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  "type": "article",
  "title": "फिल्म रामायण के ट्रैक मंगल रंग पर छिड़ी बहस पर गायक अरमान मलिक ने रखी अपनी बात",
  "summary": "नितेश तिवारी की आगामी फिल्म के गीत मंगल रंग को लेकर चल रहे विवाद के बीच कन्नड़ संस्करण के गायक अरमान मलिक ने संगीत टीम के दृष्टिकोण और अभिनेताओं के समर्पण का बचाव किया है।",
  "content": "फिल्म ‘रामायण: राइज ऑफ ए लीजेंड’ के वैवाहिक गीत ‘मंगल रंग’ को लेकर श्रोताओं और समीक्षकों के बीच एक नई बहस छिड़ गई है। प्रभु श्री राम और माता जानकी के विवाह प्रसंग पर आधारित इस रचना को लेकर सोशल मीडिया और संगीत समीक्षकों के बीच मिलीजुली राय देखने को मिल रही है। कई समीक्षकों का यह तर्क है कि इस गीत की धुन में सूफी और कव्वाली शैली का प्रभाव झलकता है, जिसे वे एक प्राचीन हिंदू महाकाव्य की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के अनुकूल नहीं मानते। इतना ही नहीं, संगीत प्रेमियों का एक वर्ग इसकी तुलना एआर रहमान के कालजयी सूफी गीत ‘कुन फाया कुन’ से करते हुए यह कह रहा है कि इसमें जाने-पहचाने पुराने सुरों के ढांचे को दोहराया गया है। मूल हिंदी ट्रैक में अरिजीत सिंह और श्रेया घोषाल के सुर सजे हैं, जबकि दक्षिण भारतीय भाषाओं में अन्य कलाकारों ने अपनी आवाज दी है।\n\nगीत के मिजाज और रचनात्मक स्वतंत्रता पर गायक का दृष्टिकोण\nइस पूरे वाद-विवाद के बीच गीत के कन्नड़ रूपांतरण ‘मंगला संगम’ को अपनी आवाज देने वाले पार्श्व गायक अरमान मलिक ने पूरे घटनाक्रम पर विस्तार से अपनी सोच साझा की है। उनका मानना है कि किसी भी कलात्मक रचना की व्याख्या हर व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत दृष्टि और समझ के अनुसार करता है। अरमान के शब्दों में, \n \"कोई सुनने वाला संगीत को किस तरह समझता है, यह हमेशा उसकी अपनी सोच पर निर्भर करता है और कला का स्वभाव ही यही है।\"\n उन्होंने स्पष्ट किया कि कंपोजिशन के निर्माण के दौरान पूरी संगीत टोली का एकमात्र उद्देश्य प्रभु राम और माता सीता के पावन प्रेम की रूहानियत को पूरी गरिमा के साथ व्यक्त करना था। एक गायक के नाते उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता इस पवित्र क्षण के प्रति पूर्ण आदर और निष्ठा बनाए रखने की थी।\n\nरणबीर कपूर और साई पल्लवी के अभिनय का प्रभाव\nअरमान मलिक ने पर्दे पर मुख्य पात्रों को जीवंत करने वाले कलाकारों रणबीर कपूर और साई पल्लवी के समर्पण की भी मुक्तकंठ से सराहना की। उनका कहना है कि इतने पूजनीय ऐतिहासिक और धार्मिक चरित्रों को निभाना किसी भी अभिनेता के लिए एक बेहद गंभीर दायित्व होता है। दोनों ही कलाकारों के स्वभाव में एक नैसर्गिक शिष्टता और गरिमा है, जो सीधे कैमरे के माध्यम से दर्शकों के दिलों को छू लेती है। उनका मानना है कि पार्श्व गायक केवल धुन में छिपे भावों की नींव तैयार करता है, लेकिन जब स्क्रीन पर मौजूद कलाकार उस भावना को गहराई से आत्मसात करते हैं और उनकी आंखों में वह सच्चाई दिखती है, तभी कोई गीत पूरी तरह जीवंत होकर अपने मूल उद्देश्य को सिद्ध करता है।