# बाबा बैद्यनाथ धाम में उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़ बनी देवघर के किसानों का वरदान, फूलों की खेती से बदल रही ग्रामीण अर्थव्यवस्था

> देवघर में श्रावणी मेले के दौरान बाबा बैद्यनाथ धाम और बासुकीनाथ धाम पहुंचने वाले श्रद्धालुओं की बढ़ती भीड़ से स्थानीय फूलों की खेती करने वाले किसानों की आय में भारी उछाल आया है। पारंपरिक फसलों से हटकर फूलों की खेती और घरेलू माला निर्माण से ग्रामीणों को दोहरी कमाई का स्थायी जरिया मिला है।

**Type:** article · **Category:** व्यापार · **Published:** 2026-08-22 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/business/baba-baidyanath-dham-men-umari-shraddhaluon-ki-bhira-bani-deoghar-ke-kisanon-ka-varadana-phulon-ki-kheti-se-badala-rahi-gramina-ar-20216 · **Language:** Hindi
**Tags:** देवघर, श्रावणी मेला, बाबा बैद्यनाथ धाम, फूलों की खेती, झारखंड किसान, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, मोहनपुर, प्रमोद पुजहर

झारखंड के देवघर जिले में हर साल आयोजित होने वाला प्रसिद्ध श्रावणी मेला केवल लाखों शिवभक्तों की अगाध आस्था का केंद्र ही नहीं है, बल्कि यह क्षेत्र के ग्रामीण इलाकों की अर्थव्यवस्था को भी नई ऊर्जा दे रहा है। बाबा बैद्यनाथ धाम और निकटवर्ती बासुकीनाथ धाम में भगवान शिव का जलाभिषेक करने के लिए देश भर से रोजाना पहुंचने वाले श्रद्धालु बड़ी मात्रा में ताजे फूल और मालाएं खरीदते हैं। श्रद्धालुओं की इस निरंतर बनी रहने वाली मांग ने देवघर के आसपास स्थित गांवों के किसानों की तकदीर बदल दी है, जहां पारंपरिक खाद्यान्न फसलों पर निर्भर रहने वाले किसान अब बड़े पैमाने पर व्यावसायिक फूलों की खेती की ओर रुख कर रहे हैं।

## पारंपरिक खेती से फूलों की खेती की ओर बदलाव
देवघर के ग्रामीण इलाकों, खासकर मोहनपुर प्रखंड के कनिया पोखर, मल्हारा और जरिया जैसे गांवों के खेतों का परिदृश्य अब पूरी तरह बदल चुका है। जिन खेतों में पहले केवल धान, अनाज और सामान्य मौसमी फसलें उगाई जाती थीं, वहां अब चारों तरफ रंग-बिरंगे फूल मुस्कुराते हुए दिखाई देते हैं। स्थानीय किसानों ने बाजार की मांग को समझते हुए सिर्फ खेत से फूल तोड़कर बेचने तक खुद को सीमित नहीं रखा है, बल्कि उन्होंने मूल्य संवर्धन (वैल्यू एडिशन) का एक अनूठा मॉडल अपनाया है।

किसान परिवार खेत से उपज प्राप्त करने के साथ-साथ घर पर खुद ही फूलों की सुंदर मालाएं तैयार कर रहे हैं। इससे एक ही फसल के जरिए कमाई के दो अलग-अलग रास्ते खुल गए हैं। एक तरफ जहां सीधे खुले फूलों की बिक्री से तुरंत नकद आय होती है, वहीं दूसरी तरफ घर में तैयार की गई मालाओं को बाजार में बेचकर अतिरिक्त मुनाफा कमाया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में परिवार के सभी सदस्य मिलकर हाथ बंटाते हैं। घर की महिलाएं विशेष रूप से माला बनाने का काम संभालती हैं, जिससे खेती-किसानी के साथ-साथ घरेलू स्तर पर ही महिलाओं के लिए स्वरोजगार और सीधी भागीदारी के अवसर पैदा हो रहे हैं।

