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  "title": "बर्लिन में जलवायु वित्त पर बरसे पीयूष गोयल, अमीर देशों को याद दिलाया 100 अरब डॉलर का अधूरा वादा",
  "summary": "केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने बर्लिन में अमीर देशों के दोहरे रवैये पर सवाल उठाते हुए कहा कि 11 साल बीतने के बावजूद विकासशील देशों को तय जलवायु मदद नहीं मिली है।",
  "content": "जर्मनी की राजधानी बर्लिन में आयोजित बर्लिन ग्लोबल डायलॉग के दौरान केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने जलवायु संकट को लेकर संपन्न पश्चिमी मुल्कों की नीयत पर तीखे सवाल खड़े किए। उन्होंने वैश्विक मंच पर स्पष्ट किया कि विकासशील देशों को स्वच्छ ऊर्जा अपनाने और पर्यावरणीय बदलावों से मुकाबला करने के लिए जिस आर्थिक सहयोग का भरोसा दिया गया था, वह आज तक हकीकत में नहीं बदल सका है। औद्योगिक प्रगति की आड़ में लंबे समय तक पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले विकसित देश अब अपनी अनिवार्य जिम्मेदारियां निभाने के वक्त कदम पीछे खींच रहे हैं।\n\nपेरिस समझौते के संकल्प और जमीनी हकीकत\nबर्लिन में आयोजित एक गोलमेज बैठक में विचार रखते हुए केंद्रीय मंत्री ने याद दिलाया कि वर्ष 2015 के ऐतिहासिक पेरिस जलवायु सम्मेलन में धनी देशों ने विकासशील और अल्पविकसित देशों को वित्तीय संबल प्रदान करने की औपचारिक सहमति दी थी। उस दौरान तय योजना के मुताबिक प्रति वर्ष 100 अरब डॉलर की जलवायु सहायता राशि का कोष तैयार किया जाना था। इस प्रतिबद्धता को सामने आए 11 वर्ष का लंबा समय बीत चुका है, लेकिन जमीनी स्तर पर जरूरतमंद मुल्कों को इसका कोई वास्तविक लाभ नहीं मिला। यह संपूर्ण प्रक्रिया केवल कागजी दस्तावेजों और औपचारिक वार्ताओं तक ही सिमट कर रह गई है। इस दौरान उन्होंने सोशल मीडिया मंच एक्स पर भी इस चर्चा से जुड़े पहलुओं को रेखांकित किया।\n\n \n\nउत्सर्जन असमानता और कार्बन बॉर्डर टैक्स पर आपत्ति\nयूरोपीय संघ की व्यापार नीतियों और उसके कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म यानी सीबीएएम की व्यवस्था पर भी गंभीर चिंता जताई गई। आबादी और कार्बन उत्सर्जन के अनुपातिक अंतर का ब्योरा देते हुए यह तथ्य रेखांकित किया गया कि भारत में पूरी दुनिया की लगभग 17 प्रतिशत आबादी बसती है, इसके बावजूद वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में देश की कुल हिस्सेदारी 3 प्रतिशत से भी नीचे बनी हुई है। इसके विपरीत, यूरोपीय क्षेत्रों में प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन का स्तर भारतीय औसत से कई गुना अधिक है। समृद्ध देशों ने कई दशकों तक अनियंत्रित औद्योगिक गतिविधियों के सहारे अपनी अर्थव्यवस्थाओं को मजबूत किया, मगर अब वे विकास की राह पर अग्रसर देशों को आवश्यक पूंजी और आधुनिक तकनीक उपलब्ध कराने से बच रहे हैं।\n\nघरेलू अनिवार्यताएं और हरित ऊर्जा का संकल्प\nवैश्विक मंच पर यह रेखांकित किया गया कि भारत के समक्ष 140 करोड़ से अधिक नागरिकों के लिए दैनिक ऊर्जा उपलब्धता, खाद्यान्न सुरक्षा और संप्रभुता की रक्षा जैसी भारी जिम्मेदारियां मौजूद हैं। इतनी व्यापक चुनौतियों के बीच भी देश नवीकरणीय और पर्यावरण अनुकूल ऊर्जा स्रोतों के विस्तार में उल्लेखनीय गति से आगे बढ़ रहा है। विकासशील अर्थव्यवस्थाओं को प्रदूषण कम करने और वैकल्पिक ऊर्जा प्रणालियों को अपनाने हेतु अंतरराष्ट्रीय समुदाय से ठोस आर्थिक और रणनीतिक साझेदारी मिलना बेहद जरूरी है।\n\nऔद्योगिक निवेश और बुनियादी ढांचे पर बैठक\nअपने बर्लिन प्रवास के दौरान पीयूष गोयल ने वैश्विक औद्योगिक कंपनी नॉफ ग्रुप के ग्लोबल जनरल पार्टनर मुरात अकयिल्दिज के साथ भी अहम बैठक की। इस वार्ता में भारत के भीतर कंपनी के विनिर्माण कार्यों का दायरा बढ़ाने, पर्यावरण अनुकूल निर्माण सामग्री के उत्पादन और आधुनिक बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में दीर्घकालिक सहयोग स्थापित करने की संभावनाओं पर विस्तृत विमर्श किया गया।