\n\nबचपन के सपने और करियर का नया मुकाम\nइस बड़े प्रोजेक्ट से जुड़ना गायक के लिए केवल एक पेशेवर काम नहीं, बल्कि उनके बरसों पुराने अरमानों की पूर्ति जैसा है। अपने शुरुआती दौर से ही वे हिंदी सिनेमा के दिग्गज रोमांटिक चेहरों के लिए गाना चाहते थे। रणबीर कपूर की ऑन-स्क्रीन आवाज बनना उनके लिए एक निजी उपलब्धि है, क्योंकि उनकी पीढ़ी के युवाओं के लिए रणबीर ने पर्दे पर रोमांस और मानवीय भावनाओं को नए आयाम दिए हैं। यह सफर इसलिए भी दिलचस्प है क्योंकि अरमान ने अपनी किशोरावस्था में निर्देशक नितेश तिवारी की लोकप्रिय फिल्म ‘चिल्लर पार्टी’ में बाल गायक के रूप में काम किया था। सालों बाद उसी निर्देशक के इतने विशाल कैनवास वाले प्रोजेक्ट में वापसी करना उनके लिए भावनात्मक रूप से बहुत खास अनुभव रहा है। इसके साथ ही उन्होंने यह इच्छा भी जताई कि भविष्य में उन्हें शाहरुख खान के लिए भी एक रोमांटिक गाना गाने का मौका मिले।\n\nरहमान के साथ साझेदारी और कन्नड़ श्रोताओं से जुड़ाव\nइस ट्रैक के जरिए अरमान मलिक ने संगीतकार एआर रहमान के मार्गदर्शन में पहली बार कन्नड़ भाषा में गायन किया है। ऑस्कर विजेता संगीत निर्देशक के साथ काम करने के अनुभव को असाधारण बताते हुए उन्होंने कहा कि जब रहमान जैसा पारखी संगीतकार किसी खास धुन के लिए आपकी गायकी पर भरोसा जताता है, तो कलाकार को उनकी दृष्टि पर बिना किसी संशय के विश्वास करना चाहिए। अरमान ने यह भी रेखांकित किया कि कर्नाटक के संगीत प्रेमियों के साथ उनका रिश्ता हमेशा से बेहद आत्मीय और गहरा रहा है। दक्षिण के श्रोताओं से मिले स्नेह के प्रति आभार जताते हुए उन्होंने कहा कि इतने प्रतिष्ठित प्रोजेक्ट के लिए कन्नड़ में सुर सजाना उनके दिल के बेहद करीब रहा है।\n\nइसका आप पर असर\nआगामी बड़े बजट की पौराणिक फिल्म के संगीत को लेकर चल रही यह सार्वजनिक बहस दर्शाती है कि ऐतिहासिक महाकाव्यों के अनुकूलन में दर्शक सांस्कृतिक और पारंपरिक सटीकता को कितनी गंभीरता से लेते हैं।\n\n• सिनेमा प्रेमियों के लिए: यह स्पष्ट करता है कि दर्शक पौराणिक फिल्मों में आधुनिक या सूफी धुनों की जगह विशुद्ध पारंपरिक भारतीय शास्त्रीय संगीत की उम्मीद रखते हैं। आने वाले समय में फिल्म के शेष गीतों को लेकर भी श्रोताओं की कसौटी बेहद सख्त रहने वाली है।\n• संगीत जगत पर असर: बड़े संगीतकारों पर यह दबाव बढ़ेगा कि वे महाकाव्यों से जुड़े प्रोजेक्ट्स में अपनी पुरानी धुनों या अन्य शैलियों के मिश्रण से बचें। इस तरह की रचनात्मक चर्चाओं से फिल्म निर्माताओं को क्षेत्रीय भाषाओं के डब संस्करणों पर भी अतिरिक्त सावधानी बरतनी होगी।\n• कलाकारों की छवि पर: रणबीर कपूर और साई पल्लवी के अभिनय और स्क्रीन गरिमा की हो रही सराहना उनके किरदारों की स्वीकार्यता को मजबूती देती है। फिल्म रिलीज से पहले उनके ऑन-स्क्रीन तालमेल को लेकर दर्शकों की उत्सुकता और अधिक बढ़ेगी।