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  "type": "article",
  "title": "दिल्ली की गलियों से निकलकर भारतीय सिनेमा के शिखर पर पहुंचे मुकेश, 50वीं पुण्यतिथि पर आज भी गूंज रहे 1200 से अधिक अमर नगमे",
  "summary": "महान पार्श्वगायक मुकेश की 50वीं पुण्यतिथि पर दिल्ली की ऐतिहासिक गलियों से लेकर भारतीय सिनेमा तक उनके 1200 से अधिक कालजयी गीतों की संगीतमय यात्रा और यादगार पलों को याद किया जा रहा है।",
  "content": "दिल्ली-6 के नई सड़क और चहलपुरी के ऐतिहासिक इलाकों में 27 अगस्त के दिन हवा में एक अलग ही सुरीली मिठास तैरती नजर आती है। स्थानीय दुकानों और रिहाइशी मकानों में लगे रेडियो से ‘ज़िंदा हूँ मैं इस तरह से’ तथा ‘मेरा जूता है जापानी’ जैसी अमर रचनाएँ बजती रहती हैं। इसके साथ ही ‘ये मेरा दीवानापन है’ एवं ‘किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार’ जैसे दिल को छू लेने वाले तरानें हवा में गूंजते हैं। यही नहीं, ‘इक दिन बिक जाएगा माटी के मोल’ जैसे दर्शन से भरे गीत और ‘मैं पल दो पल का शायर हूं’ के साथ ‘दुनिया बनाने वाले क्या तेरे मन में समायी’ जैसे कालजयी नगमे भी श्रोताओं को मंत्रमुग्ध करते हैं। यह खास अवसर भारतीय हिंदी सिनेमा के महान पार्श्वगायक मुकेश चंद्र माथुर की 50वीं पुण्यतिथि का है। 27 अगस्त 1976 को इस दुनिया से विदा हुए इस महान कलाकार की दर्दभरी और सहज आवाज पांच दशकों के बाद भी देश भर के संगीत प्रेमियों के दिलों में पूरी ताजगी के साथ बसी हुई है।\n\n \n\nदिल्ली की गलियों में बीता बचपन और शुरुआती संगीत की यात्रा\n\nमुकेश चंद्र माथुर का जन्म 22 जुलाई 1923 को पुरानी दिल्ली के चहलपुरी इलाके में एक मध्यमवर्गीय माथुर कायस्थ परिवार में हुआ था। वह अपने माता-पिता के दस बच्चों में छठे स्थान पर थे। उनके पिता लाला जोरावर चंद माथुर पेशे से एक इंजीनियर थे, जबकि उनकी माता चांद रानी एक गृहिणी थीं। मुकेश की शुरुआती शिक्षा मंदिर मार्ग स्थित एम.बी. स्कूल में संपन्न हुई, जिसे बाद में एनपी स्कूल और वर्तमान समय में अटल आदर्श बाल विद्यालय के नाम से जाना जाता है। इसी प्रतिष्ठित विद्यालय से भारत के जाने-माने क्रिकेटर मोहिंदर अमरनाथ ने भी अपनी शिक्षा प्राप्त की थी।\n\n \n बचपन के दिनों से ही मुकेश महान गायक के.एल. सहगल के बहुत बड़े प्रशंसक थे और हमेशा उन्हीं के गाए नगमे गुनगुनाने के शौकीन थे। संगीत के प्रति उनकी गहरी रुचि का अंदाज इसी बात से लगाया जा सकता है कि दिन के समय वह बिड़ला मंदिर में जन्माष्टमी उत्सव पर भजन गाते थे और शाम होते ही चहलपुरी के आसपास होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रमों में अपनी सुरीली आवाज का जादू बिखेरते थे। यही उनकी शुरुआती गायकी की मजबूत बुनियाद बनी। हालांकि, दसवीं कक्षा पास करने के बाद उन्होंने औपचारिक पढ़ाई छोड़ दी और कुछ समय के लिए दिल्ली के लोक निर्माण विभाग में कर्मचारी के तौर पर नौकरी की।