साढ़े तीन दशक और 635 फिल्मों के सुरीले सफर से कैसे अमर हुई लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल की जोड़ी हिंदी सिनेमा में साढ़े तीन दशक तक 635 से अधिक फिल्मों को अमर संगीत देने वाले लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल की जोड़ी ने संघर्ष से लेकर सफलता का एक बेमिसाल मुकाम हासिल किया। भारतीय सिनेमा के स्वर्णिम इतिहास में जब भी मनमोहक धुनों, समृद्ध वाद्य संयोजनों और कालजयी संगीत की बात होती है, तब संगीतकार लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल की बेमिसाल जोड़ी का स्मरण अनिवार्य हो जाता है। लगभग साढ़े तीन दशक लंबे अपने चमकदार करियर के दौरान इस संगीत द्वय ने तकरीबन 635 फिल्मों के लिए अविस्मरणीय गानों की रचना की। कोमल रोमानियत से लेकर विरह के दर्द, उत्सवों के उल्लास और देशभक्ति के जूनून तक, उनकी धुनों ने हर भावना को एक अनूठा संगीतमय आकार दिया। यह केवल दो कलाकारों की व्यावसायिक भागीदारी नहीं थी, बल्कि बाल्यावस्था के अभावों से उपजी एक ऐसी अमूल्य आत्मीयता थी जिसने हिंदी सिनेमा के संगीत को नया आयाम प्रदान किया। संगीतमय बचपन और सुरों से शुरुआती जुड़ाव वर्ष 1937 के दौरान एक साधारण मराठी पृष्ठभूमि वाले कुदलकर घराने में लक्ष्मीकांत का जन्म हुआ था, जिन्हें लक्ष्मीकांत शांताराम कुदलकर नाम दिया गया। पारिवारिक माली हालत बहुत मजबूत न होने के बावजूद बचपन से ही सुरों के प्रति उनका गहरा लगाव प्रकट होने लगा था। किसी औपचारिक प्रशिक्षण के बिना उन्होंने स्वयं के अभ्यास से वायलिन और मैंडोलिन बजाने में महारत हासिल कर ली। जल्द ही वे कम उम्र में ही स्थानीय संगीत मंचों और शुरुआती फिल्मी रिकॉर्डिंग सत्रों में वादक के रूप में अपनी सेवाएं देने लगे। वहीं दूसरी ओर, प्यारेलाल का जन्म वर्ष 1940 में उत्तर प्रदेश स्थित गोरखपुर शहर में हुआ। उनके पिता पंडित रामप्रसाद शर्मा एक विख्यात ट्रंपेट वादक थे, जिनसे प्यारेलाल को संगीत का प्राथमिक ज्ञान मिला। आगे चलकर उन्होंने गोवा निवासी गोंसाल्वेस से वायलिन की शास्त्रीय तकनीकें सीखीं। प्रतिभा इतनी असाधारण थी कि महज 12 वर्ष की अल्पायु में ही प्यारेलाल व्यावसायिक संगीत सभाओं और फिल्म स्टूडियो में वायलिन वादक के रूप में पहचान बना चुके थे। बचपन की दोस्ती और संघर्ष के दिन इन दोनों युवा वादकों की शुरुआती मुलाकात मुंबई के स्टूडियो परिसरों में हुई। विशेष रूप से सुरील कला केंद्र, जिसका संचालन पार्श्व गायिका लता मंगेशकर करती थीं, वहां दोनों का संपर्क गहरा हुआ। एक जैसी आयु और लगभग समान आर्थिक पृष्ठभूमि के कारण उनके बीच विश्वास का एक सुदृढ़ रिश्ता बन गया। वे रिकॉर्डिंग परिसरों में घंटों साथ बिताते, काम के नए अवसरों की तलाश में एक-दूसरे का सहयोग करते और समय मिलने पर साथ अभ्यास भी करते थे। पेशेवर जीवन के शुरुआती चरण में उन्होंने उस दौर के वरिष्ठ संगीतकारों से काफी कुछ सीखा। वर्ष 1953 में वे कल्याणजी-आनंदजी के मुख्य सहायक नियुक्त हुए और लगभग दस वर्षों तक उनके साथ कार्य किया। इसके अतिरिक्त उन्होंने सचिन देव बर्मन (एसडी बर्मन) तथा राहुल देव बर्मन (आरडी बर्मन) जैसे महान दिग्गजों के लिए भी संगीत संयोजन का जिम्मा निभाया। विदेशी सिम्फनी का सपना और भारत में रुकने का फैसला प्यारेलाल ने पाश्चात्य और शास्त्रीय