\n• श्रोताओं के विकल्प: दर्शक अब हिंदी मूल गीत के अलावा अरमान मलिक द्वारा गाए गए कन्नड़ जैसे क्षेत्रीय संस्करणों को भी ध्यान से सुनकर तुलनात्मक आनंद ले रहे हैं। बहुभाषी संगीत रिलीज से विभिन्न भाषाई क्षेत्रों के श्रोताओं को अपनी पसंद का चयन करने की पूरी स्वतंत्रता मिलती है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nफिल्म ‘रामायण: राइज ऑफ ए लीजेंड’ के वैवाहिक गीत ‘मंगल रंग’ पर विवाद इसलिए खड़ा हुआ क्योंकि कई समीक्षकों और श्रोताओं को लगा कि हिंदू महाकाव्य के प्रसंग में सूफी और कव्वाली शैली का प्रभाव अनुचित है। इसके अतिरिक्त, संगीत की धुन को एआर रहमान के पुराने काम के समान माना गया, जिसके चलते गायकों और संगीतकारों के दृष्टिकोण पर चर्चा शुरू हुई।\n\n• संगीत शैली पर मतभेद: प्रभु राम और माता जानकी के विवाह दृश्य के लिए तैयार की गई धुन में समीक्षकों को कव्वाली और सूफी संगीत के तत्व महसूस हुए। परंपरावादियों का मानना है कि त्रेतायुग की पृष्ठभूमि पर आधारित प्रसंग में शास्त्रीय भारतीय वाद्यों और शैलियों की प्रधानता होनी चाहिए थी।\n• पुरानी रचनाओं से समानता का आरोप: श्रोताओं के एक वर्ग ने इस गाने की धुन और टेम्पो की तुलना एआर रहमान के लोकप्रिय गीत ‘कुन फाया कुन’ से कर दी। समीक्षकों ने दावा किया कि संगीतकार ने नए प्रयोग करने के बजाय अपने पुराने आजमाए हुए पैटर्न का ही सहारा लिया है।\n• व्याख्या की व्यक्तिगत भिन्नता: अरमान मलिक के अनुसार, कला और संगीत को महसूस करने का नजरिया हर व्यक्ति का अपना होता है। जहां कुछ लोग इसे शैलीगत विचलन मान रहे हैं, वहीं निर्माताओं और कलाकारों का दावा है कि उनका मुख्य ध्येय केवल प्रसंग की रूहानियत और प्रेम की दिव्यता को अभिव्यक्त करना था।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. फिल्म ‘रामायण: राइज ऑफ ए लीजेंड’ के गाने ‘मंगल रंग’ पर क्या विवाद है?\nसमीक्षकों का आरोप है कि इस गाने में सूफी और कव्वाली शैली का प्रभाव है जो हिंदू महाकाव्य के अनुरूप नहीं है, और इसकी तुलना ‘कुन फाया कुन’ से की जा रही है।\n\n2. गाने ‘मंगल रंग’ के कन्नड़ संस्करण को किस गायक ने गाया है?\nइसके कन्नड़ रूपांतरण ‘मंगला संगम’ को गायक अरमान मलिक ने अपनी आवाज दी है।\n\n3. विवाद पर अरमान मलिक का क्या रुख है?\nअरमान मलिक का कहना है कि संगीत को समझना श्रोता की अपनी सोच पर निर्भर करता है और टीम का पूरा ध्यान इस पल की श्रद्धा और दिव्यता को सम्मानपूर्वक पेश करने पर था।\n\n4. गाने के मूल हिंदी संस्करण को किन गायकों ने गाया है?\nमूल हिंदी गाने में अरिजीत सिंह और श्रेया घोषाल ने प्रभु राम और माता सीता के विवाह प्रसंग के लिए अपनी आवाज दी है।\n\n5. अरमान मलिक ने रणबीर कपूर और साई पल्लवी के बारे में क्या कहा?\nउन्होंने कहा कि दोनों कलाकारों में सहज शालीनता है जो पर्दे पर गरिमा लाती है, और उनके गहरे भावों से ही गाना जीवंत बन पाया है।\n\n6. अरमान मलिक और निर्देशक नितेश तिवारी का पुराना क्या संबंध रहा है?\nअरमान मलिक ने अपनी किशोरावस्था में नितेश तिवारी द्वारा निर्देशित फिल्म ‘चिल्लर पार्टी’ में भी गाने गाए थे।",
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    "बॉलीवुड संगीत"
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