौजूद रहती है। निर्देशक विपुल शाह शुरुआत में इस महत्वपूर्ण भूमिका के लिए जया बच्चन को कास्ट करने की योजना बना रहे थे, लेकिन किसी वजह से यह बात सिरे नहीं चढ़ सकी। इसके उपरांत दिग्गज अभिनेत्री हेमा मालिनी के नाम पर भी गंभीरता से विचार किया गया। हालांकि, वर्ष 2003 में आई फिल्म 'बागबान' में अमिताभ बच्चन और हेमा मालिनी की जोड़ी पहले ही दर्शकों के सामने आ चुकी थी। फिल्म निर्माता इस जोड़ी को तुरंत दोहराने के बजाय पर्दे पर कुछ नया और ताजगी भरा संयोजन प्रस्तुत करना चाहते थे।

## गुजराती नाटक से प्रेरित थी कहानी और किरदार का चुनाव
यह पारिवारिक फिल्म दरअसल आतिश कपाड़िया के मशहूर गुजराती नाटक 'आवजो व्हाला, फरी मलीशु' पर आधारित थी। इस फिल्म में प्रियंका चोपड़ा ने भी मुख्य भूमिका निभाई थी। जब शेफाली शाह ने यह मूल नाटक देखा था, तो वह सुमी के सशक्त चरित्र से बेहद प्रभावित हुई थीं। उन्होंने स्वयं विपुल शाह से इस किरदार को निभाने की इच्छा जताई थी। मगर उस वक्त विपुल शाह ने उन्हें साफ तौर पर मना कर दिया था। उनका मानना था कि महज 30 वर्ष की उम्र में पर्दे पर एक युवा अभिनेता की मां बनने से शेफाली के करियर पर टाइपकास्ट होने का जोखिम बढ़ जाएगा और उन्हें भविष्य में केवल मां के रोल मिलने लगेंगे।

## अमिताभ बच्चन के एक सुझाव से बदला पूरा फैसला
कास्टिंग को लेकर चल रही उलझन के बीच असली मोड़ तब आया जब फिल्म में पिता का किरदार निभा रहे अमिताभ बच्चन ने खुद पहल की। पिता की भूमिका के लिए अमिताभ बच्चन ही पहली और एकमात्र पसंद थे। जब मां के रोल के लिए अन्य विकल्पों पर बात नहीं बन पा रही थी, तो अमिताभ बच्चन ने निर्देशक विपुल शाह को शेफाली शाह का नाम सुझाया। सदी के महानायक की इस सिफारिश को निर्देशक टाल नहीं सके और आखिरकार यह किरदार शेफाली की झोली में आ गया। अभिनेत्री के लिए यह निर्णय किसी सपने के सच होने जैसा साबित हुआ, क्योंकि इसके जरिए उन्हें अपने पसंदीदा सह-कलाकार अमिताभ बच्चन और निर्देशक विपुल शाह के साथ एक साथ काम करने का शानदार अवसर प्राप्त हुआ।

## इसका आप पर असर
इस संस्मरण से दर्शकों और उभरते कलाकारों को सिनेमा उद्योग की आंतरिक कार्यप्रणाली और कास्टिंग के जोखिमों को समझने का अवसर मिलता है।

- **सिनेमा प्रेमियों के लिए:** यह जानकारी क्लासिक पारिवारिक फिल्मों के निर्माण और पर्दे के पीछे की रचनात्मक चुनौतियों को गहराई से उजागर करती है। दर्शक अब इस फिल्म के दृश्यों को एक नए और दिलचस्प दृष्टिकोण से देख सकेंगे।
- **कलाकारों के लिए सीख:** यह प्रसंग दिखाता है कि मजबूत किरदारों को चुनते समय रूढ़िवादिता और टाइपकास्ट होने के डर का सामना कैसे किया जाता है। जोखिम उठाकर भी यादगार अभिनय पेश किया जा सकता है।
- **कास्टिंग प्राथमिकताओं की समझ:** यह प्रसंग स्पष्ट करता है कि किसी बड़े प्रोजेक्ट में सह-कलाकारों का तालमेल और सिफारिशें कैसे अंतिम निर्णय को प्रभावित करती हैं। इससे फिल्म निर्माण की व्यवहारिक प्रक्रिया का पता चलता है।
- **साहित्य और आत्मकथा पाठकों के लिए:** इस संस्मरण से पाठकों को भारतीय सिनेमा के प्रतिष्ठित कलाकारों के वास्तविक अनुभवों को जानने का मौका मिलता है। पुस्तक के अंश फिल्मी सफर की सच्चाई बयां करते हैं।

