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  "type": "article",
  "title": "मजरूह सुल्तानपुरी की लिखी दो पंक्तियां कैसे बनीं राज कपूर की तीसरी कसम का अमर गीत",
  "summary": "जेल में बंद मजरूह सुल्तानपुरी की आर्थिक मदद के लिए राज कपूर ने उनसे एक मुखड़ा लिखवाया था, जो 17 साल बाद फिल्म तीसरी कसम का सदाबहार गाना बना।",
  "content": "आजादी के तुरंत बाद का दौर भारतीय सिनेमा और अदब दोनों के लिए बेहद हलचल भरा था। उस जमाने में एक क्रांतिकारी शायर अपनी बेबाक नज्मों और गजलों से मुशायरों में अलग ही पहचान बना रहे थे। मशहूर अभिनेता बलराज साहनी उनके करीबी दोस्तों में शामिल थे। एक बार मजदूरों की एक सभा का आयोजन हुआ, जिसमें इन शायर को आमंत्रित किया गया था। जब वे बलराज साहनी के साथ उस सम्मेलन में पहुंचे, तो वहां मौजूद कामगारों ने उनसे अपने मिजाज के मुताबिक कुछ क्रांतिकारी पंक्तियां सुनाने की अपील की।\n\nशायर ने मजदूरों की दरख्वास्त पर अपनी कुछ तल्ख पंक्तियां मंच से पढ़ीं, जिनमें व्यवस्था पर सीधा कटाक्ष था। उन पंक्तियों के बोल कुछ यूं थे, 'दिल में ख्वाब डॉलर का बसाकर फिरती है भारत की अहिंसा।' सभा में मौजूद लोगों ने इन शब्दों को हाथों-हाथ लिया और खूब तालियां बजाईं। इस शायरी की चर्चा तेजी से फैली, लेकिन हुकूमत और सत्ता के गलियारों में बैठे कुछ लोगों को यह तीखा तंज बिल्कुल पसंद नहीं आया। नतीजतन, इस रचना की वजह से शायर और बलराज साहनी दोनों को दो साल के लिए जेल की सलाखों के पीछे भेज दिया गया।\n\nमुश्किल घड़ी में राज कपूर की अनूठी मदद\nजब इस क्रांतिकारी गीतकार को जेल में बंद किया गया, तब उनके परिवार पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा था। उनकी पत्नी गर्भवती थीं और घर में आर्थिक तंगी चरम पर थी। जब शोमैन राज कपूर को इस नाजुक स्थिति की जानकारी मिली, तो वे चुप नहीं बैठ सके और उन्होंने अपने साथी कलाकार की मदद करने की ठानी। वे जानते थे कि सामने वाला शायर बेहद खुद्दार है और कोई भी मुफ्त की माली इमदाद या खैरात कभी कबूल नहीं करेगा।\n\nराज कपूर ने जेल पहुंचकर उनसे मुलाकात की और एक रचनात्मक रास्ता निकाला। उन्होंने गीतकार से कहा कि वे सृष्टि और इस जहान पर एक नया तराना चाहते हैं, इसलिए वे इस पर कुछ विचार लिखें कि यह दुनिया क्यों और कैसे बनी। उस शायर ने फौरन कागज पर एक मुखड़ा रच दिया, जिसके अमर बोल थे, 'दुनिया बनाने वाले क्या तेरे दिल में समाई, काहे को दुनिया बनाई।' यह कलम किसी और की नहीं बल्कि मजरूह सुल्तानपुरी की थी। राज कपूर ने उस मुखड़े के एवज में उन्हें 1000 रुपये थमा दिए, जो 1948-49 के दौर में बहुत बड़ी रकम मानी जाती थी। इस तरह मजरूह के स्वाभिमान को ठेस पहुंचाए बिना उनके परिवार को जरूरी सहारा मिल गया।