बड़े यूपीआई लेन-देन पर 0.4% शुल्क लागू रहेगा, केंद्र ने नियम वापस लेने से किया इनकार सरकार ने ₹2,000 से अधिक के यूपीआई मर्चेंट भुगतान पर 0.4% एमडीआर लगाने के फैसले को बदलने से साफ मना कर दिया है। अधिकारियों के मुताबिक इस कदम से डिजिटल भुगतान का बुनियादी ढांचा आर्थिक रूप से मजबूत होगा। देश में ₹2,000 से अधिक मूल्य वाले यूपीआई मर्चेंट भुगतानों पर 0.4 प्रतिशत मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी एमडीआर वसूलने की तैयारी पूरी तरह बरकरार रहेगी। व्यापारियों, खुदरा दुकानदारों और विपक्षी दलों की ओर से लगातार उठाई जा रही मांगों के बाद भी केंद्र सरकार ने इस नीतिगत निर्णय में किसी भी प्रकार की ढील या पुनर्विचार से स्पष्ट रूप से इनकार कर दिया है। प्रशासन का मानना है कि डिजिटल भुगतान तंत्र को दीर्घकालिक रूप से आत्मनिर्भर बनाए रखने के लिए यह वित्तीय ढांचा लागू करना अनिवार्य हो चुका है। नीतिगत बदलाव पर सरकारी रुख पूरी तरह स्पष्ट बुधवार को एक शीर्ष सरकारी अधिकारी ने ₹2,000 से अधिक के व्यापारिक लेन-देन पर प्रस्तावित एमडीआर वापस लेने के सवाल पर सख्त जवाब दिया। उन्होंने बताया कि यह कदम पूरे यूपीआई तंत्र के व्यापक आर्थिक संतुलन को ध्यान में रखकर उठाया गया है, इसलिए इसे पलटने का कोई आधार नहीं बनता। इसके अलावा, कांग्रेस सहित विभिन्न विपक्षी खेमों द्वारा लगाए गए अमेरिकी दबाव के दावों को सिरे से नकारते हुए स्पष्ट किया गया कि नई व्यवस्था यूपीआई को विदेशी निर्भरता से मुक्त, वित्तीय दृष्टि से टिकाऊ और तकनीकी रूप से कहीं अधिक सुरक्षित बनाएगी। संसदीय समिति की रिपोर्ट और सरकारी खजाने की स्थिति वित्त मामलों से जुड़ी संसद की स्थायी समिति ने अपनी 32वीं रिपोर्ट में चेतावनी दी थी कि डिजिटल भुगतान पर शून्य एमडीआर की व्यवस्था सरकारी खजाने के लिए गंभीर आर्थिक बोझ साबित हो रही है। संसदीय समिति ने उल्लेख किया था कि सभी लेन-देन पूरी तरह मुफ्त बनाए रखने के एवज में सरकार को प्रतिवर्ष लगभग ₹2,000 करोड़ की बजटीय सहायता जारी करनी पड़ रही थी। पैनल की सिफारिश थी कि भुगतान नेटवर्क को हमेशा बजटीय आवंटन पर टिकाए रखने के बजाय एक आत्मनिर्भर और व्यावहारिक राजस्व मॉडल तैयार करना जरूरी है, ताकि यूपीआई का भविष्य सुरक्षित रह सके। आम उपभोक्ताओं और छोटे कारोबारियों को राहत विगत छह वर्षों से पूरी तरह निशुल्क रहे यूपीआई लेन-देन के मॉडल में यह भले ही एक नया मोड़ है, लेकिन आम नागरिकों और सूक्ष्म व्यापारिक इकाइयों पर इसका सीधा आर्थिक भार नहीं डाला गया है। वित्त मंत्रालय के अनुसार एमडीआर शुल्क का वहन केवल संबंधित व्यापारियों को करना होगा, किसी ग्राहक से यह राशि नहीं वसूली जाएगी। साधारण उपयोगकर्ताओं के लिए कोई मासिक सीमा या लेनदेन का कोटा तय नहीं किया गया है। इसके साथ ही, एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति (पी2पी) के बीच होने वाले अंतरण और ₹2,000 तक के सामान्य कारोबारी भुगतान पूरी तरह निशुल्क बने रहेंगे। प्राप्त होने वाले एमडीआर शुल्क का मुख्य हिस्सा देश के ग्रामीण और अर्ध-शहरी अंचलों में सुरक्षा बुनियादी ढांचे और आधुनिक नेटवर्क के विस्तार पर खर्च किया जाएगा। इसका आप पर असर इस फैसले से ₹2,000 से अधिक के बड़े यूपीआई लेन-देन स्वीकार करने वाले व्यापारियों की लागत