# खाली सिनेमाघरों के बीच जितेंद्र के निजी भरोसे ने कैसे बदल दी थी फिल्म फर्ज की किस्मत

> शुरुआती तीन महीनों तक दर्शकों को तरसने वाली फिल्म फर्ज ने घाटे की भरपाई की निजी गारंटी के बाद बॉक्स ऑफिस पर ढाई करोड़ रुपये की ऐतिहासिक कमाई दर्ज की थी।

**Type:** article · **Category:** बॉलीवुड · **Published:** 2026-10-14 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/bollywood/khali-sinemagharon-ke-bicha-jeetendra-ke-niji-bharose-ne-kaise-badala-di-thi-philma-farz-ki-kismata-47594 · **Language:** Hindi
**Tags:** जितेंद्र, बबीता, फिल्म फर्ज, फिरोज खान, रविकांत नगाइच, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल, आनंद बख्शी, बॉक्स ऑफिस

हिंदी सिनेमा के इतिहास में ऐसी कई मिसालें दर्ज हैं जहां शुरुआती तौर पर नाकाम दिख रही किसी रचना ने आगे चलकर सफलता के सारे कीर्तिमान ध्वस्त कर दिए। ऐसी ही एक अनूठी दास्तान वर्ष 1967 में बड़े पर्दे पर प्रदर्शित हुई जासूसी थ्रिलर शैली की पेशकश की है, जिसमें मुख्य अभिनेता के तौर पर जितेंद्र और उनकी जोड़ीदार के रूप में बबीता ने काम किया था। यह वही परियोजना थी जिसके बलबूते अभिनेता ने फिल्म उद्योग में अपने पैर मजबूती से जमाए, जबकि शुरुआती बारह सप्ताह तक आलम यह था कि सिनेमाघरों के भीतर सन्नाटा पसरा हुआ था और टिकट खिड़कियों पर खरीदार नहीं पहुंच रहे थे।

## शीर्ष सितारों की बेरुखी और रात्रिकालीन फिल्मांकन की चुनौती
इस जासूसी परियोजना के निर्माण से पहले भूमिका के चयन को लेकर निर्माताओं को काफी मशक्कत करनी पड़ी थी। निर्माण दल की प्राथमिक इच्छा थी कि मुख्य किरदार फिरोज खान अदा करें। निर्माताओं के सामने समय सीमा का कड़ा दबाव था, जिसके चलते वे दृश्य विन्यास को शीघ्रता से निपटाने के लिए रात की पाली में भी काम जारी रखना चाहते थे। फिरोज खान रात्रिकालीन काम के पक्षधर नहीं थे, इसी व्यावहारिक असहमति की वजह से उन्होंने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया था।

इसके उपरांत निर्माण दल ने मनोज कुमार तथा शशि कपूर जैसे स्थापित नामों से संपर्क साधा। इन दोनों अभिनेताओं के साथ भी विभिन्न कारणों से सहमति नहीं बन पाई। जब कई बड़े नाम इस परियोजना से अलग हो गए, तब जाकर यह केंद्रीय किरदार जितेंद्र की झोली में आया। उस दौर में शायद ही किसी समीक्षक अथवा व्यापार विशेषज्ञ ने यह अनुमान लगाया होगा कि यह साधारण सा लगने वाला फैसला अभिनेता के सफर का सबसे मजबूत स्तंभ साबित होगा।

## रचनात्मक दल और तकनीकी सहयोगियों का जमावड़ा
विजय लक्ष्मी पिक्चर्स के बैनर तले साकार हुई इस परियोजना का वित्तीय दायित्व सुंदरलाल नहाटा और डूंडी के कंधों पर था। वहीं निर्देशन की संपूर्ण कमान रविकांत नगाइच के पास थी, जिन्होंने न केवल दृश्यों का संयोजन किया बल्कि कैमरे के संचालन और सिनेमैटोग्राफी का प्रभार भी स्वयं संभाला। उनकी इस दोहरी जिम्मेदारी ने पर्दे पर एक गतिशील तकनीकी कसावट पेश की।

जितेंद्र और बबीता की मुख्य जोड़ी के समानांतर इस कथा संसार को जीवंत बनाने के लिए कई मंझे हुए सह कलाकारों को शामिल किया गया था। इनमें सज्जन, आगा, राजेंद्र कलेश्वर राव, नागेश, मुकरी, मोहन चोटी, डेविड अब्राहम चेउलकर तथा अरुणा ईरानी ने अपने-अपने किरदारों से कहानी के ताने-बाने को रोचक और समृद्ध बनाया।

## संगीत का आकर्षण और निर्माण लागत का गणित
इस कृति की दीर्घकालिक लोकप्रियता का एक बहुत बड़ा आधार इसका संगीतमय पक्ष रहा। धुनों की रचना लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल की ख्यातिप्राप्त जोड़ी ने की थी, जबकि गीतों के बोल आनंद बख्शी की कलम से निकले थे। इनके गानों की ताजगी ने धीरे-धीरे आम श्रोताओं के बीच गहरी पैठ बनाई।

