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  "type": "article",
  "title": "थियेटर के दिग्गज कलाकारों की फिल्म, चार साल तक तरसी रिलीज के लिए, फिर जीते दो नेशनल अवॉर्ड",
  "summary": "सई परांजपे द्वारा निर्देशित और ओम पुरी, नसीरुद्दीन शाह व शबाना आजमी जैसे थियेटर कलाकारों से सजी फिल्म 'स्पर्श' प्यार, रिश्तों और समाज की जटिलताओं को बेहद संवेदनशीलता से पर्दे पर उतारती है।",
  "content": "यदि आप अपने खाली समय में कोई सुकून देने वाली और गहरी कहानी वाली फिल्म देखना चाहते हैं, तो आपकी देखने की सूची में 'स्पर्श' जरूर होनी चाहिए। यह फिल्म मानवीय भावनाओं, आपसी रिश्तों और सामाजिक ताने-बाने की पेचीदगियों को बेहद सहजता के साथ दर्शकों के सामने रखती है। साल 1980 में आई इस क्लासिक फिल्म को आईएमडीबी पर 7.9 की रेटिंग मिली हुई है। इसकी कहानी एक नेत्रहीन स्कूल के प्रिंसिपल और एक टीचर के बीच पनपते प्रेम, उनकी मानसिक उलझनों और आपसी हीन भावनाओं के इर्द-गिर्द घूमती है, जो उनके रिश्ते पर हावी होने लगती हैं। इस रिश्ते में प्यार की उस असली गहराई को फिर से महसूस करने के लिए दोनों को तमाम मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। इस बेहतरीन सिनेमाई रचना में थियेटर जगत के दिग्गज कलाकारों जैसे ओम पुरी, नसीरुद्दीन शाह और शबाना आजमी ने अपनी अभिनय कला का जादू बिखेरा था, जिसका निर्देशन सई परांजपे ने किया था।\n\nरिलीज में चार साल की देरी और ऐतिहासिक सफलता\nयह फिल्म नेत्रहीन व्यक्तियों के जीवन और उनके साथ बनने वाले रिश्तों को अत्यंत संवेदनशीलता के साथ दर्शाती है। इसमें दो अलग-अलग दुनियाओं के बीच के अंतर को बहुत ही बारीकी से दिखाने का प्रयास किया गया है। सई परांजपे ने इस शानदार फिल्म का निर्माण किया था, लेकिन विडंबना यह रही कि इसे सिनेमाघरों तक पहुंचने में लगभग चार साल का लंबा समय लग गया। हालांकि, जब यह आखिरकार रिलीज हुई, तो इसने हर तरफ अपनी छाप छोड़ी और सबका ध्यान अपनी ओर खींच लिया। इस फिल्म ने हिंदी में सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार अपने नाम किया था। इसके अलावा, बेहतरीन अभिनय के लिए नसीरुद्दीन शाह को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला, जबकि सई परांजपे को सर्वश्रेष्ठ पटकथा के लिए सम्मानित किया गया।\n\nफिल्मफेयर पुरस्कारों में भी गाड़े झंडे\nराष्ट्रीय मंच के अलावा फिल्मफेयर पुरस्कारों में भी इस कलाकृति ने दो बड़े पुरस्कार जीते। फिल्म की पटकथा दर्शकों को जीवन का एक गहरा पाठ सिखा जाती है। इसकी मुख्य कहानी नेत्रहीनों के एक स्कूल के प्रिंसिपल अनिरुद्ध परमार के जीवन के इर्द-गिर्द बुनी गई है। दुनिया देख पाने में असमर्थ अनिरुद्ध की रोजमर्रा की जिंदगी उदासी और अकेलेपन के साये में गुजरती है। एक दिन जब वे डॉक्टर के पास अपनी जांच कराने जा रहे होते हैं, तो उन्हें रास्ते में एक बेहद प्यारा सा गाना सुनाई देता है। डॉक्टर के क्लिनिक जाने के बजाय वे सीधे उस मकान के दरवाजे पर पहुंच जाते हैं, जिसके भीतर से वह मंत्रमुग्ध कर देने वाली आवाज आ रही थी। वह सुरीली आवाज कविता प्रसाद यानी शबाना आजमी की होती है, जो अपने पति की मृत्यु के बाद शादी के तीन साल बाद ही विधवा हो गई थीं। कविता भी एकांत में रहना पसंद करती हैं और उनके बचपन की दोस्त मंजू ही उनकी इकलौती साथी होती है। मंजू अपने घर पर एक छोटी सी पार्टी रखती है, जिसमें कविता और अनिरुद्ध की औपचारिक मुलाकात होती है। अनिरुद्ध अपनी तेज सुनने की क्षमता से कविता की आवाज को तुरंत पहचान लेते हैं। बातचीत के दौरान वे स्कूल की जरूरतों का जिक्र करते हैं और बताते हैं कि वहां ऐसे स्वयंसेवकों की आवश्यकता है जो बच्चों को किताबें पढ़कर सुना सकें, संगीत सिखा सकें, कला और हस्तशिल्प में मदद कर सकें तथा उनके साथ गुणवत्तापूर्ण समय बिता सकें। शुरुआत में कविता इस प्रस्ताव को लेकर थोड़ा हिचकिचाती हैं, लेकिन बाद में समझाने पर वह स्कूल में स्वयंसेवक बनने का फैसला कर लेती हैं।