## स्थानीय बाजार से बढ़ा मुनाफा और घटा परिवहन खर्च
श्रावणी मेले के दौरान देवघर में फूलों और मालाओं की मांग आम दिनों के मुकाबले कई गुना बढ़ जाती है। दूर-दराज के राज्यों और जिलों से आने वाले कांवड़िये और श्रद्धालु तड़के सुबह से ही मंदिर परिसर और आसपास के बाजारों में पूजन सामग्री खरीदने लगते हैं। सूर्योदय से पहले ही दुकानें सज जाती हैं और दिन चढ़ने के साथ-साथ बिक्री में तेजी आती है।

इस भारी मांग का सबसे बड़ा फायदा स्थानीय किसानों को यह मिल रहा है कि उन्हें अपनी फसल बेचने के लिए किसी दूर-दराज की बड़ी मंडी में नहीं जाना पड़ता। बाबा बैद्यनाथ मंदिर और बासुकीनाथ धाम के आसपास के स्थानीय बाजारों में ही पूरी उपज की खपत आसानी से हो जाती है। इससे किसानों का मंडी तक जाने वाला भारी परिवहन खर्च बच जाता है और समय की भी बचत होती है। बिचौलियों के बिना सीधे स्थानीय स्तर पर मजबूत बाजार मिलने से किसानों को अपनी मेहनत का पूरा और उचित मूल्य मिल पा रहा है।

## अग्रिम योजना और पारिवारिक भागीदारी का मॉडल
श्रावणी मेले के समय फूलों की मांग में होने वाली बढ़ोतरी का अनुमान किसानों को पहले से होता है, इसलिए वे महीनों पहले से ही इसकी योजना बनाना शुरू कर देते हैं। बुवाई से लेकर सिंचाई और पौधों की देखरेख इस तरह तय की जाती है कि मेले के दौरान खेतों में फूलों की बंपर पैदावार तैयार रहे। सही समय पर सही उपज बाजार में पहुंचने से किसानों को अधिकतम दाम मिलते हैं।

खेती के इस मॉडल में पूरे परिवार का श्रम जुड़ा हुआ है, जिससे लागत बेहद कम आती है। स्थानीय किसान प्रमोद पुजहर के अनुसार, "श्रावणी मेले में फूलों की बढ़ती मांग को देखते हुए किसान पहले से तैयारी करते हैं, जिससे पूरे परिवार को अतिरिक्त कमाई का अवसर मिलता है।" खेत की तैयारी से लेकर फूल तोड़ने और माला गूंथने तक घर के सभी उम्र के सदस्य योगदान देते हैं। इस एकजुटता से परिवार की कुल आमदनी में सुधार हुआ है और खेती अब एक लाभदायक पारिवारिक व्यवसाय का रूप ले रही है।

## मौसमी आय से कुटीर उद्योग की ओर बढ़ता कदम
श्रावणी मेला समाप्त होने के बाद भी देवघर में फूलों की मांग खत्म नहीं होती। बाबा की नगरी में साल भर श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहता है और नित्य पूजा-पाठ के लिए ताजे फूलों की आवश्यकता बनी रहती है। यही कारण है कि स्थानीय किसानों के लिए फूलों की खेती केवल किसी एक महीने या मेले तक सीमित मौसमी आय का जरिया नहीं रही, बल्कि यह साल भर चलने वाली एक स्थायी अतिरिक्त आमदनी का आधार बन चुकी है।

कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसानों को फूलों की वैज्ञानिक खेती, बेहतर बीज, शीत भंडारण और व्यवस्थित बाजार संपर्क सुविधाएं मुहैया कराई जाएं, तो यह गतिविधि आने वाले समय में एक संगठित ग्रामीण कुटीर उद्योग का आकार ले सकती है। बाबा बैद्यनाथ की इस पवित्र नगरी में उमड़ने वाली आस्था ग्रामीण परिवारों के जीवन में समृद्धि के नए रंग भर रही है और किसानों को आत्मनिर्भरता की एक नई दिशा दिखा रही है।

