अमेठी में स्वयं सहायता समूहों से बदल रही महिलाओं की किस्मत, मूंज से अचार तक के उत्पादों की अब होगी ब्रांडिंग, हर महीने 25 से 30 हजार तक कमाई अमेठी जिला प्रशासन स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं द्वारा बनाए उत्पादों की ब्रांडिंग कर उन्हें एक छत के नीचे बेचने की तैयारी कर रहा है, जिससे हजारों महिलाएं और सशक्त होंगी। अमेठी की हजारों महिलाएं अब अपने हाथों से बने सामान को बेचने के लिए इधर-उधर नहीं भटकेंगी। जिला प्रशासन एक ऐसी पहल शुरू करने जा रहा है, जिसके तहत स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं द्वारा तैयार किए गए उत्पादों की न सिर्फ ब्रांडिंग होगी, बल्कि उनकी बिक्री भी एक ही छत के नीचे आसानी से कराई जाएगी। एक छत के नीचे बिकेंगे समूहों के उत्पाद अब तक समूह की महिलाएं तरह-तरह की चीजें तो बना लेती थीं, लेकिन उन्हें बाजार तक पहुंचाना और बेच पाना सबसे बड़ी चुनौती रहती थी। इसी दिक्कत को दूर करने के लिए प्रशासन ने जिले में एक साझा बिक्री केंद्र की योजना बनाई है। यहां समूहों द्वारा बनाए गए सभी उत्पाद एक जगह मिलेंगे, जिससे ग्राहक तक पहुंच आसान होगी और महिलाओं को अपने सामान की कीमत भी बेहतर मिलेगी। महिलाओं को इस दिशा में लगातार प्रोत्साहित किया जा रहा है। योजनाओं से मिल रहा रोजगार आंकड़ों पर नजर डालें तो अमेठी जिले में अब तक एक जनपद एक उत्पाद योजना के जरिए स्वयं सहायता समूहों से जुड़े 69 उद्यमियों को रोजगार मिल चुका है। वहीं मुख्यमंत्री युवा स्वरोजगार अभियान के अंतर्गत 165 लाभार्थियों को इसका फायदा पहुंचा है। इतना ही नहीं, पूरे जनपद में करीब 8000 से अधिक समूह सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं, जो अलग-अलग तरह के उत्पाद बनाकर बेचते हैं। अमेठी के जिलाधिकारी संजय चौहान के अनुसार जिले में बने उत्पादों की ब्रांडिंग आसानी से कराई जाएगी और जो भी सामान तैयार हो रहा है, उसे एक छत के नीचे बेचने में जिला प्रशासन समूह की महिलाओं की पूरी मदद करेगा। उनका कहना है कि इस कदम से स्वयं सहायता समूहों की किस्मत बदलेगी। अचार-पापड़ से लेकर मूंज और मिट्टी के उत्पादों तक अमेठी जिले में समूह की महिलाएं कई तरह के व्यवसायों से जुड़ी हुई हैं। खाने-पीने की चीजों में वे आचार, चिप्स, पापड़, मुरब्बा, मोटे अनाज के बिस्किट, नमकीन और आटा तैयार कर रही हैं। वहीं मूंज से बनने वाले उत्पादों में कुर्सी, मेज, दरी, टोकरी, पायदान, डलिया और झबिया के साथ-साथ खिलौने, गुलदस्ता और कपड़े तक बनाए जा रहे हैं। इसके अलावा मिट्टी के उत्पादों में बर्तन और खिलौने भी इन महिलाओं की मेहनत से तैयार हो रहे हैं। इन्हीं अलग-अलग कामों की बदौलत महिलाओं को हर महीने 25 से 30 हजार रुपये की कमाई हो रही है, जो सालाना लाखों रुपये तक पहुंच जाती है। रोजगार के इस जरिए ने उन्हें आत्मनिर्भर बना दिया है। महिलाओं की जुबानी, बदलाव की कहानी समूह से जुड़कर उत्पाद बनाने के साथ-साथ बैंक सखी का काम करने वाली युवा उद्यमी जूली खान बताती हैं कि एक समूह में करीब 10 महिलाओं को जोड़ा जाता है और उन्हें आत्मनिर्भर बनाने के लिए प्रशिक्षण दिया जा रहा है। उनके मुताबिक, "अब जब समूह के उत्पादों की ब्रांडिंग की जाएगी और उनकी बिक्री की जाएगी तो किसी को कहीं भटकना नहीं पड़ेगा। पहले से ही हमें समूह के जरिए रोजगार मिला है और अब इस प्रयास से हमें और मजबूती मिलेगी तथा महिलाओं को सशक्त बनने में फायदा होगा।" https://trendkia.com/business/amethi-men-svayn-sahayata-samuhon-se-badala-rahi-mahilaon-ki-kismata-munja-se-ac-702 TrendKia — Har trend, sabse pehle.