# भारत में सैटेलाइट ब्रॉडबैंड शुरू करने को तैयार स्टारलिंक, रिलायंस जियो और भारती एयरटेल की भी नजरें टिकीं

> स्पेसएक्स की सैटेलाइट इकाई स्टारलिंक ने पांच साल के विनियामक प्रयासों के बाद भारत में उच्च गति इंटरनेट सेवा देने की तैयारी पूरी कर ली है। इस बीच रिलायंस और भारती एयरटेल भी स्पेक्ट्रम आवंटन और सुरक्षा मंजूरी की प्रक्रिया पर नजर रखे हुए हैं।

**Type:** article · **Category:** व्यापार · **Published:** 2026-10-16 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/business/bharata-men-saitelaita-brodabainda-shuru-karane-ko-taiyara-starlink-reliance-jio-aura-bharti-airtel-ki-bhi-najaren-tikin-48357 · **Language:** Hindi
**Tags:** स्टारलिंक, रिलायंस जियो, स्पेसएक्स, एलन मस्क, सैटेलाइट इंटरनेट, दूरसंचार विभाग, जियो प्लेटफॉर्म्स आईपीओ, सुनील मित्तल

अंतरिक्ष तकनीक कंपनी स्पेसएक्स की सैटेलाइट इंटरनेट शाखा स्टारलिंक ने स्पष्ट किया है कि वह भारतीय बाजार में वाणिज्यिक उच्च गति ब्रॉडबैंड सेवाएं शुरू करने के लिए पूरी तरह तैयार है। कंपनी के अनुसार उसने पिछले पांच वर्षों से अधिक समय तक भारतीय नियामकों, दूरसंचार उद्योग और विभिन्न स्थानीय ऑपरेटरों के साथ बेहद बारीकी से काम किया है। इस दौरान भारत सरकार की मंजूरियों के साथ देश के भीतर ही समर्पित गेटवे, नेटवर्क सिस्टम और आवश्यक जमीनी बुनियादी ढांचा तैयार किया गया है, ताकि भारतीय डेटा और ट्रैफिक को पूरी तरह सुरक्षित और स्थानीय नियमों के अनुरूप प्रबंधित किया जा सके। यह घोषणा ऐसे समय में सामने आई है जब भारत के सैटेलाइट संचार क्षेत्र को लेकर वैश्विक और घरेलू कंपनियों के बीच विनियामक शर्तों, स्पेक्ट्रम आवंटन और बाजार प्रतिस्पर्धा पर तीखी बहस चल रही है।

## कानूनी अनुपालन और बाजार प्रतिस्पर्धा पर रिलायंस का रुख
स्टारलिंक के बयान से ठीक पहले रिलायंस इंडस्ट्रीज ने सैटेलाइट ब्रॉडबैंड बाजार में निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा और कानूनों के पालन को लेकर अपनी स्थिति स्पष्ट की थी। रिलायंस ने एक आधिकारिक बयान जारी कर कहा कि वह हमेशा से खुली और स्वस्थ प्रतिस्पर्धा का स्वागत करती रही है, क्योंकि प्रतिस्पर्धा ही यह साबित करती है कि कौन सी कंपनी उपभोक्ताओं को सबसे बेहतरीन सेवा दे सकती है। कंपनी ने जोर देकर कहा कि चाहे कोई विदेशी ऑपरेटर हो या फिर घरेलू मंच, हर भागीदार को देश के कानूनों, नीतियों और सुरक्षा मानकों का पूरी तरह सम्मान करना अनिवार्य है। रिलायंस ने यह भी रेखांकित किया कि भारत एक ऐसा खुला बाजार है जो नवाचार और निवेश का खुले दिल से स्वागत करता है, लेकिन यह खुलापन कानून के शासन और समान विनियामक नियमों पर टिका हुआ है।

