कश्मीर में पिता के अपहरण और शहादत की दर्दनाक यादें साझा करते हुए भावुक हुईं निम्रत कौर अभिनेत्री निम्रत कौर ने 1994 में कश्मीर में आतंकियों द्वारा अपने पिता मेजर भूपेंद्र सिंह के अपहरण और हत्या की दर्दनाक घटना को याद किया है। बॉलीवुड अभिनेत्री निम्रत कौर ने बचपन के उस बेहद दर्दनाक मंजर को याद किया है, जिसने उनकी पूरी दुनिया हमेशा के लिए बदल दी थी। साल 1994 के जनवरी महीने में कश्मीर में तैनात उनके पिता मेजर भूपेंद्र सिंह आतंकियों की बर्बरता का शिकार हुए थे। वह उस समय केवल 11 साल की थीं, जब उनके पिता रोजमर्रा की तरह अपनी ड्यूटी पूरी करके घर लौटते वक्त अगवा कर लिए गए और फिर कभी जिंदा वापस नहीं आए। देश सेवा में अपने प्राण न्योछावर करने वाले मेजर भूपेंद्र सिंह को मरणोपरांत वीरता के प्रतिष्ठित सम्मान शौर्य चक्र से नवाजा गया था। इतने दशक बीत जाने के बावजूद वह दर्द परिवार के जेहन में आज भी उतना ही गहरा है। काम पर जाते पिता को देखा और फिर सीधे ताबूत में एक इंटरव्यू में अपनी जिंदगी के सबसे काले दौर का जिक्र करते हुए अभिनेत्री ने बताया कि उस सुबह किसी को जरा भी भनक नहीं थी कि उनके हंसते-खेलते परिवार पर इतना बड़ा संकट टूटने वाला है। उन्होंने उस दिन अपने पिता को रोज की तरह काम पर निकलते देखा था। इसके बाद वह अपने पिता को दोबारा जीवित कभी नहीं देख पाईं और अगली बार उनका पार्थिव शरीर सीधे ताबूत में ही सामने आया। अभिनेत्री ने कहा कि कहने को कई दशक बीत चुके हैं और लोग मानते हैं कि समय के साथ घाव भर जाते हैं, मगर दिल में छूटा यह खालीपन कभी पूरा नहीं हो सकता। फौजी वर्दी पहनकर आतंकियों ने बिछाया था जाल घटना के खौफनाक ब्योरे को साझा करते हुए उन्होंने बताया कि मेजर भूपेंद्र सिंह रोजाना की तरह अपना काम खत्म करके वापस आ रहे थे। उसी दौरान सेना की वर्दी पहने कुछ हथियारबंद आतंकियों ने उन्हें रास्ते में रोक लिया और बंधक बना लिया। अपहरण के बाद अगले सात दिनों तक आतंकवादियों ने प्रशासन और परिवार पर दबाव बनाने के लिए कई अवास्तविक और बेतुकी मांगें सामने रखीं। अपहरणकर्ता भारतीय हिरासत में बंद अन्य आतंकियों को छोड़ने की जिद पर अड़े थे। हर गुजरते दिन के साथ नई-नई शर्तें थोपी जा रही थीं, जिसने पूरे परिवार को असहनीय मानसिक तनाव और दहशत में झोंक दिया था। वेरीनाग से श्रीनगर और फिर सातवें दिन आई मनहूस खबर उस अशांत दौर में अभिनेत्री का पूरा परिवार कश्मीर में ही रह रहा था। जब संकट शुरू हुआ, तब वह अपनी मां और बहन के साथ वेरीनाग में मौजूद थीं। घाटी में हालात तेजी से बिगड़ने और सुरक्षा का जोखिम बढ़ने पर उन्हें सुरक्षित स्थान श्रीनगर भेज दिया गया। वहां सात दिनों तक सांस रोककर पिता की वापसी का इंतजार करते परिवार को सातवें दिन वह खबर मिली, जिसने सब कुछ उजाड़ दिया। आतंकवादियों ने मेजर भूपेंद्र सिंह की हत्या कर दी थी। बाद में परिवार को यह भी पता चला कि अपहरणकर्ताओं की कैद में अंतिम पलों तक मेजर अपनी दोनों छोटी बेटियों और परिवार को ही याद कर रहे थे। घाटी छोड़कर नोएडा में नए सिरे से शुरू की जिंदगी अभिनेत्री ने बेहद भावुक होकर साझा किया कि कैद में रहते हुए उनके पिता ने आतंकियों से कहा था कि उनका एक परिवार है और दो छोटी बच्चियां हैं। उन्हें पूरा विश्वास है कि अपनी अंतिम सांस तक उनके पिता के दिलो-दिमाग में सिर्फ अपनी बेटियों और परिवार का ही ख्याल घूम रहा था और वह हर कीमत पर अपनी बच्चियों के पास लौटना चाहते थे। इस दिल दहला देने वाले नुकसान के बाद परिवार के लिए कश्मीर में ठहरना मुमकिन नहीं था। इसके बाद निम्रत कौर, उनकी मां और बहन ने घाटी को अलविदा कह दिया और उत्तर प्रदेश के नोएडा आकर बस गईं, जहां उनके नाना-नानी रहते थे। इसका आप पर असर यह संस्मरण आतंकवाद की मानवीय त्रासदी और सैन्य परिवारों द्वारा झेले जाने वाले आजीवन दर्द को उजागर करता है। • सैन्य परिवारों का सम्मान: देश की रक्षा में प्राण न्योछावर करने वाले वीर जवानों के परिजनों के त्याग और संघर्ष की जमीनी हकीकत सामने आती है। इससे