फिल्म से हटाए गए मुकेश के जिस नग्मे से 15 दिन बाद कोमा से जागा था बच्चा फिल्म साथी के लिए मुकेश द्वारा गाई गई गजल को मेकर्स ने भले हटा दिया था, लेकिन उसी धुन ने कोमा में गए एक बीमार बच्चे को आखिरी पलों में होश दिला दिया था। भारतीय सिनेमा के इतिहास में संगीत की ताकत से जुड़ी कई कहानियां मौजूद हैं, लेकिन पार्श्वगायक मुकेश की आवाज से जुड़ा एक ऐसा भावुक प्रसंग भी है जो किसी को भी हैरान कर दे। वर्ष 1968 में रिलीज हुई फिल्म साथी के निर्माण के दौरान एक बेहद मार्मिक गजल तैयार की गई थी। इस रचना के बोल मशहूर शायर मजरूह सुल्तानपुरी ने लिखे थे और इसकी सुरीली धुन संगीतकार नौशाद ने बांधी थी। फिल्म के साउंडट्रैक के लिए नौशाद ने कुल आठ गीतों पर काम पूरा किया था। जब फिल्म को अंतिम रूप देने का समय आया, तो निर्माताओं ने सात गीतों को तो कहानी का हिस्सा बनाए रखा, मगर मुकेश की आवाज में सजी इस खास गजल को बाहर कर दिया गया। निर्माताओं ने क्यों हटाया था यह नग्मा इस गजल के बोल थे ‘आंखें खुली थीं आए थे वो भी’, जिसे अभिनेता राजेंद्र कुमार पर फिल्माया गया था। कहानी की पटकथा के अनुसार, यह दृश्य तब सामने आता है जब नायक अपनी आंखों की रोशनी खो बैठता है। हालांकि संगीत निर्देशक नौशाद ने इस धुन को बहुत नफासत से तैयार किया था और मजरूह सुल्तानपुरी की शायरी में गहरा दर्द और जान थी, फिर भी फिल्म के निर्देशक और निर्माता इसे मुख्य फिल्म में शामिल करने के पक्ष में नहीं दिखे। आखिरकार पर्दे से बाहर होने के बावजूद इस रचना के पीछे एक ऐसा वास्तविक किस्सा जुड़ा, जिसने संगीत और मानवीय संवेदना के रिश्ते को हमेशा के लिए अमर कर दिया। बीमार बच्चे और मुकेश की आवाज का अनूठा नाता गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी के परिचितों में एक शख्स थे, जिन्हें सभी अहमद साहब के नाम से पुकारते थे। संगीतकार नौशाद और उनके बेटे भी अहमद साहब से भलीभांति परिचित थे। अहमद साहब अक्सर नौशाद के घर आया करते थे और उनके बेटों की मौजूदगी में नए और पुराने गीतों की रिकॉर्डिंग सुना करते थे। इस दौरान अहमद साहब के साथ उनका दो साल का नन्हा बेटा भी रहता था, जो गंभीर रूप से अस्वस्थ था। वह मासूम बच्चा न तो ठीक से सुन पाता था और न ही बोल पाता था। सामान्य दिनों में किसी भी आवाज या बात पर कोई प्रतिक्रिया देना उसके लिए बेहद मुश्किल था। जब संगीत की धुन पर झूम उठा मासूम अहमद साहब जब भी नौशाद के आवास पर अपने बेटे के साथ बैठकर गाने सुनते, तो जैसे ही मुकेश का गाया वह अप्रकाशित ट्रैक बजता, बच्चे के हाव-भाव पूरी तरह बदल जाते थे। जो बालक किसी भी सामान्य गतिविधि पर कोई प्रतिक्रिया नहीं देता था, वह इस खास गजल के सुर सुनते ही खुशी से झूमने लगता था। वहां मौजूद हर शख्स यह देखकर दंग रह जाता था कि एक गंभीर रूप से बीमार और संवादहीन बच्चा आखिर मुकेश के इसी गीत पर इतना गहरा जुड़ाव और प्रतिक्रिया कैसे दिखा रहा