मरीजों की हड्डियां जोड़ने वाला डॉक्टर कैसे बन गया हिंदी रॉक का पहला सुपरस्टार डॉक्टरी की पारिवारिक विरासत संभालते हुए ऑर्थोपेडिक सर्जन बने पलाश सेन ने 'यूफोरिया' बैंड बनाकर 90 के दशक में भारतीय संगीत जगत को नई दिशा दी। भारतीय संगीत जगत में 1990 का दशक एक ऐतिहासिक मोड़ माना जाता है, जब बॉलीवुड के पारंपरिक फिल्मी गीतों के भारी प्रभाव के बीच स्वतंत्र संगीत ने मजबूती से अपने कदम जमाए थे। इस दौर में एक ऐसी आवाज उभरी जिसने दिन के वक्त सफेद कोट पहनकर अस्पताल में मरीजों की सेवा की और शाम ढलते ही मंच पर गिटार थामकर हजारों श्रोताओं को झूमने पर मजबूर कर दिया। वह विलक्षण शख्सियत थे डॉ. पलाश सेन, जिन्होंने अपने मशहूर बैंड ‘यूफोरिया’ की स्थापना कर भारतीय पॉप और रॉक संगीत को एक पूरी तरह से नया और मौलिक रूप प्रदान किया। चिकित्सा की पारिवारिक विरासत और शुरुआती जीवन पलाश सेन का जन्म 23 सितंबर 1965 को लखनऊ में हुआ था, जबकि उनका मूल परिवार वाराणसी के सेन घराने से संबंध रखता है। उनके परिवार में कई पीढ़ियों से चिकित्सा का पेशा चला आ रहा था, जिसके चलते घर के भीतर पढ़ाई-लिखाई और अनुशासन का कड़ा माहौल था। स्वभाव से बेहद जिंदादिल और मिलनसार पलाश की रुचि बचपन से ही अकादमिक पढ़ाई के साथ-साथ रचनात्मक गतिविधियों में भी खूब रही। पारिवारिक परंपरा का सम्मान करते हुए उन्होंने उच्च शिक्षा की दिशा में कदम बढ़ाया और दिल्ली स्थित यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ मेडिकल साइंसेज से पहले एमबीबीएस की उपाधि हासिल की और इसके बाद ऑर्थोपेडिक्स के क्षेत्र में एमएस की स्नातकोत्तर डिग्री पूरी की। कॉलेज के दिनों में गिटार और बैंड की नींव घर में संगीत का वातावरण पहले से मौजूद था, जिसने पलाश के भीतर कला के प्रति गहरा आकर्षण बनाए रखा। मेडिकल कॉलेज के दिनों में उन्हें गिटार बजाना, गाने गाना और खास तौर पर अपने आसपास के लोगों को प्रभावित करना काफी भाता था। वे अक्सर कॉलेज के विभिन्न कार्यक्रमों और आयोजनों में प्रस्तुतियां दिया करते थे। संगीत के इसी गहरे जुनून ने उन्हें साल 1988 में अपने कुछ करीबी दोस्तों को साथ जोड़कर एक समर्पित बैंड स्थापित करने के लिए प्रेरित किया। इस समूह का नाम ‘यूफोरिया’ रखा गया, जिसे भारत का पहला विशुद्ध हिंदी रॉक बैंड माना गया। दस वर्षों की कड़ी मेहनत और देशव्यापी सफलता बैंड के गठन के बाद शुरुआती सफर आसान नहीं था। लगभग एक दशक तक यूफोरिया के सदस्य विभिन्न कॉलेजों और छोटे-मोटे कार्यक्रमों में लगातार लाइव प्रस्तुतियां देकर अपनी पहचान बनाने के लिए संघर्ष करते रहे। पूरे 10 साल के इस कठिन परिश्रम के बाद साल 1998 में उनकी किस्मत ने एक नया मोड़ लिया। उनका जोशीला गीत ‘धूम पिचक धूम’ रिलीज हुआ और इस रचना ने देश भर के संगीत प्रेमियों को अपनी गिरफ्त में ले लिया। हर टेलीविजन चैनल, रेडियो स्टेशन, ऑडियो कैसेट और सीडी प्लेयर पर इस गाने की गूंज सुनाई देने लगी। इसी अभूतपूर्व सफलता के बाद यूफोरिया ने अपना पहला पूरा म्यूजिक एल्बम ‘धूम’ बाजार में उतारा, जो जबरदस्त सुपरहिट साबित हुआ। इसके बाद ‘माई री’, ‘महफूज’ और ‘कभी आएगा तू’ जैसे यादगार गीतों के जरिए उन्होंने एक पूरी पीढ़ी के दिलों में खास जगह बना ली। उनके संगीत में प्रेम, ऊर्जा और भावनाओं का ऐसा अद्भुत