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  "type": "article",
  "title": "बहराइच के किसान त्रिलोकी ने देशी जुगाड़ से गाय के मूत्र को सहेजकर शुरू की जैविक खेती",
  "summary": "बहराइच जिले के किसान त्रिलोकी ने एक साधारण पाइप और डिब्बे की मदद से मवेशी मूत्र सहेजने की अनोखी तकनीक अपनाई है, जिससे जैविक खाद तैयार कर खेती की लागत घटाई जा रही है।",
  "content": "बहराइच जिले में खेती की बढ़ती लागत से जूझ रहे अन्नदाताओं के लिए एक अनूठी और किफायती पहल सामने आई है। जिले के एक प्रगतिशील किसान ने बिना किसी महंगे संयंत्र के बेहद साधारण तरीके से पशुओं के मूत्र को सहेजने का नायाब रास्ता निकाला है। इस स्वदेशी तकनीक के जरिए न केवल संसाधनों का बेहतरीन उपयोग हो रहा है, बल्कि प्राकृतिक खेती करने में आने वाला खर्च भी काफी हद तक कम हो गया है।\n\nपशु शेड में इस तरह तैयार किया गया है सिस्टम\nग्रामीण क्षेत्रों में खेती किसानी को बेहतर और किफायती बनाने के लिए नित नए प्रयोग किए जा रहे हैं। इसी क्रम में त्रिलोकी ने अपनी गाय के शेड के भीतर एक छोटी सी व्यवस्था स्थापित की है। उन्होंने पशु के खड़े होने के स्थान के ठीक पास तीन से चार फीट लंबा पाइप लगाया है, जिसका दूसरा सिरा जमीन पर रखे पांच लीटर के प्लास्टिक कंटेनर से जोड़ा गया है। जब भी मवेशी मूत्र त्याग करता है, वह सीधा पाइप के रास्ते सुरक्षित रूप से उस डिब्बे में एकत्र हो जाता है।\n\nरोजाना मिल रहा है पांच लीटर मवेशी मूत्र\nत्रिलोकी के मुताबिक इस सरल सी व्यवस्था की बदौलत उन्हें हर दिन लगभग पांच लीटर मवेशी मूत्र मिल जाता है। इस संचित मूत्र का उपयोग खेतों के लिए जीवामृत, घनजीवामृत, काढ़ा और जैविक उर्वरक तैयार करने में किया जा रहा है। पहले पशुओं का मूत्र खुले में इधर-उधर बहकर बेकार हो जाता था, लेकिन इस छोटे से तकनीकी बदलाव ने उसकी बर्बादी को पूरी तरह रोक दिया है।\n\nयूट्यूब से मिला विचार और दे रहे हैं दूसरों को संदेश\nत्रिलोकी साझा करते हैं कि उन्होंने इस तरकीब को करीब चार से पांच साल पहले यूट्यूब के जरिए देखा था, जिसके बाद उन्होंने इसे अपने पशु बाड़े में आजमाने की ठानी। मौजूदा समय में उनके पास एक गाय और एक देशी बछिया समेत कुल दो पशु मौजूद हैं। उनका कहना है कि यदि इलाके के अन्य पशुपालक भी ऐसे छोटे और असरदार तरीकों को अपना लें, तो खेती के खर्चे में भारी कटौती की जा सकती है। त्रिलोकी का दावा है कि इस तरीके से केवल एक गाय के माध्यम से लगभग दस से पंद्रह बीघा जमीन पर आसानी से जैविक और प्राकृतिक खेती की जा सकती है।\n\nइसका आप पर असर\nइस पहल से किसानों को खेती में महंगे रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने का सीधा व्यावहारिक रास्ता मिलता है।\n\n• बहराइच में: स्थानीय पशुपालक और किसान इस कम लागत वाले पाइप और डिब्बे के तरीके को अपनाकर खाद तैयार करने का खर्च बचा सकते हैं।