निर्माण लागत की बात करें तो शुरुआत में इस पर करीब 8 लाख रुपये का व्यय निर्धारित हुआ था। हालांकि, बाद के दौर में जब परिस्थितियां पूरी तरह बदलीं और वितरकों की मांग बढ़ी, तो अतिरिक्त कॉपियां तैयार करवानी पड़ीं। इन अतिरिक्त व्यवस्थाओं के जुड़ने से कुल लागत बढ़कर लगभग 20 लाख रुपये तक पहुंच गई। लागत में इजाफे के बावजूद जब फिल्म का अंतिम बहीखाता तैयार हुआ, तो इसने लगभग ढाई करोड़ रुपये का कारोबार दर्ज कराकर सबको हैरत में डाल दिया।

## थिएटर मालिकों की नाराजगी और अभिनेता का साहसिक समझौता
शुरुआती दौर इस परियोजना के लिए बेहद निराशाजनक साबित हो रहा था। प्रदर्शन के शुरुआती 12 हफ्तों तक दर्शकों की संख्या बेहद सीमित रही और हॉल लगभग खाली नजर आते थे। लगातार हो रहे नुकसान से तंग आकर सिनेमाघर संचालकों ने इसे अपने पर्दों से उतारने का पक्का मन बना लिया था।

परियोजना को असमय हटने से बचाने के लिए जितेंद्र ने व्यक्तिगत स्तर पर एक जोखिम भरा दांव खेला। उन्होंने प्रदर्शकों से आग्रह किया कि वे इसे कम से कम 15 सप्ताह तक चलने दें। अभिनेता ने संचालकों को स्पष्ट वचन दिया कि यदि पंद्रह हफ्ते पूरे होने पर भी दर्शक नहीं आते हैं, तो टिकटों की बिक्री में रहने वाली पूरी कमी का भुगतान वे अपनी जेब से करेंगे। इस आश्वासन के बाद प्रदर्शन जारी रहा और चमत्कारिक रूप से पंद्रहवें हफ्ते के बाद दर्शकों की भारी भीड़ उमड़ने लगी। मांग इतनी बढ़ी कि अतिरिक्त प्रिंट छपवाने पड़े और यह फ्लॉप की कगार से उठकर एक ऐतिहासिक ब्लॉकबस्टर में तब्दील हो गई।

## इसका आप पर असर
पुरानी फिल्मों के संघर्ष और सफलता के आंकड़े यह सिखाते हैं कि बाजार में किसी उत्पाद की शुरुआती सुस्ती अंतिम फैसला नहीं होती।

- **सिनेमा प्रेमियों के लिए:** यह जानकारी दर्शाती है कि ऐतिहासिक हिट्स भी रिलीज के शुरुआती हफ्तों में विफलता का सामना कर चुकी हैं। इससे दर्शकों को किसी नई फिल्म के भविष्य का आकलन केवल पहले सप्ताह के आंकड़ों से न करने का नजरिया मिलता है।
- **कलाकारों और रचनाकारों के लिए:** यह प्रसंग रेखांकित करता है कि जब कलाकार को अपनी कृति पर भरोसा हो तो निजी जोखिम भी परिणाम बदल सकता है। सृजन से जुड़े लोग विपरीत परिस्थितियों में धैर्य रखकर अपनी रचना को स्थापित करने की प्रेरणा ले सकते हैं।
- **मनोरंजन व्यापार के विश्लेषकों के लिए:** यह केस स्टडी साबित करती है कि वितरण व्यवस्था और वर्ड ऑफ माउथ पब्लिसिटी किसी भी माध्यम को दोबारा जीवित कर सकती है। व्यापारिक समझ यह बताती है कि मांग बढ़ने पर अतिरिक्त संसाधन लगाना लंबे समय में भारी मुनाफा दे सकता है।
- **आम दर्शकों के लिए:** यह कहानी मनोरंजन उद्योग के पर्दे के पीछे की वित्तीय अनिश्चितताओं को स्पष्ट करती है। लोग यह समझ पाते हैं कि एक ब्लॉकबस्टर बनने के पीछे तकनीकी टीमों और कलाकारों का कितना व्यक्तिगत दांव लगा होता है।

## ऐसा क्यों हुआ
फर्ज के निर्माण और उसकी नाटकीय बॉक्स ऑफिस सफलता के पीछे कई रचनात्मक तथा व्यावहारिक कारण मौजूद थे। प्रमुख सितारों द्वारा काम करने से मना करने के बाद ही यह भूमिका नए चेहरे तक पहुंची थी।