तालमेल था जो सीधे सुनने वालों के दिल में उतर जाता था। साल 1998 से 2005 के दौरान यूफोरिया की लोकप्रियता अपने चरम पर थी और वह भारत का नंबर वन म्यूजिक बैंड बन चुका था। उद्योग के तौर-तरीके, अभिनय और नए प्रयोग पलाश सेन एक बहुआयामी प्रतिभा के धनी रहे, जिन्होंने गायक, गीतकार, संगीतकार, चिकित्सक, निर्देशक और अभिनेता के रूप में अपनी भूमिकाएं निभाईं। हालांकि, संगीत उद्योग में भारी सफलता के साथ अंदरूनी राजनीति और समझौते की मांग भी सामने आने लगी। पलाश ने कभी भी किसी के आगे झुकना स्वीकार नहीं किया और हमेशा अपने तय उसूलों तथा शर्तों पर ही संगीत तैयार किया। इसी बेबाक रुख के चलते उनका बॉलीवुड से हमेशा एक तरह का फासला बना रहा। अपनी इस स्पष्टवादिता और बिना लाग-लपेट के काम करने की आदत के कारण धीरे-धीरे मुख्यधारा के चकाचौंध भरे मंचों पर उनकी मौजूदगी सीमित होती चली गई। अपनी प्रसिद्धी के शीर्ष दौर में उन्होंने अभिनय के क्षेत्र में भी हाथ आजमाया और साल 2002 में फिल्मों में अभिनय की शुरुआत की। उन्होंने विभिन्न भाषाओं की फिल्मों में काम किया, मगर सिनेमाई अभिनय में उन्हें संगीत जैसी व्यापक कामयाबी नहीं मिल सकी। बाद में साल 2017 में उन्होंने रचनात्मक कदम बढ़ाते हुए एक लघु फिल्म ‘जिया जले’ का निर्देशन किया, हालांकि यह परियोजना बाद में कॉपीराइट विवाद में घिर गई। इन तमाम उतार-चढ़ाव और विवादों के बावजूद पलाश सेन आज भी एक पेशेवर डॉक्टर के रूप में अपनी मेडिकल प्रैक्टिस जारी रखे हुए हैं और समय-समय पर मंच पर अपनी ऊर्जावान प्रस्तुतियां देते हैं। अपने प्रशंसकों की नजर में वे आज भी वही रॉकस्टार हैं जिन्होंने साबित किया कि एक मेडिकल सर्जन भी कला की दुनिया में क्रांति ला सकता है। इसका आप पर असर पलाश सेन का जीवन और उनका सफर स्वतंत्र कला साधकों और बहु-प्रतिभाशाली युवाओं के लिए एक व्यावहारिक मिसाल पेश करता है। • करियर में संतुलन: एक पूर्णकालिक और मांग वाले पेशेवर करियर के साथ भी रचनात्मक जुनून को जिंदा रखा जा सकता है। उन्होंने एमएस ऑर्थोपेडिक्स की कठिन पढ़ाई और मेडिकल प्रैक्टिस के साथ देश का नंबर वन म्यूजिक बैंड खड़ा करके दिखाया। • स्वतंत्र संगीत का महत्व: बिना किसी बड़े फिल्म स्टूडियो या मध्यस्थ के भी सीधे जनता तक पहुंचा जा सकता है। कलाकारों को यह प्रेरणा मिलती है कि अपनी मौलिक रचनाओं और भाषा में नई शैली गढ़ना संभव है। • कलात्मक स्वाभिमान: उद्योग के दबावों के सामने समझौता न करने की कीमत चुकानी पड़ सकती है, लेकिन विश्वसनीयता बनी रहती है। अपनी शर्तों पर काम करने वाले सर्जक मुख्यधारा से बाहर होकर भी अपनी खास पहचान सुरक्षित रखते हैं। • धैर्य और निरंतरता: तात्कालिक सफलता की जगह दीर्घकालिक तैयारी पर ध्यान देना चाहिए। साल 1988 में बैंड बनाने के बाद मुख्यधारा की पहली बड़ी सफलता हासिल करने में उन्हें पूरे दस साल का समय लगा। ऐसा क्यों हुआ पलाश सेन के जीवन में यह असाधारण संयोजन और बाद के बदलाव कई पारिवारिक, शैक्षणिक और पेशेवर कारणों की स्वाभाविक परिणति थे। • चिकित्सा और संगीत का दोहरा माहौल: लखनऊ और वाराणसी के सेन परिवार में पीढ़ियों से डॉक्टरों की परंपरा थी, जिसने उन्हें चिकित्सा की ओर मोड़ा। वहीं घर में संगीत का जीवंत वातावरण होने से उनके भीतर गिटार और गायन का स्वाभाविक