अमिताभ बच्चन के 84वें जन्मदिन पर देखें वो 8 कालजयी फिल्में जिन्होंने सिनेमा को दिया असली महानायक भारतीय सिनेमा के दिग्गज अभिनेता अमिताभ बच्चन 11 अक्टूबर को 84 वर्ष के हो गए हैं। इस खास अवसर पर जानिए उनके करियर की उन आठ बेहतरीन कृतियों के बारे में जिन्होंने हिंदी सिनेमा का नक्शा बदल दिया। हिंदी फिल्म जगत में महानायक के तौर पर अपनी अमिट छाप छोड़ने वाले अभिनेता अमिताभ बच्चन 11 अक्टूबर को अपने जीवन का 84वां पड़ाव पूरा कर रहे हैं। कई दशकों के लंबे सफर में उन्होंने भारतीय सिनेमा के पर्दे पर अनगिनत अविस्मरणीय चरित्र गढ़े हैं। साधारण शुरुआत से लेकर लोकप्रियता के शिखर तक पहुंचने के इस सफर में कुछ ऐसी चुनिंदा कृतियां रहीं, जिन्होंने न केवल उनके फिल्मी सफर को नई ऊंचाई दी, बल्कि पूरे बॉलीवुड के मिजाज को ही हमेशा के लिए बदल कर रख दिया। आइए नजर डालते हैं उन 8 बेहद खास फिल्मों पर, जिन्हें हर सिनेप्रेमी को जरूर देखना चाहिए। जंजीर (1973): एंग्री यंग मैन की शुरुआत साल 1973 में पर्दे पर उतरी एक्शन क्राइम ड्रामा 'जंजीर' ने अमिताभ बच्चन के पूरे फिल्मी जीवन को एक नया मोड़ दिया था। प्रकाश मेहरा के कुशल निर्देशन में तैयार हुई इस बेहद कामयाब फिल्म में जया बच्चन, प्राण, अजीत खान और बिंदु जैसे मंझे हुए कलाकारों ने बेहद महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाई थीं। इसी ऐतिहासिक कृति के माध्यम से हिंदी सिनेमा के दर्शकों को पहली मर्तबा 'एंग्री यंग मैन' का सशक्त चेहरा देखने को मिला। इस बेमिसाल किरदार की बदौलत वह रातों-रात बॉलीवुड की दुनिया में एक बड़े सितारे के रूप में स्थापित हो गए। दीवार (1975): दो भाइयों की भावनात्मक और वैचारिक जंग साल 1975 में दर्शकों के सामने आई क्लासिक ड्रामा 'दीवार' ने अभिनेता की न्याय की तलाश वाले विद्रोही तेवर की छवि को और अधिक पुख्ता करने का काम किया। इस कहानी का मुख्य ताना-बाना दो सगे भाइयों के टकराव के इर्द-गिर्द बुना गया था। एक ओर विजय नाम का पात्र जुर्म के अंधेरे रास्तों पर निकल पड़ता है, जिसे अमिताभ बच्चन ने निभाया था, वहीं दूसरी ओर शशि कपूर द्वारा अभिनीत रवि नाम का भाई कानून का पालन करने वाला एक कर्तव्यनिष्ठ पुलिस अधिकारी बनता है। दोनों भाइयों के मध्य पैदा हुआ वैचारिक तनाव और उनके दमदार संवाद आज भी दर्शकों की यादों में पूरी तरह ताजा हैं। शोले (1975): दोस्ती और एक्शन का मील का पत्थर साल 1975 में ही रिलीज हुई 'शोले' को भारतीय सिनेमा जगत का एक अविस्मरणीय मील का पत्थर स्वीकार किया जाता है। एक्शन और रोमांच से भरपूर यह कालजयी रचना दो गहरे मित्रों जय और वीरू की दास्तान पेश करती है, जिसमें जय का रोल अमिताभ बच्चन और वीरू का किरदार धर्मेंद्र ने अदा किया था। कहानी में एक रिटायर्ड पुलिस अफसर इलाके के बेहद खतरनाक डाकू गब्बर सिंह को कानून के शिकंजे में कसने के लिए इन दोनों दोस्तों का सहारा लेता है। फिल्म के प्रमुख कलाकार, इसका कर्णप्रिय संगीत और जय तथा वीरू के अटूट दोस्ताना रिश्ते की मिसाल आज भी भारतीय संस्कृति का अभिन्न हिस्सा बनी हुई है। अमर अकबर एंथनी (1977): विविधता और हास्य का संगम निर्देशक मनमोहन देसाई के मार्गदर्शन में बनी 1977 की मल्टी-स्टारर एक्शन-कॉमेडी 'अमर अकबर एंथनी' दर्शकों के बीच अत्यधिक सराही गई। इसकी पटकथा बचपन के दौर में एक-दूसरे से बिछड़ जाने वाले तीन सगे भाइयों की जिंदगी दर्शाती है, जिनका लालन-पालन अलग-अलग मजहबों यानी हिंदू, मुस्लिम और ईसाई परिवेश