## ऐसा क्यों हुआ
यह घटनाक्रम इसलिए सामने आया क्योंकि अभिनेत्री शेफाली शाह ने अपने संस्मरण में करियर के शुरुआती दौर के अहम अनुभवों और फैसलों को साझा किया है। फिल्म की कास्टिंग के दौरान कई बड़े विकल्पों पर विचार होने के बाद यह अनूठा फैसला लिया गया था।

- **शुरुआती विकल्पों का ना बन पाना:** निर्देशक विपुल शाह पहले जया बच्चन को कास्ट करना चाहते थे और हेमा मालिनी के नाम पर हालिया फिल्म बागबान के कारण सहमति नहीं बन सकी। निर्माताओं को पर्दे पर एक नई जोड़ी की दरकार थी।
- **उम्र और टाइपकास्टिंग की चिंता:** महज 30 वर्ष की उम्र में मां का रोल करने पर करियर सीमित होने का डर था, जिसके चलते निर्देशक शुरुआत में शेफाली को यह रोल देने के पक्ष में नहीं थे।
- **अमिताभ बच्चन का हस्तक्षेप:** जब मुख्य विकल्पों पर बात नहीं बनी, तो पिता का रोल कर रहे अमिताभ बच्चन ने खुद शेफाली शाह के नाम की सिफारिश निर्देशक से की, जिसने पूरी कास्टिंग तय कर दी।

## सवाल-जवाब

### 1. फिल्म वक्त किस साल रिलीज हुई थी?
यह फिल्म वर्ष 2005 में सिनेमाघरों में रिलीज हुई थी।

### 2. फिल्म में मां के किरदार के लिए पहली पसंद कौन थीं?
निर्देशक विपुल शाह शुरुआत में इस रोल के लिए जया बच्चन को कास्ट करना चाहते थे।

### 3. हेमा मालिनी को इस किरदार में क्यों नहीं लिया गया?
अमिताभ बच्चन और हेमा मालिनी की जोड़ी वर्ष 2003 की फिल्म बागबान में आ चुकी थी, इसलिए मेकर्स कुछ नया संयोजन चाहते थे।

### 4. शेफाली शाह के नाम की सिफारिश किसने की थी?
फिल्म में पिता का रोल निभा रहे अमिताभ बच्चन ने निर्देशक विपुल शाह को शेफाली शाह का नाम सुझाया था।

### 5. फिल्म वक्त की कहानी किस पर आधारित थी?
यह फिल्म आतिश कपाड़िया के गुजराती नाटक 'आवजो व्हाला, फरी मलीशु' पर आधारित थी।

### 6. शेफाली शाह ने इस पूरे किस्से का खुलासा कहां किया है?
उन्होंने अपनी नई किताब 'द ओडेसिटी ऑफ बीइंग: ए सॉर्ट-ऑफ मेमॉयर' में इस बात की जानकारी दी है।

## प्रेरणा और सबक
शेफाली शाह के इस फैसले से साबित होता है कि किसी भी कलाकार के लिए किरदार की ताकत उम्र और रूढ़ियों से कहीं अधिक मायने रखती है।

- **किरदार के प्रभाव को प्राथमिकता देना:** पारंपरिक भूमिकाओं के दायरे से बाहर निकलकर हमेशा सशक्त और कहानी को आगे बढ़ाने वाले किरदारों का चयन करना चाहिए।
- **संकोच के बावजूद पहल करना:** अपनी क्षमताओं पर भरोसा रखते हुए सही अवसरों के लिए स्वयं आगे बढ़कर बात रखने से नए रास्ते खुलते हैं।
- **रूढ़िवादिता के डर से ऊपर उठना:** करियर में टाइपकास्ट होने की आशंका के बावजूद अपनी कला और रचनात्मक संतुष्टि को सर्वोपरि मानना चाहिए।

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