लास्ट मैन इन टावर में मनोज बाजपेयी निभाएंगे जिद्दी शिक्षक का किरदार, बोले आत्ममुग्ध अच्छाई भी बन सकती है मुसीबत अरविंद अडिगा के उपन्यास पर आधारित आगामी फिल्म में मनोज बाजपेयी एक सेवानिवृत्त अध्यापक की भूमिका में दिखेंगे, जो मुंबई में एक विशाल बिल्डर के सामने अकेले डट जाता है। मनोज बाजपेयी आने वाले सिनेमाई प्रोजेक्ट 'लास्ट मैन इन टावर' में एक सेवानिवृत्त स्कूल शिक्षक और विधुर के रूप में परदे पर नजर आने वाले हैं। यह व्यक्ति उम्र भर खुद को अपने कुनबे का सबसे न्यायप्रिय, सुलझा हुआ और उत्तरदायी सदस्य समझता आया है। उसके मन में यह पक्का विश्वास बैठा हुआ है कि उसने अपने भाइयों और सगे-संबंधियों की भलाई के लिए अनगिनत समझौते किए हैं और हर कठिन घड़ी में उनके साथ चट्टान की तरह खड़ा रहा है। हालांकि, जब उसका अपना बेटा उसके सामने जीवन की असलियत और उसके बर्ताव का दूसरा पहलू उजागर करता है, तब अपने नेक होने का उसका वर्षों पुराना भ्रम चकनाचूर होने लगता है। मनोज बाजपेयी के अनुसार, यह किरदार संसार और मानवीय आचरण को केवल श्वेत या श्याम दृष्टिकोण से देखने का आदी रहा है। उसके सोच के दायरे में किसी भी परिस्थिति में कोई तीसरा या लचीला रास्ता तलाशने की गुंजाइश लगभग खत्म हो चुकी है। इस किरदार की पृष्ठभूमि को टटोलने पर यह साफ होता है कि उसके व्यक्तित्व के कई अनसुलझे पहलू उसके बेटे की बातचीत और तर्कों के जरिए खुलकर सामने आते हैं। वह जीवन भर अपने परिवार के भीतर खुद को सबसे बड़ा, त्यागी और सदाचारी साबित करने की कशमकश में लगा रहा। उसने अपने भाइयों की सहायता को जीवन का परम कर्तव्य मान लिया था, और धीरे-धीरे यही दंभ उसके स्वभाव का स्थायी हिस्सा बन गया। जब तथाकथित अच्छाई अपनों के लिए बन जाए आफत कुनबे के लिए सब कुछ न्योछावर करने और खुद को कुल का सबसे महान व्यक्ति साबित करने के चक्कर में वह व्यक्ति अनजाने में अपने सबसे करीबी लोगों की भावनाओं और प्राथमिकताओं को दरकिनार कर बैठता है। उसे हमेशा यह गुमान रहता है कि उसने अपने भाइयों के लिए बड़े-बड़े त्याग किए हैं, लिहाजा हर किसी को उसके निर्णयों का सम्मान करना चाहिए। बाजपेयी ने इस मानवीय उलझन को स्पष्ट करते हुए रेखांकित किया कि जब उसका बेटा उसे आईना दिखाता है कि उसकी इस जिद और तथाकथित त्याग का उसके अपने घर-परिवार पर कितना गहरा और नकारात्मक प्रभाव पड़ा है, तो उसके भीतर की पूरी मानसिक दुनिया हिल जाती है। उस क्षण उस वृद्ध व्यक्ति को गहरा अहसास होता है कि जिस व्यवहार को वह जिंदगी भर अपनी सबसे बड़ी नेकी समझकर गर्व करता रहा, वही दरअसल उसके आसपास के प्रियजनों के लिए भारी परेशानी का कारण बन चुका था। इंसान कई दफा अपनी ही बनाई महानता और नेकी की छवि का इस कदर कैदी बन जाता है कि वह यह देख ही नहीं पाता कि उसकी वही अच्छाई दूसरों के रोजमर्रा के जीवन में कितनी जटिलताएं खड़ी कर रही है। अरविंद अडिगा के चर्चित उपन्यास का रूपांतरण इंसान की सामान्य फितरत होती है कि वह अपने द्वारा उठाए गए हर कदम को सही ठहराने के लिए तरह-तरह की दलीलें गढ़ता है। असल जीवन का सबसे जटिल इम्तिहान खुद के भीतर झांकना और अपनी कमियों को स्वीकार करना होता है। इस फिल्म में बाजपेयी का किरदार भी एक ऐसे ही दोराहे पर पहुंचता है, जहां उसे अपने जीवन के पुराने फैसलों और मान्यताओं का नए सिरे से मूल्यांकन करने के लिए विवश होना पड़ता है। 'लास्ट मैन इन टावर' प्रख्यात लेखक अरविंद अडिगा के इसी शीर्षक वाले बहुचर्चित उपन्यास पर आधारित है। पूरी कहानी तेजी से बदलते और गगनचुंबी इमारतों में तब्दील होते मुंबई शहर की पृष्ठभूमि में रची गई है। कहानी में निर्णायक मोड़ तब आता है, जब एक प्रभावशाली और धनवान रियल एस्टेट बिल्डर शहर की एक पुरानी आवासीय इमारत के सभी बाशिंदों को अपने-अपने फ्लैट खाली करने के एवज में भारी भरकम धनराशि देने की पेशकश करता है। एक अकेले इंसान का विकास और पूंजी के खिलाफ मोर्चा इमारत में रहने वाले अधिकांश निवासी इस आकर्षक वित्तीय प्रस्ताव को बिना किसी हिचकिचाहट के स्वीकार करने को तैयार हो जाते हैं, क्योंकि उन्हें अपने पुराने मकानों के बदले जिंदगी बदल देने वाली रकम