सलमा बेग से अनुराधा बनने का सफर, कान में चमकीं और श्रीदेवी की आवाज बनीं बेबी नाज भारतीय सिनेमा की मशहूर बाल कलाकार बेबी नाज ने महज आठ वर्ष की उम्र में अभिनय शुरू कर अंतरराष्ट्रीय ख्याति पाई और बाद में श्रीदेवी की शुरुआती हिंदी फिल्मों की आवाज बनीं। सिनेमा के सुनहरे दौर में कई ऐसे चेहरे उभरे जिन्होंने बाल कलाकार के रूप में दर्शकों पर अमिट छाप छोड़ी, लेकिन परदे के पीछे उनकी निजी जिंदगी संघर्षों और नाटकीय मोड़ों से भरी रही। सलमा बेग, जिन्हें दुनिया ने परदे पर बेबी नाज और कुमारी नाज के नाम से जाना, एक ऐसी ही विलक्षण अदाकारा थीं। उन्होंने आठ साल की छोटी सी उम्र में अभिनय की दुनिया में कदम रखा और अपनी भावुक अदाकारी से न केवल घरेलू स्तर पर बल्कि अंतरराष्ट्रीय फलक पर भी तारीफें बटोरीं। बाद के वर्षों में जब दिग्गज अभिनेत्री श्रीदेवी ने हिंदी सिनेमा में अपनी पहचान बनानी शुरू की, तब उनकी कमजोर हिंदी के कारण परदे के पीछे से जो प्रभावशाली आवाज गूंजती थी, वह वास्तव में बेबी नाज की ही थी। कठिन पारिवारिक हालात और बचपन की चुनौतियां सलमा बेग का जन्म 20 अगस्त 1944 को मुंबई शहर में हुआ था। उनके वालिद मिर्जा दाऊद बेग फिल्मों में लेखन का कार्य करते थे, मगर घर की माली हालत बेहद तंग थी। परिवार को आर्थिक संकट से उबारने की जिम्मेदारी बहुत कम उम्र में ही सलमा के कंधों पर आ गिरी। बाल्यकाल में खेलकूद और पढ़ाई के बजाय उन्हें मंच पर नृत्य प्रस्तुतियां देकर पैसे कमाने पड़े। अपनी जिंदगी पर बात करते हुए एक साक्षात्कार में नाज ने खुलासा किया था कि उन्हें अपनी ही मां के हाथों शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना सहनी पड़ी थी। उनका कहना था कि उनकी मां खुद की सुख-सुविधाओं और आराम की खातिर उनसे लगातार काम करवाती थीं, जिसके कारण उनका बचपन गंभीर दबाव और तनाव के साए में बीता। रेशम से शुरुआत और कान में ऐतिहासिक सराहना साल 1952 में रिलीज हुई फिल्म ‘रेशम’ के जरिए सलमा बेग को पहली बार कैमरे का सामना करने का मौका मिला, उस वक्त वह लगभग आठ बरस की थीं। इसी फिल्म के निर्माण के दौरान उनका नाम बदलकर नाज रख दिया गया। इसके महज दो साल बाद, 1954 में राज कपूर के निर्देशन में बनी फिल्म ‘बूट पॉलिश’ दर्शकों के सामने आई, जिसने नाज के फिल्मी करियर की दिशा पूरी तरह बदल दी। जूते पॉलिश करने वाले अनाथ बच्चों के जीवन पर आधारित इस भावुक कहानी में उनके अभिनय को आलोचकों और आम दर्शकों ने दिल खोलकर सराहा। वर्ष 1955 के कान फिल्म फेस्टिवल में इस फिल्म को विशेष पहचान मिली और नाज की अभिनय क्षमता की वैश्विक स्तर पर गूंज सुनाई दी। इस अभूतपूर्व सफलता के बाद वह अपने दौर की सबसे अधिक मेहनताना पाने वाली बाल कलाकार बन गईं। सिल्वर स्क्रीन से लेकर भोजपुरी सिनेमा तक की यात्रा शुरुआती कामयाबी के बाद नाज ने हिंदी सिनेमा के कई कालजयी प्रोजेक्ट्स में अपनी प्रतिभा दिखाई। उन्होंने ‘देवदास’, ‘कागज के फूल’, ‘दो फूल’, ‘गंगा जमुना’, ‘कटी पतंग’, ‘बहू बेगम’ और ‘सच्चा झूठा’ जैसी यादगार फिल्मों में विभिन्न प्रकार के किरदार निभाए। जैसे-जैसे