# बहराइच के किसान त्रिलोकी ने केले के साथ सह-फसली खेती से निकाला मुनाफे का नया फॉर्मूला

> मिर्जापुर गांव के किसान त्रिलोकी ने 5 बीघे के केले के बागान में खाली जमीन पर तीन अतिरिक्त फसलें उगाकर खेती की लागत शून्य करने और शुद्ध मुनाफा कमाने की अनूठी मिसाल पेश की है।

**Type:** article · **Category:** व्यापार · **Published:** 2026-10-09 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/business/bahraich-ke-kisana-triloki-ne-kele-ke-satha-saha-phasali-kheti-se-nikala-munaphe-ka-naya-phormula-45365 · **Language:** Hindi
**Tags:** केले की खेती, सह-फसली खेती, बहराइच, कृषि समाचार, किसान की आय, शिमला मिर्च, हरी खाद

पारंपरिक खेती के तरीकों में बदलाव लाकर आधुनिक सूझबूझ का इस्तेमाल करने वाले किसान अब अपनी मेहनत का बेहतर फल हासिल कर रहे हैं। आम तौर पर केले की बागवानी करने वाले काश्तकारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होती है कि पौधों के पूरी तरह विकसित होने तक खेत का एक बड़ा हिस्सा महीनों तक खाली पड़ा रहता है। उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले के अंतर्गत मिर्जापुर गांव के रहने वाले युवा काश्तकार त्रिलोकी ने इसी खाली पड़ी जमीन का सदुपयोग करने के लिए सह-फसली खेती यानी इंटरक्रॉपिंग का एक बेहद असरदार तरीका निकाला है। इस तकनीक के दम पर केले की देखरेख, खाद और जुताई में लगने वाला पूरा खर्च बीच की फसलों की आमदनी से ही चुकता हो जाता है, जिससे केले की मुख्य उपज से मिलने वाला पूरा पैसा सीधे शुद्ध बचत में बदल जाता है।

## हरी खाद के लिए ढैंचे के स्थान पर तिल का चयन
जमीन की उर्वरा शक्ति को मजबूत करने और प्राकृतिक हरी खाद तैयार करने के लिए ज्यादातर किसान ढैंचा उगाने को प्राथमिकता देते हैं। इसके विपरीत त्रिलोकी ने अपने खेत में तिल की बुवाई का रास्ता चुना। इसके पीछे की व्यावहारिक वजह साझा करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि ढैंचे के पौधों को जमीन में सड़कर पूरी तरह मिट्टी का हिस्सा बनने में काफी लंबा वक्त लग जाता है। चूंकि उन्हें अगली फसल के तौर पर एक सप्ताह के भीतर ही शिमला मिर्च की पौध तैयार कर खेत में रोपनी थी, इसलिए तिल बोना ज्यादा मुफीद साबित हुआ। तिल के हरे पौधों को जोतकर खेत में पलटने से मिट्टी को जरूरी जैविक पोषक तत्व भी तेजी से मिल जाते हैं। इसके अतिरिक्त यदि किसी परिस्थिति में तिल को पकने दिया जाए, तो बाजार में तिल के बीज और उसके तेल की बिक्री से अच्छे दाम भी मिल सकते हैं।

## केले के साथ तीन चरणों में अतिरिक्त फसलों का चक्र
त्रिलोकी की कार्ययोजना के मुताबिक केले की मुख्य बागवानी जब तक फल देने की स्थिति में पहुंचेगी, तब तक वे उसी जमीन से कुल तीन अतिरिक्त उपज समेट चुके होंगे। फसल चक्र के पहले चरण में तिल की बुवाई की गई, जिसे बाद में खेत जोतकर हरी खाद का रूप दिया जाएगा ताकि जमीन को पर्याप्त जैविक खुराक मिल सके। तिल को मिट्टी में मिलाने के तुरंत बाद खाली क्यारियों में शिमला मिर्च की रोपाई की जाएगी। शिमला मिर्च की पैदावार और उसकी नियमित बाजार बिक्री मार्च से अप्रैल के महीने तक निरंतर जारी रहेगी। इसके बाद जब शिमला मिर्च की तुड़ाई का सिलसिला समाप्त हो जाएगा, तो बचे हुए खाली वक्त में हरी पत्तेदार धनिया की बुवाई कर ली जाती है। इस प्रकार एक ही भूखंड से समय गंवाए बिना लगातार पैदावार हासिल होती रहती है।

