बेबी कॉर्न की खेती से चमकी भागलपुर के पवन उपाध्याय की किस्मत, कतरनी के साथ हो रही बंपर कमाई भागलपुर के किसान पवन उपाध्याय ने पारंपरिक खेती से हटकर बेबी कॉर्न की खेती शुरू की है जिससे उन्हें दोहरा मुनाफा मिल रहा है। कतरनी धान के लिए मशहूर इस क्षेत्र में मात्र तीन महीने में तैयार होने वाली इस फसल से किसानों की आय तेजी से बढ़ रही है। बिहार के कृषि क्षेत्र में अब धीरे-धीरे एक नया बदलाव देखने को मिल रहा है जहाँ किसान पारंपरिक फसलों से आगे बढ़कर नकदी फसलों की तरफ अपना रुख कर रहे हैं। भागलपुर जिला जो मुख्य रूप से अपने पारंपरिक कतरनी धान और जर्दालु आम के लिए पूरे देश में अपनी एक खास पहचान रखता है, अब एक नई फसल यानी बेबी कॉर्न के उत्पादन का प्रमुख केंद्र बनता जा रहा है। कृषि क्षेत्र से जुड़े जानकारों का मानना है कि इस फसल की बाजार में भारी मांग बनी रहती है और इसमें लागत काफी कम आती है, जिसके चलते किसानों को अपनी पूंजी पर बेहतर रिटर्न मिलने की पूरी संभावना रहती है। इस पूरे बदलाव को आगे बढ़ाने में राज्य के कृषि विभाग की तरफ से भी किसानों को लगातार प्रोत्साहन और तकनीकी सहायता प्रदान की जा रही है, जिससे खेती का यह नया ट्रेंड तेजी से अपनी जड़ें जमा रहा है। पीरपैंती इलाके में शुरू हुई नई शुरुआत इस आधुनिक खेती की शुरुआत भागलपुर के पीरपैंती अंचल में देखने को मिली है जहाँ के स्थानीय निवासी पवन उपाध्याय ने बड़े पैमाने पर बेबी कॉर्न की खेती की कमान संभाली है। इस बारे में जानकारी देते हुए उन्होंने बताया कि उनके इस पूरे क्षेत्र में पहले से ही गन्ने की खेती बड़े पैमाने पर की जाती थी, लेकिन कृषि विभाग की आत्मा योजना से मिलने वाली प्रेरणा के बाद उन्होंने लीक से हटकर कुछ अलग करने का फैसला किया। उनके सफल प्रयोग को देखकर अब इलाके के दूसरे किसान भी इस मुनाफे वाली खेती से जुड़ने लगे हैं। पिछले साल इस इलाके में करीब पाँच एकड़ जमीन पर इसकी खेती की गई थी और इसकी बढ़ती मांग को देखते हुए अब इसका दायरा लगातार फैलता जा रहा है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को एक नया संबल मिल रहा है। कम समय में दोगुना मुनाफा कमाने का मौका बेबी कॉर्न की खेती की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह फसल बहुत ही कम समय यानी महज तीन महीने के भीतर पककर पूरी तरह तैयार हो जाती है। किसान इसमें एक साल के भीतर दो बार फसल चक्र अपना सकते हैं, जिससे एक फसल की कटाई के तुरंत बाद दूसरी फसल तैयार हो जाती है और किसानों को एक ही खेत से दोहरा मुनाफा कमाने का बेहतरीन अवसर मिल जाता है। मौजूदा समय में किसान भाई इसके साथ मटर जैसी अन्य फसलों की खेती भी आसानी से कर सकते हैं। कम अवधि में तैयार होने के कारण किसानों को अपनी आय के लिए लंबा इंतजार नहीं करना पड़ता है और वे सालभर लगातार कमाई के रास्ते पर बने रहते हैं। फसल का एक-एक हिस्सा साबित होता है उपयोगी किसानों के लिए यह फसल इसलिए भी बेहद फायदेमंद साबित हो रही है क्योंकि इसका एक भी हिस्सा बेकार या बर्बाद नहीं जाता है और हर एक हिस्से की बाजार में अच्छी कीमत मिल जाती है। आकार में छोटे और प्रीमियम क्वालिटी के होने के कारण ये सीधे बड़े-बड़े होटलों और रेस्तरां में ऊंचे दामों पर बेचे