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  "type": "article",
  "title": "अमिताभ और रेखा की जोड़ी का वो सुनहरा दौर जब चार सालों तक बॉक्स ऑफिस पर मचा रहा तहलका, जानें उस बेमिसाल केमिस्ट्री का पूरा सफर",
  "summary": "साल 1976 से 1979 के बीच अमिताभ बच्चन और रेखा की जोड़ी ने हर साल लगातार दो फिल्में देकर बॉक्स ऑफिस पर राज किया, जिसमें कई ब्लॉकबस्टर और एक कल्ट क्लासिक शामिल है।",
  "content": "भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ जोड़ियां ऐसी होती हैं जो सिर्फ फिल्मों तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि दर्शकों के दिलों में हमेशा के लिए दर्ज हो जाती हैं। 'एंग्री यंग मैन' के रूप में मशहूर अमिताभ बच्चन ने अपने शानदार और बेहद लंबे अभिनय सफर में कई बेहतरीन अभिनेत्रियों के साथ काम किया। उन्होंने जया बच्चन, हेमा मालिनी, नीतू कपूर, परवीन बाबी और जीनत अमान जैसी दिग्गज अदाकाराओं के साथ मिलकर पर्दे पर कई यादगार कहानियां पेश कीं। लेकिन सत्तर और अस्सी के दशक में सिनेमाई पर्दे पर एक ऐसा अध्याय शुरू हुआ जिसने बॉक्स ऑफिस के सारे समीकरण ही बदल कर रख दिए। साल 1976 से लेकर साल 1979 तक का वह चार साल का समय हिंदी फिल्म जगत के सुनहरे पन्नों में गिना जाता है। इस विशेष कालखंड के दौरान हर साल इस खास जोड़ी की दो-दो फिल्में सिनेमाघरों में रिलीज होती थीं। इन चार वर्षों में इस बेमिसाल जोड़ी ने दर्शकों को मनोरंजन का हर रंग दिखाया, जिसमें दो फ्लॉप फिल्में, पांच हिट और सुपरहिट फिल्में और दो ब्लॉकबस्टर फिल्में शामिल थीं। इनमें से एक फिल्म तो ऐसी बनकर उभरी जिसे आज भी भारतीय सिनेमा इतिहास की एक बेहतरीन 'कल्ट क्लासिक' का दर्जा दिया जाता है।\n\n \n\n१९७६ से हुई एक बेमिसाल ऑन-स्क्रीन सफर की शुरुआत\n\nयह कहानी सदाबहार और बेहद खूबसूरत अदाकारा रेखा और महानायक अमिताभ बच्चन की है। इन दोनों की जोड़ी को आज भी हिंदी सिनेमा की सबसे शानदार और चर्चित जोड़ियों में गिना जाता है। इन दोनों कलाकारों ने कुल मिलाकर दस फिल्मों में एक साथ काम किया, जिन्हें आज भी सिनेमा प्रेमी बड़े ही चाव और दिलचस्पी के साथ देखना पसंद करते हैं। इस बेमिसाल ऑन-स्क्रीन सफर की शुरुआत साल 1976 में हुई, जब यह जोड़ी पहली बार 'दो अनजाने' फिल्म के जरिए दर्शकों के सामने आया। यह फिल्म थ्रिलर, सस्पेंस और गहरे पारिवारिक ड्रामे से भरपूर थी। फिल्म की कहानी एक ऐसी महत्वाकांक्षी पत्नी के इर्द-गिर्द घूमती है जो अपने सीधे-साधे पति को धोखा देकर एक अमीर और रसूखदार फिल्म निर्माता का दामन थाम लेती है और खुद एक बहुत बड़ी स्टार बन जाती है। इस धोखे के बाद पति को चलती ट्रेन से नीचे फेंक दिया जाता है। ट्रेन से फेंके जाने के बाद अपनी याददाश्त खो चुका मुख्य किरदार अमित वापस लौटता है और अपनी पत्नी से पुराना हिसाब चुकता करने के लिए एक बिल्कुल नई पहचान के साथ कदम रखता है। दुलाल गुहा के निर्देशन में बनी यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सेमी हिट साबित हुई और इसी फिल्म के साथ दर्शकों के बीच इस नई जोड़ी की जबरदस्त चर्चा शुरू हो गई। फिल्म के गानों को भी काफी पसंद किया गया, खासकर 'लुक छुप लुक छुप जाओ ना' गाना लोगों की जुबान पर चढ़ गया।