# फिल्म महबूबा में जब हेमा मालिनी ने तवायफ बनकर बांधा था समां, राजेश खन्ना के सामने मुजरे का वो यादगार किस्सा

> साल 1976 में रिलीज हुई फिल्म महबूबा में हेमा मालिनी और राजेश खन्ना की जोड़ी ने पुनर्जन्म पर आधारित कहानी में शानदार अभिनय किया था। इस फिल्म के मशहूर मुजरे और इसके बनने के पीछे की दिलचस्प वजह आज भी चर्चा में रहती है।

**Type:** article · **Category:** बॉलीवुड · **Published:** 2026-10-12 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/bollywood/philma-mehbooba-men-jaba-hema-malini-ne-tavayapha-banakara-bandha-tha-saman-rajesh-khanna-ke-samane-mujare-ka-vo-yadagara-kissa-46620 · **Language:** Hindi
**Tags:** हेमा मालिनी, राजेश खन्ना, महबूबा फिल्म, शक्ति सामंत, लता मंगेशकर, आर डी बर्मन

सिनेमा के पर्दे पर अपनी अदाकारी और लावण्य से दशकों तक राज करने वाली ड्रीम गर्ल हेमा मालिनी ने अपने पूरे सफर में कई चुनौतीपूर्ण किरदार निभाए। आमतौर पर पारंपरिक और चुलबुले किरदारों में नजर आने वाली इस अदाकारा ने साल 1976 में दर्शकों को उस वक्त पूरी तरह हैरान कर दिया, जब उन्होंने फिल्म **महबूबा** में एक तवायफ की भूमिका स्वीकार की। इस फिल्म में उनके साथ मुख्य भूमिका में राजेश खन्ना नजर आए थे। फिल्म के दृश्यों में जब हेमा मालिनी मंच पर उतरती हैं और राजेश खन्ना खामोशी से उन्हें देखते रह जाते हैं, वह दृश्य भारतीय सिनेमा के यादगार लम्हों में गिना जाता है।

## लता मंगेशकर और आर डी बर्मन की जुगलबंदी से अमर हुआ गीत
इस फिल्म का एक गीत आज भी संगीत प्रेमियों के दिलों में खास जगह बनाए हुए है। वह गीत था **मैं तवायफ हूं मुजरा करूंगी**, जिसमें हेमा मालिनी ने तवायफ के वेश में ऐसा मनमोहक नृत्य पेश किया कि पूरी महफिल मंत्रमुग्ध हो गई। इस रचना को सुर साम्राज्ञी लता मंगेशकर ने अपनी आवाज से सजाया था, जबकि इसका संगीत संगीतकार आर डी बर्मन ने तैयार किया था। लता मंगेशकर की भावपूर्ण आवाज और आर डी बर्मन के संगीत संयोजन ने इस गीत को उस दौर में जबर्दस्त लोकप्रियता दिलाई।

## पुनर्जन्म के ताने-बाने पर बुनी गई थी फिल्म की दास्तान
फिल्म **महबूबा** की पूरी पटकथा पुनर्जन्म के रहस्य और रोमांस के इर्द-गिर्द घूमती है। कहानी के प्रवाह में राजेश खन्ना का किरदार धीरे-धीरे अपनी पूर्व जन्म की स्मृतियों को याद करने लगता है। जीवन के इसी रहस्यमयी मोड़ पर ऐसा वाकया आता है जब हेमा मालिनी महफिल के बीच पहुंचकर उनके सामने मुजरा पेश करती हैं। हेमा मालिनी ने इस पूरे क्रम में जिस संजीदगी और ऊर्जा के साथ नृत्य किया, उसने यह साबित कर दिया कि वह किसी भी तरह के जटिल किरदार में पूरी तरह ढल सकती हैं।

## सच्चे पारिवारिक अनुभव से उपजा था फिल्म का विचार
इस क्लासिक फिल्म का निर्देशन शक्ति सामंत ने किया था। पुनर्जन्म और परलौकिक अनुभवों से जुड़ी इस कहानी की प्रेरणा शक्ति सामंत को किसी काल्पनिक किस्से से नहीं, बल्कि अपने एक बेहद करीबी दोस्त के परिवार में घटी वास्तविक घटना से मिली थी। उनके दोस्त की पहली पत्नी के निधन के बाद दोस्त ने अपनी दिवंगत पत्नी की छोटी बहन से विवाह कर लिया था। शक्ति सामंत ने स्वयं यह महसूस किया कि वह दूसरी पत्नी कई मौकों पर अचानक बिल्कुल वैसा ही आचरण करने लगती थी जैसा उनकी दिवंगत बहन किया करती थी। इसी विस्मयकारी और अलौकिक व्यवहार ने निर्देशक के मन में पुनर्जन्म पर फिल्म बनाने की सोच पैदा की।