है। यह क्रम कई मुलाकातों तक लगातार चलता रहा। अस्पताल में 15 दिन का कोमा और उम्मीद टूटना कुछ समय बाद उस मासूम बच्चे की तबीयत अचानक बहुत ज्यादा बिगड़ गई और वह गहरे कोमा में चला गया। परिवार ने उसे तुरंत अस्पताल में भर्ती कराया। बच्चे ने अस्पताल के बिस्तर पर पूरे 15 दिन कोमा की अवस्था में बिताए, लेकिन उसकी सेहत में कोई सुधार नहीं हुआ। डॉक्टरों की तमाम कोशिशें नाकाम साबित हुईं और अंततः उन्होंने अपने हाथ खड़े कर दिए। चिकित्सकों ने परिजनों से साफ कह दिया कि वे जितना इलाज कर सकते थे कर चुके हैं, अब बच्चे के बचने की कोई उम्मीद बाकी नहीं है, इसलिए वे उसे घर ले जाएं। घर लौटते ही बजाई गई वही पुरानी धुन निराश होकर जब अहमद साहब अपने बच्चे को घर वापस लेकर पहुंचे, तो उनके जेहन में एक विचार आया। उन्हें याद आया कि उनका बेटा मुकेश के उसी गीत को सुनकर सबसे ज्यादा खुश होता था और झूमने लगता था। उन्होंने तुरंत वही गजल बजाने का फैसला किया। जैसे ही कमरे में मुकेश के गाए बोल गूंजने लगे, वहां एक अद्भुत दृश्य दिखा। पिछले 15 दिनों से अचेत पड़ा वह बच्चा न सिर्फ कोमा से बाहर आ गया और अपनी आंखें खोल दीं, बल्कि चेहरे पर मंद मुस्कान बिखेरते हुए संगीत को महसूस करने लगा। संगीत के थमते ही बंद हो गईं सांसें जब तक रिकॉर्डर पर मुकेश की वह गजल बजती रही, तब तक वह बच्चा पूरी तरह होश में बना रहा और अपने माता-पिता को देखता रहा। लेकिन जैसे ही गीत की आखिरी पंक्ति खत्म हुई और संगीत की आवाज थमी, उस मासूम बच्चे ने हमेशा-हमेशा के लिए अपनी आंखें मूंद लीं और उसकी सांसें रुक गईं। जब मजरूह सुल्तानपुरी को इस बेहद भावुक घटना का पता चला, तो वे सीधे संगीतकार नौशाद के पास गए। मजरूह ने भावुक होकर कहा कि यह आपके रचे संगीत का चमत्कार था जिसने कोमा में गए बच्चे को जगा दिया। इस पर नौशाद ने विनम्रता से जवाब दिया कि यह केवल धुन का असर नहीं था, बल्कि मजरूह के गहरे शब्द, संगीत की संरचना और मुकेश की आवाज के संगम ने मिलकर एक ऐसी खास फ्रीक्वेंसी पैदा की थी, जिसने सीधे बच्चे के मस्तिष्क को प्रभावित किया और वह चंद पलों के लिए जीवित चेतना में लौट आया। इसका आप पर असर यह किस्सा दर्शाता है कि सुरीला संगीत मानव मस्तिष्क और गंभीर रूप से अस्वस्थ व्यक्तियों की चेतना पर कितना गहरा प्रभाव डाल सकता है। • संगीत का संवेदी प्रभाव: जाने-पहचाने सुर और आवाजें अचेतन या कोमा जैसी स्थिति में भी मस्तिष्क को उत्तेजित कर सकती हैं। परिवार के सदस्य अक्सर गंभीर मरीजों के सामने उनकी पसंद की धुनें सुनाने का सहारा लेते हैं। • मनोवैज्ञानिक जुड़ाव: बच्चों का किसी खास स्वर या लय से भावनात्मक रिश्ता बन सकता है। यह जुड़ाव कठिन शारीरिक सीमाओं के बावजूद प्रतिक्रिया उत्पन्न करने की क्षमता रखता है। • कला का महत्व: जो रचनाएं व्यवसायिक वजहों से फिल्मों से बाहर हो जाती हैं, वे भी कई बार व्यक्तिगत जीवन में अमिट छाप छोड़ जाती