बढ़ती लागत और भारी टैक्स से रुका किफायती घरों का निर्माण, क्रेडाई ने 45 लाख रुपये की सीमा हटाने की उठाई मांग रियल एस्टेट संस्था क्रेडाई के अनुसार महंगाई, महंगी जमीन और 30 से 50 फीसदी टैक्स के चलते डेवलपर्स के लिए सस्ते मकान तैयार करना मुश्किल हो गया है। देश भर में मकान निर्माण की बढ़ती लागत, जमीन के ऊंचे भाव और भारी करों के चलते आम खरीदारों के लिए सस्ते घर तैयार करना रियल एस्टेट कंपनियों के लिए एक कठिन चुनौती बन चुका है। रियल एस्टेट डेवलपर्स के शीर्ष निकाय कंफेडरेशन ऑफ रियल एस्टेट डेवलपर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया यानी क्रेडाई के अध्यक्ष शेखर पटेल ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि मौजूदा आर्थिक परिस्थितियों में किफायती आवास की पुरानी परिभाषा के तहत प्रोजेक्ट्स चलाना अब व्यावहारिक नहीं रहा। वर्तमान नियमों में 45 लाख रुपये तक की कीमत वाले मकानों को किफायती श्रेणी में रखा जाता है, लेकिन मौजूदा महंगाई को देखते हुए यह आर्थिक दायरा बहुत छोटा पड़ रहा है। सस्ते घरों के रास्ते में जमीन, सामग्री और करों की अड़चन घरेलू बाजार में सामग्रियों के लगातार बढ़ते भाव और वैश्विक स्तर की आर्थिक अनिश्चितताओं ने निर्माण उद्योग के बजट को पूरी तरह बिगाड़ दिया है। डेवलपरों के सामने सबसे बड़ा संकट जमीन की लगातार बढ़ती कीमतें, सीमेंट व सरिये जैसी बुनियादी निर्माण सामग्रियों की महंगाई और बिक्री मूल्य पर लगने वाले कई तरह के टैक्स हैं। इस समय डेवलपर्स केंद्र सरकार, राज्य सरकारों और संबंधित नगर निगमों को मिलाकर बिक्री मूल्य का 30 फीसदी से 50 फीसदी तक हिस्सा केवल करों के रूप में चुका रहे हैं। इतनी बड़ी कर देनदारी और बढ़ते खर्चों के कारण कंपनियां 45 लाख रुपये की सीमा में गुणवत्तापूर्ण घर तैयार करने में असमर्थ हैं। किफायती आवास की परिभाषा में बदलाव की रूपरेखा क्रेडाई ने सरकार के समक्ष मांग रखी है कि किफायती आवास के वर्गीकरण से 45 लाख रुपये की मूल्य सीमा को पूरी तरह समाप्त कर दिया जाए। इसके स्थान पर केवल क्षेत्रफल आधारित मानक तय किए जाने चाहिए। संगठन का प्रस्ताव है कि मेट्रो शहरों में 60 वर्गमीटर तक के कारपेट एरिया और गैर-मेट्रो शहरों में 90 वर्गमीटर तक के मकानों को बिना किसी मूल्य सीमा के किफायती घर का दर्जा दिया जाए। पटेल ने इस बात पर गहरी चिंता जताई कि कुल आवासीय संपत्तियों की बिक्री में किफायती घरों की हिस्सेदारी घटकर अब केवल 14 फीसदी रह गई है। इस गिरावट को थामने के लिए उन्होंने सरकार से किफायती आवासीय परियोजनाओं पर टैक्स की दरों को कम करने की सिफारिश भी की है। नीतिगत सुधार, ब्याज दरें और तकनीकी बदलाव क्रेडाई इस संकट से उबरने और सप्लाई बढ़ाने के लिए लगातार केंद्र सरकार के साथ बातचीत कर रहा है। आने वाले 6 महीनों के भीतर किफायती आवास की आपूर्ति और मांग को रफ्तार देने के लिए कुछ महत्वपूर्ण नीतिगत कदम उठाए जाने की संभावना जताई गई है। इसके अलावा, वित्त व्यवस्था पर बात करते हुए शेखर पटेल ने स्पष्ट किया कि यदि भारतीय रिजर्व बैंक यानी आरबीआई अपनी अगली मौद्रिक नीति समिति की बैठक में रेपो रेट बढ़ाता है, तो उसका सीधा असर रियल एस्टेट सेक्टर की गति पर पड़ सकता है। वहीं कार्यप्रणाली में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई के उपयोग को लेकर उन्होंने साफ किया कि इससे नौकरियां जाने का कोई खतरा नहीं है, बल्कि यह तकनीक परिचालन क्षमता को बेहतर बना रही है और आगामी त्योहारी सीजन में आवास की मांग में और इजाफा होने की पूरी उम्मीद है। इसका आप पर असर किफायती आवास की परिभाषा में बदलाव और बढ़ती लागत का सीधा असर घर खरीदने की