\n• भारत में: देश भर के छोटे किसान मवेशी मूत्र को बेकार बहाने के बजाय सहेजकर अपनी फसल की लागत को काफी हद तक घटा सकते हैं।\n• लागत में कमी: रसायनों का खर्च घटने से किसानों की कुल बचत बढ़ती है और फसल उत्पादन भी बेहतर होता है।\n• संसाधन का सदुपयोग: घर पर उपलब्ध साधारण चीजों से ही जैविक खाद और जीवामृत तैयार करना संभव हो जाता है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nखेती में रासायनिक खादों की बढ़ती कीमतें और उनका मिट्टी की सेहत पर बुरा असर इस तरह की वैकल्पिक तकनीकों को अपनाने का मुख्य कारण बना।\n\n• बढ़ता खर्च: आधुनिक खेती में उर्वरकों और कीटनाशकों का भारी खर्च किसानों पर आर्थिक बोझ बढ़ा रहा था।\n• तकनीक की जानकारी: यूट्यूब जैसे माध्यमों के जरिए किसानों तक कम लागत वाले स्वदेशी उपायों की जानकारी आसानी से पहुंचने लगी है।\n• गोवंश का उपयोग: पशुओं के मलमूत्र को बर्बाद होने से बचाकर उसे खेती के काम में लेना पर्यावरण और आय दोनों के लिए फायदेमंद है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. यह अनोखा जुगाड़ किस जिले के किसान ने तैयार किया है?\nयह जुगाड़ बहराइच जिले के किसान त्रिलोकी द्वारा तैयार किया गया है।\n\n2. इस तकनीक में मवेशी मूत्र कैसे एकत्रित किया जाता है?\nगाय के बांधने वाले स्थान के पास 3 से 4 फीट लंबा पाइप लगाया गया है जिसका दूसरा सिरा 5 लीटर के प्लास्टिक डिब्बे से जुड़ा है।\n\n3. त्रिलोकी को प्रतिदिन कितना मवेशी मूत्र प्राप्त होता है?\nइस व्यवस्था के जरिए उन्हें प्रतिदिन लगभग 5 लीटर मवेशी मूत्र मिल जाता है।\n\n4. एकत्रित मूत्र का उपयोग किन चीजों को बनाने में होता है?\nइस मूत्र का उपयोग जीवामृत, घनजीवामृत, काढ़ा और जैविक खाद बनाने में किया जाता है।\n\n5. किसान को इस तकनीक का विचार कहां से मिला था?\nत्रिलोकी को यह आइडिया लगभग 4-5 साल पहले यूट्यूब से मिला था।\n\n6. किसान के पास वर्तमान में कितने मवेशी हैं?\nउनके पास वर्तमान में एक गाय और एक देशी बछिया सहित कुल दो मवेशी हैं।\n\nप्रेरणा और सबक\nयह प्रेरणादायक कहानी दिखाती है कि कैसे साधारण सूझबूझ से बिना बड़े निवेश के भी खेती को किफायती बनाया जा सकता है।\n\n• कम लागत का उपयोग: महंगे उपकरणों के बिना भी केवल साधारण प्लास्टिक डिब्बे और पाइप से उपयोगी व्यवस्था बनाई जा सकती है।\n• तकनीक का लाभ: इंटरनेट और यूट्यूब पर मिलने वाली सही जानकारियों को अपने खेतों में उतारकर सकारात्मक बदलाव लाया जा सकता है।\n• आत्मनिर्भरता: एक या दो पशुओं के जरिए ही बड़े पैमाने पर जैविक खाद और जीवामृत की जरूरत पूरी की जा सकती है।",
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  "category": "व्यापार",
  "publishedAt": "2026-10-23",
  "tags": [
    "जैविक खेती",
    "बहराइच",
    "प्राकृतिक खेती",
    "किसान जुगाड़",
    "गोवंश मूत्र",
    "जीवामृत"
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  "site": "TrendKia"
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