\n\n इसी साल यानी 1976 में ही इन दोनों कलाकारों की जोड़ी एक बार फिर सिनेमाघरों में नजर आई, जब फिल्म 'अपना पराया' रिलीज हुई। यह पूरी तरह से एक पारिवारिक ड्रामा फिल्म थी, जिसमें हमारे समाज के पारंपरिक पारिवारिक मूल्यों, अपनों के बीच पैदा होने वाली गलतफहमियों और रिश्तों में आने वाले टकराव को गहराई से दिखाने का प्रयास किया गया था। हालांकि इस फिल्म में अमिताभ बच्चन और रेखा जैसे बड़े कलाकारों की मौजूदगी थी, लेकिन इसके बावजूद यह फिल्म दर्शकों को सिनेमाघरों तक खींचने में पूरी तरह नाकाम रही। बॉक्स ऑफिस पर यह फिल्म फ्लॉप साबित हुई, हालांकि आलोचकों और दर्शकों दोनों ने ही फिल्म में इन दोनों कलाकारों के शानदार अभिनय की काफी सराहना की थी।\n\n \n\n१९७७ में संजीदा कहानियों और एक्शन का अनोखा संगम\n\nसाल 1977 में कदम रखते ही फिल्म निर्माताओं और दर्शकों दोनों को ही इस जोड़ी से बहुत ज्यादा उम्मीदें थीं। इस साल भी इन दोनों की दो फिल्में रिलीज हुईं। पहली फिल्म थी 'अलाप', जिसका निर्देशन हिंदी सिनेमा के दिग्गज निर्देशक ऋषिकेश मुखर्जी ने किया था। 'अलाप' एक बहुत ही गंभीर और संजीदा विषय पर आधारित फिल्म थी। इसमें अमिताभ बच्चन ने 'अशोक' नाम के एक ऐसे युवक का किरदार निभाया था जो एक बेहद अमीर और नामी वकील का बेटा होने के बावजूद संगीत की दुनिया से गहरा लगाव रखता है। अपने इसी संगीत प्रेम के कारण वह रेखा द्वारा निभाए गए किरदार 'राधा' और एक मल्लाह के परिवार के काफी करीब आ जाता है। अशोक का यह व्यवहार उसके रुतबेदार पिता को बिल्कुल भी पसंद नहीं आता। पिता और पुत्र के बीच के वैचारिक मतभेद, सामाजिक दूरियां और संगीत के प्रति अशोक का अटूट जुनून ही इस फिल्म की मुख्य धुरी थे। ऋषिकेश मुखर्जी की बेहतरीन शैली के बावजूद यह फिल्म सिनेमाघरों में दर्शकों का दिल जीतने में नाकाम रही और बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप साबित हुई।\n\n 'अलाप' जैसी गंभीर और धीमी रफ्तार की फिल्म की असफलता के बाद, यह जोड़ी उसी साल एक बिल्कुल अलग मिजाज की फिल्म में नजर आई। साल 1977 में रिलीज हुई इनकी चौथी फिल्म का नाम था 'खून पसीना'। यह पूरी तरह से एक एक्शन-मसाला एंटरटेनर फिल्म थी, जिसमें मनोरंजन के सारे मसाले कूट-कूट कर भरे गए थे। राकेश कुमार के निर्देशन में बनी इस फिल्म में अमिताभ बच्चन ने 'शिवा' और 'टाइगर' का किरदार निभाया, जो समाज में फैले अन्याय और गुंडागर्दी के खिलाफ डटकर खड़ा होता है। वहीं रेखा इस फिल्म में उनकी प्रेमिका 'चंदा' के बेहद जीवंत किरदार में नजर आईं। फिल्म की कहानी में शिवा की मां और चंदा के साथ उसके खट्टे-मीठे रिश्तों को बेहद मजेदार और एक्शन से भरपूर अंदाज में पेश किया गया था। इस फिल्म के गाने जैसे 'राजा जी श्याम मोरे नैया पार लगा दो' और 'खून पसीने की जो मिलेगी तो खाएंगे' उस समय के सिनेमाघरों में जबरदस्त तरीके से गूंजते थे। लगातार दो फ्लॉप फिल्में देने के बाद फिल्म इंडस्ट्री के निर्माता इस जोड़ी को लेकर थोड़े चिंतित थे, लेकिन 'खून पसीना' ने बॉक्स ऑफिस पर सेमी हिट का तमगा हासिल कर सभी को बड़ी राहत दी।