# गैंग्स ऑफ वासेपुर के गाने ओ वुमनिया में कैसे कैद हुई बिहार और झारखंड के मेलों और शादियों की असली धुनें

> संगीत निर्देशक स्नेहा खानवलकर द्वारा बिहार और झारखंड के सुदूर गांवों में की गई महीनों की कड़ी रिसर्च से तैयार हुआ फिल्म 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' का लोकप्रिय गीत 'ओ वुमनिया' आज भी दर्शकों का पसंदीदा बना हुआ है।

**Type:** article · **Category:** बॉलीवुड · **Published:** 2026-09-12 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/bollywood/gangs-of-wasseypur-ke-gane-o-womaniya-men-kaise-kaida-hui-bihar-aura-jharkhand-ke-melon-aura-shadiyon-ki-asali-dhunen-31542 · **Language:** Hindi
**Tags:** ओ वुमनिया, गैंग्स ऑफ वासेपुर, स्नेहा खानवलकर, वरुण ग्रोवर, अनुराग कश्यप, मनोज बाजपेयी, नवाजुद्दीन सिद्दीकी

कुछ फिल्मी गीत ऐसे होते हैं जो केवल कानों में रस नहीं घोलते, बल्कि श्रोताओं को एक बिल्कुल अलग माहौल में ले जाते हैं। इन गानों में किसी बड़े शहर की कृत्रिम चमक नहीं होती, बल्कि इनमें मिट्टी की सौंधी खुशबू, क्षेत्रीय बोलियों का अपनापन और आम इंसानों की रोजमर्रा की जिंदगी की खट्टी-मीठी कहानियां रची-बसी होती हैं। अनुराग कश्यप की कल्ट क्लासिक फिल्म 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' का बेहद लोकप्रिय गाना 'ओ वुमनिया' भी इसी श्रेणी में आता है। लगभग डेढ़ दशक बीत जाने के बाद भी इस विशेष गीत ने भारतीय संगीत जगत में अपनी एक बहुत ही अलग पहचान और साख बनाई हुई है। इस गाने के सुरों में जो बिंदासपन और अल्हड़पन है, उसके पीछे की कहानी को अगर गहराई से समझा जाए तो यह और भी अधिक दिलचस्प लगने लगती है। यह गाना ग्रामीण और अर्ध-शहरी महिलाओं की उस आंतरिक दुनिया को बेहद खूबसूरती से दर्शाता है, जहां वे अपनी शिकायतें भी करती हैं, व्यंग्य के तीर भी चलाती हैं और अपनी अनोखी शरारतों से पूरी महफिल को अपने नाम कर लेती हैं।

## जमीन पर महीनों की कड़ी रिसर्च का परिणाम
इस अद्भुत लोक-गीत को बनाने की प्रक्रिया किसी बंद एसी स्टूडियो में बैठकर शुरू नहीं हुई थी। इसके निर्माण के पीछे संगीत निर्देशक स्नेहा खानवलकर की महीनों की कड़ी मेहनत और जमीनी स्तर पर की गई गहन रिसर्च है। 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' के लिए एक नया और प्रामाणिक संगीत तैयार करने के उद्देश्य से स्नेहा खानवलकर ने बिहार और झारखंड के सुदूर इलाकों में लंबा समय बिताया था। उन्होंने वहां के ग्रामीण जीवन को बहुत करीब से देखा, स्थानीय लोगों से आत्मीय बातचीत की और उनकी संस्कृति को समझा। इस यात्रा के दौरान उन्होंने अलग-अलग क्षेत्रों की प्राकृतिक आवाजों, लोक वाद्यों की धुनों और महिलाओं के गीतों को अपने रिकॉर्डर में सहेजा। इस जमीनी अनुभव का नतीजा यह हुआ कि जब 'ओ वुमनिया' बनकर तैयार हुआ, तो उसमें बनावटीपन का लेशमात्र भी अंश नहीं था। इसे सुनते समय ऐसा महसूस होता है मानो हम किसी गांव की शादी के आंगन में बैठे हों, किसी मेले की चहल-पहल के बीच खड़े हों या फिर महिलाओं की किसी अनौपचारिक बैठक का हिस्सा बन गए हों। यही जीवंतता इस गाने को आज भी एक कालजयी रचना बनाती है।