- **रात्रिकालीन शूटिंग से परहेज:** मुख्य भूमिका के लिए पहली पसंद फिरोज खान थे, लेकिन निर्माताओं को जल्द काम पूरा करने के लिए रातों में भी शूटिंग करनी थी। फिरोज खान ने रात में काम न करने के अपने नियम के कारण इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया था।
- **अन्य शीर्ष अभिनेताओं की असहमति:** फिरोज खान के बाद मनोज कुमार और शशि कपूर से संपर्क किया गया, मगर उनके साथ भी तालमेल नहीं बैठ सका। इन दोनों बड़े नामों के हटने के बाद ही यह किरदार आखिरकार जितेंद्र को सौंपा गया।
- **संगीतमय मजबूती और प्रचार:** फिल्म की धीमी शुरुआत के बावजूद लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल का संगीत और आनंद बख्शी के गीत धीरे-धीरे लोकप्रिय होते गए। इस संगीतमय आकर्षण ने 12 हफ्ते की सुस्ती के बाद दर्शकों को सिनेमाघरों तक खींचने में बड़ी भूमिका निभाई।
- **अभिनेता का वित्तीय जोखिम:** जब सिनेमाघर मालिकों ने घाटे के कारण फिल्म हटाने का फैसला किया, तो जितेंद्र ने 15 हफ्ते तक चलाने की शर्त पर नुकसान की निजी भरपाई का वादा किया। इसी अवसर ने फिल्म को संभलने का जरूरी समय दिया, जिससे दर्शक उमड़ पड़े और फिल्म सुपरहिट हो गई।

## सवाल-जवाब

### 1. फिल्म फर्ज किस वर्ष रिलीज हुई थी और इसके मुख्य कलाकार कौन थे?
यह फिल्म वर्ष 1967 में सिनेमाघरों में रिलीज हुई थी, जिसमें जितेंद्र और बबीता ने मुख्य भूमिकाएं निभाई थीं।

### 2. जितेंद्र से पहले यह फिल्म किन अभिनेताओं को ऑफर की गई थी?
यह भूमिका सबसे पहले फिरोज खान को दी गई थी, और उनके बाद मनोज कुमार व शशि कपूर से भी इस रोल के लिए बात की गई थी।

### 3. फिरोज खान ने फिल्म में काम करने से क्यों मना किया था?
मेकर्स फिल्म की शूटिंग जल्दी पूरी करने के लिए रात में भी शूट करना चाहते थे, लेकिन फिरोज खान रात में काम नहीं करते थे, इसलिए उन्होंने यह फिल्म छोड़ दी थी।

### 4. फिल्म फर्ज का निर्देशन और निर्माण किसने किया था?
इसका निर्देशन और सिनेमैटोग्राफी रविकांत नगाइच ने संभाली थी, जबकि सुंदरलाल नहाटा और डूंडी ने विजय लक्ष्मी पिक्चर्स के तहत इसे प्रोड्यूस किया था।

### 5. फिल्म का संगीत किसने तैयार किया था और इसके गीत किसने लिखे थे?
फिल्म का संगीत लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल की जोड़ी ने तैयार किया था और इसके सभी गीत आनंद बख्शी ने लिखे थे।

### 6. फिल्म की निर्माण लागत और बॉक्स ऑफिस कमाई कितनी रही?
शुरुआती लागत करीब 8 लाख रुपये थी जो बाद में बढ़कर 20 लाख रुपये तक पहुंच गई, जबकि फिल्म ने करीब ढाई करोड़ रुपये की कुल कमाई की थी।

### 7. सिनेमाघरों से उतरने की कगार पर पहुंची फिल्म को बचाने के लिए जितेंद्र ने क्या शर्त रखी थी?
जितेंद्र ने थिएटर मालिकों से इसे 15 हफ्तों तक चलाने का अनुरोध किया था और कहा था कि दर्शक न आने पर टिकटों के नुकसान की भरपाई वे खुद करेंगे।

## प्रेरणा और सबक
जितेंद्र के इस ऐतिहासिक फैसले से किसी भी कार्यक्षेत्र में अपने काम पर भरोसा रखने और जोखिम उठाने की अमूल्य सीख मिलती है।

- **खुद की मेहनत पर अटूट विश्वास:** शुरुआती तीन महीने की असफलता के बावजूद अभिनेता ने अपनी परियोजना से उम्मीद नहीं छोड़ी। जब व्यक्ति को अपने काम की गुणवत्ता पर भरोसा होता है, तो वह विपरीत हालात में भी डटे रहने का साहस जुटा लेता है।
- **जिम्मेदारी लेने की तत्परता:** घाटे की स्थिति में नुकसान की भरपाई का वचन देना एक बहुत बड़ा व्यक्तिगत दायित्व था। असफलता का आर्थिक बोझ अपने कंधों पर लेने की यह तैयारी ही पेशेवरों को असाधारण सफलता दिलाती है।
- **धैर्य और सही समय का इंतजार:** सिनेमा में तात्कालिक परिणामों की जगह पंद्रह सप्ताह तक प्रतीक्षा करने की रणनीति कारगर साबित हुई। जीवन में किसी भी प्रयास को स्थापित होने के लिए पर्याप्त समय देना अत्यंत आवश्यक होता है।

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