उम्र को मात देकर अमिताभ बच्चन ने रचे नए कीर्तिमान, इन सात यादगार फिल्मों ने बदल दिया सिनेमाई सफर संजय लीला भंसाली की ब्लैक से लेकर नाग अश्विन की कल्कि 2898 एडी तक, उम्र के दूसरे पड़ाव में अमिताभ बच्चन ने कई बेमिसाल किरदारों से दर्शकों को मंत्रमुग्ध किया है। भारतीय सिनेमा के इतिहास में बहुत कम अभिनेता ऐसे हैं जिन्होंने करियर के ढलते दौर में अपनी अदाकारी से पूरी कहानी का रुख बदल दिया हो। अमिताभ बच्चन ने ढलती उम्र में पारंपरिक मुख्य भूमिकाओं के ढर्रे को तोड़कर ऐसे चुनौतीपूर्ण किरदारों को चुना, जिन्होंने न केवल उनके अभिनय को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया, बल्कि कई बार उनके करियर को नया मोड़ भी दिया। गंभीर ड्रामा, अनोखी कॉमेडी, सामाजिक सरोकार और पौराणिक साइंस-फिक्शन तक, उन्होंने हर विधा में खुद को साबित किया। गुरुकुल का सख्त अनुशासन और डूबते करियर को सहारा साल 2000 में पर्दे पर आई फिल्म मोहब्बतें अभिनेता के पेशेवर सफर के लिए मील का पत्थर साबित हुई। आदित्य चोपड़ा द्वारा निर्देशित इस रोमांटिक ड्रामा में उन्होंने गुरुकुल के कड़े मिजाज वाले प्रिंसिपल नारायण शंकर की भूमिका अदा की थी। संस्थान की चारदीवारी में प्यार को कमजोरी और अनुशासन को सर्वोपरि मानने वाले इस किरदार ने कहानी में जबर्दस्त वजन पैदा किया था। शाहरुख खान और ऐश्वर्या राय बच्चन के साथ उनके संवाद और अभिनय के टकराव ने दर्शकों पर गहरी छाप छोड़ी। सिनेमा जगत में यह दौर अभिनेता के लिए बेहद कठिन माना जाता था, और इस सफल प्रस्तुति ने उनके डगमगाते करियर को नई मजबूती प्रदान की। संजय लीला भंसाली की ब्लैक में शिक्षक की संवेदनशील भूमिका इसके पांच वर्ष बाद, 2005 में संजय लीला भंसाली के निर्देशन में बनी फिल्म ब्लैक रिलीज हुई, जिसे उनके पूरे फिल्मी जीवन के शिखर प्रदर्शनों में गिना जाता है। इस कथा में उन्होंने देबराज सहाय नाम के एक अनोखे शिक्षक का रूप धरा था, जो दृष्टिहीन और मूक-बधिर युवती को दुनिया से संवाद करने का हौसला देता है। रानी मुखर्जी द्वारा अभिनीत मिशेल मैकनेली के किरदार और देबराज के बीच का यह भावनात्मक सफर संघर्ष, आत्मसम्मान तथा आत्मविश्वास का अद्भुत दस्तावेज बना। भावनाओं की सूक्ष्म परतों को पर्दे पर उतारने के उनके सधे अंदाज ने समीक्षकों और दर्शकों दोनों को स्तब्ध कर दिया। पा में पिता और पुत्र की अनोखी भूमिका की अदला-बदली साल 2009 में आई फिल्म पा ने दर्शकों के सामने अभिनय का एक बिल्कुल नया नजरिया पेश किया। इस फिल्म की सबसे अनोखी खासियत यह थी कि वास्तविक जीवन में पिता-पुत्र की जोड़ी ने पर्दे पर अपनी भूमिकाएं पूरी तरह उलट दी थीं। बिग बी ने एक दुर्लभ बीमारी से जूझ रहे बेटे का रोल निभाया, जबकि अभिषेक बच्चन उनके पिता के किरदार में नजर आए थे। विद्या बालन की मौजूदगी वाली इस संवेदनशील कहानी में उनके शारीरिक बदलाव और बाल सुलभ मासूमियत ने आलोचकों से जबरदस्त सराहना हासिल की। पीकू में कब्ज से परेशान चिड़चिड़े पिता का सहज अभिनय गंभीर अभिनय के दायरे से बाहर निकलकर शूजित सरकार की 2015 की प्रस्तुति पीकू में उनका एक सर्वथा अलग रंग देखने को मिला। भास्कर बनर्जी के रूप में उन्होंने एक ऐसे बुजुर्ग बंगाली पिता का रोल निभाया, जो अपनी पेट की समस्याओं और पाचन को लेकर दिन-रात चिंतित रहता है। अपनी कामकाजी बेटी पीकू के साथ उनके खट्टे-मीठे रिश्ते को फिल्म में बड़ी बारीकी से उकेरा गया