## कलाकारों की मजबूत टोली ने किरदारों को बनाया जीवंत
हेमा मालिनी और राजेश खन्ना के केंद्रीय किरदारों के अलावा इस फिल्म में कई अन्य मंझे हुए अभिनेताओं ने अपनी अदाकारी का हुनर दिखाया था। फिल्म में असरानी, योगिता बाली, लीला मिश्रा, मदन पुरी और सुजीत कुमार जैसे कलाकारों ने अपनी-अपनी भूमिकाओं को बखूबी निभाया, जिससे कहानी में गहराई और स्वाभाविकता बनी रही।

## इसका आप पर असर
क्लासिक फिल्मों और पुराने संगीत के शौकीनों के लिए यह जानकारी सिनेमाई इतिहास और रचनात्मकता के अनछुए पहलुओं को समझने का अवसर देती है।

- **सिनेमा प्रेमियों के लिए:** यह किस्सा दर्शाता है कि पुराने दौर में किस तरह वास्तविक जीवन के अनुभव काल्पनिक कहानियों की प्रेरणा बनते थे। दर्शक इन संदर्भों को जानकर 1970 के दशक की फिल्मों को एक नए नजरिए से देख सकते हैं।
- **कला और संगीत के प्रशंसकों के लिए:** लता मंगेशकर और आर डी बर्मन की कालजयी कृतियां आज भी संगीत सीखने वालों के लिए अध्ययन का विषय हैं। इस तरह के क्लासिक गीतों को दोबारा सुनकर लोग पुरानी रिकॉर्डिंग की बारीकियों को महसूस कर सकते हैं।
- **सांस्कृतिक समझ के लिहाज से:** पुनर्जन्म और भारतीय लोक मान्यताओं पर आधारित यह फिल्म दिखाती है कि उस दौर में लीक से हटकर कहानियों को किस तरह स्वीकार किया गया। इससे यह समझ मिलता है कि पुराने समय में विषय चयन कितना प्रयोगधर्मी था।
- **अभिनय के संदर्भ में:** हेमा मालिनी द्वारा तवायफ का किरदार निभाना यह साबित करता है कि विविधतापूर्ण रोल करियर को नई पहचान देते हैं। अभिनय सीखने वाले कलाकार उनके इस काम से चरित्र निर्माण की प्रेरणा ले सकते हैं।

## ऐसा क्यों हुआ
फिल्म महबूबा का निर्माण और इसकी कहानी एक निजी पारिवारिक अनुभव से उपजे कौतूहल का नतीजा थी। निर्देशक शक्ति सामंत ने अपने करीबी माहौल में परलौकिक जैसा लगने वाला आचरण देखा था, जिसने उन्हें इस विषय पर विचार करने के लिए विवश किया।

- **सच्ची घटना का प्रभाव:** शक्ति सामंत के एक दोस्त ने पहली पत्नी की मृत्यु के बाद उनकी छोटी बहन से शादी कर ली थी। दूसरी पत्नी का व्यवहार कई बार हुबहू मृत बहन जैसा दिखाई देता था।
- **परलौकिक विषय में रुचि:** इस असामान्य व्यवहार को देखकर निर्देशक के मन में पुनर्जन्म और पूर्व जन्म की यादों पर केंद्रित फिल्म बनाने की योजना बनी। इसी विचार को उन्होंने एक प्रेम कहानी का रूप दिया।
- **किरदार में बदलाव का फैसला:** हेमा मालिनी को एक तवायफ के रूप में प्रस्तुत करने का निर्णय इसलिए लिया गया ताकि कहानी के नाटकीय मोड़ और शास्त्रीय नृत्य को मजबूती मिल सके।

## सवाल-जवाब

### 1. फिल्म महबूबा किस वर्ष रिलीज हुई थी?
फिल्म महबूबा साल 1976 में रिलीज हुई थी, जिसमें हेमा मालिनी और राजेश खन्ना मुख्य भूमिकाओं में थे।

### 2. इस फिल्म में कौन सा मशहूर मुजरा गीत फिल्माया गया था?
इस फिल्म में 'मैं तवायफ हूं मुजरा करूंगी' गीत फिल्माया गया था, जिसमें हेमा मालिनी ने नृत्य किया था।

### 3. इस गीत को किसने गाया और संगीत किसने दिया था?
इस गीत को लता मंगेशकर ने अपनी आवाज दी थी और इसका संगीत आर डी बर्मन ने तैयार किया था।

### 4. निर्देशक शक्ति सामंत को इस फिल्म की कहानी का विचार कहां से मिला था?
शक्ति सामंत को यह विचार अपने एक दोस्त की दूसरी पत्नी द्वारा अपनी दिवंगत बहन जैसा व्यवहार करने की वास्तविक घटना से मिला था।

### 5. फिल्म महबूबा में कौन से अन्य प्रमुख कलाकार शामिल थे?
फिल्म में असरानी, योगिता बाली, लीला मिश्रा, मदन पुरी और सुजीत कुमार जैसे कलाकारों ने महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाई थीं।

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