शौक भी गहराई से पनपता रहा। • बॉलीवुड एकाधिकार के बीच नए संगीत की मांग: 1990 के दशक में फिल्म संगीत के एकरस ढांचे के विपरीत युवा पीढ़ी ताजा, ऊर्जावान और वास्तविक गीतों की तलाश में थी। इसी शून्यता को भरने के लिए 1988 में स्थापित यूफोरिया ने 1998 में अपनी मौलिक रॉक ध्वनि प्रस्तुत की, जो सुपरहिट साबित हुई। • मुख्यधारा से टकराव और अलगाव: जबरदस्त सफलता के बाद भी पलाश सेन ने उद्योग की आंतरिक राजनीति और जी-हुजूरी से साफ इनकार कर दिया। अपनी शर्तों पर काम करने के इसी बेबाक रुख के चलते उनका बॉलीवुड से टकराव रहा, जिसके परिणामस्वरूप वे धीरे-धीरे मुख्यधारा से दूर होते चले गए। सवाल-जवाब 1. डॉ. पलाश सेन का जन्म कब और कहां हुआ था? पलाश सेन का जन्म 23 सितंबर 1965 को लखनऊ में हुआ था, और उनका परिवार मूल रूप से वाराणसी से संबंध रखता है। 2. पलाश सेन ने कौन सी मेडिकल डिग्रियां हासिल की हैं? उन्होंने दिल्ली के यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ मेडिकल साइंसेज से एमबीबीएस और फिर ऑर्थोपेडिक्स में एमएस की डिग्री प्राप्त की। 3. बैंड 'यूफोरिया' की स्थापना कब हुई थी? पलाश सेन ने अपने दोस्तों के साथ मिलकर साल 1988 में यूफोरिया की स्थापना की थी, जिसे भारत का पहला हिंदी रॉक बैंड माना जाता है। 4. यूफोरिया को राष्ट्रव्यापी सफलता किस गाने से मिली? साल 1998 में रिलीज हुए गीत 'धूम पिचक धूम' और पहले एल्बम 'धूम' से बैंड को देश भर में भारी सफलता मिली। 5. पलाश सेन ने अभिनय और निर्देशन में कौन से काम किए? उन्होंने साल 2002 में फिल्मों में अभिनय की शुरुआत की और 2017 में लघु फिल्म 'जिया जले' का निर्देशन किया। 6. क्या पलाश सेन आज भी मेडिकल प्रैक्टिस करते हैं? हां, पलाश सेन आज भी एक ऑर्थोपेडिक डॉक्टर के तौर पर प्रैक्टिस करते हैं और समय-समय पर संगीत कार्यक्रमों में भी प्रस्तुति देते हैं। प्रेरणा और सबक डॉ. पलाश सेन का सफर यह दिखाता है कि समाज की पारंपरिक अपेक्षाओं को पूरा करते हुए भी अपने रचनात्मक सपनों को किस तरह साकार किया जा सकता है। • जुनून के लिए बहाने नहीं, वक्त निकालें: मेडिकल की अत्यधिक कठिन पढ़ाई और सर्जरी की जिम्मेदारी के बीच भी उन्होंने अपने संगीत से कभी मुंह नहीं मोड़ा। यदि लगन सच्ची हो, तो दो बिल्कुल अलग दुनियाओं को एक साथ साधा जा सकता है। • अपनी विशिष्ट पहचान बनाएं: जब हर कोई सिर्फ फिल्मी गानों के पीछे भाग रहा था, तब उन्होंने हिंदी रॉक का नया रास्ता चुना। नए प्रयोग करने का साहस ही आपको भीड़ से अलग एक ऐतिहासिक पहचान दिलाता है। • दबाव में अपने सिद्धांतों से समझौता न करें: चकाचौंध और भारी प्रचार के लिए उन्होंने कभी जी-हुजूरी नहीं की और हमेशा अपनी शर्तों पर संगीत बनाया। आत्मसम्मान और अपने काम की शुद्धता किसी भी शॉर्टकट से कहीं अधिक मूल्यवान होती है। • निरंतर परिश्रम में विश्वास रखें: पहले एल्बम की कामयाबी से पहले उन्होंने पूरे दस साल तक कॉलेज कार्यक्रमों और छोटे मंचों पर लगातार रियाज और संघर्ष किया। वास्तविक सफलता रातोंरात नहीं मिलती, बल्कि वर्षों की एकाग्रता का परिणाम होती है। https://trendkia.com/bollywood/marijon-ki-haddiyan-jorane-vala-doktara-kaise-bana-gaya-hindi-roka-ka-pahala-suparastara-36744 TrendKia — Har trend, sabse pehle.