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  "title": "जसवंत सिंह खालड़ा की तस्वीर देखते ही भावुक हुए दिलजीत दोसांझ, किरदार के लिए मांगा सिर्फ 1 रुपया",
  "summary": "फिल्म 'सतलुज' के निर्देशक हनी त्रेहान ने खुलासा किया कि जसवंत सिंह खालड़ा की भूमिका के लिए दिलजीत दोसांझ ने स्क्रिप्ट देखते ही भावुक होकर सिर्फ 1 रुपये फीस लेने की बात कही थी।",
  "content": "पंजाबी सिंगर और एक्टर दिलजीत दोसांझ की फिल्म 'सतलुज' चर्चाओं से बाहर निकलने का नाम ही नहीं ले रही। सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन के साथ महीनों चली खींचतान के बाद जब यह फिल्म आखिरकार दर्शकों तक पहुंची, तो रिलीज के महज 48 घंटों के भीतर ही इसे ओटीटी प्लेटफॉर्म जी5 से हटा दिया गया। इसी बीच फिल्म के निर्देशक हनी त्रेहान ने एक ऐसी बात बताई है जिसने दिलजीत दोसांझ के फैंस का दिल जीत लिया है, उन्होंने खुलासा किया कि मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा की भूमिका निभाने के लिए दिलजीत ने आखिर कितनी फीस ली थी।\n\nपहले दो दिन में जिसने भी यह फिल्म देखी, वो भावुक हुए बिना नहीं रह सका। दिलजीत दोसांझ की एक्टिंग को लेकर हर तरफ तारीफों का सिलसिला चल पड़ा। लेकिन इस पूरी कहानी में सबसे ज्यादा चर्चा उस पल की हो रही है जब दिलजीत ने इस किरदार के लिए फीस लेने से ही इनकार कर दिया था।\n\nक्यों दिलजीत को ही मिला यह किरदार\n'सतलुज' के लिए मेकर्स को लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी। सर्टिफिकेशन को लेकर विवाद हो या फिर फिल्म का ओटीटी से अचानक हट जाना, इन सारी मुश्किलों के बीच दिलजीत दोसांझ का इस प्रोजेक्ट के प्रति समर्पण हर किसी का ध्यान खींच रहा है। निर्देशक हनी त्रेहान के मुताबिक, वह शुरू से ही चाहते थे कि जसवंत सिंह खालड़ा का किरदार कोई सिख एक्टर ही निभाए, ताकि कहानी की भावना और उसकी सांस्कृतिक सच्चाई पर कोई आंच न आए। उनका मानना था कि अगर किसी बड़े बॉलीवुड स्टार को लिया जाता तो चर्चा किरदार से हटकर एक्टर पर केंद्रित हो जाती, जिससे खालड़ा की विरासत के साथ इंसाफ नहीं हो पाता।\n\nकौन थे जसवंत सिंह खालड़ा\nफिल्म 'सतलुज' मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर बनी है। जसवंत सिंह खालड़ा 1990 के दशक में उस वक्त सुर्खियों में आए थे जब उन्होंने पंजाब में कथित तौर पर 1984 से 1994 के बीच हुए 25,000 अज्ञात अंतिम संस्कारों की जांच शुरू की थी। कोर्ट के रिकॉर्ड के मुताबिक, साल 1995 में उनका अपहरण कर लिया गया और पुलिस हिरासत में ही उनकी हत्या कर दी गई थी।\n\nस्क्रिप्ट सुनते ही भर आईं आंखें\nहनी त्रेहान ने बताया कि साल 2021 में उन्होंने दिलजीत से करीब 30 मिनट तक मुलाकात की थी, जिसमें उन्होंने अपनी रिसर्च और स्क्रिप्ट दिलजीत को दिखाई थी। जसवंत सिंह खालड़ा की तस्वीर देखते ही दिलजीत भावुक हो गए। हनी त्रेहान के मुताबिक, दिलजीत ने स्क्रिप्ट को अपने माथे से लगाया, 'वाहेगुरु' कहा और बोले, 'खालड़ा साहब जैसा किरदार निभाने के पैसे कैसे ले सकता हूं? ऐसा करना शर्मनाक होगा।' हालांकि जब हनी त्रेहान ने कॉन्ट्रैक्ट की औपचारिकता का हवाला दिया, तो दिलजीत ने सिर्फ 1 रुपया लेने की बात कही।\n\nदेरी के बावजूद कभी नहीं की शिकायत\nहनी त्रेहान ने एक अन्य बातचीत में दिलजीत की प्रोफेशनलिज्म की भी जमकर तारीफ की थी। उन्होंने बताया कि शूटिंग के दौरान कई बार शेड्यूल बिगड़ जाता था। दिलजीत सुबह 6 बजे ही सेट पर पहुंच जाते थे, लेकिन उनका पहला शॉट शाम 4 बजे तक भी नहीं लग पाता था। इतनी लंबी देरी के बावजूद उन्होंने कभी शिकायत नहीं की। निर्देशक के मुताबिक, हर बार दिलजीत मुस्कुराकर कहते थे, 'पाजी, कोई बात नहीं। आप जो कर रहे हैं, फिल्म के लिए कर रहे हैं। मैं फिल्म को सपोर्ट करने आया हूं।'