## इसका आप पर असर
**पाठकों और किसानों पर इस खबर का असर:**

- **देवघर और झारखंड में:** स्थानीय किसान पारंपरिक अनाज फसलों के स्थान पर व्यावसायिक फूलों की खेती अपनाकर अपनी पारिवारिक आय और स्वरोजगार के अवसरों में महत्वपूर्ण वृद्धि कर सकते हैं।
- **पूरे भारत में:** धार्मिक और सांस्कृतिक पर्यटन केंद्रों के आसपास रहने वाले ग्रामीण समुदाय स्थानीय तीर्थयात्रियों की मांग के अनुसार मूल्यवर्धित कृषि उत्पाद तैयार करके अपनी आजीविका को सशक्त बना सकते हैं।

## सवाल-जवाब

### 1. देवघर में फूलों की मांग में भारी उछाल क्यों आया है?
श्रावणी मेले के दौरान बाबा बैद्यनाथ धाम और बासुकीनाथ धाम में लाखों की संख्या में श्रद्धालु भगवान शिव पर चढ़ाने के लिए फूल और मालाएं खरीदते हैं, जिससे मांग काफी बढ़ गई है।

### 2. देवघर के किन गांवों के किसान मुख्य रूप से फूलों की खेती अपना रहे हैं?
देवघर के मोहनपुर प्रखंड के कनिया पोखर, मल्हारा और जरिया सहित आसपास के गांवों के किसान पारंपरिक फसलों की जगह फूलों की खेती कर रहे हैं।

### 3. किसान फूलों की खेती से दोहरी कमाई कैसे कर रहे हैं?
किसान खेत से सीधे फूल बेचने के अलावा घर में परिवार के सदस्यों की मदद से मालाएं बनाकर बेचते हैं, जिससे उन्हें दो अलग-अलग स्रोतों से अतिरिक्त मुनाफा मिलता है।

### 4. क्या श्रावणी मेला खत्म होने के बाद भी फूलों की खेती फायदेमंद रहती है?
हां, बाबा बैद्यनाथ की नगरी में धार्मिक आयोजनों और पूजा-पाठ के कारण साल भर फूलों की मांग बनी रहती है, जिससे किसानों को लगातार अतिरिक्त आय होती है।

### 5. स्थानीय किसान प्रमोद पुजहर ने श्रावणी मेले की तैयारी को लेकर क्या बताया?
प्रमोद पुजहर ने बताया कि मेले में फूलों की बढ़ती मांग का अंदाजा किसानों को पहले से होता है, इसलिए वे अग्रिम तैयारी करते हैं और पूरा परिवार मिलकर काम करके अतिरिक्त आय अर्जित करता है।

## प्रेरणा और सबक
**देवघर के किसानों की सफलता से मिलने वाली मुख्य सीख:**

- **स्थानीय मांग की पहचान:** बाजार और धार्मिक अवसरों की मांग को पहचानकर सही समय पर फसल उगाने से मुनाफा कई गुना बढ़ जाता है।
- **मूल्य संवर्धन (वैल्यू एडिशन):** केवल कच्चा उत्पाद बेचने के बजाय उसे निर्मित वस्तु (जैसे फूलों की माला) में बदलकर बेचना दोहरी कमाई का साधन बनता है।
- **पारिवारिक श्रम का उपयोग:** खेती और प्रसंस्करण में घर के सदस्यों और महिलाओं को जोड़ने से बाहरी श्रम लागत कम होती है और परिवार की आय बढ़ती है।
- **फसल विविधीकरण:** पारंपरिक अनाज की जगह उच्च मूल्य वाली नकदी फसलों (जैसे फूलों) को अपनाना कृषि को अधिक लाभदायक बनाता है।

---
_TrendKia — Har trend, sabse pehle.. Machine-readable view; canonical HTML at the URL above._