ऑर्केस्ट्रा संगीत में अपनी समझ को निरंतर निखारा। वे परांजोति अकादमी और बॉम्बे चैंबर ऑर्केस्ट्रा जैसी संस्थाओं से जुड़े रहे। जुबिन मेहता तथा उनके पिता मेहली मेहता के अलावा कूमी वाडिया और गुडी सीरवई जैसे संगीत विद्वानों के सानिध्य ने उनके ऑर्केस्ट्रेशन कौशल को अत्यधिक निखारा। हालांकि, एक समय ऐसा आया जब दोनों साथी अपनी मेहनत के एवज में मिलने वाली पारिश्रमिक राशि से संतुष्ट नहीं थे। अधिक अवसरों की आस में वे मद्रास गए, किंतु वहां भी स्थिति भिन्न नहीं दिखी और उन्हें मुंबई लौटना पड़ा। हतोत्साहित होकर प्यारेलाल ने एक अंतरराष्ट्रीय सिम्फनी ऑर्केस्ट्रा से जुड़ने के उद्देश्य से विदेश जाने का मन बना लिया था। परंतु लक्ष्मीकांत के विशेष आग्रह पर उन्होंने स्वदेश में ही रहकर संघर्ष करने का ऐतिहासिक निर्णय लिया। यही निर्णय आगे चलकर हिंदी सिनेमा संगीत का एक अत्यंत गौरवशाली अध्याय साबित हुआ। पारसमणि से शुरुआत और दोस्ती फिल्म से मिली राष्ट्रीय पहचान बतौर स्वतंत्र संगीतकार लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल को पहला मौका वर्ष 1963 में बाबूभाई मिस्त्री की फिल्म पारसमणि से प्राप्त हुआ। इस पहली फिल्म की धुनों ने श्रोताओं का ध्यान खींचा, परंतु असली राष्ट्रव्यापी सफलता अगले ही वर्ष 1964 में आई फिल्म दोस्ती से मिली। सीमित बजट में निर्मित इस मार्मिक फिल्म के गीतों ने पूरे देश में सफलता का नया इतिहास रच दिया। गायक मोहम्मद रफी की आवाज में रचा गया सदाबहार गीत चाहूंगा मैं तुझे शाम सवेरे घर-घर में गूंजने लगा। इस फिल्म ने जोड़ी को उनका पहला फिल्मफेयर पुरस्कार दिलाया। इसके बाद सुपरहिट गानों और यादगार फिल्मों का ऐसा अटूट दौर शुरू हुआ जिसने उन्हें सफलता के शीर्ष पर स्थापित कर दिया। उनकी सुरीली कलाकृतियां खिलौना, दो रास्ते, मिलन तथा शोर जैसी शुरुआती फिल्मों से लेकर बाद के दौर की प्रेम रोग, राम लखन, त्रिमूर्ति और खलनायक तक में साफ झलकती है। सुपरहिट फिल्मों की लड़ी, महान गायक और आरडी बर्मन से खास रिश्ता लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल की बनाई अमर धुनों को भारतीय संगीत के महानतम गायकों ने अपनी आवाज दी। लता मंगेशकर, मोहम्मद रफी तथा किशोर कुमार के अलावा आशा भोसले, अलका याज्ञनिक और मुकेश की गायकी ने उनकी रचनाओं को जीवंत बनाया। उस दौर के दूसरे दिग्गज संगीतकार आरडी बर्मन के साथ भी उनका संबंध अत्यंत घनिष्ठ रहा। व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा के बावजूद उनके बीच गहरी मित्रता और पारस्परिक सम्मान का भाव बना रहा। दिलचस्प बात यह है कि लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल और आरडी बर्मन दोनों ने ही अपने-अपने करियर में 7-7 फिल्मफेयर पुरस्कार जीते। उनकी कालजयी धुनों ने कई पीढ़ियों के श्रोताओं को सम्मोहित किया। 