# जब मजरूह सुल्तानपुरी ने जेल में रचे थे सदाबहार बोल, राज कपूर ने यूं बढ़ाया था मदद का हाथ

> जेल में बंद होने और परिवार के आर्थिक संकट के बावजूद मजरूह सुल्तानपुरी ने खैरात लेने से इनकार कर दिया था, जिसके बाद राज कपूर ने उनकी जेल में लिखी रचना खरीदकर उनका साथ दिया।

**Type:** article · **Category:** बॉलीवुड · **Published:** 2026-09-30 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/bollywood/jaba-majrooh-sultanpuri-ne-jela-men-rache-the-sadabahara-bola-raj-kapoor-ne-yun-barhaya-tha-madada-ka-hatha-40840 · **Language:** Hindi
**Tags:** मजरूह सुल्तानपुरी, राज कपूर, धरम करम, मुकेश, आरडी बर्मन, दादा साहब फाल्के पुरस्कार, हिंदी सिनेमा, पुराने गाने

हिंदी सिनेमा के इतिहास में ऐसे कई गीत दर्ज हैं, जिनकी रचना केवल कागज और कलम का खेल नहीं थी बल्कि जिंदगी के कड़े संघर्षों की गवाही थी। मशहूर गीतकार और प्रख्यात उर्दू शायर मजरूह सुल्तानपुरी के जीवन से जुड़ा एक ऐसा ही यादगार वाकया है, जब सलाखों के पीछे रचे गए उनके शब्दों ने भारतीय सिनेमा को एक अमर गीत दिया। 1 अक्टूबर 1919 को उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर में जन्मे मजरूह अपनी बेबाक शायरी और प्रगतिशील लेखक आंदोलन से गहरे जुड़ाव के लिए जाने जाते थे। सामाजिक सरोकारों पर मुखर होकर लिखना और अपनी मान्यताओं पर अडिग रहना उनकी पहचान थी।

## वैचारिक लड़ाई और जेल की मुश्किलें
1940 के दशक के अंतिम वर्षों में भारत का राजनीतिक परिदृश्य भारी उठापटक और तनाव के दौर से गुजर रहा था। मजरूह सुल्तानपुरी की वामपंथी विचारधारा और तत्कालीन सरकारी नीतियों के खिलाफ लिखी गई तल्ख कविताओं के कारण हुकूमत ने उनके खिलाफ सख्त कदम उठाया। इसी कार्रवाई के चलते उन्हें गिरफ्तार करके जेल भेज दिया गया। कारागार की कठिन परिस्थितियों के बावजूद मजरूह का हौसला नहीं टूटा। उन्होंने मुश्किल दिनों में भी अपनी रचनात्मक अभिव्यक्ति को नहीं रोका और जेल की कोठरी में रहकर भी निरंतर लिखते रहे।

## राज कपूर की पेशकश और आत्मसम्मान की मिसाल
मजरूह के जेल चले जाने के बाद बाहर उनका परिवार भीषण आर्थिक तंगी से घिर गया। घर का दैनिक खर्च चलाना भी मुश्किल साबित हो रहा था, क्योंकि परिवार के मुखिया जेल में बंद थे और उनके लिए किसी तरह की कमाई का जरिया नहीं बचा था। जब हिंदी सिनेमा के जाने-माने फिल्मकार राज कपूर को मजरूह के परिवार के इस संकट का पता चला, तो वह बेहद चिंतित हुए। राज कपूर उनके असाधारण हुनर के मुरीद थे और इस कठिन समय में उनकी आर्थिक मदद करना चाहते थे।

राज कपूर ने जेल में मजरूह को सीधे तौर पर आर्थिक सहायता की पेशकश की। मजरूह ने पूरी विनम्रता के साथ इस मदद को स्वीकार करने से मना कर दिया। वह अपने आत्मसम्मान को लेकर बेहद सजग थे और किसी भी सूरत में बिना मेहनत के पैसे या खैरात लेना पसंद नहीं करते थे। मजरूह ने स्पष्ट कहा कि अगर सहायता करनी ही है, तो उन्हें किसी गीत का काम दिया जाए ताकि वह अपने हुनर और पसीने की कमाई से परिवार का भरण-पोषण कर सकें। मजरूह के इस स्वाभिमान का सम्मान करते हुए राज कपूर ने उनसे एक गीत लिखने का सौदा तय किया। उस दौरान मजरूह के पास जेल में ही लिखी हुई एक विशेष रचना मौजूद थी, जिसे उन्होंने राज कपूर को सौंप दिया।

