बिहार के इस किसान ने दिखाया कमाल, परवल की खेती से हो रही छप्परफाड़ कमाई सीतामढ़ी जिले के प्रगतिशील किसान दिनेश महतो ने आधुनिक तरीकों से खेती कर परवल के उत्पादन में नया मुकाम हासिल किया है। पारंपरिक कृषि पद्धतियों से अलग हटकर कुछ नया करने का जज्बा हो, तो किस तरह सफलता हासिल की जा सकती है, इसकी एक शानदार मिसाल बिहार के सीतामढ़ी जिले से सामने आई है। यहाँ के मदनपुर इलाके के रहने वाले दिनेश महतो ने अपनी मेहनत और बेहतर प्रबंधन के दम पर खेती को मुनाफे का सौदा बना दिया है। वह अपनी करीब 18 कट्ठे जमीन पर खास तौर पर देहाती प्रजाति के परवल की खेती कर रहे हैं और इससे बंपर मुनाफा कमा रहे हैं। इस अनोखे सफर की शुरुआत उन्होंने आज से तीन साल पहले की थी, जब उन्होंने अपने एक रिश्तेदार और अमरीश जी के मार्गदर्शन में इस दिशा में कदम बढ़ाया था। उस समय वह सिर्फ 200 पौधे लेकर आए थे, जिन्होंने आगे चलकर उनकी सफलता की मजबूत नींव का काम किया। खुद तैयार करते हैं नर्सरी और बढ़ा रहे हैं रकबा दिनेश महतो अब खेती से जुड़ी हर छोटी-बड़ी जरूरत के लिए किसी अन्य व्यक्ति पर निर्भर नहीं रहते हैं, बल्कि वे अपने ही खेतों में परवल की नर्सरी खुद तैयार करते हैं। वे अपने मौजूदा प्लॉट से लत्ती की कटाई-छंटाई करके लगातार अपने कृषि क्षेत्र का दायरा बढ़ाते जा रहे हैं। उनकी इस काबिलियत और लगन को देखकर क्षेत्र के दूसरे किसान भी काफी प्रेरित हो रहे हैं और आधुनिक खेती की ओर रुख कर रहे हैं। इस पूरी प्रक्रिया की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यदि कोई जरूरतमंद किसान उनसे पौधे या लत्ती मांगने आता है, तो वे उसे पूरी तरह मुफ्त में उपलब्ध करा देते हैं, जिससे दूसरों को भी आगे बढ़ने में मदद मिलती है। दैनिक बंपर पैदावार और शानदार मुनाफा अपनी इस 18 कट्ठे की फसल से दिनेश हर रोज लगभग एक क्विंटल परवल की तुड़ाई का काम करते हैं। बाजार में इस सब्जी की लगातार बनी हुई अच्छी मांग के कारण वर्तमान में परवल का थोक भाव 4,000 से 4,500 रुपये प्रति क्विंटल के बीच चल रहा है। खेती से जुड़े सभी तरह के लेबर और मजदूरी के खर्चों को पूरी तरह से काटने के बाद भी उन्हें हर दिन करीब 3,000 रुपये की शुद्ध बचत आसानी से हो जाती है। वे सालभर में लगभग 5 महीने लगातार परवल की फसल की तुड़ाई करते हैं, जिससे उनकी आय में जबरदस्त इजाफा होता है। सालभर होती है डबल कमाई की व्यवस्था परवल की फसल का मुख्य सीजन समाप्त होने के बाद भी दिनेश अपने खेतों को कभी खाली नहीं छोड़ते हैं। वे पौधे की मुख्य जड़ को सुरक्षित रखते हुए खेत में गोभी, आलू और चुकंदर जैसी अन्य मौसमी सब्जियों की बुआई कर देते हैं। सर्दियों के ठंडे मौसम में ये तमाम फसलें महज दो से तीन महीने के भीतर तैयार होकर सीधे बाजार में बिकने के लिए पहुंच जाती हैं। इसके तुरंत बाद वे दोबारा परवल की लत्ती की झांकी तैयार कर देते हैं, जिससे पौधे फिर से फल देने लगते हैं। इस तरह वे एक ही टुकड़े पर पूरे साल अलग-अलग फसलें उगाकर अपनी आमदनी को लगातार सुरक्षित बनाए रख रहे हैं। इसका आप पर असर इस आधुनिक कृषि तकनीक