अपनी बात को पुख्ता करने के लिए रिलायंस ने 2016 में दूरसंचार बाजार में जियो के प्रवेश का ऐतिहासिक उदाहरण दिया। कंपनी ने बताया कि जब जियो ने टेलीकॉम क्षेत्र में कदम रखा था, तब बाजार पहले से कई स्थापित कंपनियों से भरा हुआ था और जियो के पास शुरुआत में एक भी उपभोक्ता नहीं था। इसके बावजूद कंपनी ने मात्र एक दशक के भीतर 53 करोड़ से अधिक उपभोक्ताओं का भरोसा हासिल किया। रिलायंस के अनुसार उसने दुनिया के सबसे किफायती डेटा प्लान और उच्च स्तरीय डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण करके यह मुकाम पाया है। इसलिए सैटेलाइट संचार में स्टारलिंक सहित किसी भी अन्य वैश्विक कंपनी के आने से उसे कोई परहेज नहीं है, बशर्ते सभी खिलाड़ी एक ही कानूनी दायरे में रहकर काम करें।

## विदेशी टिप्पणियां और उद्योग जगत के बीच छिड़ी जुबानी जंग
यह पूरा विनियामक विमर्श उस समय अधिक गरमा गया जब स्पेसएक्स और स्टारलिंक के प्रमुख एलन मस्क ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर भारतीय दूरसंचार परिदृश्य को लेकर तीखी टिप्पणियां कीं। मस्क ने भारत में सैटेलाइट सेवाओं की मंजूरी मिलने में हो रही देरी पर सवाल खड़े किए और आरोप लगाया कि कुछ मजबूत व्यापारिक घराने भारतीय बाजार में एकाधिकार बनाए रखने का प्रयास कर रहे हैं। मस्क ने सोशल मीडिया पोस्ट में रिलायंस इंडस्ट्रीज के चेयरमैन मुकेश अंबानी पर भी कटाक्ष किया और उन्हें व्यंग्यात्मक लहजे में संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मुकाबले व्यावसायिक प्रभाव को लेकर प्रश्न खड़े किए।

इन टिप्पणियों के जवाब में रिलायंस ने स्पष्ट किया कि भारत सरकार की प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी और सभी कंपनियों के लिए एक समान है। रिलायंस ने इस बात को भी उजागर किया कि स्वयं जियो की अपनी सैटेलाइट ब्रॉडबैंड सेवा अभी तक वाणिज्यिक शुरुआत के लिए आवश्यक अंतिम मंजूरियों की प्रतीक्षा कर रही है। ऐसे में किसी विशेष कंपनी को लाभ पहुंचाने या प्रक्रिया में पक्षपात करने के आरोप पूरी तरह बेबुनियाद हैं। संचार मंत्रालय ने भी इस संबंध में साफ किया है कि नियमों में किसी तरह का भेदभाव नहीं है और ऐसे तमाम आरोप निराधार और गलत समझ पर आधारित हैं। सरकार ने दोहराया कि जब तक सभी निर्धारित राष्ट्रीय सुरक्षा और स्पेक्ट्रम आवंटन की शर्तें पूरी नहीं होतीं, किसी को भी व्यावसायिक संचालन की छूट नहीं मिलेगी।

## लाइसेंस और वाणिज्यिक परिचालन के बीच विनियामक प्रक्रिया
केंद्रीय संचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने इस क्षेत्र की वर्तमान स्थिति का ब्योरा देते हुए बताया कि अब तक तीन प्रमुख उपक्रमों को भारत में सैटेलाइट संचार सेवा के लिए लाइसेंस प्रदान किए गए हैं। इन तीन कंपनियों में स्टारलिंक, जियो सैटकॉम और भारती समर्थित यूटेलसैट वनवेब शामिल हैं। इसके अलावा अमेज़न के प्रोजेक्ट कुइपर ने भी भारतीय बाजार में रुचि दिखाई है, लेकिन उसे भी निर्धारित प्रशासनिक और विनियामक प्रक्रियाओं का अक्षरशः पालन करना होगा। मंत्री ने यह स्पष्ट किया कि केवल लाइसेंस मिल जाने से कोई भी ऑपरेटर अपनी सेवाएं तुरंत शुरू नहीं कर सकता, क्योंकि लाइसेंस और वास्तविक व्यावसायिक परिचालन के बीच कई महत्वपूर्ण कानूनी चरण बाकी रहते हैं।