## 5 बीघे में 150 क्विंटल उपज और आय का लेखा-जोखा
त्रिलोकी के पास वर्तमान में कुल 5 बीघे का सब्जी वाले केले का बागान है। सामान्य तौर पर उनके खेत में 1 बीघे से करीब 30 से 35 क्विंटल सब्जी वाले केले की पैदावार मिल जाती है। इस हिसाब से पूरे 5 बीघे के बागान से लगभग 150 क्विंटल केले की कुल पैदावार तैयार होती है। स्थानीय मंडियों और बाजारों में इस किस्म के केले का भाव औसतन ₹15 प्रति किलोग्राम तक आसानी से मिल जाता है। सह-फसली मॉडल का सबसे मुख्य आर्थिक लाभ यह रहता है कि बीच में उगाई जाने वाली तीनों फसलें तिल, शिमला मिर्च और हरी धनिया केले की खेती में लगने वाले पानी, खाद, मजदूरी और जुताई के पूरे निवेश की भरपाई कर देती हैं। नतीजतन जब केले की मुख्य फसल कटकर बाजार में बिकती है, तो मिलने वाला समूचा राजस्व किसान के खाते में बिना किसी लागत कटौती के शुद्ध लाभ के तौर पर दर्ज होता है।

## साथी काश्तकारों के लिए आमदनी बढ़ाने की सलाह
त्रिलोकी का मानना है कि इलाके के अन्य किसान भी अपनी जोत में इस बहुफसली व्यवस्था को लागू करके अपनी कमाई के स्तर को कई गुना बढ़ा सकते हैं। केले की कतारों के बीच मौजूद खुली जगह में केवल तिल या धनिया ही नहीं, बल्कि मौसम के अनुकूल लौकी, कद्दू, शिमला मिर्च या अन्य हरी मौसमी सब्जियों की अंतरवर्तीय खेती की जा सकती है। इस सुनियोजित तालमेल से सीमित जमीन और कम निवेश के बावजूद दोहरा लाभ आसानी से सुनिश्चित किया जा सकता है।

## इसका आप पर असर
केले के बागान में खाली जमीन का सदुपयोग करने से छोटे और मध्यम किसानों की खेती की लागत शून्य होकर शुद्ध आमदनी कई गुना बढ़ सकती है।

- **भारत में:** लंबे समय में तैयार होने वाली बागवानी फसलों में इस तरह का सह-फसली मॉडल अपनाकर किसान अपनी नियमित नकदी प्रवाह की समस्या को दूर कर सकते हैं। बीच में उगाई जाने वाली मौसमी सब्जियां खाद और पानी का खर्च निकाल देती हैं, जिससे मुख्य फसल की बिक्री पूरी बचत बन जाती है।
- **बहराइच में:** स्थानीय स्तर पर सब्जी वाला केला उगाने वाले उत्पादक खाली पड़ी क्यारियों में तिल, शिमला मिर्च और धनिया की खेती करके सालाना कमाई को सुरक्षित कर सकते हैं। इससे मंडी में ₹15 प्रति किलो के भाव पर बिकने वाले केले का पूरा पैसा बिना किसी कर्ज या खर्च के काश्तकार की जेब में पहुंचेगा।
- **लागत नियंत्रण:** मुख्य फसल पर होने वाले जुताई, खाद और सिंचाई के खर्च को अंतरवर्तीय सब्जियों की बिक्री से तुरंत संतुलित किया जा सकता है। इससे किसानों को फसल तैयार होने तक बाजार से कर्ज लेने या अपनी बचत खर्च करने की जरूरत नहीं पड़ती है।
- **जमीन और समय की बचत:** खाली जमीन पर चक्रानुक्रम में फसलें लेने से मिट्टी की जैविक संरचना मजबूत होती है और खरपतवार का फैलाव भी रुकता है। हरी खाद के रूप में तिल का प्रयोग मिट्टी के स्वास्थ्य को स्वाभाविक रूप से सुधार देता है।

## ऐसा क्यों हुआ
केले के पौधे शुरुआत में काफी छोटे होते हैं और उनके कतारों के बीच की जमीन लंबे समय तक खाली पड़ी रहने से न केवल संसाधन व्यर्थ जाते हैं, बल्कि खरपतवार और सिंचाई की लागत भी बढ़ती है।