## धरम करम में गूंजे वे अमर बोल
जेल में लिखी गई यह रचना तुरंत किसी फिल्म में इस्तेमाल नहीं हुई, बल्कि लंबे समय तक सहेज कर रखी गई। कई वर्षों के अंतराल के बाद राज कपूर ने अपनी फिल्म ‘धरम करम’ में इन पंक्तियों को शामिल करने का फैसला किया। इस रचना को संगीतकार आरडी बर्मन ने अपनी खास धुनों में ढाला, जबकि गायक मुकेश ने अपनी दर्दभरी और असरदार आवाज से इसे हमेशा के लिए अमर बना दिया। ‘इक दिन बिक जाएगा माटी के मोल’ शीर्षक वाले इस गीत ने जीवन के शाश्वत सत्य को बहुत गहराई से पेश किया।

यह गीत इंसानी नश्वरता और उसके कर्मों के महत्व को रेखांकित करता है। संसार से हर इंसान को एक न एक दिन विदा होना है, लेकिन उसके पीछे उसके नेक काम, उसकी वाणी और उसके विचार ही लोगों के दिलों में हमेशा जीवित रहते हैं। यही दार्शनिक भाव इस गीत को आज भी श्रोताओं के बीच बेहद प्रासंगिक और लोकप्रिय बनाए रखता है।

## सिनेमा को समृद्ध करने वाली विरासत
मजरूह सुल्तानपुरी ने अपने कई दशकों के शानदार करियर में भारतीय सिनेमा को अनगिनत यादगार गीतों का उपहार दिया। उन्होंने हिंदी फिल्म जगत के कई अलग-अलग पीढ़ियों के संगीत निर्देशकों के साथ मिलकर काम किया और हर दौर में अपनी लेखनी की छाप छोड़ी। उनके लिखे नगमों में प्रेम, विरह, मानवीय रिश्तों और जीवन के गूढ़ फलसफे का अनूठा संगम देखने को मिलता है।

सिनेमा और साहित्य में उनके अमूल्य योगदान के लिए उन्हें भारतीय सिनेमा के सर्वोच्च सम्मान दादा साहब फाल्के पुरस्कार से भी नवाजा गया। मजरूह सुल्तानपुरी की यह जीवन यात्रा स्पष्ट करती है कि विकट से विकट हालात भी सच्चे कलाकार के स्वाभिमान और उसकी प्रतिभा को दबा नहीं सकते। ‘इक दिन बिक जाएगा माटी के मोल’ जैसे बोल आज भी उनकी कलम की ताकत, विचार की गहराई और गौरवमयी विरासत का सजीव प्रमाण हैं।

## इसका आप पर असर
यह ऐतिहासिक प्रसंग पाठकों को आत्मसम्मान और विपरीत परिस्थितियों में अपनी कला पर अटूट विश्वास बनाए रखने की व्यावहारिक सीख देता है।

- **आत्मसम्मान का महत्व:** गंभीर आर्थिक संकट के बावजूद खैरात लेने के बजाय काम मांगने का फैसला यह सिखाता है कि गरिमा से समझौता नहीं करना चाहिए। किसी भी कठिन परिस्थिति में अपने हुनर पर भरोसा रखकर सही रास्ते पर डटे रहना संभव है।
- **रचनात्मकता का संरक्षण:** जेल की कैद जैसी मुश्किल स्थिति में भी लिखना जारी रखना यह दर्शाता है कि परेशानियां रचनात्मकता को रोक नहीं सकतीं। मुश्किल वक्त में रची गई कृतियां भविष्य में सबसे बड़ा संबल बन सकती हैं।
- **सहानुभूति और सहयोग:** राज कपूर का यह कदम बताता है कि साथियों की मदद करते समय उनके स्वाभिमान का सम्मान करना कितना आवश्यक है। किसी को सीधे पैसे देने की जगह उसके काम की कद्र करना ज्यादा गरिमामयी तरीका है।
- **सांस्कृतिक विरासत:** पुरानी पीढ़ी के संघर्ष और उनके गीतों की पृष्ठभूमि को समझकर आज के संगीत प्रेमी क्लासिक नगमों की गहराई को बेहतर तरीके से महसूस कर सकते हैं। यह जानकारी दर्शकों को गीतों के पीछे छिपे गहरे सामाजिक संदर्भों से जोड़ती है।