\n\nपहले नाम था 'पंजाब 95', फिर हुआ बदलाव\nबता दें कि फिल्म 'सतलुज' का नाम पहले 'पंजाब 95' रखा गया था, लेकिन बाद में इसे बदल दिया गया। फिल्म को ओटीटी से हटाने की असल वजह मेकर्स ने अब तक खुलकर नहीं बताई है। हालांकि कहा जा रहा है कि इस फिल्म को कभी सीबीएफसी का सर्टिफिकेट मिला ही नहीं था और सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए इसे आईटी एक्ट की धारा 69ए के तहत हटाया गया।\n\nइसका आप पर असर\n• फिल्म प्रेमियों के लिए: अगर आप दिलजीत दोसांझ के फैन हैं या 'सतलुज' देखना चाहते थे, तो फिलहाल यह फिल्म जी5 पर उपलब्ध नहीं है और सर्टिफिकेशन व सुरक्षा से जुड़े विवाद सुलझने तक इसे दोबारा देख पाना मुश्किल है।\n• ओटीटी दर्शकों के लिए: यह मामला दिखाता है कि आईटी एक्ट की धारा 69ए के तहत रिलीज के बाद भी किसी कंटेंट को हटाया जा सकता है, यानी किसी फिल्म का ओटीटी पर आना उसके स्थायी उपलब्ध रहने की गारंटी नहीं है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. दिलजीत दोसांझ ने 'सतलुज' के लिए कितनी फीस ली?\nहनी त्रेहान के मुताबिक दिलजीत ने कॉन्ट्रैक्ट की औपचारिकता के चलते सिर्फ 1 रुपया फीस के तौर पर लिया।\n\n2. फिल्म 'सतलुज' किस पर आधारित है?\nयह फिल्म मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर आधारित है।\n\n3. जसवंत सिंह खालड़ा कौन थे?\nवे एक मानवाधिकार कार्यकर्ता थे जो 1990 के दशक में पंजाब में 1984 से 1994 के बीच हुए कथित 25,000 अज्ञात अंतिम संस्कारों की जांच के लिए सुर्खियों में आए थे।\n\n4. फिल्म को ओटीटी प्लेटफॉर्म से क्यों हटाया गया?\nकहा जा रहा है कि फिल्म को कभी सीबीएफसी सर्टिफिकेट नहीं मिला था और सुरक्षा कारणों से इसे आईटी एक्ट की धारा 69ए के तहत हटाया गया।\n\n5. फिल्म का पुराना नाम क्या था?\nफिल्म का नाम पहले 'पंजाब 95' रखा गया था, जिसे बाद में बदलकर 'सतलुज' किया गया।\n\n6. फिल्म के निर्देशक कौन हैं?\nफिल्म का निर्देशन हनी त्रेहान ने किया है।\n\n7. दिलजीत और हनी त्रेहान की पहली मुलाकात कब हुई थी?\nसाल 2021 में हनी त्रेहान ने करीब 30 मिनट तक दिलजीत से मुलाकात की और उन्हें स्क्रिप्ट व रिसर्च दिखाई थी।\n\n8. क्या फिल्म को सीबीएफसी सर्टिफिकेट मिला था?\nनहीं, कहा जा रहा है कि फिल्म को कभी सीबीएफसी सर्टिफिकेट नहीं मिला।\n\nप्रेरणा और सबक\n• असली कहानी से जुड़ें: दिलजीत ने जसवंत सिंह खालड़ा जैसे संवेदनशील किरदार को निभाने से पहले उनकी तस्वीर देखकर भावुक होना दिखाता है कि किरदार में उतरने से पहले उसकी सच्चाई से जुड़ना जरूरी है।\n• पैसे से ऊपर मकसद: उन्होंने किरदार के लिए फीस लेने को शर्मनाक बताते हुए सिर्फ 1 रुपया लिया, यह सिखाता है कि हर काम का पैमाना कमाई नहीं, बल्कि उसकी अहमियत भी होनी चाहिए।\n• धैर्य और प्रोफेशनलिज्म: शेड्यूल बिगड़ने और घंटों इंतजार के बावजूद कभी शिकायत न करना बताता है कि किसी बड़े मकसद के लिए काम करते समय छोटी असुविधाओं को नजरअंदाज करना जरूरी है।\n• टीम को सपोर्ट करने का रवैया: देरी होने पर भी मुस्कुराकर 'मैं फिल्म को सपोर्ट करने आया हूं' कहना दिखाता है कि प्रोजेक्ट की सफलता के लिए अपने अहम को पीछे रखना कितना जरूरी है।",
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  "category": "बॉलीवुड",
  "publishedAt": "2026-07-16",
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