उनकी उम्र बढ़ी, उन्होंने मुख्य बाल कलाकार की भूमिकाओं से आगे बढ़कर चरित्र किरदारों में भी अपनी सहज कला का प्रदर्शन किया। इसके अलावा उन्होंने क्षेत्रीय सिनेमा का रुख करते हुए भोजपुरी फिल्मों में भी अपनी छाप छोड़ी। वर्ष 1963 में प्रदर्शित फिल्म ‘बिदेसिया’ ने उन्हें भोजपुरी दर्शकों के बीच घर-घर में लोकप्रिय बना दिया। इसके उपरांत वह ‘सैंया से नेहा लगाइबे’ और ‘अईल बसंत बहार’ जैसी भोजपुरी फिल्मों में भी अहम किरदारों में दिखाई दीं। किले की शूटिंग, सेट पर शादी और धर्म परिवर्तन नाज की व्यक्तिगत जिंदगी में सबसे बड़ा बदलाव अभिनेता सुब्बिराज के आने से हुआ। साल 1963 में निर्देशक के. परवेज की फिल्म ‘देखा प्यार तुम्हारा’ की शूटिंग के सिलसिले में दोनों की पहली मुलाकात हुई। इस फिल्म के कई हिस्से उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ में स्थित एक ऐतिहासिक किले में फिल्माए जा रहे थे। साथ काम करते-करते दोनों के बीच घनिष्ठता बढ़ी और यह दोस्ती जल्द ही गहरे प्रेम संबंध में तब्दील हो गई। हालांकि, उस दौर में उनका यह रिश्ता कई सामाजिक और पारिवारिक बाधाओं से घिरा हुआ था। दोनों अलग-अलग मजहब से ताल्लुक रखते थे और तत्कालीन सामाजिक माहौल में हिंदू और मुस्लिम का निकाह बेहद जटिल माना जाता था। इसके अलावा नाज के परिवार का संपूर्ण खर्च उन्हीं की आमदनी से चलता था, जिसके कारण उनकी मां इस रिश्ते और शादी की इजाजत कभी नहीं देतीं। सुब्बिराज हर हाल में नाज का साथ चाहते थे। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए सुब्बिराज ने शूटिंग स्थल पर ही नाज की मांग में सिंदूर भरकर उनसे विवाह कर लिया। सेट पर हुई इस अचानक शादी की खबर ने उस समय पूरे बॉलीवुड को चौंका दिया था। विवाह के बाद नाज ने हिंदू धर्म स्वीकार कर लिया और उनका नया नाम अनुराधा रखा गया। डबिंग कलाकार के तौर पर नई पहचान और आखिरी वक्त जीवन के अंतिम पड़ाव में जब उन्हें परदे पर अभिनय के अच्छे प्रस्ताव मिलने कम हो गए, तब उन्होंने फिल्मों से दूरी बनाकर डबिंग को अपना पेशा बनाया। दक्षिण भारत से आकर हिंदी फिल्मों में काम शुरू करने वाली श्रीदेवी की हिंदी शुरुआती दौर में काफी कमजोर थी। ऐसे में बेबी नाज ने अपनी मधुर और दमदार आवाज से श्रीदेवी के कई किरदारों में जान फूंकी। 19 अक्टूबर 1995 को मुंबई में 51 वर्ष की आयु में इस बहुमुखी कलाकार ने दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया। इसका आप पर असर यह जीवन गाथा सिनेमा प्रेमियों और कला के शोधकर्ताओं को भारतीय फिल्म उद्योग के सुनहरे दौर और कलाकारों के वास्तविक संघर्षों को समझने का अवसर देती है। • सिनेमा प्रेमियों के लिए: यह कहानी दिखाती है कि परदे पर दिखने वाली ग्लैमरस दुनिया के पीछे कलाकारों की निजी जिंदगी में कितनी कठिनाइयां छिपी हो सकती हैं। दर्शक पुरानी क्लासिक फिल्मों जैसे ‘बूट पॉलिश’ और ‘कागज के फूल’ को नए नजरिए से देख सकते हैं। • कला और डबिंग क्षेत्र में: यह विवरण रेखांकित करता है कि पर्दे के पीछे काम करने वाले डबिंग कलाकारों का योगदान किसी बड़े स्टार के करियर को