\n\n \n\n१९७८ में छुआ सफलता का शिखर और दर्ज की ऐतिहासिक ब्लॉकबस्टर\n\nसाल 1978 इस जोड़ी के करियर का सबसे बेहतरीन साल साबित हुआ, जब दोनों ने बॉक्स ऑफिस पर सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित किए। इस साल भी इनकी दो शानदार फिल्में रिलीज हुईं, 'गंगा की सौगंध' और 'मुकद्दर का सिकंदर'। सुल्तान अहमद द्वारा निर्देशित 'गंगा की सौगंध' में यह जोड़ी एक बार फिर बड़े पर्दे पर चमकी। इस फिल्म की पृष्ठभूमि डाकुओं और ग्रामीण इलाकों पर आधारित थी और यह एक शुद्ध रिवेंज ड्रामा यानी बदले की कहानी थी। फिल्म में अमिताभ बच्चन ने 'जीवा' नाम के एक सीधे-साधे और मासूम ग्रामीण युवक का किरदार निभाया था, जिसे गांव के एक बेहद क्रूर और अत्याचारी जमींदार (जिसका किरदार अमजद खान ने निभाया था) द्वारा डाकू बनने पर मजबूर कर दिया जाता है। जीवा अपनी मां के साथ हुए घोर अपमान का बदला लेने के लिए पवित्र नदी गंगा की सौगंध खाता है। अन्याय के खिलाफ छिड़ी इस जंग में गांव की ही एक चुलबुली और निडर लड़की 'धनिया' (रेखा) उसका पूरा साथ देती है। महान गायक मोहम्मद रफी और स्वर कोकिला लता मंगेशकर की आवाज में सजा गाना 'मानो तो मैं गंगा मां हूं, ना मानो तो बहता पानी' इस फिल्म की मुख्य आत्मा बनकर उभरा। यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सुपरहिट साबित हुई और इसने कमाई के कई रिकॉर्ड तोड़े।\n\n इसी साल इस जोड़ी की छठी फिल्म 'मुकद्दर का सिकंदर' रिलीज हुई, जिसने बॉक्स ऑफिस पर ऐसा तहलका मचाया कि यह फिल्म ब्लॉकबस्टर साबित हुई। प्रकाश मेहरा के निर्देशन में बनी यह कालजयी फिल्म आज भी भारतीय सिनेमा के इतिहास के सबसे बड़े और महत्वपूर्ण मील के पत्थरों में से एक मानी जाती है। यह कहानी थी एक अनाथ लड़के 'सिकंदर' (अमिताभ बच्चन) की, जो बचपन से ही अपनी सहेली कामना (राखी) से एकतरफा और बेहद पवित्र मोहब्बत करता है। लेकिन सिकंदर की जिंदगी में एक नया मोड़ तब आता है जब उसका सामना कोठे पर रहने वाली 'जोहराबाई' (रेखा) से होता है। जोहराबाई सिकंदर के इस निस्वार्थ और एकतरफा प्यार को देखकर खुद उससे बेपनाह मोहब्बत करने लगती है। यह कहानी त्याग, सच्ची दोस्ती, वफादारी और अधूरे प्यार की एक अमर दास्तान पेश करती है। इस फिल्म का संगीत भी एक बड़ा कारण था इसकी बेजोड़ सफलता का। जोहराबाई के कोठे पर फिल्माया गया सदाबहार गीत 'सलाम-ए-इश्क मेरी जान कुबूल कर लो' और सिकंदर का दर्द भरा गीत 'ओ साथी रे तेरे बिना भी क्या जीना' आज भी हर पीढ़ी के संगीत प्रेमियों की जुबान पर रहता है।