बिहार के इस जिले में चमकी किसान की किस्मत, खेतों की मेड़ पर उगाई बेहतरीन मौसमी बिहार के छपरा जिले के एक प्रगतिशील किसान ने खेतों की मेड़ पर मौसमी की बागवानी कर बेहतरीन सफलता हासिल की है। वैज्ञानिकों के प्रशिक्षण और सही पौधों के चुनाव से यह अनोखा प्रयोग पूरी तरह कामयाब रहा है। बिहार के छपरा जिले के अन्नदाता अब सिर्फ पारंपरिक तौर-तरीकों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे बागवानी के क्षेत्र में भी नए प्रयोग कर अपनी आय बढ़ा रहे हैं। जिले में आम, अमरूद और केले की खेती के बीच अब खट्टे-मीठे फलों की बहार भी दिखने लगी है। खासकर मौसमी की खेती ने यहां के किसानों का ध्यान अपनी ओर खींचा है, जिसकी शुरुआत जिले के एक जागरूक किसान ने कर दिखाई है। दरियापुर प्रखंड के खानपुर गांव की सफलता यह अनोखी सफलता दरियापुर प्रखंड के अंतर्गत आने वाले खानपुर गांव से सामने आई है। यहां के रहने वाले प्रगतिशील किसान रणजीत सिंह ने अपनी कड़ी मेहनत और लगन से यह साबित कर दिया है कि सही दिशा में किया गया प्रयास कभी बेकार नहीं जाता। उन्होंने अपने खेत के खाली पड़े किनारों और मेड़ों का सदुपयोग करते हुए ट्रायल के तौर पर मौसमी के कुछ पौधे रोपे थे। आज उनके इन पौधों पर बंपर फल आ चुके हैं, जिनकी गुणवत्ता देखकर आसपास के लोग भी हैरान हैं। प्रशिक्षण और नर्सरी से हुई शुरुआत इस अनूठी खेती के पीछे की कहानी भी काफी दिलचस्प है। किसान रणजीत सिंह को मांझी कृषि विज्ञान केंद्र के कृषि वैज्ञानिकों द्वारा विशेष प्रशिक्षण दिया गया था। इसी दौरान उन्हें बागवानी और नए फलों की पैदावार के बारे में बारीकी से सीखने का मौका मिला। प्रशिक्षण पूरा होने के बाद जब वे किसी अन्य काम से हाजीपुर नर्सरी गए, तो वहां उनकी नजर मौसमी के पौधों पर पड़ी। उन्हें वहां 50 रुपये प्रति पौधे की दर से मौसमी के पौधे मिल गए। इस अवसर का लाभ उठाते हुए उन्होंने वहां से करीब 15 पौधे खरीदे और उन्हें अपने साथ सुरक्षित घर ले आए। आज से करीब ढाई से तीन साल पहले उन्होंने इन पौधों को अपने खेतों की मेड़ों के किनारे रोपा था, जो अब बड़े होकर फल देने लगे हैं। बाजार की मौसमी से बेहतर स्वाद और आकार रणजीत सिंह ने बताया कि उन्होंने सोनपुर हाजीपुर मेला घूमने के दौरान इन पौधों को खरीदने का मन बनाया था। अब लगभग ढाई से तीन साल का समय बीत जाने के बाद इन पेड़ों पर फलों की पहली खेप उतरनी शुरू हो गई है। उन्होंने साझा किया कि अभी यह केवल शुरुआती और ट्रायल के तौर पर आया हुआ फलन है, लेकिन आने वाले сезоनों में पेड़ों का दायरा बढ़ने पर और भी अधिक पैदावार मिलने की उम्मीद है। उनकी यह मौसमी न केवल आकार में काफी बड़ी है, बल्कि इसका प्राकृतिक स्वाद भी बाजार में बाहर से आने वाली अन्य मौसमी की तुलना में कहीं अधिक मीठा है। इस सफलता से उत्साहित होकर वे अब भविष्य में इस बागवानी को और बड़े पैमाने पर विस्तारित करने की योजना बना रहे हैं ताकि इसका लाभ स्थानीय स्तर पर व्यापक रूप से मिल सके। इसका आप पर असर बिहार में: यह सफलता राज्य के अन्य किसानों को अपनी आय बढ़ाने के लिए पारंपरिक फसलों के साथ बागवानी और मेड़ की उपयोगिता समझने के लिए प्रेरित करती है। छपरा में: जिले के किसानों को खाली पड़ी मेड़ों और सीमाओं पर फलदार पौधे लगाकर अतिरिक्त आमदनी कमाने का एक नया व्यावहारिक रास्ता मिला है। सवाल-जवाब 1. रणजीत सिंह ने मौसमी के पौधे कहां से खरीदे थे? उन्होंने हाजीपुर नर्सरी से मौसमी के पौधे खरीदे थे। 2. एक पौधा कितने रुपये में मिला था? मौसमी का एक पौधा 50 रुपये में खरीदा गया था। 3. ये पौधे कितने साल पहले लगाए गए थे? इन पौधों को करीब ढाई से तीन साल पहले खेतों की मेड़ पर लगाया गया था। 4. यह खेती बिहार के किस जिले में की गई है? यह खेती बिहार के छपरा जिले के दरियापुर प्रखंड के खानपुर गांव में की गई है। प्रेरणा और सबक सफलता के प्रमुख सबक: • वैज्ञानिक सलाह का लाभ: कृषि विज्ञान केंद्र से सही प्रशिक्षण लेकर किसी भी नए प्रयोग को शुरू करना सफलता की संभावना को काफी बढ़ा देता है। • संसाधनों का सही इस्तेमाल: खेत की बंजर या खाली पड़ी मेड़ों का उपयोग करके अतिरिक्त मुनाफा कमाया जा सकता है। • सब्र और मेहनत: बागवानी में फल मिलने में कुछ साल का समय लगता है, इसलिए धैर्य रखना बहुत जरूरी है। • नवाचार की सोच: पारंपरिक खेती से हटकर कुछ अलग करने की इच्छा किसानों को आर्थिक रूप से मजबूत बना सकती है। https://trendkia.com/business/bihar-ke-is-jil-mein-chamki-kisan-ki-kismat-kheton-ki-med-par-ugai-behtareen-mosambi-20817 TrendKia — Har trend, sabse pehle.