में होता है। फिल्म में अमिताभ बच्चन, विनोद खन्ना और ऋषि कपूर की मुख्य चौकड़ी नजर आई थी। एंथनी गोंसाल्विस के मनोरंजक किरदार में अमिताभ का हास्य से भरा अंदाज और सटीक कॉमिक टाइमिंग इस प्रस्तुति को जबरदस्त सफलता दिलाने में निर्णायक साबित हुई। डॉन (1978): दोहरे किरदार का रहस्य और रोमांच साल 1978 में प्रदर्शित हुई सस्पेंस और रोमांच से भरी 'डॉन' को अभिनेता के पूरे सफर की सबसे यादगार और बेहतरीन कृतियों में गिना जाता है। इस सस्पेंस-थ्रिलर में उन्होंने दोहरे रोल को पर्दे पर बेहद प्रभावशाली ढंग से पेश किया। एक तरफ अंतरराष्ट्रीय स्तर का शातिर अपराधी 'डॉन' था, तो दूसरी तरफ बनारस की पृष्ठभूमि से आने वाला उसका भोला-भाला हमशक्ल 'विजय'। इस फिल्म में शामिल रहस्य, सम्मोहक बैकग्राउंड म्यूजिक और 'खईके पान बनारस वाला' गाने पर किया गया उनका ऊर्जावान नृत्य दर्शकों के बीच आज भी उतना ही लोकप्रिय है। कुली (1983): जीवन-मृत्यु के संघर्ष की गवाह बनी दास्तान निर्देशक मनमोहन देसाई के साथ साल 1983 में आई फिल्म 'कुली' में उन्होंने रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म पर सामान उठाने वाले इकबाल नाम के कुली का बेहद मार्मिक चरित्र निभाया था। पूरी पटकथा इकबाल और उसकी मां, जिसे वहीदा रहमान ने अभिनीत किया था, के बिछोह और मिलन के भावनात्मक दर्द के इर्द-गिर्द आगे बढ़ती है। यह फिल्म न केवल अपनी संवेदनशील कहानी और सुरीले गीतों के लिए पहचानी जाती है, बल्कि शूटिंग के सेट पर घटी उस भयानक दुर्घटना के लिए भी इतिहास में दर्ज है, जिसमें अमिताभ बच्चन गंभीर रूप से घायल होकर मौत के मुंह से सुरक्षित बाहर निकले थे। शहंशाह (1988): सियासत के बाद पर्दे पर तूफानी वापसी सियासी गलियारों में 3 साल का समय बिताने के बाद अमिताभ बच्चन ने साल 1988 में 'शहंशाह' के जरिए सिनेमा के बड़े पर्दे पर एक बेहद जोरदार वापसी की थी। टीनू आनंद के निर्देशन में तैयार की गई इस एक्शन-ड्रामा फिल्म में उन्होंने दोहरी जिंदगी जीने वाले शख्स का किरदार निभाया, जो दिन के उजाले में एक भ्रष्ट पुलिसकर्मी दिखता है और अंधेरी रात में अपराध का सफाया करने वाला 'शहंशाह' बन जाता है। इस फिल्म का संवाद 'रिश्ते में तो हम तुम्हारे बाप होते हैं' आज भी लोगों की जुबान पर अक्सर सुनाई देता है। बागबान (2023): बुढ़ापे के दर्द और रिश्तों का आईना रवि चोपड़ा के निर्देशन में बनी पारिवारिक भावनाओं से ओतप्रोत फिल्म 'बागबान' में अमिताभ बच्चन के साथ हेमा मालिनी मुख्य भूमिका में नजर आई थीं। यह भावनात्मक कहानी राज और पूजा नाम के एक बुजुर्ग जोड़े की व्यथा को दर्शाती है, जो पिछले 40 सालों से एक-दूसरे के साथ सुख-दुख साझा करते रहे हैं, लेकिन उनकी अपनी ही औलादें उन्हें अलग रहने के लिए लाचार कर देती हैं। फिल्म के भीतर अमिताभ और हेमा मालिनी की स्वाभाविक अदाकारी और आपसी केमिस्ट्री को दर्शकों ने बेहद सराहा था, जो 2023 में रिलीज हुई थी। इसका आप पर असर अमिताभ बच्चन के 84वें जन्मदिन के अवसर पर जारी यह सूची सिनेमा प्रेमियों को क्लासिक हिंदी फिल्मों के स्वर्णिम दौर को दोबारा देखने और समझने का बेहतरीन मौका देती है। • सिनेमा प्रेमियों के लिए: यह संकलन दर्शकों को उन ऐतिहासिक फिल्मों को तलाशने में मदद करता है जिन्होंने आधुनिक हिंदी फिल्म निर्माण की दिशा तय की। पुरानी पीढ़ी अपनी पुरानी यादें ताजा कर सकती है, जबकि नए दर्शक भारतीय सिनेमा के आधार स्तंभों को समझ सकते हैं। • कला और अभिनय के