था। दीपिका पादुकोण और इरफान खान के साथ उनकी सहज बातचीत और हास्य की सटीक टाइमिंग ने सिनेमाप्रेमियों का दिल पूरी तरह जीत लिया। पिंक के जरिए सहमति और सामाजिक न्याय की जोरदार वकालत अनिरुद्ध रॉय चौधरी के निर्देशन में 2016 में रिलीज हुई अदालती ड्रामा पिंक ने समाज के सामने नारी स्वतंत्रता और सहमति का बुनियादी सवाल खड़ा किया। इस फिल्म में उन्होंने दीपक सहगल नाम के एक सेवानिवृत्त वकील की भूमिका निभाई, जो मुश्किल में फंसी तीन युवतियों का मुकदमा अदालत में लड़ता है। तापसी पन्नू, कीर्ति कुल्हारी और एंड्रिया तारियांग के किरदारों को इंसाफ दिलाने के लिए अदालत के कठघरे में दी गई उनकी दलीलें बेहद प्रभावशाली थीं। यह फिल्म न केवल उनके करियर का यादगार अध्याय बनी, बल्कि सामाजिक संवाद का केंद्र भी बन गई। 102 नॉट आउट में जिंदगी का भरपूर जश्न उमेश शुक्ला के निर्देशन में 2018 में आई 102 नॉट आउट ने ऋषि कपूर और उनकी जोड़ी को एक बेहद दिलचस्प पारिवारिक ताने-बाने में पेश किया। कहानी 102 वर्ष की उम्र में भी खिलखिलाती जिंदगी जीने वाले दत्तात्रेय वखारिया और उनके 75 साल के निराशावादी बेटे बाबूलाल के बीच घूमती है। जहां बाबूलाल उम्र के बोझ तले खुद को थका हुआ मान बैठता है, वहीं दत्तात्रेय बुढ़ापे के हर पल को उमंग और ऊर्जा के साथ जीने का संदेश देते हैं। दोनों दिग्गजों की जुगलबंदी ने दर्शकों को हंसाने के साथ-साथ गहरे अहसास भी दिए। कल्कि 2898 एडी में पौराणिक योद्धा का महाकाय अवतार उम्र के नौवें दशक में नाग अश्विन के निर्देशन में बनी 2024 की महत्वाकांक्षी साइंस-फिक्शन फिल्म कल्कि 2898 एडी में उन्होंने अश्वत्थामा का किरदार निभाकर सभी को हैरान कर दिया। भविष्य के अंधकारमय दौर में इंसानी वजूद और सत्ता के संघर्ष के बीच अमरता के श्राप से बंधे महाभारत के इस योद्धा के रूप में वह महाबली बनकर उभरे। प्रभास, दीपिका पादुकोण और कमल हासन जैसे सितारों से सजी इस भव्य गाथा में उन्होंने एक्शन और गरिमा का ऐसा तालमेल दिखाया, जिसने यह साबित कर दिया कि प्रतिभा किसी उम्र की मोहताज नहीं होती। इसका आप पर असर सिनेमा प्रेमियों और दर्शकों के लिए अमिताभ बच्चन की यह सात फिल्में भारतीय फिल्म उद्योग के बदलते नजरिए और अभिनय की विविधता को समझने का सबसे बेहतरीन जरिया हैं। • दर्शकों के लिए सीख: यह फिल्में दिखाती हैं कि उम्र बढ़ने का मतलब मुख्यधारा से गायब होना नहीं है। दर्शक अलग-अलग शैलियों में बुजुर्ग किरदारों की सशक्त कहानियां देखने के आदी हुए हैं। • मनोरंजन का नया स्तर: पीकू जैसी फिल्मों ने साधारण घरेलू समस्याओं को हास्य में बदलना सिखाया। वहीं पिंक ने सहमति के मुद्दे पर परिवारों को खुलकर बात करने का नजरिया दिया। • कलाकारों के लिए सबक: उभरते कलाकारों को इन फिल्मों से प्रेरणा मिलती है कि किसी भी आयु वर्ग में नई विधाएं आजमाई जा सकती हैं। प्रयोग करने से कभी पीछे नहीं हटना चाहिए। • पारिवारिक जुड़ाव: 102 नॉट आउट जैसी कृतियां बुजुर्गों और उनके बच्चों के बीच के भावनात्मक रिश्तों को समझने में मददगार साबित होती हैं। यह परिजनों को सकारात्मक रूप से जीने की प्रेरणा देती हैं। ऐसा क्यों हुआ अमिताभ बच्चन का बाद के वर्षों में यह शानदार सफर अचानक नहीं हुआ, बल्कि इसके पीछे पेशेवर विफलताएं और सिनेमाई समझ में आए बदलाव शामिल थे। • करियर में ठहराव और वित्तीय संकट: नब्बे के दशक के अंत में पुरानी शैली की मुख्य भूमिकाएं चलना बंद हो