दूरसंचार नियामक प्राधिकरण यानी TRAI और दूरसंचार विभाग यानी DoT इस समय सैटेलाइट स्पेक्ट्रम की राजस्व आधारित शुल्क व्यवस्था और मूल्य निर्धारण को अंतिम रूप देने के करीब पहुंच चुके हैं। केंद्रीय मंत्री के अनुसार स्पेक्ट्रम का वास्तविक आवंटन तभी संभव होगा जब मूल्य निर्धारण नीति तय हो जाएगी और ऑपरेटर सुरक्षा से जुड़े सभी अनिवार्य तकनीकी परीक्षण पास कर लेंगे। सरकार का यह दृढ़ मत रहा है कि देश की सुरक्षा और संप्रभुता से जुड़े मामलों में किसी भी प्रकार का समझौता नहीं किया जा सकता, इसलिए डेटा सुरक्षा और स्थानीय निगरानी के नियमों को पूरा करना प्रत्येक ऑपरेटर के लिए अनिवार्य शर्त है।

## सुनील मित्तल ने रखी मंजूरी प्रक्रिया की जमीनी हकीकत
सैटेलाइट इंटरनेट क्षेत्र की जटिल विनियामक समयसीमा पर भारती एयरटेल के चेयरमैन सुनील मित्तल ने भी ब्लूमबर्ग न्यू इकोनॉमी फोरम 2026 में महत्वपूर्ण विचार साझा किए। सुनील मित्तल ने अनुमति मिलने की कतार का उल्लेख करते हुए कहा कि वे इस प्रक्रिया में एलन मस्क से काफी आगे खड़े हैं, क्योंकि उनकी कंपनी ने पांच साल पहले आवेदन जमा किया था। मित्तल ने कहा कि अनुमति अभी तक उनके पास भी नहीं है, इसलिए अगर सरकार से मंजूरी मिलती है तो वे मस्क से कम से कम कुछ दिन पहले अनुमति पाकर बेहद प्रसन्न होंगे।

सुनील मित्तल ने इस बात पर विशेष बल दिया कि यूटेलसैट वनवेब का ग्राउंड नेटवर्क पिछले तीन वर्षों से भारत में पूरी तरह तैयार खड़ा है। इतना ही नहीं, वनवेब के उपग्रह पिछले पांच वर्षों से भारतीय भूभाग के ऊपर लगातार सक्रिय हैं और कनेक्टिविटी प्रदान करने की तकनीकी क्षमता रखते हैं। इन सभी तैयारियों के बावजूद कंपनी अब तक वाणिज्यिक सेवाओं के अंतिम आदेशों का इंतजार कर रही है। मित्तल के इस बयान ने यह साबित किया कि मंजूरी प्रक्रिया केवल स्टारलिंक के लिए ही लंबित नहीं है, बल्कि घरेलू साझेदारों वाले बड़े समूह भी उसी कतार में खड़े होकर सरकार के सुरक्षा प्रोटोकॉल और स्पेक्ट्रम आवंटन के अंतिम निर्णय की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

## रिलायंस जियो का मेगा आईपीओ और अंतरिक्ष रणनीति
सैटेलाइट इंटरनेट को लेकर चल रही इस बहस का समय रिलायंस के लिए इसलिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि समूह की डिजिटल शाखा जियो प्लेटफॉर्म्स अपने विशाल आरंभिक सार्वजनिक निर्गम यानी IPO को बाजार में उतारने की तैयारियों में जुटी है। इस निर्गम के लिए प्रति शेयर 1,065 रुपये से 1,119 रुपये का प्राइस बैंड तय किया गया है। योजना के तहत कंपनी करीब 27 करोड़ नए शेयर जारी करेगी, जो उसकी मौजूदा इक्विटी पूंजी का लगभग 3 प्रतिशत हिस्सा है। इस निर्गम में प्रवर्तकों की ओर से बिक्री के लिए कोई प्रस्ताव यानी ऑफर फॉर सेल शामिल नहीं किया गया है।

