अमेरिका और ईरान युद्ध से कच्चे तेल में आग, 90 डॉलर के पार पहुंचा भाव, महंगाई का खतरा बढ़ा वॉशिंगटन और तेहरान के बीच युद्धविराम टूटते ही होर्मुज जलडमरूमध्य दोबारा बंद हो गया है, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 90 डॉलर प्रति बैरल के पार निकल गई हैं। अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष विराम का समझौता अचानक टूटने से वैश्विक ऊर्जा बाजारों में भारी दहशत फैल गई है, जिसके चलते ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतें 90 डॉलर प्रति बैरल के अहम स्तर को पार कर गई हैं। दोनों देशों के बीच फिर से युद्ध शुरू होने के कारण बेहद रणनीतिक माने जाने वाले होर्मुज जलडमरूमध्य को एक बार फिर से यातायात के लिए बंद कर दिया गया है। दुनिया भर में तेल की आपूर्ति के लिए यह समुद्री रास्ता बेहद महत्वपूर्ण है और इसकी नाकाबंदी ने हर जगह पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में भारी उछाल आने की गहरी चिंताओं को फिर से जिंदा कर दिया है। लंबे युद्ध की आशंका से सहमा बाजार नए कारोबारी सप्ताह की शुरुआत होते ही वित्तीय बाजारों में इसका सीधा असर देखने को मिला। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमतों में 2.70 प्रतिशत का तेज उछाल दर्ज किया गया और यह 90.52 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर पहुंच गया। इसी के साथ अमेरिकी कच्चे तेल यानी डब्ल्यूटीआई (WTI) में भी 2.27 प्रतिशत की भारी वृद्धि देखी गई, जिससे इसका भाव 84.37 डॉलर प्रति बैरल हो गया। यह स्थिति शांति समझौते के उन दिनों के बिल्कुल उलट है जब ब्रेंट क्रूड गिरकर 71 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया था और पिछले ही सप्ताह डब्ल्यूटीआई 72 डॉलर पर कारोबार कर रहा था। बाजार विश्लेषकों का कहना है कि फिलहाल खाड़ी क्षेत्र में हालात सामान्य होने की कोई उम्मीद नजर नहीं आ रही है। इसके अलावा, अमेरिका द्वारा की जा रही व्यापक सैन्य तैयारियों को देखकर निवेशकों को लगने लगा है कि यह सैन्य टकराव काफी लंबे समय तक खिंचने वाला है। इसी वजह से तेल व्यापारी और बड़ी कंपनियां भविष्य के किसी भी जोखिम और किल्लत से बचने के लिए अभी से ऊंचे दामों पर कच्चा तेल खरीदने को मजबूर हो गए हैं। वैश्विक व्यापार पर मंडराते दोहरे संकट पश्चिम एशिया में लगातार बिगड़ते हालात अंतरराष्ट्रीय व्यापार को नुकसान पहुंचाने वाला अकेला संकट नहीं है। भू-राजनीतिक मोर्चे पर अमेरिका और यूरोप सहित तमाम पश्चिमी देशों के कारोबार पर चीन (जिसे ड्रैगन भी कहा जाता है) का एक बड़ा खतरा भी मंडरा रहा है, जहां एक फैसले ने पूरी 6.5 ट्रिलियन डॉलर की इंडस्ट्री को भारी मुश्किल में डाल दिया है। मध्य पूर्व की इस अस्थिरता के साथ मिलकर ये चुनौतियां वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए खतरे की घंटी बन गई हैं। कमोडिटी विशेषज्ञों का साफ मानना है कि जब तक पश्चिम एशिया में पूरी तरह से शांति स्थापित नहीं हो जाती और समुद्री व्यापारिक मार्ग पूरी तरह से सुरक्षित नहीं हो जाते, तब तक कच्चे तेल की कीमतों में नरमी आने की कोई संभावना नहीं है। होर्मुज जलडमरूमध्य का लंबे समय तक बंद रहना और अमेरिका और ईरान के बीच खिंचता हुआ युद्ध ऊर्जा क्षेत्र में महंगाई को और ज्यादा भड़का सकता है। महंगाई