विद्यार्थियों के लिए: अभिनय और पटकथा लेखन से जुड़े लोग इन फिल्मों के जरिए विभिन्न शैलियों में चरित्र चित्रण का बारीकी से अध्ययन कर सकते हैं। गंभीर ड्रामा से लेकर सटीक हास्य टाइमिंग तक, यह सूची अभिनय के विविध रूपों का व्यावहारिक उदाहरण प्रस्तुत करती है। • पारिवारिक मनोरंजन के लिए: सूची में शामिल फिल्में ड्रामा, संगीत और पारिवारिक भावनाओं का एक संतुलित संयोजन उपलब्ध कराती हैं। दर्शक सप्ताहांत पर अपने पूरे परिवार के साथ इन क्लासिक प्रस्तुतियों का आनंद आसानी से ले सकते हैं। • डिजिटल प्लेटफॉर्म पर उपलब्धता: विभिन्न ओटीटी और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर इन फिल्मों की मौजूदगी से नई पीढ़ी को पुरानी उत्कृष्ट कृतियां आसानी से सुलभ हो जाती हैं। इससे दर्शकों को बेहतरीन कंटेंट चुनने में समय की बचत होती है। ऐसा क्यों हुआ अमिताभ बच्चन के 84वें जन्मदिन के अवसर पर उनकी ऐतिहासिक फिल्मों की यह सूची इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इन कृतियों ने एक संघर्षरत अभिनेता को भारतीय सिनेमा के महानायक के पद तक पहुंचाया। • करियर का निर्णायक मोड़: 1970 के दशक की शुरुआत में आई 'जंजीर' और 'दीवार' जैसी फिल्मों ने उन्हें उस दौर के पारंपरिक रोमांटिक नायकों से अलग एक विद्रोही और न्यायप्रिय छवि प्रदान की। इस नए अवतार ने आम दर्शकों की व्यवस्था के प्रति निराशा को आवाज दी और उन्हें देश का सबसे बड़ा सितारा बना दिया। • निर्देशकों का विजन और विविध शैलियां: प्रकाश मेहरा, मनमोहन देसाई और टीनू आनंद जैसे निर्देशकों ने उनके अलग-अलग हुनर को तराशते हुए एक्शन, हास्य और पारिवारिक ड्रामा में प्रस्तुत किया। इस रचनात्मक तालमेल ने उन्हें केवल एक छवि में बंधने से रोका और हर वर्ग के दर्शकों से जोड़ा। • जीवन के कठिन दौर से उबरना: फिल्म 'कुली' के सेट पर हुए जानलेवा हादसे और राजनीति के 3 साल के अनुभव के बाद उनकी जोरदार वापसी ने उनकी सार्वजनिक छवि को और बड़ा बना दिया। इन वास्तविक घटनाओं ने पर्दे पर उनके किरदारों को दर्शकों के लिए और अधिक वास्तविक और प्रेरणादायी बना दिया। सवाल-जवाब 1. अमिताभ बच्चन 11 अक्टूबर को अपना कौन सा जन्मदिन मना रहे हैं? अमिताभ बच्चन 11 अक्टूबर को अपना 84वां जन्मदिन मना रहे हैं। 2. अमिताभ बच्चन को पहली बार 'एंग्री यंग मैन' की पहचान किस फिल्म से मिली? उन्हें यह पहचान साल 1973 में रिलीज हुई प्रकाश मेहरा की फिल्म 'जंजीर' से मिली। 3. फिल्म 'दीवार' में अमिताभ बच्चन के साथ पुलिस अफसर भाई का रोल किसने निभाया था? फिल्म 'दीवार' में उनके भाई रवि का किरदार अभिनेता शशि कपूर ने निभाया था। 4. फिल्म 'कुली' की शूटिंग के दौरान क्या बड़ी घटना घटी थी? फिल्म 'कुली' के सेट पर शूटिंग करते समय अमिताभ बच्चन गंभीर रूप से घायल हो गए थे और उन्होंने मौत से जंग जीती थी। 5. राजनीति में 3 साल बिताने के बाद अमिताभ बच्चन ने किस फिल्म से वापसी की? राजनीति में तीन साल बिताने के बाद उन्होंने साल 1988 में टीनू आनंद द्वारा निर्देशित फिल्म 'शहंशाह' से वापसी की थी। 6. फिल्म 'बागबान' की मूल कहानी किस विषय पर आधारित है? यह फिल्म 40 साल से साथ रह रहे एक बुजुर्ग दंपत्ति की कहानी है, जिन्हें उनके बच्चे अलग होने पर मजबूर कर देते हैं। https://trendkia.com/bollywood/amitabh-bachchan-ke-84ven-janmadina-para-dekhen-vo-8-kalajayi-philmen-jinhonne-sinema-ko-diya-asali-mahanayaka-46455 TrendKia — Har trend, sabse pehle.