जब कैमरे के सामने सचमुच झुलस गए थे नाना पाटेकर, रोंगटे खड़े कर देने वाला वो हादसा गोवा में अंतिम सांस लेने वाले नाना पाटेकर के पांच दशक लंबे सफर में 1989 की फिल्म का वो भयानक हादसा भी दर्ज है जब पर्दे की आग असल जिंदगी में भड़क उठी थी। भारतीय मनोरंजन जगत ने एक बेबाक और असाधारण प्रतिभा को खो दिया जब 75 वर्ष की आयु में नाना पाटेकर का गोवा स्थित निवास पर निधन हो गया। गुरुवार, 8 अक्टूबर की सुबह अचानक उनकी तबीयत बिगड़ने लगी और उन्होंने सीने के बाएं हिस्से में तेज तकलीफ बताई। इसके कुछ ही देर बाद वह अचेत पाए गए, जिसके तुरंत बाद उन्हें मणिपाल अस्पताल पहुंचाया गया था। चिकित्सकों के तमाम प्रयासों के बावजूद उन्हें होश में नहीं लाया जा सका, और अब मौत के सटीक कारणों का पता लगाने के लिए शव परीक्षण कराया जा रहा है। करीब आधी सदी तक थिएटर से लेकर बड़े पर्दे तक राज करने वाले इस फनकार ने 'क्रांतिवीर', 'अग्निसाक्षी', 'खामोशी: द म्यूजिकल', 'अब तक छप्पन', 'वेलकम' और 'नटसम्राट' जैसी अनगिनत कृतियों में अपने अभिनय का लोहा मनवाया। मगर उनके समूचे फिल्मी सफर में एक वाकया ऐसा भी रहा जब कला की खातिर उन्होंने मौत को बेहद करीब से देखा था। फिल्म के अंतिम दृश्य में जब बेकाबू हो गई थीं लपटें साल 1989 के दौरान विधु विनोद चोपड़ा के निर्देशन में तैयार हुई गैंगस्टर ड्रामा 'परिंदा' में नाना पाटेकर ने अन्ना नाम के खौफनाक सरगना को जीवंत किया था। कहानी के चरमोत्कर्ष में अन्ना का किरदार धधकती आग के घेरे में आ जाता है। उस दौर के सिनेमा में कंप्यूटर जनित तकनीक या आधुनिक विजुअल इफेक्ट्स का चलन नहीं था, इसलिए माहौल को जीवंत बनाने के लिए सेट पर असली लपटें सुलगाई गई थीं। नाना उस वक्त एक झूले पर विराजमान थे, तभी लपटों ने अप्रत्याशित रूप से विकराल रूप ले लिया और उनके बेहद करीब पहुंच गईं। एक टेलीविजन कार्यक्रम 'आप की अदालत' में रजत शर्मा के साथ पुरानी यादें साझा करते हुए खुद नाना ने बताया था कि दृश्य के दौरान उन्हें अचानक अहसास हुआ कि उनका शरीर सचमुच आग की चपेट में आ चुका है। स्थिति इतनी वीभत्स हो चुकी थी कि जब उन्होंने नीचे नजर दौड़ाई तो उनकी अपनी झुलसी हुई चमड़ी का टुकड़ा नीचे रखी चप्पल पर गिरा हुआ था। तत्काल उन्हें चिकित्सालय ले जाना पड़ा, जहां उनका लंबा उपचार चला। सुरक्षा परिधान पहनने से कर दिया था साफ इनकार इस दिल दहला देने वाली शूटिंग को याद करते हुए निर्देशक विधु विनोद चोपड़ा ने भी अतीत के पन्ने पलटे थे। निर्देशक चाहते थे कि अभिनेता की हिफाजत के लिए उन्हें संपूर्ण अग्नि-रोधी परिधान पहनाया जाए। इसके विपरीत नाना का तर्क था कि भारी भरकम सुरक्षात्मक सूट पहन लेने से दृश्य की स्वाभाविकता और उनके हाव-भाव की तीव्रता कमजोर पड़ जाएगी। निर्देशक ने भी कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट कर दिया था कि बिना सुरक्षा साधनों के वह फिल्मांकन आगे नहीं बढ़ाएंगे। काफी जद्दोजहद के बाद अभिनेता ने उस सूट का ऊपरी हिस्सा तो पहन लिया, लेकिन निचले हिस्से को पहनने को लेकर अड़ गए। उन्होंने निर्देशक से कहा कि वह उनके सामने इसे धारण नहीं करेंगे। निर्देशक को लगा कि वह एकांत में जाकर बाकी सुरक्षा पोशाक पहन