\n\n \n\nमुंबई का रुख और शुरुआती संघर्षों से सफलता का दौर\n\nमुकेश की जिंदगी में नया मोड़ तब आया जब उनकी बहन के विवाह के दौरान गाते हुए उनके एक दूर के रिश्तेदार और मशहूर अभिनेता मोतीलाल ने उनकी असाधारण गायन क्षमता को भांप लिया। मोतीलाल उन्हें अपने साथ मुंबई ले आए और वहां जाने-माने संगीत गुरु पंडित जगन्नाथ प्रसाद से उन्हें शास्त्रीय संगीत का गहन प्रशिक्षण दिलवाया। मुंबई में शुरुआती दौर काफी चुनौतीपूर्ण रहा। उनकी मुख्य भूमिका और गायन वाली पहली फिल्म ‘निर्दोष’ बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह असफल रही, जिसके बाद उन्हें सख्त आर्थिक तंगी झेलनी पड़ी। उस कठिन समय में गुजर-बसर करने के लिए उन्हें शेयर ब्रोकिंग और सूखे मेवे बेचने का काम भी करना पड़ा।\n\n साल 1945 में प्रदर्शित हुई फिल्म ‘पहली नजर’ का सदाबहार गाना ‘दिल जलता है तो जलने दे’ उनके करियर का पहला बड़ा मोड़ साबित हुआ। अनिल विश्वास के संगीत निर्देशन में तैयार इस गाने में मुकेश का गायन के.एल. सहगल की आवाज से इतना मेल खाता था कि स्वयं सहगल भी उसे सुनकर हैरान रह गए थे। सहगल ने उस वक्त कहा था, \"अजीब बात है, मुझे याद नहीं कि मैंने यह गीत गाया।\" इसके बाद दिग्गज संगीतकारों अनिल विश्वास और नौशाद ने मुकेश को किसी दिग्गज की नकल करने के बजाय अपनी स्वाभाविक और अनोखी गायन शैली तलाशने के लिए प्रेरित किया, जिसके बाद मुकेश ने पार्श्वगायन की दुनिया में अपनी एक स्वतंत्र पहचान कायम की।\n\n \n\nराज कपूर की रूह और 1200 से अधिक गीतों की विरासत\n\nमुकेश के संगीत सफर का सबसे स्वर्णिम अध्याय शोमैन राज कपूर के साथ जुड़ा। दोनों कलाकारों के बीच कलात्मक तालमेल इतना गहरा था कि राज कपूर हमेशा कहा करते थे, \"मुकेश मेरी रूह हैं, मैं तो सिर्फ एक शरीर हूँ।\" मुकेश ने अपने पूरे करियर में राज कपूर के पर्दे वाले चरित्रों के लिए लगभग 110 कालजयी गीत गाए। राज कपूर के अलावा उन्होंने अपने दौर के दो अन्य महानायकों दिलीप कुमार के लिए तथा मनोज कुमार के लिए भी दर्जनों सुपरहिट गानों में अपनी आवाज दी। अपने कई दशकों लंबे करियर में मुकेश ने करीब 1200 से 1300 अमर गानों को अपनी आवाज से सजाया।\n\n उनकी बेमिसाल गायकी के लिए उन्हें कई राष्ट्रीय और प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। फिल्म ‘रजनीगंधा’ के लोकप्रिय गीत ‘कई बार यूंही देखा है’ के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायक का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। इसके साथ ही उन्होंने चार बार फिल्मफेयर पुरस्कार अपने नाम किया। मुकेश स्वभाव से बेहद संवेदनशील थे और वह अक्सर कहा करते थे कि दस खुशी भरे तरानों के बदले अगर उन्हें एक गहरा दर्द भरा गीत गाने का मौका मिले, तो वह उसे सहर्ष चुनेंगे।\n\n \n\nशादी, अंतिम अमरीका दौरा और डेट्रॉयट में अंतिम सांस\n\nमुकेश का पारिवारिक जीवन भी खास लम्हों से भरा रहा। 22 जुलाई 1946 को अपने 23वें जन्मदिन के मौके पर उन्होंने सरल त्रिवेदी के साथ एक मंदिर में सादगी से शादी रचाई थी। इस विवाह के ठीक तीस बरस बाद 22 जुलाई 1976 को इस जोड़ी ने अपनी 30वीं शादी की सालगिरह खुशी-खुशी मनाई। इस जश्न के महज चार दिन बाद मुकेश अपने अंतरराष्ट्रीय कॉन्सर्ट टूर के लिए अमरीका और कनाडा के दौरे पर निकल गए। इस संगीतमय दौरे में उनके साथ स्वर कोकिला लता मंगेशकर और उनके बेटे नितिन मुकेश भी गए थे।