योजना बना रहे मध्यम वर्ग और डेवलपर्स के बजट पर पड़ेगा। • घर खरीदारों के लिए: 45 लाख रुपये की सीमा में मिलने वाले सस्ते मकानों का विकल्प तेजी से घट रहा है। खरीदारों को अब बड़े शहरों में निजी डेवलपर्स के प्रोजेक्ट्स में कम कीमत वाले घर तलाशने के लिए लंबा इंतजार करना पड़ सकता है या बजट बढ़ाना पड़ेगा। • टैक्स और अंतिम कीमत: मकानों के बिक्री मूल्य का 30 से 50 फीसदी हिस्सा विभिन्न टैक्स में जाने से लागत लगातार बढ़ रही है। यदि सरकार टैक्स दरों में कटौती नहीं करती है, तो घरों की कीमतें आम वेतनभोगी वर्ग की पहुंच से बाहर बनी रहेंगी। • लोन और ईएमआई का गणित: यदि भारतीय रिजर्व बैंक ने आगामी बैठक में रेपो रेट बढ़ाया, तो होम लोन पर ब्याज दरें बढ़ सकती हैं। इससे मकान खरीदने वालों पर मासिक ईएमआई का बोझ और अधिक बढ़ जाएगा। • आकार के नियम: यदि सरकार 60 और 90 वर्गमीटर के नए मानकों को स्वीकार करती है, तो खरीदारों को कीमत की पाबंदी के बिना बेहतर स्थान पर छोटे फ्लैटों पर सरकारी रियायतें मिल सकती हैं। इससे शहरों में किफायती परियोजनाओं की नई शुरुआत संभव होगी। ऐसा क्यों हुआ निर्माण लागत में बढ़ोतरी, अत्यधिक कर संरचना और जमीन की आसमान छूती कीमतों के चलते डेवलपर्स के लिए 45 लाख रुपये के दायरे में घर बना पाना अव्यावहारिक हो गया है। • निर्माण सामग्रियों की महंगाई: पिछले कुछ समय में सीमेंट, सरिया और अन्य आवश्यक निर्माण सामग्रियों के दामों में तेज उछाल आया है। इसके साथ ही वैश्विक बाजार की अनिश्चितताओं ने प्रोजेक्ट्स के कुल खर्च को अप्रत्याशित रूप से बढ़ा दिया है। • तिहरे करों का भारी दबाव: डेवलपर्स को केंद्र, राज्य और नगर निगम स्तर पर संयुक्त रूप से बिक्री मूल्य का 30 फीसदी से 50 फीसदी तक टैक्स चुकाना पड़ता है। करों का यह भारी अनुपात कंपनियों के पास लागत घटाने की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ता। • अप्रासंगिक हो चुकी कीमत सीमा: किफायती आवास के लिए तय 45 लाख रुपये की अधिकतम सीमा मुद्रास्फीति और जमीन के मौजूदा भावों से मेल नहीं खाती। इस विसंगति के कारण कुल आवासीय बिक्री में सस्ते मकानों की हिस्सेदारी गिरकर मात्र 14 प्रतिशत पर आ चुकी है। सवाल-जवाब 1. क्रेडाई के अनुसार वर्तमान में किफायती मकान की कीमत सीमा क्या है? वर्तमान नियमों के तहत 45 लाख रुपये तक की कीमत वाले मकानों को किफायती आवास की श्रेणी में रखा गया है। 2. क्रेडाई ने सरकार से किफायती मकानों के लिए क्या नया नियम लागू करने की मांग की है? क्रेडाई ने 45 लाख रुपये की मूल्य सीमा हटाने और मेट्रो शहरों में 60 वर्गमीटर तथा गैर-मेट्रो शहरों में 90 वर्गमीटर क्षेत्रफल को ही एकमात्र पैमाना बनाने की मांग की है। 3. डेवलपर्स को कुल बिक्री मूल्य पर कितना टैक्स चुकाना पड़ता है? डेवलपर्स केंद्र, राज्य और नगर निगमों को मिलाकर बिक्री मूल्य का 30 फीसदी से 50 फीसदी तक टैक्स के रूप में भुगतान करते हैं। 4. कुल आवासीय बिक्री में किफायती घरों की हिस्सेदारी घटकर कितनी रह गई है? बढ़ती लागत और टैक्स के दबाव के चलते कुल आवासीय बिक्री में सस्ते मकानों की हिस्सेदारी घटकर केवल 14 फीसदी रह गई है। 5. क्या रियल एस्टेट सेक्टर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से नौकरियां जाने का खतरा है? क्रेडाई के अध्यक्ष शेखर पटेल के अनुसार एआई से नौकरियां नहीं जाएंगी, बल्कि यह तकनीक उद्योग की परिचालन क्षमता को बेहतर बनाती है। https://trendkia.com/business/barhati-lagata-aura-bhari-taiksa-se-ruka-kiphayati-gharon-ka-nirmana-credai-ne-45-lakha-rupaye-ki-sima-hatane-ki-uthai-manga-41977 TrendKia — Har trend, sabse pehle.