\n\n \n\n१९७९ में बनाई सफलता की अनोखी हैट्रिक और किया नया प्रयोग\n\nसाल 1979 तक आते-आते इस जोड़ी ने दर्शकों के दिलों पर पूरी तरह से राज कर लिया था। इस साल इस जोड़ी ने लगातार सफलता की हैट्रिक लगाई जब वे सस्पेंस, कॉमेडी, रोमांस और एक्शन से भरपूर फिल्म 'मि. नटवरलाल' में नजर आए। राकेश कुमार द्वारा निर्देशित इस फिल्म में अमिताभ बच्चन ने एक बेहद चालाक और शातिर ठग का किरदार निभाया, जबकि रेखा उनकी प्रेमिका के चुलबुले रोल में दिखाई दीं। कहानी में अमिताभ अपने भाई (जिसका किरदार अजीत ने निभाया था) को झूठे मामले में फंसाने वाले शातिर विलेन विक्रम (अमजद खान) से बदला लेने के लिए 'नटवरलाल' का रूप धारण करते हैं। वह एक अनजान गांव में जाते हैं और वहां के भोले-भाले लोगों को विक्रम के खौफ और आतंक से मुक्ति दिलाते हैं। इसी दौरान उन्हें गांव की लड़की शन्नो (रेखा) से प्यार हो जाता है। यह फिल्म भारतीय सिनेमा के इतिहास में इसलिए भी एक बेहद खास मुकाम रखती है क्योंकि इसी फिल्म के जरिए अमिताभ बच्चन ने पहली बार प्लेबैक सिंगिंग यानी पार्श्व गायन की दुनिया में कदम रखा था। उनका गाया हुआ बच्चों का बेहद प्यारा और लोकप्रिय गीत 'मेरे पास आओ मेरे दोस्तों एक किस्सा सुनो' आज भी उतना ही पसंद किया जाता है।\n\n इस प्रकार 1976 से 1979 के बीच के इन चार सालों ने न केवल अमिताभ बच्चन और रेखा के अभिनय करियर को एक नई ऊंचाई दी, बल्कि दर्शकों को एक ऐसी ऑन-स्क्रीन केमिस्ट्री दी जिसकी मिसाल आज भी दी जाती है। इन फिल्मों के जरिए दोनों कलाकारों ने अपनी अभिनय क्षमता और बहुमुखी प्रतिभा का लोहा मनवाया, जो आज भी दर्शकों के दिलों में ताजा है।\n\nइसका आप पर असर\n• सिनेमा प्रेमियों के लिए: यह विश्लेषण उन सदाबहार फिल्मों की यादें ताजा करता है जिन्होंने भारतीय सिनेमा के इतिहास को बदला, जिससे आज की पीढ़ी भी इस ऐतिहासिक जोड़ी के सिनेमाई योगदान को गहराई से समझ सकती है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. अमिताभ बच्चन और रेखा ने पहली बार किस फिल्म में एक साथ काम किया था?\nदोनों कलाकारों ने पहली बार साल 1976 में रिलीज हुई सस्पेंस ड्रामा फिल्म 'दो अनजाने' में एक साथ काम किया था।\n\n2. साल 1976 से 1979 के बीच इस जोड़ी की कुल कितनी फिल्में रिलीज हुईं?\nइस चार साल की अवधि के दौरान दोनों ने हर साल दो-दो फिल्में दीं, यानी कुल मिलाकर उनकी आठ फिल्में रिलीज हुईं।\n\n3. फिल्म 'मि. नटवरलाल' अमिताभ बच्चन के करियर के लिए क्यों खास मानी जाती है?\nयह फिल्म इसलिए खास है क्योंकि इसके जरिए अमिताभ बच्चन ने पहली बार पार्श्व गायक (प्लेबैक सिंगर) के रूप में बच्चों का लोकप्रिय गाना 'मेरे पास आओ मेरे दोस्तों' गाया था।\n\n4. अमिताभ और रेखा की किस फिल्म को भारतीय सिनेमा की ब्लॉकबस्टर और कालजयी फिल्म माना जाता है?\nप्रकाश मेहरा के निर्देशन में बनी साल 1978 की फिल्म 'मुकद्दर का सिकंदर' को एक ऐतिहासिक ब्लॉकबस्टर और मील का पत्थर माना जाता है।",
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  "category": "बॉलीवुड",
  "publishedAt": "2026-07-08",
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