मूल्य दायरे के ऊपरी स्तर पर यह आईपीओ बाजार से करीब 30,213 करोड़ रुपये जुटाने का लक्ष्य लेकर चल रहा है। यह आकार अक्टूबर 2024 में आए हुंडई मोटर इंडिया के 27,870 करोड़ रुपये के निर्गम से भी बड़ा है, जिससे यह भारत के पूंजी बाजार का एक ऐतिहासिक आईपीओ बन जाता है। इस तय मूल्य के आधार पर जियो प्लेटफॉर्म्स का बाजार मूल्यांकन लगभग 10.3 लाख करोड़ रुपये बैठता है, जो हालांकि पहले अनुमानित 11 लाख करोड़ रुपये के लक्ष्य से थोड़ा कम है। तय कार्यक्रम के अनुसार इस आईपीओ के लिए मुख्य बोली 21 से 23 अक्टूबर तक चलेगी, जबकि एंकर निवेशकों के लिए बोली 19 अक्टूबर को खुलेगी। शेयरों की स्टॉक एक्सचेंजों पर लिस्टिंग 28 अक्टूबर को प्रस्तावित है।

जियो की दीर्घकालिक सैटेलाइट रणनीति भी बेहद महत्वाकांक्षी है। कंपनी निचले भू-कक्षा यानी LEO में लगभग 1,600 उपग्रहों का एक विशाल समूह स्थापित करने की योजना पर काम कर रही है। इस योजना का मुख्य उद्देश्य देश के 600,000 गांवों तक आधुनिक कनेक्टिविटी पहुंचाना है, जहां पारंपरिक केबल या मोबाइल टावर लगाना बेहद कठिन और खर्चीला साबित होता है। दिलचस्प तथ्य यह भी है कि रिलायंस और स्पेसएक्स ने पिछले साल एक समझौते पर हस्ताक्षर किए थे, जिसमें जियो के रिटेल नेटवर्क के माध्यम से भारतीय उपभोक्ताओं तक स्टारलिंक सेवाएं पहुंचाने की संभावनाओं की पड़ताल शामिल थी। अब जैसे ही DoT और TRAI स्पेक्ट्रम शुल्क और सुरक्षा दिशा-निर्देशों पर मुहर लगाएंगे, भारत के सुदूरवर्ती क्षेत्रों में उपग्रह ब्रॉडबैंड क्रांति का नया अध्याय शुरू होगा।

## इसका आप पर असर
भारत में सैटेलाइट ब्रॉडबैंड सेवाओं की शुरुआत से डिजिटल कनेक्टिविटी और इंटरनेट उपलब्धता पर बड़ा असर देखने को मिलेगा।

- **ग्रामीण और दुर्गम क्षेत्रों में:** दूरदराज के 600,000 गांवों, पहाड़ी इलाकों और द्वीपों पर बिना मोबाइल टॉवर के भी हाई-स्पीड इंटरनेट पहुंचेगा। इससे ऑनलाइन शिक्षा, टेलीमेडिसिन और बैंकिंग जैसी आवश्यक सेवाएं बिना रुकावट काम कर सकेंगी।
- **उपभोक्ताओं के लिए विकल्प:** आम इंटरनेट उपयोगकर्ताओं को फाइबर और 5G के अलावा अंतरिक्ष आधारित ब्रॉडबैंड का नया विकल्प मिलेगा। हालांकि शुरुआती दौर में सैटेलाइट टर्मिनल और उपकरण पारंपरिक ब्रॉडबैंड की तुलना में महंगे हो सकते हैं।
- **दूरसंचार प्रतिस्पर्धा:** स्टारलिंक, जियो सैटकॉम और यूटेलसैट वनवेब के बीच सीधी प्रतिस्पर्धा से डेटा की गुणवत्ता सुधरेगी। निजी और व्यावसायिक ग्राहकों को बेहतर बैंडविड्थ और आपातकालीन बैकअप कनेक्शन की सुविधा मिलेगी।
- **पूंजी बाजार के निवेशक:** जियो प्लेटफॉर्म्स के 30,213 करोड़ रुपये के विशाल आईपीओ से खुदरा और संस्थागत निवेशकों को दूरसंचार क्षेत्र में निवेश का मौका मिलेगा। 21 से 23 अक्टूबर तक बोली लगाने वाले निवेशक नई लिस्टिंग में हिस्सेदार बन सकेंगे।