## ऐसा क्यों हुआ
मजरूह सुल्तानपुरी को 1940 के दशक के अंतिम दौर में अपनी मुखर वामपंथी विचारधारा और सरकारी नीतियों पर तीखी कविताओं के चलते जेल भेजा गया था, जिससे उनका परिवार आर्थिक संकट में आ गया।

- **राजनीतिक विरोध और गिरफ्तारी:** 1940 के दशक के आखिर में देश में तनावपूर्ण राजनीतिक माहौल था। मजरूह की वामपंथी विचारधारा और नीतियों की आलोचना करती कविताओं के कारण तत्कालीन सरकार ने उनके खिलाफ कार्रवाई करते हुए उन्हें जेल भेज दिया था।
- **पारिवारिक तंगी:** मजरूह के कारावास में होने की वजह से परिवार का एकमात्र कमाने वाला सदस्य दूर हो गया। कोई नियमित आय न होने से उनके घर का खर्च चलाना मुश्किल हो गया था।
- **स्वाभिमानी स्वभाव:** जब राज कपूर मदद के लिए आगे आए, तो मजरूह ने मुफ्त में पैसे लेने से साफ मना कर दिया। उन्होंने अपने हुनर के बदले काम मांगा, जिसके तहत उन्होंने जेल में लिखी अपनी रचना राज कपूर को दी।
- **फिल्म में देर से शामिल होना:** राज कपूर ने उस रचना को तुरंत इस्तेमाल नहीं किया। कई वर्षों बाद उन्होंने फिल्म धरम करम में उस गीत को शामिल करने का फैसला किया।

## सवाल-जवाब

### 1. मजरूह सुल्तानपुरी का जन्म कब और कहां हुआ था?
मजरूह सुल्तानपुरी का जन्म 1 अक्टूबर 1919 को उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर में हुआ था।

### 2. मजरूह सुल्तानपुरी को जेल क्यों भेजा गया था?
1940 के दशक के आखिर में मजरूह की वामपंथी विचारधारा और सरकारी नीतियों पर उनकी कविताओं के कारण उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया था।

### 3. जेल में बंद होने के दौरान राज कपूर ने मजरूह की क्या मदद की थी?
राज कपूर ने मजरूह के परिवार की आर्थिक मदद की पेशकश की थी, लेकिन मजरूह के काम मांगने पर उन्होंने जेल में लिखी उनकी रचना खरीदकर उन्हें गीत लिखने का काम दिया।

### 4. मजरूह की जेल में लिखी रचना किस फिल्म में इस्तेमाल की गई?
मजरूह की जेल में लिखी रचना को कई साल बाद राज कपूर की फिल्म ‘धरम करम’ में इस्तेमाल किया गया।

### 5. फिल्म ‘धरम करम’ के इस मशहूर गीत के गायक और संगीतकार कौन थे?
इस गीत ‘इक दिन बिक जाएगा माटी के मोल’ को मुकेश ने अपनी आवाज दी थी और इसका संगीत आरडी बर्मन ने तैयार किया था।

### 6. मजरूह सुल्तानपुरी को सिनेमा में योगदान के लिए किस बड़े पुरस्कार से सम्मानित किया गया?
भारतीय सिनेमा में उनके विशेष योगदान के लिए मजरूह सुल्तानपुरी को दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

## प्रेरणा और सबक
मजरूह सुल्तानपुरी का यह प्रसंग सिखाता है कि स्वाभिमान और हुनर के दम पर इंसान सबसे कठिन समय से भी उबर सकता है।

- **खैरात के बजाय काम को प्राथमिकता:** विपरीत परिस्थितियों में भी मुफ्त की मदद लेने के बजाय अपनी मेहनत और काम पर जोर देना आत्मसम्मान को हमेशा ऊंचा बनाए रखता है।
- **हालात के आगे न झुकना:** कारावास की सीमाओं के बावजूद लेखन को जीवित रखकर मजरूह ने साबित किया कि प्रतिकूल परिस्थितियां प्रतिभा को नहीं रोक सकतीं।
- **धैर्य और समय का सम्मान:** जेल में लिखे बोल भले ही तुरंत पर्दे पर नहीं आए, लेकिन धैर्य रखने से वह समय के साथ एक अमर कृति साबित हुए।

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