## वरुण ग्रोवर के बोल और स्थानीय गायिकाओं की जादुई आवाज
यह गाना उस पारंपरिक लोक-संसार की प्रतिध्वनि है जिसमें महिलाओं के सामूहिक गीतों के विभिन्न रंग साफ दिखाई देते हैं। इस रचना में प्रेम की कोमल अभिव्यक्ति भी है, अपनों से की जाने वाली मीठी शिकायतें भी हैं और रिश्तों में होने वाली नोकझोंक भी शामिल है। लेकिन इन सबसे बढ़कर इसमें एक ऐसी मासूम शरारत है जो इस पूरे गीत को बेहद खास और सदाबहार बना देती है। इस गीत को अपनी जादुई आवाजों से सजाया है गायिका खुशबू राज और रेखा झा ने, जिन्होंने इसके देसी मिजाज को पूरी तरह से आत्मसात किया। वहीं, इसके बेहद सटीक और गहरे अर्थ वाले बोल प्रसिद्ध लेखक वरुण ग्रोवर ने लिखे हैं, जो लोक संस्कृति की नस-नस से वाकिफ हैं। यह गाना केवल मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि यह औरतों के आपस में जुड़ने, उनके खुलकर हंसने और सामाजिक बंधनों से परे जाकर अपनी भावनाओं को बेबाक तरीके से व्यक्त करने का एक उत्सव है। इसके जरिए महिलाएं उन बातों को भी हंसते-हंसते कह जाती हैं, जिन्हें वे सामान्य रूप से समाज के सामने सीधे तौर पर कहने से कतराती हैं।

## हिंसक पृष्ठभूमि के बीच महिलाओं की चुलबुली दुनिया
'गैंग्स ऑफ वासेपुर' की कहानी मुख्य रूप से धनबाद के वासेपुर इलाके के कुख्यात कोयला माफिया, दो बड़े परिवारों के बीच पीढ़ियों से चली आ रही दुश्मनी, खूनी बदले की भावना और वर्चस्व की जंग पर आधारित है। फिल्म के इस हिंसक माहौल में जहां एक तरफ सरदार खान (मनोज बाजपेयी) और फैजल खान (नवाजुद्दीन सिद्दीकी) जैसे पुरुष किरदार बंदूक की नोक पर अपने साम्राज्य और दहशत को बनाए रखने की कोशिश करते हैं, वहीं दूसरी तरफ इस पुरुष-प्रधान और डरावने माहौल के बीच घर की औरतें अपनी एक अलग, सुरक्षित और खुशमिजाज दुनिया का निर्माण करती हैं। नगमा खातून (रिचा चड्ढा) और मोहसिना (हुमा कुरैशी) जैसी सशक्त महिला किरदार इस बात का बेहतरीन उदाहरण हैं। वे इस हिंसक दुनिया में रहते हुए भी अपनी चुलबुली मुस्कान, मजबूत इरादों और आंतरिक स्वतंत्रता को खोने नहीं देती हैं। 'ओ वुमनिया' गाना वास्तव में इन्हीं महिलाओं के इसी जीवंत अस्तित्व, उनकी अंदरूनी ताकत और विपरीत परिस्थितियों में भी मुस्कुराने की कला का एक शानदार संगीतमय प्रतीक है।

## इसका आप पर असर
'ओ वुमनिया' गीत के निर्माण की यह गहरी समीक्षा आधुनिक भारतीय सिनेमा में वास्तविक लोक संगीत और जमीनी सांस्कृतिक परंपराओं को सहेजने के स्थायी मूल्य को दर्शाती है।

- **लोक संगीत प्रेमियों के लिए:** यह क्षेत्रीय कलाकारों और वास्तविक क्षेत्रीय रिकॉर्डिंग का समर्थन करने के महत्व को रेखांकित करता है। इस तरह का जुड़ाव पारंपरिक संगीत को जीवित रखने में मदद करता है और स्थानीय कलाकारों को मुख्यधारा में पहचान दिलाता है।
- **उभरते हुए संगीतकारों के लिए:** इस गाने की सफलता जमीनी स्तर पर जाकर गहन शोध करने के व्यावहारिक लाभों को सिखाती है। यह दर्शाता है कि आधुनिक स्टूडियो से बाहर कदम निकालने पर कहीं अधिक प्रभाव पैदा करने वाली कलाकृतियों का जन्म होता है।
- **सांस्कृतिक संरक्षकों के लिए:** यह मौखिक इतिहास और ग्रामीण परंपराओं को सहेजने के एक माध्यम के रूप में सिनेमा की ताकत को दर्शाता है। इससे पारंपरिक महिला लोक गीतों के लुप्त होने से पहले उनके दस्तावेजीकरण की प्रेरणा मिलती है।
- **सिनेमा प्रेमियों के लिए:** यह समझने में मदद करता है कि संगीत किस प्रकार किसी फिल्म की भावनात्मक गहराई को नया आकार दे सकता है। यह दृष्टिकोण दर्शकों को गंभीर एक्शन फिल्मों में भी महिला किरदारों के सूक्ष्म संघर्ष को बेहतर ढंग से समझने में मदद करता है।

