दूरदर्शन के मशहूर धारावाहिक 'गुल गुलशन गुलफाम' के निर्देशक वेद राही का 93 वर्ष की उम्र में निधन प्रख्यात साहित्यकार और फिल्म निर्देशक वेद राही का महाराष्ट्र के ठाणे में 93 वर्ष की आयु में देहांत हो गया। साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता राही ने सिनेमा, दूरदर्शन और डोगरी भाषा के संवर्धन में अप्रतिम योगदान दिया। कला, साहित्य और मनोरंजन जगत ने अपने दौर के एक प्रखर रचनाकार को खो दिया है। प्रख्यात साहित्यकार, संवाद लेखक और फिल्म निर्देशक वेद राही का 93 वर्ष की उम्र में देहावसान हो गया। उन्होंने रविवार सुबह महाराष्ट्र के ठाणे जिले में स्थित अपने निवास स्थान पर आखिरी सांस ली। उसी दिन दोपहर में ठाणे के कोपरी श्मशान घाट पर उनका अंतिम संस्कार संपन्न हुआ। उनके परिवार में दो बेटियां गीतांजलि और पूनम तथा उनके परिजन हैं। साहित्य अकादमी ने सोशल मीडिया के माध्यम से उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनके रचनात्मक अवदान को याद किया। उल्लेखनीय है कि दो दिन पूर्व निर्देशक संजय गुप्ता के आकस्मिक निधन की खबर आई थी, जिसके बाद अब वेद राही के निधन से कला जगत में शोक की लहर व्याप्त है। डोगरी जुबान को राष्ट्रीय फलक पर दिलाई विशिष्ट प्रतिष्ठा जम्मू की मिट्टी में रची-बसी संवेदनाओं को साहित्य में ढालने वाले वेद राही डोगरी भाषा के शिखर लेखकों में शुमार किए जाते थे। अपनी मातृभाषा के प्रति उनका अनुराग आजीवन बना रहा। क्षेत्रीय समाज की वास्तविक जीवन-स्थितियों, लोक-संस्कृति और मानवीय अनुभूतियों को उन्होंने अपनी रचनाओं के केंद्र में रखा। साल 1983 में उनके चर्चित कहानी संग्रह 'आले' के लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार प्रदान किया गया था। इस प्रतिष्ठित संस्था ने साल 2024 में उन्हें अपनी शीर्ष फेलोशिप से अलंकृत किया, जो भारत में साहित्यिक उपलब्धियों के सर्वोच्च सम्मानों में गिनी जाती है। अपने समग्र रचनात्मक जीवन में उन्हें अनगिनत सम्मान और पुरस्कार मिले, जिससे डोगरी साहित्य की धारा को अखिल भारतीय स्तर पर एक व्यापक पाठक वर्ग और गरिमा प्राप्त हुई। सिनेमाई पर्दे पर 25 से अधिक फिल्मों के लिए लिखी कहानियां साहित्यिक लेखन तक ही स्वयं को सीमित न रखते हुए वेद राही ने हिंदी फिल्म उद्योग में भी अपनी गहरी छाप छोड़ी। उन्होंने 25 से अधिक हिंदी फीचर फिल्मों की कहानियां, पटकथाएं और संवाद तैयार किए। साठ और सत्तर के दशक की कई यादगार फिल्में उनके संवेदनशील लेखन का प्रमाण हैं। इनमें 'ये रात फिर न आएगी', 'आप आए बहार आई', 'बेईमान', 'मोम की गुड़िया' तथा 'बेजुबान' जैसी उल्लेखनीय फिल्में शामिल हैं। कहानी कहने की बारीकियों और पात्रों के बीच चुटीले संवाद रचने में उन्हें महारत हासिल थी, जिससे वे उस दौर के सबसे विश्वसनीय लेखकों में गिने जाने लगे। फिल्म निर्देशन के क्षेत्र में भी दर्ज की सशक्त उपस्थिति सफल पटकथा लेखन के उपरांत उन्होंने कैमरा संभाला और फीचर फिल्मों के निर्देशन में कदम रखा। उन्होंने 'प्रेम पर्वत' और 'काली घटा' जैसी अनूठी फिल्मों का निर्देशन किया, जो अपने गीतात्मक सौंदर्य और गंभीर कथानक के लिए समीक्षकों द्वारा सराही गईं। समय के थपेड़ों के कारण 'प्रेम पर्वत' और 'काली घटा' जैसी फिल्में वर्तमान दौर के दर्शकों के लिए सुलभ माध्यमों पर आसानी से उपलब्ध नहीं हैं। बाद के दौर में उन्होंने ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर आधारित चर्चित फिल्म 'वीर सावरकर' का निर्देशन किया, जो साल 