\n\nकविता और अनिरुद्ध के रिश्ते के उतार-चढ़ाव\nफिल्म की कहानी जैसे-जैसे आगे बढ़ती है, स्कूल में लगातार मिलते-मिलते कविता और अनिरुद्ध एक-दूसरे के करीब आ जाते हैं और दोनों को प्यार हो जाता है। इसके बाद वे सगाई भी कर लेते हैं, लेकिन दोनों की शख्सियत और स्वभाव में जमीन-आसमान का फर्क होता है। उनके इस रिश्ते में कई तरह के उतार-चढ़ाव आते हैं। अनिरुद्ध के मन में यह आशंका घर कर जाती है कि कविता केवल इस सेवा कार्य के जरिए अपने जीवन के खालीपन को पाटना चाहती हैं। उन्हें ऐसा महसूस होता है कि कविता ने उनके विवाह के प्रस्ताव को सच्चे प्रेम की वजह से नहीं, बल्कि अपनी सूखी और उदास जिंदगी से बाहर निकलने के एक रास्ते के रूप में स्वीकार किया है। इसके बाद कहानी क्या नया मोड़ लेती है, यह जानने के लिए इस फिल्म को खुद देखना ही सबसे अच्छा अनुभव रहेगा।\n\nइसका आप पर असर\nयह क्लासिक फिल्म दर्शकों को मानवीय रिश्तों की गहराई और संवेदनशीलता को समझने का एक नया नजरिया देती है।\n\n• दर्शकों के लिए: यह फिल्म दर्शकों को रिश्तों में अहंकार और हीन भावना से ऊपर उठकर प्यार को सच्चे रूप में अपनाने की प्रेरणा देती है। इसका प्रभाव यह होता है कि लोग दिव्यांगजनों के प्रति अधिक संवेदनशील और मददगार दृष्टिकोण अपनाते हैं।\n• कला प्रेमियों के लिए: यह थियेटर और अभिनय के छात्रों को दिग्गज कलाकारों के माध्यम से सूक्ष्म भावों को पर्दे पर उतारने की कला सीखने का अवसर देती है। इससे सिनेमा प्रेमियों को मजबूत पटकथा और कलात्मक फिल्मों के महत्व का गहरा अहसास होता है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. क्या स्पर्श देखने लायक है?\nहाँ, स्पर्श एक बेहद संवेदी और गहरी कहानी वाली फिल्म है जो मानवीय रिश्तों की बारीकियों को खूबसूरती से दर्शाती है।\n\n2. स्पर्श फिल्म का निर्देशन किसने किया था?\nइस फिल्म का निर्देशन सई परांजपे ने किया था।\n\n3. फिल्म में मुख्य भूमिकाओं में कौन-कौन कलाकार थे?\nफिल्म में ओम पुरी, नसीरुद्दीन शाह और शबाना आजमी ने मुख्य भूमिकाएं निभाई थीं।\n\n4. स्पर्श फिल्म को कौन से बड़े पुरस्कार मिले थे?\nइस फिल्म ने हिंदी में सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म का नेशनल अवॉर्ड जीता था और नसीरुद्दीन शाह को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार मिला था।\n\n5. इस फिल्म को रिलीज होने में कितनी देरी हुई थी?\nइस फिल्म को रिलीज होने में लगभग चार साल की देरी हुई थी।\n\nप्रेरणा और सबक\nयह फिल्म और इसकी निर्माण यात्रा जीवन संघर्ष और कला के प्रति समर्पण के कई महत्वपूर्ण पाठ सिखाती है।\n\n• धैर्य और दृढ़ता: चार साल तक रिलीज का इंतजार करने के बावजूद इस कलाकृति ने अपनी गुणवत्ता के दम पर राष्ट्रीय स्तर पर जो मुकाम हासिल किया, वह सिखाता है कि बेहतरीन काम आखिरकार पहचान पा ही लेता है।\n• संवेदनशीलता अपनाना: जीवन की जटिलताओं और दूसरों की आंतरिक कमजोरियों को समझकर उनके साथ सहानुभूति रखना एक सफल रिश्ते की नींव बनता है।\n• गंभीर विषयों पर काम: व्यावसायिक सफलता के दबाव से दूर हटकर समाज के वास्तविक मुद्दों पर आधारित रचनात्मक कार्य करना हमेशा दीर्घकालिक प्रभाव छोड़ता है।",
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  "category": "बॉलीवुड",
  "publishedAt": "2026-09-04",
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