मिल रही होती है। लेकिन मनोज बाजपेयी का किरदार अपने पुश्तैनी आशियाने को छोड़ने से साफ इनकार कर देता है। उसका यह कड़ा फैसला उसे पूरी सोसाइटी और बिल्डर की नजर में खलनायक बना देता है। वह पूरी पुरानी सोसाइटी को गिराकर वहां एक आलीशान लग्जरी टावर खड़ा करने के विशाल प्रोजेक्ट के रास्ते में अकेला सबसे बड़ा रोड़ा बनकर खड़ा हो जाता है। यह कथा सिर्फ एक मकान अथवा चारदीवारी को बचाने के संघर्ष तक सीमित नहीं रहती, बल्कि इसके जरिए इंसानी रिश्तों, पैसे की ताकत, समाज की बदलती सोच और मनुष्य द्वारा अपने बारे में पाले गए आत्ममुग्धता के भ्रम को बेहद संजीदगी से परदे पर उकेरा गया है। इसका आप पर असर यह फिल्म आधुनिक शहरीकरण और पारिवारिक रिश्तों में नैतिक हठधर्मिता के वास्तविक टकराव को उजागर करती है। • सिनेमा प्रेमियों के लिए: दर्शक साहित्य पर आधारित एक गंभीर और विचारोत्तेजक नाटक देख सकेंगे। मनोज बाजपेयी का यह अभिनय मानवीय कमजोरियों और जिद के सूक्ष्म पक्षों को समझने का अवसर प्रदान करेगा। • शहरी फ्लैट मालिकों के लिए: यह कहानी पुराने आवासीय परिसरों के पुनर्विकास के दौरान पैदा होने वाले दबाव को दिखाती है। बिल्डर के प्रस्तावों और पड़ोसियों के आपसी मतभेदों के व्यावहारिक संकट को इसमें स्पष्ट रूप से रेखांकित किया गया है। • पारिवारिक संवाद के स्तर पर: व्यक्ति को अपनी तथाकथित अच्छाई के पीछे छिपे अहंकार का पुनर्मूल्यांकन करने की सीख मिलती है। यह कहानी सिखाती है कि परिवार के भले का दावा करने वाले फैसले कई बार अपनों के लिए ही मुसीबत बन जाते हैं। • साहित्यिक पाठकों के लिए: अरविंद अडिगा के अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित उपन्यास का स्क्रीन रूपांतरण देखने को मिलेगा। जो लोग किताब पढ़ चुके हैं, वे लिखित पात्रों को दृश्य पटल पर नए रूप में महसूस कर सकेंगे। ऐसा क्यों हुआ फिल्म की मुख्य पटकथा अरविंद अडिगा के उपन्यास के उस केंद्रीय द्वंद्व से उत्पन्न होती है, जहां एक समाज पूंजी और नैतिकता के बीच बंट जाता है। • उपन्यास का मूल कथ्य: लेखक अरविंद अडिगा ने बदलती मुंबई में धन की ताकत और पुराने मूल्यों के संघर्ष को रेखांकित किया था। उसी साहित्यिक ताने-बाने को सिनेमाई रूप में ढाला गया है ताकि मानवीय प्रकृति की कमजोरियों को परदे पर दिखाया जा सके। • बिल्डर का लुभावना प्रस्ताव: पुरानी इमारत के अधिकांश बाशिंदे वित्तीय लाभ के लिए अपने मकान तुरंत खाली करने का फैसला करते हैं। आर्थिक तंगी और बेहतर जीवन की चाहत पड़ोसियों को एकमत कर देती है। • किरदार का अडिग स्वभाव: मुख्य पात्र जीवन भर खुद को नैतिक रूप से श्रेष्ठ मानने का आदी रहा है, जिससे वह सामूहिक दबाव के आगे झुकने से इनकार कर देता है। यही दृढ़ता आगे चलकर पूरे समाज और उसके अपने परिवार के साथ गहरे तनाव का कारण बनती है। सवाल-जवाब 1. फिल्म लास्ट मैन इन टावर में मनोज बाजपेयी किस तरह का किरदार निभा रहे हैं? वह एक सेवानिवृत्त स्कूल शिक्षक और विधुर की भूमिका निभा रहे हैं, जो खुद को परिवार का सबसे सही इंसान मानता है और पुरानी इमारत खाली करने से मना कर देता है। 2. यह फिल्म किस लेखक की रचना पर आधारित है? यह फिल्म प्रसिद्ध लेखक अरविंद अडिगा के इसी नाम के उपन्यास पर आधारित है। 3. कहानी किस शहर की पृष्ठभूमि में घटित होती है? पूरी कहानी तेजी से बदलती और गगनचुंबी इमारतों में तब्दील हो रही मुंबई की पृष्ठभूमि में बुनी गई है। 4. इमारत के निवासियों और मनोज के किरदार के बीच मुख्य विवाद क्या है? एक बिल्डर सोसाइटी को खाली कराने के लिए भारी रकम देता है जिसे बाकी लोग मान लेते हैं, लेकिन मनोज का किरदार अपना घर छोड़ने से साफ इनकार कर देता है। 5. मनोज बाजपेयी के किरदार की सोच में बदलाव की शुरुआत कैसे होती है? जब उनका बेटा उन्हें आईना दिखाता है कि उनके तथाकथित त्याग और जिद ने परिवार को परेशानी में डाला है, तब उनका नजरिया बदलने लगता है। https://trendkia.com/bollywood/last-man-in-tower-men-manoj-bajpayee-nibhaenge-jiddi-shikshaka-ka-kiradara-bole-atmamugdha-achchhai-bhi-bana-sakati-hai-musibata-37284 TrendKia — Har trend, sabse pehle.