जाते हैं, जबकि पौधे का बचा हुआ हिस्सा पशुओं के लिए बेहतरीन हरा चारा बन जाता है। इसके अलावा पौधे के सूखे अवशेषों का इस्तेमाल ग्रामीण इलाकों में जलावन के रूप में भी आसानी से कर लिया जाता है। कृषि विभाग अब एक ऐसी ठोस योजना पर काम कर रहा है जिसके तहत बाहर से मंगाए जाने के बजाय स्थानीय स्तर पर ही भागलपुर के होटलों में यहीं के खेतों में उपजे ताजे बेबी कॉर्न की खपत सुनिश्चित की जा सके, जिससे उपभोक्ताओं को भी बिल्कुल ताजा उत्पाद खाने को मिल सके। इसका आप पर असर बेबी कॉर्न की खेती अपनाने से किसानों को कम लागत में दोहरा मुनाफा कमाने का सीधा अवसर मिलता है। • बिहार में: पारंपरिक धान और आम के साथ नकदी फसलों का यह नया विकल्प किसानों की आय बढ़ाने में मदद करता है। कृषि विभाग की योजनाओं से जुड़कर किसान अपनी आमदनी को कई गुना तक बढ़ा सकते हैं। • भागलपुर में: पीरपैंती और आसपास के इलाकों के किसानों के लिए कम समय में तैयार होने वाली यह फसल आय का एक नया और स्थिर साधन बन रही है। स्थानीय स्तर पर होटलों में खपत बढ़ने से किसानों को अपनी उपज का उचित मूल्य मिलेगा। ऐसा क्यों हुआ पारंपरिक खेती से हटकर नकदी फसलों की ओर यह झुकाव किसानों की आमदनी बढ़ाने और बाजार की बदलती मांग को पूरा करने के लिए हो रहा है। • सरकारी प्रोत्साहन: कृषि विभाग की आत्मा योजना ने किसानों को गन्ने और पारंपरिक फसलों से आगे बढ़कर कम लागत में अधिक मुनाफा देने वाली फसलों को अपनाने के लिए प्रेरित किया। • बाजार की मांग: बड़े होटलों और रेस्तरां में बेबी कॉर्न की निरंतर मांग बनी रहती है, जिससे किसानों को उनके उत्पाद के अच्छे दाम आसानी से मिल जाते हैं। • शून्य बर्बादी: फसल का कोई भी हिस्सा बेकार नहीं जाता क्योंकि खाने योग्य भाग बिकने के अलावा पौधे का बाकी हिस्सा चारे और जलावन के रूप में काम आ जाता है। सवाल-जवाब 1. भागलपुर में बेबी कॉर्न की खेती की शुरुआत कहाँ हुई है? भागलपुर के पीरपैंती इलाके में इस खेती की शुरुआत किसान पवन उपाध्याय द्वारा की गई है। 2. बेबी कॉर्न की फसल तैयार होने में कितना समय लगता है? यह फसल मात्र तीन महीने के भीतर पककर पूरी तरह तैयार हो जाती है। 3. एक साल में इस खेत से कितनी फसलें ली जा सकती हैं? किसान इसमें दो क्रॉप या फसलें लगातार लगा सकते हैं जिससे एक कटने के बाद दूसरी तैयार हो जाती है। 4. फसल के अवशेषों का क्या उपयोग किया जाता है? पौधे के अवशेषों को पशुओं के लिए हरा चारा और जलावन के रूप में उपयोग किया जाता है। प्रेरणा और सबक पवन उपाध्याय की यह कृषि सफलता अन्य किसानों को लीक से हटकर नए रास्ते चुनने की प्रेरणा देती है। • विविधीकरण अपनाएं: पारंपरिक फसलों के साथ-साथ कम अवधि वाली नकदी फसलों को जोड़कर अपनी आमदनी को दोगुना किया जा सकता है। • संसाधनों का पूरा उपयोग: फसल के हर हिस्से का सदुपयोग करके खेती की लागत को प्रभावी ढंग से कम किया जा सकता है। • विभाग से जुड़ें: स्थानीय कृषि योजनाओं और सरकारी सहायता का लाभ उठाकर खेती में आधुनिक तकनीक को समय पर अपनाया जा सकता है। https://trendkia.com/business/bhagalpur-farmer-pawan-upadhyaya-boosts-income-with-baby-corn-cultivation-alongside-traditional-crops-39535 TrendKia — Har trend, sabse pehle.