## ऐसा क्यों हुआ
'ओ वुमनिया' गीत का निर्माण निर्देशक अनुराग कश्यप की उस सोच का परिणाम था जिसके तहत वे अपनी क्राइम ड्रामा फिल्म के लिए एक बेहद यथार्थवादी माहौल तैयार करना चाहते थे, जिसके लिए बिहार और झारखंड की मिट्टी से जुड़ी धुनों की आवश्यकता थी।

- **स्टूडियो की बनावट को नकारना:** संगीत निर्देशक स्नेहा खानवलकर ने ग्रामीण जीवन की वास्तविक और अनगढ़ ऊर्जा को समेटने के लिए पॉलिश की हुई स्टूडियो धुनों को जानबूझकर खारिज कर दिया था। इस फैसले ने उन्हें गांवों में जाकर वास्तविक स्थानीय ध्वनियों को रिकॉर्ड करने के लिए प्रेरित किया।
- **महिला दृष्टिकोण को प्राथमिकता:** फिल्म की टीम एक ऐसा गाना चाहती थी जो पुरुष-प्रधान और हिंसक माहौल में रह रही महिला किरदारों की आंतरिक भावनाओं को व्यक्त कर सके। इसके लिए पारंपरिक महिला मंडली के गीतों को शामिल करना सबसे सटीक माध्यम साबित हुआ।
- **लोक संस्कृति से जुड़े बोल:** गीतकार वरुण ग्रोवर ने ग्रामीण घरों में होने वाले हंसी-मजाक और आपसी रिश्तों की नोकझोंक से प्रेरणा लेकर इसके बोल लिखे थे। इसने सुनिश्चित किया कि शब्द क्षेत्रीय गायिकाओं की गायन शैली के साथ पूरी तरह मेल खा सकें।

## सवाल-जवाब

### 1. 'ओ वुमनिया' गाने का संगीत किसने तैयार किया और इसके बोल किसने लिखे हैं?
'ओ वुमनिया' गाने का संगीत स्नेहा खानवलकर ने तैयार किया है, और इसके बोल वरुण ग्रोवर ने लिखे हैं।

### 2. 'ओ वुमनिया' गाने को किन गायिकाओं ने अपनी आवाज दी है?
इस गाने को स्थानीय लोक गायिका खुशबू राज और रेखा झा ने अपनी आवाज दी है।

### 3. स्नेहा खानवलकर ने 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' के संगीत के लिए किस प्रकार रिसर्च की थी?
स्नेहा ने महीनों तक बिहार और झारखंड के ग्रामीण इलाकों में रहकर स्थानीय लोगों से मुलाकात की, शादियों और मेलों में जाकर वहां की प्रामाणिक आवाजों को रिकॉर्ड किया।

### 4. 'ओ वुमनिया' गाने का मुख्य विषय क्या है?
यह गाना महिलाओं के एक साथ आने, उनके हंसी-मजाक, मीठी शिकायतों, व्यंग्य और अपनी भावनाओं को बेबाकी से व्यक्त करने का एक उत्सव है।

### 5. 'ओ वुमनिया' गाना किस फिल्म में शामिल है?
यह गाना अनुराग कश्यप की बेहद चर्चित कल्ट क्लासिक फिल्म 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' में शामिल है।

## प्रेरणा और सबक
'ओ वुमनिया' के निर्माण के पीछे की कहानी हमें सिखाती है कि कैसे अपने कम्फर्ट जोन से बाहर निकलकर मौलिकता को अपनाने से क्रांतिकारी सफलता हासिल की जा सकती है।

- **जमीनी हकीकत को अपनाना:** संगीतकार स्नेहा खानवलकर द्वारा स्थानीय समुदायों के बीच जाकर रहने का फैसला दिखाता है कि सच्ची रचनात्मकता अक्सर बनावटी सेटअप के बजाय आम लोगों के वास्तविक अनुभवों में छिपी होती है।
- **प्रसिद्धि से ऊपर मौलिकता को चुनना:** स्थापित बॉलीवुड गायकों के बजाय खुशबू राज और रेखा झा जैसी स्थानीय लोक गायिकाओं को चुनकर निर्माताओं ने साबित किया कि वास्तविक प्रतिभा दर्शकों के दिलों को अधिक गहराई से छूती है।
- **सूक्ष्म अभिव्यक्ति की ताकत:** यह गाना हमें सिखाता है कि जब सीधे तौर पर सामाजिक रूढ़ियों को चुनौती देना कठिन हो, तब हंसी-मजाक और मीठे व्यंग्य के जरिए भी गंभीर मुद्दों को प्रभावी ढंग से उठाया जा सकता है।

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