## ऐसा क्यों हुआ
यह विनियामक गतिरोध और सार्वजनिक बहस इसलिए उत्पन्न हुई क्योंकि सैटेलाइट इंटरनेट ऑपरेटरों को केवल सेवा लाइसेंस मिलने के बाद भी स्पेक्ट्रम आवंटन और सुरक्षा मंजूरी की लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ रहा है।

- **स्पेक्ट्रम मूल्य निर्धारण का अभाव:** सेवा लाइसेंस मिलने के बावजूद TRAI और DoT ने अभी तक सैटेलाइट स्पेक्ट्रम के लिए राजस्व आधारित शुल्क व्यवस्था को अंतिम रूप नहीं दिया है। बिना निश्चित शुल्क नीति के सरकार कानूनी तौर पर एयरवेव्स आवंटित नहीं कर सकती।
- **कड़े सुरक्षा मानक:** भारत सरकार ने अनिवार्य किया है कि सभी डेटा ट्रैफिक की निगरानी स्थानीय स्तर पर हो और सभी सर्वर व गेटवे देश के भीतर स्थापित किए जाएं। इन राष्ट्रीय सुरक्षा शर्तों और तकनीकी परीक्षणों के सत्यापन में सभी कंपनियों को लंबा समय लगा है।
- **व्यवसायिक हितों का टकराव:** एलन मस्क द्वारा लगाए गए पक्षपात के आरोपों के बाद रिलायंस और भारती एयरटेल ने स्पष्ट किया कि विनियामक प्रक्रिया सभी कंपनियों के लिए एक समान है। सभी ऑपरेटर नियमों के तहत स्पेक्ट्रम आवंटन की औपचारिक घोषणा का इंतजार कर रहे हैं।

## सवाल-जवाब

### 1. स्टारलिंक ने भारतीय बाजार के बारे में क्या कहा है?
स्टारलिंक ने बताया कि उसने पांच साल से अधिक समय तक नियामकों के साथ काम कर देश में स्थानीय गेटवे और इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार कर लिया है और वह हाई-स्पीड इंटरनेट देने के लिए तैयार है।

### 2. भारत में किन कंपनियों को सैटेलाइट ब्रॉडबैंड का लाइसेंस मिला है?
केंद्रीय संचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के अनुसार स्टारलिंक, जियो सैटकॉम और भारती समर्थित यूटेलसैट वनवेब को सैटेलाइट ब्रॉडबैंड लाइसेंस प्राप्त हो चुके हैं।

### 3. लाइसेंस मिलने के बाद भी सेवाएं क्यों शुरू नहीं हो पाई हैं?
केवल लाइसेंस मिलने से परिचालन शुरू नहीं हो सकता, क्योंकि इसके लिए DoT और TRAI से स्पेक्ट्रम आवंटन, मूल्य निर्धारण और कड़े सुरक्षा परीक्षण पास करना आवश्यक है।

### 4. रिलायंस इंडस्ट्रीज ने इस पूरे मामले पर क्या प्रतिक्रिया दी है?
रिलायंस ने कहा कि वह स्टारलिंक सहित सभी प्रतिस्पर्धा का स्वागत करती है, लेकिन सभी कंपनियों को समान रूप से देश के कानून और नीतियों का पालन करना चाहिए।

### 5. सुनील मित्तल ने मंजूरी प्रक्रिया के बारे में क्या बयान दिया?
सुनील मित्तल ने कहा कि वनवेब के उपग्रह पांच साल से और ग्राउंड नेटवर्क तीन साल से तैयार हैं, और उन्होंने स्टारलिंक से पहले आवेदन किया था लेकिन वे भी अभी मंजूरी का इंतजार कर रहे हैं।

### 6. जियो प्लेटफॉर्म्स के आईपीओ से जुड़ी मुख्य बातें क्या हैं?
जियो का आईपीओ 1,065 से 1,119 रुपये प्रति शेयर के प्राइस बैंड पर 30,213 करोड़ रुपये जुटाने के लिए 21 से 23 अक्टूबर तक खुलेगा, जिसकी लिस्टिंग 28 अक्टूबर को होगी।

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