2001 में रिलीज हुई थी। इस परियोजना के जरिए उन्होंने एक जटिल ऐतिहासिक व्यक्तित्व के जीवन को सिनेमाई रूप में ढाला। दूरदर्शन के धारावाहिकों से हर घर तक पहुंची पहचान भारतीय टेलीविजन का जब विस्तार हो रहा था, तब वेद राही ने छोटे पर्दे पर ऐसी कथाएं बुनीं जो दर्शकों के दिलों में हमेशा के लिए बस गईं। दूरदर्शन पर प्रसारित धारावाहिक 'गुल गुलशन गुलफाम' के निर्देशन ने उन्हें समूचे देश के घर-घर में लोकप्रिय बना दिया। अस्सी और नब्बे के दशक के मध्य प्रसारित इस धारावाहिक में कश्मीर घाटी की पृष्ठभूमि, मानवीय रिश्ते और सामाजिक बदलाव को बेहद संवेदनशीलता से दिखाया गया था। इसके अतिरिक्त उन्होंने 'मीरा' और 'रिश्ते' जैसे लोकप्रिय कार्यक्रमों का भी निर्देशन और लेखन किया। इन टीवी प्रस्तुतियों ने उनके व्यापक दृष्टिकोण को जन-जन तक पहुंचाने का काम किया। जम्मू में हुआ था जन्म, पत्रकारिता की विरासत से जुड़े थे तार वेद राही की जीवन यात्रा मई 1933 में जम्मू शहर से आरंभ हुई थी। उनका पारिवारिक परिवेश बौद्धिक और वैचारिक रूप से काफी समृद्ध था। उनके पिता मूलराज सराफ उस क्षेत्र के अग्रदूत पत्रकारों में से एक थे और उन्होंने रियासत में स्वतंत्र पत्रकारिता की नींव रखी थी। घर में मिले साहित्यिक वातावरण के प्रभाव से वेद राही ने अल्पायु में ही जम्मू में डोगरी भाषा में लिखना शुरू कर दिया था। बाद के वर्षों में अपनी रचनात्मक महत्वाकांक्षाओं को बड़ा कैनवास देने के उद्देश्य से वे मुंबई आ गए। मुंबई में उन्होंने साहित्य, सिनेमा और प्रसारण माध्यमों के बीच ऐसा समन्वय स्थापित किया जिसकी मिसाल कम ही मिलती है। इसका आप पर असर वेद राही के निधन से भारतीय साहित्य और टेलीविजन इतिहास के एक सुनहरे दौर का समापन हुआ है। • टेलीविजन और साहित्य प्रेमियों पर प्रभाव: दूरदर्शन के क्लासिक धारावाहिकों और डोगरी साहित्य की समृद्ध परंपरा को समझने के लिए नई पीढ़ी को उनके कालजयी कार्यों की ओर मुड़ना पड़ेगा। उनके द्वारा रचित कहानियां और धारावाहिक भारतीय समाज की जमीनी हकीकत को समझने के लिए अहम दस्तावेज बने रहेंगे। • क्षेत्रीय भाषा के लेखकों के लिए सबक: अपनी मातृभाषा डोगरी में साहित्य रचकर राष्ट्रीय स्तर का सर्वोच्च सम्मान हासिल करने का उनका सफर क्षेत्रीय रचनाकारों को प्रेरित करता रहेगा। यह साबित करता है कि स्थानीय परिवेश से जुड़ी कहानियां भी व्यापक मंचों पर सम्मान पा सकती हैं। • सिनेमा प्रेमियों के लिए चुनौती: उनकी निर्देशित 'प्रेम पर्वत' और 'काली घटा' जैसी दुर्लभ फिल्मों को देखने के साधन आज आसानी से उपलब्ध नहीं हैं। इससे क्लासिक भारतीय सिनेमा की फिल्मों के संरक्षण और डिजिटलीकरण की आवश्यकता रेखांकित होती है। • फिल्म जगत के लिए क्षति: हिंदी सिनेमा के साठ और सत्तर के दशक के कुशल संवाद लेखन की परंपरा अब धीरे-धीरे पुरानी पीढ़ी के साथ विदा हो रही है। इस नुकसान से उद्योग में संवेदनशील और साहित्यिक पटकथा लेखन का शून्य महसूस किया जाएगा। ऐसा क्यों हुआ वेद राही का 93 वर्ष की आयु में निधन रविवार सुबह ठाणे स्थित उनके आवास पर हुआ, जो लंबी उम्र और स्वाभाविक वृद्धावस्था की परिस्थितियों के कारण हुआ। • उम्र और स्वास्थ्य: वे 93 वर्ष के थे और रविवार सुबह महाराष्ट्र के ठाणे जिले में अपने घर पर उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके पार्थिव शरीर का अंतिम संस्कार ठाणे के ही कोपरी श्मशान घाट पर संपन्न किया गया। • साहित्यिक और रचनात्मक यात्रा: मई 1933 में जन्मे राही ने कई दशकों तक सक्रिय