- **सीमित नकदी प्रवाह:** केले की फसल पूरी तरह तैयार होने में कई महीनों का लंबा समय लेती है, जिस दौरान किसान को निरंतर खाद और पानी पर पैसा लगाना पड़ता है। इस वित्तीय दबाव को कम करने के लिए बीच की खाली जमीन पर तुरंत बिकने वाली सब्जियां लगाना सबसे व्यावहारिक उपाय बना।
- **ढैंचे के विकल्प की तलाश:** पारंपरिक हरी खाद फसल ढैंचा गलने और मिट्टी में मिलने में बहुत लंबा समय लेती है, जिससे अगली रोपाई में देरी होती है। एक हफ्ते के भीतर शिमला मिर्च लगानी थी, इसलिए त्रिलोकी ने तेजी से घुलनशील जैविक विकल्प के तौर पर तिल का चुनाव किया।
- **बहुस्तरीय फसल योजना:** जमीन की उर्वरता बढ़ाने के साथ-साथ बाजार की मांग के अनुरूप शिमला मिर्च और धनिया जैसी नकदी फसलों का चुनाव किया गया ताकि हर मौसम में लगातार आय सुनिश्चित हो सके।

## सवाल-जवाब

### 1. त्रिलोकी किस गांव और जिले के रहने वाले हैं?
त्रिलोकी उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले में स्थित मिर्जापुर गांव के रहने वाले हैं।

### 2. त्रिलोकी के पास कितने बीघे का केले का बागान है?
उनके पास कुल 5 बीघे का सब्जी वाले केले का बागान है।

### 3. 1 बीघे से सब्जी वाले केले का कितना उत्पादन मिलता है?
1 बीघे से लगभग 30 से 35 क्विंटल सब्जी वाले केले की पैदावार निकलती है।

### 4. 5 बीघे के बागान से कुल कितना केला उत्पादित होता है?
5 बीघे के पूरे बागान से लगभग 150 क्विंटल केले की कुल पैदावार होती है।

### 5. बाजार में सब्जी वाले केले का औसत भाव क्या मिलता है?
बाजार में इस सब्जी वाले केले का औसत भाव ₹15 प्रति किलोग्राम तक मिल जाता है।

### 6. त्रिलोकी ने ढैंचे की जगह तिल की बुवाई क्यों की?
ढैंचा सड़ने में अधिक समय लेता है, जबकि उन्हें एक हफ्ते में शिमला मिर्च लगानी थी, इसलिए उन्होंने तिल चुना जो जल्दी मिट्टी में मिल जाता है।

### 7. केले के साथ उगाई जाने वाली तीन अतिरिक्त फसलें कौन सी हैं?
केले के साथ उगाई जाने वाली तीन अतिरिक्त फसलें तिल, शिमला मिर्च और हरी धनिया हैं।

### 8. सह-फसली खेती का सबसे बड़ा आर्थिक लाभ क्या है?
बीच की तीनों अतिरिक्त फसलें केले की खाद, पानी और जुताई की पूरी लागत निकाल देती हैं, जिससे केले की पूरी बिक्री शुद्ध मुनाफा बन जाती है।

## प्रेरणा और सबक
युवा किसान त्रिलोकी की यह पहल साबित करती है कि खेती में पारंपरिक ढर्रे से हटकर की गई वैज्ञानिक योजना कम जमीन पर भी बंपर मुनाफा दिला सकती है।

- **संसाधनों का अधिकतम उपयोग:** जमीन का एक भी इंच बेकार न छोड़ते हुए पौधों के बीच की खाली जगह को सक्रिय आय के स्रोत में बदलें।
- **लागत कम करने की सूझबूझ:** मुख्य फसल की लागत अन्य सहायक फसलों से निकालने की रणनीति अपनाएं ताकि मुख्य उपज शुद्ध मुनाफे में तब्दील हो सके।
- **समय और तकनीक का सही चुनाव:** केवल सुनी-सुनाई बातों पर निर्भर रहने के बजाय अपनी जरूरत के अनुसार सही फसलों जैसे ढैंचे की जगह तिल का चुनाव करें।
- **विविधता में ही सुरक्षा:** केवल एक फसल पर निर्भर रहने के जोखिम से बचने के लिए अलग-अलग समय पर तैयार होने वाली सब्जियों का फसल चक्र अपनाएं।

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