में बदलाव आएगा, जबकि आम ग्राहकों की रोजमर्रा की खरीदारी अप्रभावित रहेगी। • आम उपभोक्ताओं के लिए: व्यक्ति से व्यक्ति के बीच पैसे भेजने और ₹2,000 तक की सामान्य खरीदारी पर कोई शुल्क नहीं लगेगा। ग्राहकों पर किसी प्रकार की मासिक सीमा या लेन-देन का कोटा भी लागू नहीं किया गया है। • बड़े व्यापारियों और दुकानदारों पर: ₹2,000 से ऊपर के भुगतान स्वीकार करने पर प्रतिष्ठानों को 0.4% एमडीआर शुल्क खुद चुकाना होगा। यह लागत सीधे कारोबारी को उठानी होगी और वे इसे ग्राहक पर नहीं डाल सकते। • छोटे दुकानदारों को राहत: ₹2,000 तक के लेन-देन स्वीकार करने वाले छोटे खुदरा व्यापारियों से कोई भी कटौती नहीं की जाएगी। इससे पड़ोस के छोटे किराना स्टोर और रेहड़ी-पटरी वालों का कारोबार पूरी तरह मुफ्त बना रहेगा। • डिजिटल बुनियादी ढांचे पर असर: एकत्रित होने वाले शुल्क का उपयोग ग्रामीण तथा कस्बाई इलाकों में सर्वर सुरक्षा और नेटवर्क विस्तार में किया जाएगा। इससे भविष्य में भुगतान विफलता और तकनीकी खामियों में कमी आने की उम्मीद है। ऐसा क्यों हुआ सरकार ने यह निर्णय इसलिए लिया क्योंकि शून्य-शुल्क व्यवस्था बनाए रखने के लिए राजकोषीय सहायता पर अत्यधिक निर्भरता बढ़ गई थी और दीर्घकालिक ढांचागत सुरक्षा के लिए एक टिकाऊ राजस्व मॉडल आवश्यक था। • राजकोष पर भारी आर्थिक दबाव: शून्य एमडीआर नीति जारी रखने के लिए सरकार को हर वर्ष खजाने से लगभग ₹2,000 करोड़ की सब्सिडी देनी पड़ रही थी। यह वित्तीय भार लगातार बढ़ता जा रहा था जिससे बजट पर गंभीर दबाव बना। • संसदीय समिति की सख्त चेतावनी: वित्त मामलों की स्थायी समिति ने अपनी 32वीं रिपोर्ट में साफ कहा था कि भुगतान तंत्र को स्थायी बजटीय मदद पर नहीं छोड़ा जा सकता। समिति ने सुरक्षित भविष्य के लिए एक आत्मनिर्भर मॉडल स्थापित करने की स्पष्ट सिफारिश की थी। • सुरक्षा और तकनीकी मजबूती की आवश्यकता: बढ़ते लेन-देन के साथ नेटवर्क को साइबर खतरों से बचाने और सर्वर क्षमता बढ़ाने के लिए निरंतर पूंजी निवेश की दरकार थी। एमडीआर से जुटाया जाने वाला फंड बुनियादी ढांचे को मजबूत करने में मदद करेगा। सवाल-जवाब 1. क्या ₹2,000 से ऊपर के यूपीआई भुगतान पर आम ग्राहकों को अतिरिक्त चार्ज देना होगा? नहीं, ग्राहकों को कोई शुल्क नहीं देना होगा। यह 0.4% एमडीआर शुल्क केवल मर्चेंट यानी व्यापारी द्वारा वहन किया जाएगा। 2. क्या एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति (पी2पी) को पैसे भेजने पर कोई कटौती होगी? नहीं, आम लोगों के बीच होने वाले व्यक्तिगत पी2पी लेन-देन पर यह नियम लागू नहीं होता और वे पूरी तरह निशुल्क रहेंगे। 3. संसदीय समिति ने शून्य एमडीआर व्यवस्था पर क्या चिंता जताई थी? संसदीय समिति ने बताया था कि व्यवस्था पूरी तरह मुफ्त रखने के कारण सरकारी खजाने पर सालाना लगभग ₹2,000 करोड़ का भारी दबाव पड़ रहा था। 4. इकट्ठे किए गए एमडीआर शुल्क का इस्तेमाल कहां किया जाएगा? इस शुल्क का अधिकांश हिस्सा ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में डिजिटल बुनियादी ढांचे और सुरक्षा तंत्र को उन्नत करने में लगाया जाएगा। https://trendkia.com/business/bare-upi-lena-dena-para-0-4-shulka-lagu-rahega-kendra-ne-niyama-vapasa-lene-se-kiya-inakara-36630 TrendKia — Har trend, sabse pehle.