रचनात्मक कार्य किया और जीवन के अंतिम पड़ाव तक उनका नाम साहित्यिक हलकों में आदर के साथ लिया जाता रहा। साल 2024 में साहित्य अकादमी ने उन्हें अपनी प्रतिष्ठित फेलोशिप से सम्मानित कर उनके योगदान को सराहा था। • पारिवारिक पृष्ठभूमि: पत्रकारिता और बौद्धिक विमर्श से जुड़े परिवार में पले-बढ़े राही ने लंबे रचनात्मक जीवन के बाद अपनी दो बेटियों और नाती-पोतों से भरा-पूरा परिवार पीछे छोड़ा है। उनके जाने के साथ उस पीढ़ी का एक प्रमुख रचनाकार विदा हो गया जिसने स्वतंत्रता-पूर्व काल से लेकर 21वीं सदी तक की यात्रा देखी। सवाल-जवाब 1. वेद राही कौन थे? वेद राही डोगरी भाषा के प्रख्यात साहित्यकार, उपन्यासकार, पटकथा लेखक और फिल्म निर्देशक थे। 2. वेद राही का निधन कब और कहां हुआ? उनका निधन 93 वर्ष की उम्र में रविवार सुबह महाराष्ट्र के ठाणे स्थित उनके आवास पर हुआ। 3. वेद राही का अंतिम संस्कार कहां संपन्न हुआ? उनका अंतिम संस्कार रविवार दोपहर ठाणे के कोपरी श्मशान घाट पर संपन्न किया गया। 4. वेद राही को किस पुस्तक के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था? उन्हें साल 1983 में उनके डोगरी कहानी संग्रह 'आले' के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था। 5. साहित्य अकादमी ने उन्हें फेलोशिप कब प्रदान की थी? साहित्य अकादमी ने साल 2024 में उन्हें अपनी प्रतिष्ठित फेलोशिप से अलंकृत किया था। 6. वेद राही ने दूरदर्शन के किस मशहूर धारावाहिक का निर्देशन किया था? उन्होंने 1980 और 1990 के दशक के लोकप्रिय दूरदर्शन धारावाहिक 'गुल गुलशन गुलफाम' का निर्देशन किया था। 7. वेद राही ने किन प्रमुख हिंदी फिल्मों की पटकथा या संवाद लिखे? उन्होंने 'ये रात फिर न आएगी', 'आप आए बहार आई', 'बेईमान', 'मोम की गुड़िया' और 'बेजुबान' जैसी 25 से अधिक फिल्मों के लिए लेखन किया। 8. वेद राही द्वारा निर्देशित प्रमुख फिल्में कौन सी थीं? उन्होंने 'प्रेम पर्वत', 'काली घटा' और साल 2001 में रिलीज हुई ऐतिहासिक फिल्म 'वीर सावरकर' का निर्देशन किया था। 9. वेद राही के परिवार में कौन-कौन हैं? उनके परिवार में उनकी दो बेटियां गीतांजलि और पूनम तथा उनके परिजन हैं। 10. वेद राही का जन्म कब और कहां हुआ था? उनका जन्म मई 1933 में जम्मू में हुआ था और उनके पिता मूलराज सराफ एक जाने-माने पत्रकार थे। प्रेरणा और सबक वेद राही का जीवन इस बात का उत्कृष्ट उदाहरण है कि क्षेत्रीय भाषा की जड़ों से जुड़े रहकर भी राष्ट्रीय स्तर पर सर्वोच्च पहचान बनाई जा सकती है। • मातृभाषा के प्रति निष्ठा: अपनी मूल भाषा डोगरी में लगातार लिखकर उन्होंने साहित्य अकादमी पुरस्कार और फेलोशिप जैसे सर्वोच्च राष्ट्रीय सम्मान हासिल किए। यह सिखाता है कि अपनी पहचान और मातृभाषा पर गर्व करने से ही स्थायी रचनात्मक पहचान मिलती है। • माध्यमों की सीमाओं को लांघना: उन्होंने केवल किताबों तक सीमित रहने के बजाय सिनेमा और टेलीविजन जैसे जनमाध्यमों में समान दक्षता से काम किया। यह दर्शाता है कि एक लेखक को बदलते समय और माध्यमों के अनुकूल खुद को ढालते रहना चाहिए। • जमीनी संवेदनाओं की ताकत: 'गुल गुलशन गुलफाम' जैसे धारावाहिकों में आम लोगों के जीवन और संस्कृति को चित्रित कर उन्होंने साबित किया कि सादगी भरी कहानियां ही जनमानस में दशकों तक जिंदा रहती हैं। https://trendkia.com/bollywood/duradarshana-ke-mashahura-dharavahika-gul-gulshan-gulfam-ke-nirdeshaka-ved-rahi-ka-93-varsha-ki-umra-men-nidhana-55025 TrendKia — Har trend, sabse pehle.