\n\n अमरीका के डेट्रॉयट शहर में अपने तय कार्यक्रम से ठीक पहले मुकेश को अचानक पांचवां दिल का दौरा पड़ा। अस्पताल ले जाते वक्त एम्बुलेंस के भीतर उन्होंने श्री रामचरितमानस की प्रति मांगी और अपनी मां का स्मरण किया। डेट्रॉयट में ही उन्होंने अपनी अंतिम सांस ली। उनके अकस्मात निधन से पूरे सिनेमा जगत में गहरा शोक छा गया। राज कपूर ने उनके पार्थिव शरीर को देखकर बेहद भावुक शब्दों में शोक जताया कि उनका साथी एक मुसाफिर के रूप में विदेश गया था लेकिन वापस एक बेजान सामान बनकर लौटा और उनके जाने के साथ ही उनकी अपनी आवाज भी हमेशा के लिए खामोश हो गई। दुनिया से विदा लेने से पहले मुकेश ने अपनी आखिरी रिकॉर्डिंग प्रसिद्ध फिल्म ‘सत्यम शिवम सुंदरम’ के शीर्षक गीत के लिए की थी।\n\n \n\nपुरखों का मोहल्ला, वार्षिक स्मारक कार्यक्रम और पुरानी दिल्ली की सांस्कृतिक धरोहर\n\nमुंबई की चकाचौंध में एक स्थापित महानायक बनने के बावजूद मुकेश का अपनी जन्मभूमि दिल्ली से लगाव कभी कम नहीं हुआ। वह अक्सर अपने पुराने दोस्तों, भाई-बहनों और नाते-रिश्तेदारों से मिलने दिल्ली आते रहते थे। चहलपुरी स्थित उनके पुश्तैनी निवास पर आज तक कोई आधिकारिक स्मारक पट्टिका नहीं लग सकी है, जिसके लिए उनके निकट संबंधी और संगीत मर्मज्ञ अशोक माथुर लंबे समय से अथक प्रयास कर रहे हैं। उनके निधन के बाद साल 1983 से हर 27 अगस्त को दिल्ली में एक विशाल वार्षिक स्मारक संगीत सभा का आयोजन शुरू हुआ था। इस आयोजन में उनकी तीन बहनें श्याम प्यारी, राजेश प्यारी, उषा चंद्र और उनके छोटे भाई परमेश्वरी दास हमेशा उपस्थित रहते थे।\n\n इस यादगार आयोजन को आयोजित करने में अमरजीत सिंह कोहली की मुख्य भूमिका रहती थी, जबकि दिग्गज संगीतकार अनिल विश्वास और मशहूर गायिका मीना कपूर निर्णायक की भूमिका निभाते थे। कार्यक्रम में मुकेश के बचपन के सहपाठी और मित्र दलजीत सिंह, फिर चंदर पाल मेहरा, उनके साथी सोम सिकंद और सुखमल जैन पुरानी यादों को ताजा करने के लिए जुटते थे, हालांकि पिछले कुछ वर्षों से यह वार्षिक आयोजन बंद पड़ा है। पुरानी दिल्ली के नाई सड़क, किनारी बाज़ार, चहलपुरी, अनार की गली, चौक रायजी, चीराखाना और बीवी गौहर का कूचा जैसे ऐतिहासिक मोहल्लों में बसा माथुर कायस्थ समाज आज भी मुकेश को अपना गौरव मानता है।\n\n इस समाज का गौरवशाली इतिहास रहा है, जिससे महान स्वतंत्रता सेनानी लाला हरदयाल, ऐतिहासिक फिल्म ‘मुगल-ए-आजम’ के प्रसिद्ध फोटोग्राफर एफ.सी. माथुर, और भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व प्रबंधक व जाने-माने लेखक अमृत माथुर जुड़े रहे हैं। इसके अतिरिक्त सिविल लाइंस की महाराजा लाल लेन भी इसी परिवार के नाम पर दर्ज है, जिनकी व्यावसायिक फर्म महाराजा लाल एंड संस एचएमवी की अधिकृत वितरक थी और जिसके मशहूर शोरूम चांदनी चौक, कनॉट प्लेस तथा करोल बाग में स्थित थे। आज पांच दशक बीत जाने के बाद भी चहलपुरी की संकरी गलियों में मुकेश की सादगी और दर्दभरी तान उसी दिव्यता के साथ गूंज रही है।