जब दिग्गज बीआर चोपड़ा को मोहम्मद रफी के सामने झुकाना पड़ा था सिर, एक गाने ने खोल दी थीं आँखें हिंदी सिनेमा के मशहूर फिल्मकार बीआर चोपड़ा और लीजेंड्री गायक मोहम्मद रफी के बीच एक समय पर जबरदस्त तकरार हो गई थी। हालात ऐसे बन गए थे कि फिल्म 'वक्त' के एक गाने के लिए निर्देशक को अपना अहंकार छोड़कर मोहम्मद रफी की शरण में जाना पड़ा था। हिंदी सिनेमा के सुनहरे दौर में एक वाकया ऐसा भी आया था जब देश के एक दिग्गज फिल्मकार को अपनी जिद छोड़नी पड़ी थी। बीआर चोपड़ा और मोहम्मद रफी के बीच अनबन इस हद तक बढ़ गई थी कि निर्देशक ने गायक का बायकॉट तक कर दिया था, लेकिन फिल्म निर्माण के दौरान उपजी एक मजबूरी ने सारा समीकरण बदल दिया। दोनों के बीच इस पेशेवर टकराव की नींव तब पड़ी जब साल 1957 में आई सुपरहिट फिल्म 'नया दौर' के बाद बीआर चोपड़ा ने यह चाहत जताई कि यह महान गायक भविष्य में सिर्फ उन्हीं के बैनर तले अपनी आवाज दे। जब मोहम्मद चोपड़ा की शर्त मानने से किया इनकार मोहम्मद रफी ने बीआर चोपड़ा के इस प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया था। वह अपने उसूलों के पक्के थे और किसी भी तरह के विशेष अनुबंध या बंदिश में बंधने को तैयार नहीं थे। उन्होंने साफ शब्दों में कहा था कि वह बुलाए जाने पर हमेशा हाजिर रहेंगे, लेकिन उन्हें अन्य निर्माताओं और बैनरों के लिए भी गाने का पूरा हक है। यह बात फिल्मकार को भीतर तक चुभ गई। हालांकि इसके बावजूद 'साधना' और 'धूल का फूल' जैसी आइकॉनिक फिल्मों में, जिसमें 'तू हिंदू बनेगा न मुसलमान बनेगा' जैसा अमर गीत शामिल है, मोहम्मद रफी ने ही अपनी सुरीली आवाज का जादू बिखेरा था। महेंद्र कपूर के साथ युगल गीत पर उपजा विवाद इस तकरार में एक नया मोड़ तब आया जब बीआर चोपड़ा ने एक युगल गीत के लिए मोहम्मद रफी और महेंद्र कपूर को एक साथ खड़ा करना चाहा। महेंद्र कपूर स्वयं इस बात के पक्ष में नहीं थे कि वे अपने आदर्श और गुरु समान मोहम्मद रफी के साथ कोई डुएट गाना गाएं। दूसरी ओर, मोहम्मद रफी ने भी यह तय कर रखा था कि वे महेंद्र कपूर के साथ कभी कोई युगल गीत नहीं गाएंगे क्योंकि वे दोनों गुरु और शिष्य के रिश्ते की गरिमा बनाए रखना चाहते थे और नहीं चाहते थे कि जनता उनकी तुलना करके उनके बीच किसी प्रकार की कड़वाहट पैदा करे। बायकाट का फैसला और फिल्म वक्त का मोड़ इन तमाम घटनाओं से आहत होकर बीआर चोपड़ा ने यह पक्का इरादा कर लिया कि वे भविष्य में अपनी किसी भी फिल्म में मोहम्मद रफी को काम नहीं करने देंगे। उन्होंने इसके बाद महेंद्र कपूर को ही अपने बैनर के गानों की जिम्मेदारी सौंप दी। लेकिन असली परीक्षा साल 1965 में आई फिल्म 'वक्त' के निर्माण के दौरान हुई। जब इस फिल्म के टाइटल ट्रैक 'वक्त से दिन और रात' पर काम चल रहा था, तब संगीतकार रवि और निर्देशक दोनों समझ गए कि कोई भी दूसरा गायक इस धुन की रूह और गहराई के साथ न्याय नहीं कर पा रहा है। आखिरकार डायरेक्टर को क्यों मानना पड़ा हार महेंद्र कपूर को इस गाने के रियाज के लिए आजमाया गया, लेकिन संगीतकार रवि भांप चुके थे कि यह आवाज इस खास कंपोजीशन के लिए नाकाफी साबित होगी। रवि ने ही बीआर चोपड़ा को समझाया कि इस अमर कृति के लिए सिर्फ और सिर्फ मोहम्मद रफी की ही जरूरत है। हालांकि फिल्मकार इस उधेड़बुन में थे कि क्या वे शख्सियत से भरे उस गायक के पास दोबारा जा पाएंगे जिनका उन्होंने बहिष्कार किया था। रवि के समझाने पर आखिरकार बीआर चोपड़ा ने अपना अहंकार ताक पर रखा और मोहम्मद रफी से संपर्क साधा। इस तरह सारे गिले-शिकवे दूर हुए और उस महान गायक ने एक बार फिर बीआर चोपड़ा के बैनर के लिए अपनी आवाज का जादू बिखेरा। सवाल-जवाब 1. बीआर चोपड़ा और मोहम्मद रफी के बीच विवाद की मुख्य वजह क्या थी? बीआर चोपड़ा चाहते थे कि मोहम्मद रफी केवल उनके बैनर की फिल्मों के लिए गाएं, जिसे गायक ने मानने से इनकार कर दिया था। 2. फिल्म 'नया दौर' का असर दोनों के रिश्तों पर कैसे पड़ा? नया दौर की सफलता के बाद बीआर चोपड़ा मोहम्मद रफी की गायकी के मुरीद हो गए थे और चाहते थे कि वह किसी अन्य के लिए न गाएं। 3. महेंद्र कपूर और मोहम्मद रफी ने साथ में कौन सा गाना गाया था? दोनों ने साल 1968 में आई फिल्म 'आदमी' का युगल गीत 'कैसी हसीन आज बहारों की रात है' गाया था। 4. किस फिल्म के गाने के कारण बीआर चोपड़ा को अपना अहंकार छोड़ना पड़ा था? फिल्म 'वक्त' के टाइटल सॉन्ग के लिए बीआर चोपड़ा को मजबूरन मोहम्मद रफी से संपर्क करना पड़ा था। https://trendkia.com/bollywood/jaba-diggaja-br-chopra-ko-mohammed-rafi-ke-samane-jhukana-para-tha-sira-eka-gane-ne-khola-di-thin-ankhen-25926 TrendKia — Har trend, sabse pehle.