हैं। कला का असली मूल्य केवल पर्दे की सफलता तक सीमित नहीं होता। • सहानुभूतिपूर्ण देखभाल: जब चिकित्सीय उम्मीदें समाप्त हो जाएं, तब भी मरीज के अंतिम पलों को शांत और प्रिय माहौल देकर सुकून भरा बनाया जा सकता है। परिजनों के लिए ऐसे आत्मीय प्रयास मानसिक संबल प्रदान करते हैं। ऐसा क्यों हुआ फिल्म के गाने को हटाए जाने और बाद में बच्चे द्वारा उस पर दिखाई गई प्रतिक्रिया के पीछे रचनात्मक मतभेद और गहरा ध्वनि संबंध मुख्य कारण रहे। • फिल्म से गाने को हटाने का कारण: निर्देशक और निर्माता को लगा कि नायक के अंधे होने की स्थिति में यह गजल दृश्य के अनुकूल नहीं बैठ रही थी। संगीतकार नौशाद की बेहतरीन धुन और मजरूह के मजबूत शब्दों के बावजूद सात अन्य गानों को रखकर इसे अंतिम संपादन में काट दिया गया। • बच्चे का गाने से खास लगाव: अहमद साहब के साथ नौशाद के घर जाने पर दो साल का बीमार बच्चा बार-बार उस रचना को सुनता था। संवादहीन होने के बावजूद मुकेश के स्वर और लय ने बच्चे के मन में एक गहरा संवेदी आकर्षण पैदा कर दिया था। • अंतिम पलों में होश में आना: पंद्रह दिन के कोमा के बाद जब वही पसंदीदा धुन बजाई गई, तो उसने मस्तिष्क को सक्रिय कर दिया। संगीतकार नौशाद के अनुसार शब्दों, धुन और मुकेश के गायन की मिली-जुली फ्रीक्वेंसी ने बच्चे के दिमाग को छूकर उसे क्षणिक होश दिया। सवाल-जवाब 1. मुकेश ने यह गाना किस फिल्म के लिए रिकॉर्ड किया था? यह गाना वर्ष 1968 में रिलीज हुई फिल्म साथी के लिए रिकॉर्ड किया गया था। 2. फिल्म से हटाए गए उस गाने के बोल क्या थे? उस गजल के बोल थे ‘आंखें खुली थीं आए थे वो भी’, जिसे मजरूह सुल्तानपुरी ने लिखा था। 3. फिल्म के संगीत निर्देशक कौन थे और कुल कितने गाने रिकॉर्ड हुए थे? फिल्म का संगीत नौशाद ने तैयार किया था और उन्होंने कुल आठ गाने रिकॉर्ड किए थे, जिनमें से सात को फिल्म में रखा गया। 4. गाने को किस अभिनेता पर फिल्माया जाना तय था? इस गजल को अभिनेता राजेंद्र कुमार पर उस दृश्य के लिए फिल्माया गया था जब नायक अंधा हो जाता है। 5. अहमद साहब के बीमार बच्चे की उम्र कितनी थी? अहमद साहब का वह बच्चा दो साल का था, जो न ठीक से बोल पाता था और न ही सुन पाता था। 6. बच्चा कितने दिनों तक कोमा में रहा था? बच्चा अस्पताल में 15 दिनों तक कोमा की स्थिति में रहा, जिसके बाद डॉक्टरों ने उम्मीद छोड़ दी थी। 7. गाना बजाने पर बच्चे ने क्या प्रतिक्रिया दी? 15 दिन कोमा में रहने के बाद बच्चे ने गाना सुनते ही आंखें खोल दीं और जब तक गाना चला तब तक मुस्कुराता रहा। 8. नौशाद ने बच्चे के होश में आने का क्या कारण बताया? नौशाद ने कहा कि मजरूह के शब्दों, संगीत और मुकेश की आवाज की साझा फ्रीक्वेंसी ने बच्चे के मस्तिष्क पर असर डाला था। https://trendkia.com/bollywood/philma-se-hatae-gae-mukesh-ke-jisa-nagme-se-15-dina-bada-koma-se-jaga-tha-bachcha-33888 TrendKia — Har trend, sabse pehle.