गई थीं। इस कारण उन्हें अपने किरदारों के चयन पर दोबारा विचार करने के लिए विवश होना पड़ा। • मोहब्बतें का बड़ा जुआ: आदित्य चोपड़ा की फिल्म में अपनी वास्तविक उम्र के अनुरूप सख्त शिक्षक का रोल स्वीकार करना उनके लिए एक बड़ा बदलाव था। इस प्रयोग की भारी सफलता ने चरित्र-प्रधान भूमिकाओं का रास्ता साफ कर दिया। • नए दौर के निर्देशकों का उभार: शूजित सरकार, नाग अश्विन और संजय लीला भंसाली जैसे फिल्मकारों ने उनके विशाल व्यक्तित्व के लिए नए सांचे तैयार किए। इन निर्देशकों ने स्टीरियोटाइप भूमिकाओं के बजाय अनोखी पटकथाएं लिखीं। • दर्शकों की पसंद में परिपक्वता: भारतीय सिनेमा प्रेमी अब परंपरागत नायक के बजाय यथार्थवादी और जटिल इंसानी कहानियों को देखने के लिए तैयार थे। इस सांस्कृतिक बदलाव ने इन विविध प्रयोगों को बॉक्स ऑफिस पर सफल बनाया। सवाल-जवाब 1. मोहब्बतें फिल्म अमिताभ बच्चन के करियर के लिए क्यों महत्वपूर्ण थी? इस फिल्म ने उनके डगमगाते करियर को नया सहारा दिया और उन्हें उम्र के अनुकूल प्रभावशाली किरदार निभाने का नया रास्ता दिखाया। 2. फिल्म ब्लैक में अमिताभ बच्चन ने कौन सा किरदार निभाया था? उन्होंने देबराज सहाय नाम के शिक्षक की भूमिका निभाई थी, जो दृष्टिहीन और मूक-बधिर लड़की को आत्मनिर्भर बनाता है। 3. फिल्म पा में अमिताभ बच्चन और अभिषेक बच्चन की क्या भूमिकाएं थीं? पा में अमिताभ बच्चन ने दुर्लभ बीमारी से पीड़ित बेटे का किरदार निभाया था, जबकि अभिषेक बच्चन उनके पिता बने थे। 4. फिल्म पीकू का निर्देशन किसने किया था? पीकू का निर्देशन शूजित सरकार ने किया था, जिसमें अमिताभ बच्चन ने एक चिड़चिड़े बुजुर्ग पिता भास्कर बनर्जी का रोल किया था। 5. फिल्म पिंक किस सामाजिक विषय पर आधारित थी? पिंक महिलाओं की सहमति और कानूनी अधिकारों के मुद्दे पर आधारित एक गंभीर अदालती ड्रामा थी। 6. फिल्म 102 नॉट आउट में अमिताभ बच्चन के साथ मुख्य भूमिका में कौन थे? इस फिल्म में उनके साथ ऋषि कपूर मुख्य भूमिका में थे, जिन्होंने उनके 75 वर्षीय बेटे का किरदार निभाया था। 7. कल्कि 2898 एडी में अमिताभ बच्चन ने किसका किरदार निभाया? उन्होंने महाभारत के अमर योद्धा अश्वत्थामा का शक्तिशाली किरदार निभाया था। प्रेरणा और सबक अमिताभ बच्चन का यह सफर साबित करता है कि दृढ़ इच्छाशक्ति और अनुकूलन क्षमता से किसी भी ढलते दौर को नए आरंभ में बदला जा सकता है। • बदलाव को समय पर अपनाना: जब पुराना तौर-तरीका काम करना बंद कर दे, तो नई वास्तविकताओं और भूमिकाओं को बिना झिझक स्वीकार करना चाहिए। समय के साथ खुद को ढालना ही प्रगति की पहली शर्त है। • असफलताओं के बाद वापसी: पेशेवर जीवन में मुश्किल दौर आने पर हिम्मत हारने के बजाय नई संभावनाओं की तलाश करनी चाहिए। सही रणनीति के साथ दोबारा शुरुआत की जा सकती है। • जोखिम लेने का साहस: पा और कल्कि 2898 एडी जैसी फिल्मों में असामान्य किरदार चुनना यह सिखाता है कि सुरक्षित दायरे से बाहर निकलकर ही बड़ी उपलब्धियां हासिल होती हैं। प्रयोग से कभी घबराना नहीं चाहिए। • उम्र को सीमा न मानना: सक्रियता और लगन इंसान को हर पड़ाव पर प्रासंगिक बनाए रखती है। उम्र का बढ़ना कभी भी नई मंजिलें तय करने में बाधा नहीं बन सकता। https://trendkia.com/bollywood/umra-ko-mata-dekara-amitabh-bachchan-ne-rache-nae-kirtimana-ina-sata-yadagara-philmon-ne-badala-diya-sinemai-saphara-46768 TrendKia — Har trend, sabse pehle.