\n\nइसका आप पर असर\nमहान गायक मुकेश की 50वीं पुण्यतिथि पर उनके सुरीले सफर और सांस्कृतिक विरासत का असर आम संगीत प्रेमियों तथा दिल्ली के स्थानीय निवासियों पर स्पष्ट रूप से देखने को मिलता है।\n\n• भारत भर में: देश भर के शास्त्रीय और सुगम संगीत प्रेमियों के लिए यह अवसर उनकी 1200 से अधिक रचनाओं के विशाल संग्रह को डिजिटल माध्यमों पर दोबारा सुनने का समय है। युवा कलाकारों और गायकों के लिए मुकेश की स्वाभाविक अभिव्यक्ति और सहजता गायकी का एक अनमोल पाठ प्रदान करती है।\n\n• दिल्ली में: पुरानी दिल्ली के चहलपुरी और नई सड़क क्षेत्र के रहवासियों के लिए यह मौका अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान पर गर्व करने का है। स्थानीय नागरिक उनके पुश्तैनी निवास पर स्मारक पट्टिका लगाने की मांग उठाकर अपनी विरासत को संरक्षित करने की मुहिम चला रहे हैं।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. महान पार्श्वगायक मुकेश की 50वीं पुण्यतिथि कब मनाई जा रही है?\nमहान पार्श्वगायक मुकेश की 50वीं पुण्यतिथि 27 अगस्त को मनाई जा रही है। उनका निधन 27 अगस्त 1976 को अमरीका के डेट्रॉयट शहर में हुआ था।\n\n2. मुकेश का जन्म कहाँ हुआ था और उनका बचपन कहाँ बीता था?\nमुकेश का जन्म 22 जुलाई 1923 को पुरानी दिल्ली के चहलपुरी इलाके में हुआ था और उनकी शुरुआती पढ़ाई मंदिर मार्ग स्थित एम.बी. स्कूल में हुई थी।\n\n3. गायक मुकेश ने अभिनेता राज कपूर के लिए कितने गीत गाए थे?\nमुकेश ने शोमैन राज कपूर के ऑन-स्क्रीन किरदारों के लिए लगभग 110 अमर गीत गाए थे।\n\n4. मुकेश को किस गीत के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित किया गया था?\nउन्हें फिल्म ‘रजनीगंधा’ के प्रसिद्ध गीत ‘कई बार यूंही देखा है’ के लिए सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायक का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला था।\n\n5. मुकेश का निधन कहाँ हुआ था और उनका अंतिम रिकॉर्ड किया गया गाना कौन सा था?\nमुकेश का निधन अमरीका के डेट्रॉयट शहर में दिल का दौरा पड़ने से हुआ था और उनका अंतिम रिकॉर्ड किया गया गाना फिल्म ‘सत्यम शिवम सुंदरम’ का शीर्षक गीत था।\n\nप्रेरणा और सबक\nमुकेश चंद माथुर का जीवन संघर्ष, लगन और अपनी जड़ों से जुड़ाव की एक अनुकरणीय मिसाल पेश करता है।\n\n• शुरुआती असफलताओं से न हारना: पहली फिल्म फ्लॉप होने और आर्थिक तंगी के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी तथा शेयर ब्रोकिंग और सूखे मेवे बेचकर भी अपने सपने को जीवित रखा।\n\n• अपनी मौलिक पहचान गढ़ना: सहगल की आवाज की नकल करने के बजाय उन्होंने वरिष्ठ दिग्गजों की सलाह मानकर अपनी मौलिक और स्वाभाविक गायन शैली विकसित की।\n\n• भावनाओं के प्रति सच्ची निष्ठा: वह व्यावसायिक सफलता से बढ़कर गीत की अंतरात्मा को महत्व देते थे, इसी कारण वह दर्द भरे गीतों को बेहद संजीदगी से गाते थे।\n\n• जड़ों से अटूट लगाव: मुंबई के महानायक बनने के बाद भी उन्होंने पुरानी दिल्ली की अपनी गलियों, दोस्तों और रिश्तेदारों के साथ ताउम्र रिश्ता बनाए रखा।",
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  "publishedAt": "2026-08-27",
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