\n\nइसका आप पर असर\nजलवायु वित्त और कार्बन टैक्स पर अंतरराष्ट्रीय तकरार का सीधा असर भारतीय उद्योगों और निर्यातकों पर पड़ता है।\n\n• भारतीय निर्यातकों पर असर: यूरोपीय संघ के सीबीएएम जैसे कार्बन टैक्स नियमों से इस्पात और सीमेंट जैसे उत्पादों के निर्यात पर अतिरिक्त लागत का जोखिम बना रहता है। भारतीय विनिर्माण इकाइयों को वैश्विक बाजारों में बने रहने के लिए जल्द से जल्द कम उत्सर्जन वाली तकनीक अपनानी होगी।\n• घरेलू ऊर्जा बिल: अंतरराष्ट्रीय फंड न मिलने के बावजूद भारत अपने दम पर नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता का विस्तार कर रहा है। आने वाले वर्षों में ग्रिड में सौर और पवन ऊर्जा का हिस्सा बढ़ने से घरेलू बिजली आपूर्ति अधिक सुरक्षित और टिकाऊ बनेगी।\n• औद्योगिक निवेश और रोजगार: नॉफ ग्रुप जैसी कंपनियों द्वारा टिकाऊ निर्माण सामग्री के क्षेत्र में विस्तार से निर्माण उद्योग में नए अवसर पैदा होंगे। आधुनिक इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं में स्थानीय रोजगार और तकनीक हस्तांतरण को मजबूती मिलेगी।\n• वैश्विक व्यापार समझौते: जलवायु नियमों पर भारत के कड़े रुख से द्विपक्षीय मुक्त व्यापार वार्ताओं में देश के हितों की सुरक्षा तय होगी। इससे स्थानीय लघु और मध्यम उद्योगों पर अनुचित कार्बन शुल्कों का भार टल सकता है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nयह कूटनीतिक गतिरोध विकसित देशों द्वारा जलवायु वित्तपोषण के पुराने वादों को पूरा न करने और एकतरफा पर्यावरणीय व्यापार नियम लागू करने के कारण पैदा हुआ है।\n\n• पेरिस समझौते की अधूरी निधि: वर्ष 2015 में विकसित देशों ने विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के लिए प्रति वर्ष 100 अरब डॉलर का फंड देने की सहमति दी थी। 11 साल का समय बीत जाने के बावजूद यह राशि औपचारिक संवितरण के बजाय ज्यादातर कागजी प्रस्तावों तक सीमित रही है।\n• कार्बन बॉर्डर टैक्स की एकतरफा नीति: यूरोपीय संघ द्वारा सीबीएएम व्यवस्था लागू करने से विकासशील देशों के निर्यातक चिंतित हैं। भारत का तर्क है कि अमीर देश खुद ऐतिहासिक रूप से भारी प्रदूषण फैलाने के बाद अब अन्य देशों पर अनुचित टैक्स का बोझ डाल रहे हैं।\n• प्रति व्यक्ति उत्सर्जन में भारी खाई: भारत दुनिया की 17 प्रतिशत आबादी का घर होने के बाद भी 3 प्रतिशत से कम उत्सर्जन करता है। इसके विपरीत विकसित देशों का प्रति व्यक्ति कार्बन फुटप्रिंट अत्यंत ऊंचा होने के बावजूद वे आवश्यक हरित तकनीक साझा करने में देरी कर रहे हैं।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. पीयूष गोयल ने बर्लिन में किस मुख्य मुद्दे पर बात की?\nउन्होंने बर्लिन ग्लोबल डायलॉग में विकसित देशों द्वारा 100 अरब डॉलर की वार्षिक जलवायु सहायता का वादा पूरा न करने और कार्बन बॉर्डर टैक्स के मुद्दे को प्रमुखता से उठाया।\n\n2. जलवायु परिवर्तन कोष को लेकर क्या वादा किया गया था?\nवर्ष 2015 के पेरिस जलवायु सम्मेलन के दौरान अमीर देशों ने विकासशील देशों की मदद के लिए हर साल 100 अरब डॉलर जुटाने की प्रतिबद्धता जताई थी।\n\n3. वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में भारत की हिस्सेदारी कितनी है?\nभारत में दुनिया की लगभग 17 प्रतिशत आबादी निवास करती है, लेकिन वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में देश का योगदान 3 प्रतिशत से भी कम है।\n\n4. बर्लिन यात्रा के दौरान पीयूष गोयल ने किस औद्योगिक समूह से मुलाकात की?\nउन्होंने नॉफ ग्रुप के ग्लोबल जनरल पार्टनर मुरात अकयिल्दिज से मुलाकात कर भारत में विनिर्माण और टिकाऊ निर्माण सामग्री पर चर्चा की।",
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  "category": "व्यापार",
  "publishedAt": "2026-10-24",
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