बढ़ने का चौतरफा असर अगर कच्चे तेल की कीमतें इसी तरह युद्ध के कारण उच्च स्तर पर बनी रहती हैं, तो दुनिया भर की सरकारों और तेल कंपनियों के पास पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ाने के अलावा कोई और विकल्प नहीं बचेगा। इसका सीधा और बुरा असर पूरी अर्थव्यवस्था पर एक चेन रिएक्शन की तरह पड़ेगा। माल ढुलाई और लॉजिस्टिक का खर्च काफी बढ़ जाएगा, जिससे लगभग सभी कंपनियों की उत्पादन लागत में भारी इजाफा होगा। जाहिर है कि ट्रांसपोर्टेशन महंगा होने का सीधा मतलब है कि खाने-पीने की चीजें, राशन और रोजमर्रा के इस्तेमाल का हर सामान आम आदमी की पहुंच से दूर होने लगेगा। इन कठिन परिस्थितियों में वैश्विक स्तर पर महंगाई को नियंत्रित करना बहुत मुश्किल हो जाएगा। इस बेतहाशा बढ़ती महंगाई पर लगाम कसने के लिए केंद्रीय बैंकों को अपनी ब्याज दरें मजबूरी में ऊंची रखनी पड़ेंगी। कर्ज के महंगा होने की यह स्थिति उपभोक्ता कीमतों को तो शायद कुछ हद तक रोक ले, लेकिन इससे वैश्विक अर्थव्यवस्था के विकास की रफ्तार के बुरी तरह सुस्त पड़ने का बहुत बड़ा जोखिम पैदा हो जाएगा। इसका आप पर असर • भारत में: कच्चे तेल के 90 डॉलर पार जाने से देश में जल्द ही पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में भारी बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है, जिससे आपका मासिक ईंधन बजट बिगड़ सकता है। • आम उपभोक्ता पर असर: माल ढुलाई महंगी होने से सब्जियां, राशन और रोजमर्रा के अन्य जरूरी सामान भी महंगे हो जाएंगे, जिससे घरेलू खर्च का बोझ सीधा आप पर पड़ेगा। • लोन और ईएमआई: बढ़ती महंगाई को काबू में रखने के लिए रिजर्व बैंक ब्याज दरों को लंबे समय तक ऊंचा रख सकता है, यानी आपके होम या ऑटो लोन की ईएमआई फिलहाल कम नहीं होगी। सवाल-जवाब 1. ब्रेंट क्रूड का भाव अब किस स्तर पर पहुंच गया है? अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड ऑयल का भाव 2.70 प्रतिशत उछलकर 90.52 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया है। 2. कच्चे तेल की कीमतों में अचानक इस उछाल का क्या कारण है? अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम टूटने और होर्मुज जलडमरूमध्य के दोबारा बंद होने के कारण वैश्विक तेल आपूर्ति बाधित होने की आशंका से कीमतें बढ़ी हैं। 3. शांति समझौते के दौरान तेल की कीमतें क्या थीं? युद्धविराम के दौरान कच्चे तेल के दाम काफी गिर गए थे, जिसमें ब्रेंट क्रूड 71 डॉलर और अमेरिकी कच्चा तेल (WTI) 72 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया था। 4. इस भू-राजनीतिक तनाव का पश्चिमी कारोबार पर क्या असर पड़ रहा है? अमेरिका और यूरोप सहित पश्चिमी देशों के कारोबार पर चीन का खतरा मंडरा रहा है, जिससे 6.5 ट्रिलियन डॉलर की एक पूरी इंडस्ट्री मुश्किल में पड़ गई है। 5. क्या आने वाले समय में पेट्रोल और डीजल और महंगे होंगे? हां, अगर कच्चे तेल की कीमतें इसी तरह ऊंची बनी रहीं, तो सरकारों और तेल कंपनियों को अपनी लागत निकालने के लिए पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ाने पड़ेंगे। https://trendkia.com/business/america-aura-iran-yuddha-se-kachche-tela-men-aga-90-dolara-ke-para-pahuncha-bhava-mahngai-ka-khatara-barha-8934 TrendKia — Har trend, sabse pehle.