लेंगे और वे वहां से हट गए, मगर नाना ने नीचे का सुरक्षात्मक घेरा नहीं पहना। जैसे ही कैमरा रोल हुआ और लपटें भड़काई गईं, आग ने तेजी से अभिनेता को अपनी गिरफ्त में ले लिया। खुद का जीवन बचाने के लिए नाना को सुरक्षित स्थल की ओर छलांग लगानी पड़ी, जबकि इस पूरे अफरातफरी भरे मंजर में कैमरा लगातार चालू रहा। चोपड़ा ने बाद में उनके उस जज्बे की भूरी-भूरी प्रशंसा की थी कि कैसे चरम भय के उस क्षण में भी नाना ने वास्तविक संकट को अपने अभिनय में पिरो दिया था। अस्पताल का लंबा बिस्तर और साल भर तक काम से दूरी इस भयानक दुर्घटना का खामियाजा अभिनेता को भारी शारीरिक कष्ट के रूप में भुगतना पड़ा। गंभीर रूप से झुलस जाने की वजह से उन्हें करीब दो महीने तक अस्पताल में भर्ती रहना पड़ा था। डिस्चार्ज होने के उपरांत भी उनकी मुश्किलें कम नहीं हुईं, क्योंकि जख्मों को भरने और शरीर को सामान्य गति में लौटने में लंबा वक्त लगा। नाना ने स्वयं माना था कि इस हादसे के सदमे और शारीरिक क्षति से उबरने में उन्हें पूरा एक साल लग गया, जिसके चलते वह उस दौरान सामान्य रूप से कामकाज नहीं कर पाए थे। पर्दे पर दर्शकों ने जिस खौफ और पीड़ा को देखा, वह महज दिखावा नहीं बल्कि एक कलाकार की वास्तविक असहनीय व्यथा थी। एक किरदार जिसने सिनेमाई फलक पर दिलाई अमिट पहचान इतने बड़े जोखिम के बावजूद 'परिंदा' ने नाना के करियर को नई बुलंदियों पर पहुंचा दिया। अन्ना का व्यक्तित्व केवल क्रूरता तक सीमित नहीं था, बल्कि उसमें भय, आक्रामकता और अंदरूनी दुर्बलताओं की गहरी परतें मौजूद थीं। फिल्म में अनिल कपूर, जैकी श्रॉफ और माधुरी दीक्षित जैसे दिग्गज सितारों की मौजूदगी के बाद भी नाना की अदाकारी अलग से चमकी। दर्शकों के अपार स्नेह और समीक्षकों की जबरदस्त सराहना के साथ-साथ इस यादगार भूमिका के लिए नाना को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से भी नवाजा गया। विलेन के खौफ से लेकर कॉमेडी की टाइमिंग तक हिंदी और मराठी सिनेमा में नाना पाटेकर कभी किसी बंधी-बंधाई परिपाटी के मोहताज नहीं रहे। वह पारंपरिक नायक के दायरे से कोसों दूर रहे और हर उस भूमिका में उतरे जिसने उन्हें चुनौती दी। कभी उन्होंने 'क्रांतिवीर' में समाज और व्यवस्था पर तीखे प्रहार किए, तो कभी 'अब तक छप्पन' में एक संजीदा पुलिस अधिकारी बनकर व्यवस्था की नब्ज टटोली। दूसरी तरफ 'वेलकम' में उदय शेट्टी के हास्य रूप में आकर उन्होंने साबित कर दिया कि उनकी कॉमिक टाइमिंग का भी कोई सानी नहीं था। मराठी रंगमंच और 'नटसम्राट' जैसी गंभीर कृतियों में उनके अभिनय का जो ठहराव दिखा, वह भारतीय अभिनय परंपरा में विरले ही देखने को मिलता है। इसका आप पर असर नाना पाटेकर के निधन और उनके जोखिम भरे फिल्मी सफर की यह दास्तान दिखाती है कि भारतीय सिनेमा में स्टंट सुरक्षा और कलाकारों की हिफाजत के मानक कितने बदल चुके हैं। • सिनेमा प्रेमियों के लिए: भारतीय फिल्म उद्योग ने एक ऐसा अनूठा अभिनेता खो दिया है जिसने किरदारों में यथार्थवाद लाने के लिए जान की बाजी तक लगा दी थी। यह कहानी याद दिलाती है कि 80 और 90 के दशक में डिजिटल प्रभावों के अभाव में कलाकारों को कितने भीषण खतरों का सामना करना पड़ता था। • मनोरंजन उद्योग के लिए: फिल्मों के सेट पर अग्नि सुरक्षा और स्टंट प्रोटोकॉल की अहमियत अब पहले से कहीं अधिक सख्त हो चुकी है। बिना पूर्ण सुरक्षा सूट और आधुनिक सुरक्षा मानकों के आज किसी भी अभिनेता या स्टंटमैन को जानलेवा जोखिम में डालने की अनुमति नहीं दी जाती। • कला और अभिनय के दृष्टिकोण से: यथार्थवादी अभिनय और व्यक्तिगत सुरक्षा के बीच संतुलन बनाए रखना हर कलाकार के लिए एक बुनियादी सीख है। अत्यधिक जोखिम उठाकर अभिनय करने की जिद कभी-कभी पूरे करियर और जीवन को खतरे में डाल सकती है। • प्रशंसकों और दर्शकों के लिए: पुराने क्लासिक दृश्यों को देखते समय यह अहसास गहरा होता है कि पर्दे पर दिखने वाला हर खौफनाक मंजर केवल अभिनय नहीं था। यह घटना सिखाती है कि पर्दे की चमक के पीछे कलाकारों का असीम पसीना और दर्द छिपा होता है। ऐसा क्यों हुआ यह हादसा इसलिए हुआ क्योंकि फिल्म के अंतिम दृश्य में यथार्थवादी आग दिखाने की कोशिश की गई थी और अभिनेता ने संपूर्ण सुरक्षात्मक परिधान पहनने से मना कर दिया था। • डिजिटल तकनीकों का अभाव: साल 1989 में विजुअल इफेक्ट्स और सीजीआई तकनीक आज की तरह उपलब्ध नहीं थी, जिसके चलते निर्देशक को वास्तविक लपटों का सहारा लेना पड़ा। वास्तविक आग की लपटें हवा और सेट के माहौल के अनुसार अप्रत्याशित रूप से फैल गईं। • सुरक्षा परिधान पहनने से इंकार: नाना पाटेकर का मानना था कि पूरा फायर सूट पहनने से उनके अभिनय का प्रभाव और स्वाभाविकता कम हो जाएगी। उन्होंने केवल ऊपरी सुरक्षा पहनी और निचले हिस्से का सूट नहीं पहना, जिससे उनका शरीर सीधे आग की चपेट में आ गया। • लपटों का अप्रत्याशित फैलाव: झूले के पास लगाई गई आग अचानक नियंत्रण से बाहर हो गई और तेजी से अभिनेता की ओर बढ़ गई। उचित सुरक्षा न होने के कारण लपटें सीधे उनकी त्वचा तक पहुंच गईं और उन्हें तत्काल जान बचाने के लिए कूदना पड़ा। सवाल-जवाब 1. नाना पाटेकर का निधन कब और कहां हुआ? नाना पाटेकर का निधन 75 वर्ष की उम्र में गुरुवार, 8 अक्टूबर को गोवा स्थित उनके निवास पर हुआ। 2. फिल्म 'परिंदा' के सेट पर नाना पाटेकर के साथ क्या हादसा हुआ था? साल 1989 की फिल्म 'परिंदा' के क्लाइमेक्स की शूटिंग के दौरान नाना पाटेकर वास्तव में आग की लपटों की चपेट में आकर गंभीर रूप से झुलस गए थे। 3. शूटिंग के दौरान आग से बचने के लिए नाना पाटेकर ने पूरा सुरक्षा सूट क्यों नहीं पहना था? उनका मानना था कि पूरा फायर सूट पहनने से उनके अभिनय की स्वाभाविकता और दृश्य का यथार्थवादी प्रभाव खत्म हो जाएगा। 4. इस आग हादसे के बाद नाना पाटेकर को ठीक होने में कितना समय लगा? उन्हें करीब दो महीने अस्पताल में भर्ती रहना पड़ा था और पूरी तरह उबरकर सामान्य काम पर लौटने में लगभग एक साल का समय लगा। 5. फिल्म 'परिंदा' में नाना पाटेकर ने कौन सा किरदार निभाया था और उन्हें क्या सम्मान मिला? उन्होंने अन्ना नाम के गैंगस्टर की भूमिका निभाई थी और इस शानदार अभिनय के लिए उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। https://trendkia.com/bollywood/jaba-kaimare-ke-samane-sachamucha-jhulasa-gae-the-nana-patekar-rongate-khare-kara-dene-vala-vo-hadasa-44960 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