नागरिकों में सुरक्षा बलों के प्रति सम्मान और उनके आश्रितों के मानसिक संघर्षों के प्रति संवेदनशीलता बढ़ती है। • कश्मीर घाटी का इतिहास: नब्बे के दशक के शुरुआती दौर में घाटी में फैली अशांति और सैन्य अधिकारियों को निशाना बनाए जाने के काले दौर की याद ताजा होती है। यह उस दौर के पलायन और परिवारों पर पड़े सामाजिक असर को समझने में मदद करता है। • शौर्य चक्र का महत्व: मेजर भूपेंद्र सिंह को मरणोपरांत मिले सम्मान से पता चलता है कि सेना में सर्वोच्च बलिदान को राष्ट्र हमेशा याद रखता है। यह नई पीढ़ी को राष्ट्र सेवा और जांबाज सैनिकों की शौर्य गाथाओं से जोड़ता है। • सदमे से उबरने की सीख: बचपन में इतने बड़े आघात के बाद भी अभिनेत्री का करियर संवारना मानवीय जीवटता को दर्शाता है। यह किसी भी बड़े व्यक्तिगत आघात से जूझ रहे लोगों को आगे बढ़ने की हिम्मत देता है। ऐसा क्यों हुआ यह घटना जनवरी 1994 में कश्मीर घाटी में उग्रवाद के चरम दौर के दौरान घटी थी, जब आतंकियों ने घात लगाकर एक सैन्य अधिकारी को निशाना बनाया। • घात लगाकर किया गया हमला: मेजर भूपेंद्र सिंह जब अपनी नियमित सैन्य ड्यूटी समाप्त करके लौट रहे थे, तब वर्दीधारी आतंकवादियों ने धोखे से उन्हें रोककर बंधक बना लिया था। आतंकी भारतीय सुरक्षा बलों की गतिविधियों पर नजर रखे हुए थे। • कैदियों की अदला-बदली का दबाव: आतंकवादियों ने मेजर के बदले भारतीय हिरासत में बंद अन्य आतंकियों की रिहाई की अव्यावहारिक मांगें रखी थीं। सरकार पर दबाव बनाने के लिए एक हफ्ते तक लगातार नई शर्तें जोड़ी जाती रहीं। • मांगें पूरी न होने पर हत्या: प्रशासन द्वारा देशविरोधी शर्तों को स्वीकार न किए जाने के चलते अपहरण के सातवें दिन आतंकवादियों ने मेजर भूपेंद्र सिंह की हत्या कर दी। इसके बाद परिवार को उनकी शहादत की सूचना मिली। सवाल-जवाब 1. निम्रत कौर के पिता कौन थे और वह किस पद पर थे? निम्रत कौर के पिता मेजर भूपेंद्र सिंह भारतीय सेना में अधिकारी थे, जो जनवरी 1994 में कश्मीर में तैनात थे। 2. मेजर भूपेंद्र सिंह का अपहरण कब और कैसे हुआ था? जनवरी 1994 में ड्यूटी से लौटते समय सेना की वर्दी पहने आतंकियों ने उन्हें रास्ते में रोककर अगवा कर लिया था। 3. आतंकवादियों ने रिहाई के लिए क्या शर्तें रखी थीं? अपहरणकर्ताओं ने भारतीय हिरासत में मौजूद अन्य आतंकवादियों की रिहाई की मांग रखी थी और लगातार नई शर्तें जोड़ रहे थे। 4. मेजर भूपेंद्र सिंह को मरणोपरांत कौन सा वीरता पुरस्कार मिला? देश के लिए अपने प्राण न्योछावर करने पर मेजर भूपेंद्र सिंह को मरणोपरांत शौर्य चक्र से सम्मानित किया गया था। 5. पिता की शहादत के समय निम्रत कौर की उम्र क्या थी? उस दुखद हादसे के समय निम्रत कौर की उम्र केवल 11 वर्ष थी। 6. पिता के निधन के बाद निम्रत कौर का परिवार कहां जाकर बस गया? हादसे के बाद निम्रत, उनकी मां और बहन कश्मीर छोड़कर उत्तर प्रदेश के नोएडा में अपने नाना-नानी के पास बस गए। प्रेरणा और सबक निम्रत कौर और उनके परिवार का यह सफर असीम दुख के बीच अडिग रहने और जिंदगी को दोबारा संवारने का प्रतीक है। • असीम साहस के साथ वापसी: महज 11 साल की उम्र में पिता को खोने के बाद भी निम्रत ने हिम्मत नहीं हारी और कला के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई। इससे सीख मिलती है कि परिस्थितियां कितनी भी कठिन हों, मेहनत से भविष्य संवारा जा सकता है। • कर्तव्य के प्रति निष्ठा: मेजर भूपेंद्र सिंह ने आतंकियों की कैद में भी अपने देश और परिवार की गरिमा को सर्वोपरि रखा। उनका यह बलिदान राष्ट्रभक्ति और मानसिक दृढ़ता का उत्कृष्ट उदाहरण है। • पारिवारिक संबल: संकट के समय मां और ननिहाल के सहयोग से परिवार ने नए शहर में शून्य से शुरुआत की। यह साबित करता है कि आपसी विश्वास और जुड़ाव से सबसे बड़े सदमे को भी झेला जा सकता है। https://trendkia.com/bollywood/kashmir-men-pita-ke-apaharana-aura-shahadata-ki-dardanaka-yaden-sajha-karate-hue-bhavuka-huin-nimrat-kaur-41471 TrendKia — Har trend, sabse pehle.