संवारने में कितना निर्णायक होता है। कई बार परदे पर दिखने वाले चेहरे के पीछे की असली आवाज किसी अन्य हुनरमंद कलाकार की होती है। • इतिहास और समाज के संदर्भ में: यह वृत्तांत 1960 के दशक के सामाजिक ताने-बाने और अंतरधार्मिक विवाहों की चुनौतियों को समझने में मदद करता है। यह उस दौर के कलाकारों द्वारा लिए गए साहसिक व्यक्तिगत फैसलों को दर्शाता है। • बाल कलाकारों के अधिकारों के प्रति सजगता: इस घटनाक्रम से स्पष्ट होता है कि परिवार के भरण-पोषण के लिए काम करने वाले बाल कलाकारों की मानसिक और भावनात्मक सुरक्षा कितनी आवश्यक है। यह आज के मनोरंजन जगत में बाल श्रम नियमों के महत्व को रेखांकित करता है। ऐसा क्यों हुआ बेबी नाज का जीवन और उनके व्यक्तिगत फैसले परिवार के आर्थिक संकट, शुरुआती प्रसिद्धि और सामाजिक बंधनों से जुड़े घटनाक्रमों का परिणाम थे। • बचपन में काम करने का कारण: उनके पिता मिर्जा दाऊद बेग के फिल्म लेखक होने के बावजूद परिवार गंभीर आर्थिक तंगी से गुजर रहा था, जिसके चलते सलमा बेग को छोटी उम्र में ही मंच पर नृत्य और अभिनय करना पड़ा। उनकी मां पर लगे आरोपों के मुताबिक, पारिवारिक विलासिता बनाए रखने के लिए उनसे लगातार काम कराया गया। • सेट पर विवाह का फैसला: अभिनेता सुब्बिराज और नाज अलग-अलग धर्मों से थे और नाज की कमाई पर उनका पूरा परिवार निर्भर था, जिसके कारण उनकी मां विवाह के लिए कभी सहमत नहीं होतीं। सुब्बिराज ने उन्हें खोने के डर से फिल्म ‘देखा प्यार तुम्हारा’ की शूटिंग के दौरान ही मांग भरकर विवाह का अप्रत्याशित कदम उठाया। • डबिंग की ओर रुख: उम्र बढ़ने के साथ जब प्रमुख अभिनय भूमिकाएं कम होने लगीं, तब उन्होंने डबिंग का कार्य चुना। दक्षिण भारतीय भाषाओं से आई अभिनेत्री श्रीदेवी की हिंदी उस समय कमजोर थी, जिसके चलते निर्माताओं ने नाज की परिपक्व आवाज का सहारा लिया। सवाल-जवाब 1. बेबी नाज का असली नाम क्या था? बेबी नाज का वास्तविक नाम सलमा बेग था, जबकि विवाह और धर्म परिवर्तन के बाद उनका नाम अनुराधा रखा गया था। 2. बेबी नाज को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान किस फिल्म से मिली? वर्ष 1954 में रिलीज हुई फिल्म ‘बूट पॉलिश’ के लिए उन्हें 1955 के कान फिल्म फेस्टिवल में अंतरराष्ट्रीय प्रशंसा और पहचान मिली। 3. श्रीदेवी के शुरुआती दौर में बेबी नाज की क्या भूमिका थी? श्रीदेवी की हिंदी शुरुआती समय में कमजोर होने के कारण बेबी नाज ने उनकी कई फिल्मों में उनकी आवाज के लिए डबिंग की थी। 4. बेबी नाज ने किससे शादी की और उनका विवाह कहां हुआ था? उन्होंने अभिनेता सुब्बिराज से विवाह किया था, जिन्होंने प्रतापगढ़ के एक किले में फिल्म ‘देखा प्यार तुम्हारा’ की शूटिंग के दौरान सेट पर ही उनकी मांग में सिंदूर भरा था। 5. बेबी नाज का निधन कब और किस उम्र में हुआ? उनका निधन 19 अक्टूबर 1995 को मुंबई में 51 वर्ष की आयु में हुआ था। https://trendkia.com/bollywood/salma-baig-se-anuradha-banane-ka-saphara-cannes-men-chamakin-aura-sridevi-ki-avaja-banin-baby-naaz-49331 TrendKia — Har trend, sabse pehle.