25 मई 1998 को लक्ष्मीकांत के असामयिक देहावसान से यह शारीरिक जोड़ी भले ही बिछड़ गई, लेकिन उनके द्वारा रचे गए संगीतमय सुर सदा के लिए अमर हो गए। प्यारेलाल वर्तमान में भी संगीत की दुनिया से निरंतर जुड़े हुए हैं। इसका आप पर असर लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल का संगीतमय योगदान आज भी भारतीय संगीत प्रेमियों और उदीयमान संगीतकारों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। • भारत भर में: पुरानी और नई पीढ़ी के श्रोताओं को 635 से अधिक फिल्मों के रूप में सदाबहार गानों का एक अनमोल खजाना मिलता है, जिसे किसी भी डिजिटल प्लेटफॉर्म पर आसानी से सुना जा सकता है। • मुंबई फिल्म उद्योग में: नए संगीतकारों और व्यवस्थापकों (अरेन्जर्स) के लिए भारतीय और पश्चिमी वाद्ययंत्रों के संतुलित प्रयोग का यह एक आदर्श उदाहरण है, जिसे सीखकर अपनी कला को निखारा जा सकता है। • शास्त्रीय व ऑर्केस्ट्रा संगीत में: वायलिन, मैंडोलिन और ट्रंपेट जैसे वाद्ययंत्र सीखने वाले युवाओं को इनके अरेंजमेंट्स का अध्ययन करके तकनीक और सुरों की बारीकियां समझने का अवसर मिलता है। • संगीत प्रेमियों के लिए: 7 फिल्मफेयर अवॉर्ड जीतने वाले गानों का संग्रह हर सांस्कृतिक कार्यक्रम और उत्सव में आज भी उत्साह और मिठास घोलने का काम करता है। सवाल-जवाब 1. लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल की जोड़ी ने कुल कितनी फिल्मों में संगीत दिया? लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने अपने करीब साढ़े तीन दशक लंबे करियर में लगभग 635 फिल्मों के लिए संगीत तैयार किया। 2. संगीत निर्देशक के रूप में लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल की पहली फिल्म कौन सी थी? बतौर स्वतंत्र संगीत निर्देशक उनकी पहली फिल्म 1963 में आई 'पारसमणि' थी, जिसके बाद 1964 की फिल्म 'दोस्ती' से उन्हें बड़ी पहचान मिली। 3. लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने अपने करियर में कितने फिल्मफेयर पुरस्कार जीते? लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल की जोड़ी ने अपने शानदार करियर में कुल 7 फिल्मफेयर पुरस्कार अपने नाम किए। 4. लक्ष्मीकांत का निधन कब हुआ था? लक्ष्मीकांत का निधन 25 मई 1998 को हुआ था, जिसके बाद यह ऐतिहासिक भौतिक जोड़ी टूट गई। 5. प्यारेलाल ने वायलिन बजाना किससे सीखा था? प्यारेलाल ने संगीत की शुरुआती शिक्षा अपने पिता पंडित रामप्रसाद शर्मा से ली और बाद में गोवा के गोंसाल्वेस से वायलिन सीखा। 6. कल्याणजी-आनंदजी के साथ लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने कितने साल काम किया? उन्होंने कल्याणजी-आनंदजी के सहायक के रूप में लगभग 10 वर्षों (1953 से) तक काम किया था। प्रेरणा और सबक लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के जीवन और करियर का सफर हर व्यक्ति और कलाकार के लिए प्रेरणादायक सबक प्रदान करता है। • विषम परिस्थितियों में अनुशासन: बचपन में सीमित साधनों के बावजूद मैंडोलिन और वायलिन पर महारत हासिल करना सिखाता है कि लगन संसाधनों से बड़ी होती है। • सच्ची मित्रता और टीम वर्क: कठिन समय में एक-दूसरे का समर्थन करना और विदेशी अवसरों के बजाय साथ रहने का फैसला साझेदारी की शक्ति दिखाता है। • अनवरत अभ्यास और सीखना: 10 वर्षों तक कल्याणजी-आनंदजी के सहायक के रूप में काम करके खुद को निखारना धैर्य और निरंतर सीखने का प्रतीक है। • प्रतिस्पर्धा में सम्मान: आरडी बर्मन के साथ व्यावसायिक होड़ के बावजूद व्यक्तिगत सम्मान और दोस्ती बनाए रखना पेशेवर परिपक्वता को दर्शाता है। https://trendkia.com/bollywood/sarhe-tina-dashaka-aura-635-philmon-ke-surile-saphara-se-kaise-amara-hui-laxmikant-pyarelal-ki-jori-26814 TrendKia — Har trend, sabse pehle.