\n\n17 साल का लंबा इंतजार और तीसरी कसम\nइस घटना के बाद वक्त का पहिया घूमता रहा और पूरे 17 साल का लंबा अरसा बीत गया। जब राज कपूर अपनी ऐतिहासिक फिल्म 'तीसरी कसम' के निर्माण में जुटे थे, तब मजरूह सुल्तानपुरी की लिखी वे दो पंक्तियां अचानक फिर चर्चा में आईं। राज कपूर ने वह पुराना मुखड़ा मशहूर गीतकार शैलेंद्र के सामने रखा। हालांकि शैलेंद्र उस वक्त फिल्म के निर्माता होने के नाते अन्य व्यवस्थाओं में बहुत व्यस्त चल रहे थे, इसलिए उन्होंने यह मुखड़ा गीतकार हसरत जयपुरी को सौंप दिया और उनसे पूरा गीत तैयार करने का आग्रह किया।\n\nहसरत जयपुरी ने मजरूह के उस ऐतिहासिक मुखड़े के आगे शानदार अंतरे लिखे और पूरे गीत को मुकम्मल शक्ल दी। इस रचना को संगीतकार जोड़ी शंकर-जयकिशन ने अपनी धुन से सजाया, जबकि पार्श्वगायक मुकेश ने इसे अपनी दर्दभरी आवाज देकर हमेशा के लिए अमर बना दिया। जब यह पूरा गाना तैयार होकर मजरूह सुल्तानपुरी के सामने पेश किया गया, तो उन्होंने बड़े दिल का परिचय देते हुए पूरा क्रेडिट हसरत जयपुरी को ही देने की बात कही। यही वजह है कि आधिकारिक रिकॉर्ड्स में इस गीत के रचनाकार के तौर पर हसरत जयपुरी का नाम दर्ज है, मगर इतिहास के पन्नों में यह हकीकत हमेशा दर्ज रहेगी कि इसके मूल मुखड़े का जन्म जेल में बंद मजरूह सुल्तानपुरी की कलम से हुआ था।\n\nइसका आप पर असर\nयह ऐतिहासिक किस्सा दिखाता है कि भारतीय सिनेमा में कलाकारों का आपसी सम्मान और रचनात्मक सहयोग किस तरह काम करता था।\n\n• सिनेमा प्रेमियों के लिए: यह जानकारी क्लासिक हिंदी गीतों के पीछे छिपे वास्तविक इतिहास और संघर्ष को समझने का एक नया नजरिया देती है। दर्शक अब 'तीसरी कसम' के इस सदाबहार गाने को सुनते हुए मजरूह सुल्तानपुरी की कलम की अहमियत को भी पहचान सकेंगे।\n• रचनाकारों के लिए: यह प्रसंग सिखाता है कि कठिन परिस्थितियों में भी अपनी खुद्दारी और गरिमा को कैसे बनाए रखा जा सकता है। साथी कलाकारों की बिना उनका स्वाभिमान तोड़े मदद करने की राज कपूर की मिसाल आज भी प्रासंगिक है।\n• इतिहास के नजरिए से: आजादी के शुरुआती दौर में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और कलाकारों पर हुए सरकारी एक्शन का यह एक बड़ा दस्तावेज है। इससे पता चलता है कि उस समय की राजनीति और अदब का रिश्ता कितना संवेदनशील हुआ करता था।\n• क्रेडिट विवादों पर सीख: मजरूह सुल्तानपुरी का क्रेडिट छोड़ देना दिखाता है कि पुराने दौर में कलाकारों के बीच अहंकार की जगह आपसी सम्मान बड़ा था। यह आज के दौर में बौद्धिक संपदा और श्रेय को लेकर होने वाले टकरावों के विपरीत एक दुर्लभ बड़प्पन पेश करता है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nमजरूह सुल्तानपुरी की गिरफ्तारी और इस अमर गीत के जन्म के पीछे का कारण तत्कालीन राजनीतिक माहौल और कलाकारों की आपसी संवेदनशीलता थी।