से किसानों को बंपर कमाई और सालभर रोजगार के नए अवसर मिलते हैं। • भारत में: यह सफलता देश के अन्य किसानों को पारंपरिक खेती के चक्र से बाहर निकलकर उन्नत सब्जियों की खेती अपनाने के लिए प्रेरित करती है। • सीतामढ़ी में: स्थानीय किसानों को कम लागत में उच्च पैदावार हासिल करने और मुफ्त पौधे प्राप्त करने का व्यावहारिक मार्ग मिलता है। • बाजार पर असर: स्थानीय मंडियों में परवल की नियमित आपूर्ति बनी रहने से उपभोक्ताओं को उचित दामों पर ताजी सब्जियां मिलती हैं। • दैनिक जीवन: छोटे किसानों को मजدूरी का पूरा खर्च निकालकर हर दिन नगद बचत करने का एक बेहतरीन फॉर्मूला मिल जाता है। • कमाई का तरीका: मुख्य फसल के साथ गोभी और आलू जैसी मौसमी फसलें उगाने से पूरे साल बिना रुकावट के आमदनी सुनिश्चित होती है। ऐसा क्यों हुआ कम जगह में अधिक पैदावार और बेहतर फसल प्रबंधन के कारण यह खेती बेहद मुनाफे वाली साबित हो रही है। • प्रेरणा और शुरुआत: किसान ने तीन साल पहले एक रिश्तेदार और अमरीश जी की सलाह पर मात्र 200 पौधे लगाकर इस काम की नींव रखी थी। • उन्नत प्रबंधन: मुख्य फसल के कटने के बाद खेत को खाली न छोड़कर गोभी और आलू जैसी मौसमी फसलें उगाने से सालभर आय बनी रहती है। • बाजार की मांग: मंडियों में परवल की लगातार उच्च मांग और 4,000 से 4,500 रुपये प्रति क्विंटल का भाव मिलने से शुद्ध बचत बढ़ जाती है। • स्वावलंबन: अपनी खुद की नर्सरी तैयार करने और बिचौलियों पर निर्भर न रहने से लागत में भारी कमी आती है। सवाल-जवाब 1. दिनेश महतो किस फसल की खेती कर रहे हैं? वह लगभग 18 कट्ठे जमीन पर देहाती प्रजाति के परवल की खेती कर रहे हैं। 2. उन्होंने इस खेती की शुरुआत कब की थी? उन्होंने तीन साल पहले अपने एक रिश्तेदार और अमरीश जी की सलाह पर लगभग 200 पौधे लेकर इसकी शुरुआत की थी। 3. उन्हें रोजाना कितनी पैदावार और बचत होती है? वे रोज लगभग एक क्विंटल परवल तोड़ते हैं और सभी खर्च निकालकर प्रतिदिन करीब 3,000 रुपये की शुद्ध बचत करते हैं। 4. परवल का सीजन खत्म होने के बाद वे खेत में क्या उगाते हैं? वे गोभी, आलू और चुकंदर जैसी अन्य मौसमी फसलें उगाते हैं। 5. वे दूसरे किसानों की किस प्रकार मदद करते हैं? वे जरूरतमंद किसानों को पौधे या लत्ती पूरी तरह निःशुल्क उपलब्ध कराते हैं। प्रेरणा और सबक दिनेश महतो की यह कहानी उन सभी लोगों के लिए प्रेरणा है जो सीमित संसाधनों में बड़ा मुकाम हासिल करना चाहते हैं। • स्वयं पर भरोसा: किसी दूसरे पर निर्भर रहने के बजाय अपनी खुद की नर्सरी तैयार करके आत्मनिर्भर बनें। • संसाधनों का उपयोग: खाली समय और बंजर या खाली पड़ी जमीन का सदुपयोग कर मौसमी फसलें उगाएं। • सहयोग की भावना: अपनी सफलता का दायरा बढ़ाने के साथ-साथ जरूरतमंद किसानों को मुफ्त पौधे देकर उनकी मदद करें। • नवाचार अपनाएं: पारंपरिक फसलों के साथ आधुनिक तकनीकों और बेहतर प्रबंधन का तालमेल बिठाकर मुनाफा बढ़ाएं। https://trendkia.com/business/bihar-ke-is-kisan-ne-dikhaya-kamaal-parwal-ki-kheti-se-ho-rahi-chhapparfaad-kamai-51343 TrendKia — Har trend, sabse pehle.