बिहार के इस जिले में सड़क किनारे बिकता है विदेशी जायका, ₹200 किलो है कीमत बिहार के पश्चिम चम्पारण जिले में सड़क किनारे पत्तों पर रखकर घोंघे बेचे जाते हैं। विदेशों में एग्ज़ोटिक डिश के रूप में परोसा जाने वाला यह जीव स्थानीय बाजारों में ₹200 प्रति किलो के भाव बिकता है और रोजाना भारी मात्रा में इसकी खपत होती है। पश्चिम चम्पारण में एक ऐसा कारोबार चल रहा है जो लोगों को हैरान कर सकता है। जिस स्नेल यानी घोंघे को दुनिया के कई देशों में एक बेहद महंगी और खास एग्ज़ोटिक नॉन वेज डिश के तौर पर परोसा और खाया जाता है, उसकी खरीद-फरोख्त पश्चिम चम्पारण समेत बिहार के तमाम जिलों में खुलेआम सड़क के किनारे पत्तों पर रखकर की जाती है। वायरल वीडियो और जमीनी हकीकत बयां करती है कि कैसे सड़क किनारे लंबी कतारों में विक्रेता बोरियों और पत्तों पर घोंघे सजाकर बैठते हैं और शौकीन खरीदार बड़े चाव से इन्हें खरीदते हैं। गौर करने वाली बात यह है कि दुनिया भर में जिसे सी फूड की श्रेणी में रखा जाता है, उसे बिहार के स्थानीय तालाबों, पोखरों और छोटी नदियों से चुनकर सीधे बाजारों तक पहुंचाया जाता है। गांव के 70 परिवार चलाते हैं यह अनूठा व्यवसाय बेतिया के हरदिया पंचायत के रहने वाले हीरा लाल मांझी का कहना है कि उनके गांव के लगभग 70 परिवार इसी स्नेल के व्यवसाय से जुड़े हुए हैं। इस कारोबार की सबसे दिलचस्प बात यह है कि ये लोग केवल पारंपरिक व्यापारी नहीं हैं, बल्कि खुद कुशल फार्मर भी हैं। ये ग्रामीण खुद ही घोंघे की फार्मिंग करने के साथ-साथ आसपास के पोखरों, तालाबों और छोटी नदियों से इन्हें बड़ी मेहनत से इकट्ठा करते हैं। इसके बाद इन्हें स्थानीय बाजारों में लाया जाता है, जहां इनका थोक और खुदरा व्यापार बड़े पैमाने पर होता है। स्थानीय भाषा में अइठा और निकालने का खास तरीका आपको बता दें कि इस जीव को हिंदी में घोंघा और बिहार की स्थानीय बोलियों में अइठा के नाम से जाना जाता है। ये जीव आमतौर पर जलीय स्रोतों के आसपास की नम मिट्टी में रहना पसंद करते हैं। इन्हें पकड़ने के लिए बांस से बने एक विशेष और पारंपरिक यंत्र का इस्तेमाल किया जाता है, जिसकी मदद से इन्हें आसानी से फंसाया जाता है। बाजार में बेचने से पहले व्यापारी इसके कड़े बाहरी कवच को अलग कर देते हैं और उसके भीतर मौजूद नरम जीव को पानी से अच्छी तरह साफ करने के बाद ही ग्राहकों को बेचते हैं। पोषण से भरपूर और बंपर बिक्री के आंकड़े हीरा लाल मांझी के मुताबिक, खुले बाजार में इस घोंघे का भाव 200 रुपए प्रति किलो चल रहा है। इस जीव के भीतर आयरन, प्रोटीन और ओमेगा 3 फैटी एसिड जैसे दर्जनों जरूरी पोषक तत्व प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं, यही वजह है कि लोग इसे खाने के लिए काफी उत्सुक रहते हैं। इस भारी मांग के चलते स्थानीय बाजार में हर दिन औसतन दो क्विंटल तक घोंघे की खपत हो जाती है। वहीं, अगस्त से अक्टूबर के बीच का समय इसके लिए पीक सीजन माना जाता है, जब इसकी बिक्री बढ़कर प्रतिदिन तीन क्विंटल तक पहुंच जाती है। इसका आप पर असर यह अनोखा कारोबार ग्रामीण अर्थव्यवस्था और स्थानीय खानपान की आदतों को एक नया आयाम देता है। • बिहार में: ग्रामीण परिवारों को इस व्यवसाय से सीधे तौर पर स्थायी आजीविका और अच्छी आय मिल रही है। • पश्चिम चम्पारण में: स्थानीय बाजारों और ग्रामीण इलाकों में पोखरों से जुड़े इस पारंपरिक व्यापार से दर्जनों परिवारों का आर्थिक विकास हो रहा है। ऐसा क्यों हुआ घोंघे के इस बड़े कारोबार के पीछे इसकी प्रचुर उपलब्धता और उच्च पोषक तत्व मुख्य कारण हैं। • प्राकृतिक उपलब्धता: क्षेत्र के तालाबों, पोखरों और छोटी नदियों के पास नम मिट्टी में घोंघे बहुतायत में पाए जाते हैं। • पोषक तत्वों की मात्रा: इसमें आयरन, प्रोटीन और ओमेगा 3 जैसे जरूरी तत्व होने के कारण इसकी मांग लगातार बनी रहती है। • पारंपरिक कौशल: स्थानीय परिवारों को बांस के यंत्रों से इन्हें पकड़ने और फार्मिंग करने का विशेष अनुभव है। सवाल-जवाब 1. बिहार में घोंघे को स्थानीय भाषा में क्या कहा जाता है? बिहार की स्थानीय भाषा में घोंघे को अइठा कहा जाता है। 2. बाजार में घोंघे की कीमत क्या है? स्थानीय बाजार में घोंघे का भाव 200 रुपए प्रति किलो है। 3. बेतिया में कितने परिवार इस व्यवसाय से जुड़े हैं? हरदिया पंचायत के करीब 70 परिवार इस स्नेल व्यवसाय से जुड़े हुए हैं। 4. घोंघे में कौन से मुख्य पोषक तत्व पाए जाते हैं? घोंघे में आयरन, प्रोटीन और ओमेगा 3 जैसे पोषक तत्व प्रचुर मात्रा में होते हैं। 5. किस महीने में इसकी बिक्री सबसे ज्यादा होती है? अगस्त से अक्टूबर महीने के दौरान इसकी बिक्री बढ़कर प्रतिदिन तीन क्विंटल तक पहुंच जाती है। https://trendkia.com/business/bihar-ke-isa-jile-men-saraka-kinare-bikata-hai-videshi-jayaka-rs-200-kilo-hai-kimata-39568 TrendKia — Har trend, sabse pehle.