\n\n• राजनीतिक असंतोष: आजादी के ठीक बाद व्यवस्था पर कटाक्ष करने वाली शायरी को सत्ता पक्ष ने स्वीकार नहीं किया। मजदूरों के सम्मेलन में अमेरिका पर तंज कसने वाली पंक्तियां पढ़ने के कारण मजरूह और बलराज साहनी को दो साल की जेल हुई थी।\n• पारिवारिक तंगी और खुद्दारी: जेल में रहने के दौरान मजरूह की पत्नी गर्भवती थीं और परिवार गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहा था। चूंकि वे किसी से मुफ्त मदद नहीं ले सकते थे, इसलिए राज कपूर ने उनसे गीत का मुखड़ा लिखवाने का बहाना बनाया।\n• तीसरी कसम का निर्माण: घटना के 17 साल बाद जब फिल्म 'तीसरी कसम' बन रही थी, तब राज कपूर ने वही मुखड़ा शैलेंद्र को सौंपा। व्यस्तता के कारण शैलेंद्र ने उसे हसरत जयपुरी को दिया, जिन्होंने अंतरे लिखकर मुकेश की आवाज में गीत पूरा कराया।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. मजरूह सुल्तानपुरी और बलराज साहनी को जेल क्यों हुई थी?\nमजदूरों की सभा में भारत की तत्कालीन नीतियों और अहिंसा पर व्यंग्य करती क्रांतिकारी कविता पढ़ने के कारण उन्हें दो साल की जेल हुई थी।\n\n2. राज कपूर ने जेल में मजरूह सुल्तानपुरी को 1000 रुपये क्यों दिए थे?\nमजरूह के परिवार की आर्थिक तंगी दूर करने के लिए राज कपूर ने उनसे 'दुनिया बनाने वाले' गीत का मुखड़ा लिखवाकर मानदेय के रूप में 1000 रुपये दिए थे।\n\n3. गाना 'दुनिया बनाने वाले क्या तेरे दिल में समाई' किस फिल्म में इस्तेमाल हुआ?\nयह प्रसिद्ध गीत उस वाकये के 17 साल बाद राज कपूर की फिल्म 'तीसरी कसम' में इस्तेमाल किया गया था।\n\n4. फिल्म तीसरी कसम में इस गीत का आधिकारिक क्रेडिट किसे मिला है?\nइस गीत के अंतरे हसरत जयपुरी ने लिखे थे और मजरूह की सहमति के बाद आधिकारिक रिकॉर्ड में गीतकार का क्रेडिट हसरत जयपुरी को ही दिया गया।\n\nप्रेरणा और सबक\nमजरूह सुल्तानपुरी और राज कपूर के इस संस्मरण से विपरीत परिस्थितियों में गरिमा बनाए रखने और दूसरों की मदद करने की गहरी सीख मिलती है।\n\n• खुद्दारी बनाए रखना: अत्यधिक गरीबी और जेल की मुश्किलों के बीच भी अपनी गरिमा और सिद्धांतों से कभी समझौता न करें। कठिन से कठिन दौर में भी अपनी मेहनत और हुनर के दम पर ही आगे बढ़ें।\n• सम्मानपूर्वक मदद करना: जरूरतमंद मित्रों और साथियों की सहायता इस तरह करें कि उनके आत्मसम्मान को कभी ठेस न पहुंचे। खैरात बांटने के बजाय उनकी कला या सेवा का सम्मान करना वास्तविक सहयोग है।\n• बड़प्पन और क्रेडिट: अपनी कला और योगदान के बावजूद दूसरों के परिश्रम को सम्मान देना और श्रेय बांटना ही एक सच्चे कलाकार की पहचान है। मजरूह सुल्तानपुरी ने क्रेडिट का मोह त्यागकर यह सिद्ध किया।",
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  "category": "बॉलीवुड",
  "publishedAt": "2026-09-19",
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