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  "type": "article",
  "title": "बिहार के कृषि वैज्ञानिक डॉ. एस.के. सिंह ने बताया केले की उपज 35 प्रतिशत तक बढ़ाने का तरीका",
  "summary": "गोरौल हाजीपुर केला अनुसंधान संस्थान के प्रधान डॉ. एस.के. सिंह ने केले की पैदावार 20 से 35 प्रतिशत तक बढ़ाने के लिए 'अकेला' पौधा प्रबंधन और वैज्ञानिक खेती के प्रमुख उपाय साझा किए हैं।",
  "content": "केले की खेती करने वाले किसानों के लिए फसल का उत्पादन बढ़ाना और लागत कम करना एक बड़ी चुनौती रहता है। इस दिशा में बिहार के प्रसिद्ध कृषि विशेषज्ञ प्रोफेसर डॉ. एस.के. सिंह ने एक खास वैज्ञानिक तरीका प्रस्तुत किया है। गोरौल हाजीपुर स्थित केला अनुसंधान संस्थान के प्रधान और डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय पूसा के पादप रोगविज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. एस.के. सिंह के अनुसार, इस विशेष तकनीक को अपनाकर किसान अपनी फसल की पैदावार में 20 प्रतिशत से लेकर 35 प्रतिशत तक की उल्लेखनीय वृद्धि हासिल कर सकते हैं। केले के संवर्धन पर 20 वर्षों से अधिक का शोध अनुभव रखने वाले डॉ. सिंह की यह सलाह देश भर के किसानों के लिए अत्यंत उपयोगी साबित हो रही है।\n\nक्या है 'अकेला' पौधा सिद्धांत और क्यों है यह जरूरी\nडॉ. एस.के. सिंह के अनुसार केले की पैदावार बढ़ाने का मूल मंत्र पौधे को 'अकेला' रखना है। मुख्य या मातृ पौधे के आसपास प्राकृतिक रूप से कई छोटे प्रकंद या 'सकर्स' उग आते हैं। यदि इन अवांछित सकर्स को हटाया न जाए, तो वे मिट्टी से मिलने वाले आवश्यक पोषक तत्वों को खुद सोख लेते हैं। परिणामस्वरूप, मुख्य पौधे को पूरा पोषण नहीं मिल पाता, जिससे बनने वाला घौंद या गुच्छा आकार में छोटा रह जाता है और फल भी कमजोर होते हैं।\n\nइस समस्या के समाधान के लिए किसानों को प्रत्येक 40 से 45 दिनों के अंतराल पर एक तेज चाकू की मदद से इन अनावश्यक सकर्स को काट देना चाहिए। ध्यान रखने योग्य बात यह है कि जब तक पौधे में फूल न आ जाए, तब तक उसके पास किसी भी अन्य पौधे को पनपने न दें। एक बार जब पौधे से घौंद बाहर निकल आए, तो अगली फसल की समय पर तैयारी के लिए केवल एक स्वस्थ फॉलोअर पौधे को छोड़ने की सलाह दी जाती है।\n\nभारत और बिहार में केले के उत्पादन का वर्तमान परिदृश्य\nभारत दुनिया भर में केले का सबसे बड़ा उत्पादक देश माना जाता है, जहाँ हर साल लगभग 3.7 करोड़ टन केले की पैदावार होती है। बिहार राज्य के विभिन्न जिलों जैसे वैशाली, समस्तीपुर, मुजफ्फरपुर, कटिहार और भागलपुर में केले का रकबा लगातार बढ़ रहा है। हालाँकि, वर्तमान समय में केवल रासायनिक खाद या पारंपरिक उर्वरक डालने से वांछित परिणाम हासिल नहीं हो रहे हैं। लगातार बदलती जलवायु परिस्थितियाँ, फसलों में लगने वाले नए रोग और बढ़ती कृषि लागत ने किसानों के सामने नई चुनौतियाँ खड़ी कर दी हैं, जिसके लिए आधुनिक वैज्ञानिक प्रबंधन अनिवार्य हो गया है।\n\nउत्पादन और गुणवत्ता बढ़ाने के लिए अन्य वैज्ञानिक उपाय\nफसल की गुणवत्ता और मात्रा बढ़ाने के लिए डॉ. सिंह ने कई अतिरिक्त तकनीकी सुझाव दिए हैं\n\n• मिट्टी और पौधे का चयन: केले के लिए गहरी और बेहतर जल निकासी क्षमता वाली दोमट मिट्टी का चुनाव करना चाहिए। इसके साथ ही केवल टिशू कल्चर तकनीक से तैयार किए गए रोगमुक्त पौधों का ही रोपण करना चाहिए।\n• सिंचाई और फर्टिगेशन: केले की फसल को प्रचुर जल की आवश्यकता होती है, लेकिन खेत में जलभराव पौधा सहन नहीं कर सकता। ड्रिप सिंचाई प्रणाली और फर्टिगेशन के उपयोग से पानी और खाद दोनों में 40 प्रतिशत तक की बचत की जा सकती है।\n• पोटाश का संतुलित प्रयोग: पोटाश का उचित प्रयोग फलों के आकार, प्राकृतिक मिठास और पौधों की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।\n• मल्चिंग और पॉलीबैग का प्रयोग: खेत की नमी बनाए रखने के लिए सूखी पत्तियों से मल्चिंग करना आवश्यक है। इसके अतिरिक्त, घौंद निकलने के बाद उसे नीले या पारदर्शी पॉलीबैग से ढक देने से फल 7 से 10 दिन पहले पककर तैयार हो जाते हैं और उनका रंग व आकर्षण भी निखर आता है।\n\nइसका आप पर असर\nयह नई वैज्ञानिक तकनीक केले की खेती करने वाले किसानों के लिए उत्पादन लागत कम करने और आय बढ़ाने का सीधा अवसर प्रदान करती है।\n\n• भारत में: देश भर के केले उत्पादक किसान सकर्स प्रबंधन और फर्टिगेशन तकनीक अपनाकर प्रति हेक्टेयर 20 से 35 प्रतिशत तक अधिक पैदावार प्राप्त कर सकते हैं। इससे बाजार में गुणवत्तापूर्ण फल पहुँचेंगे और किसानों का मुनाफा बढ़ेगा।\n• बिहार में: वैशाली, समस्तीपुर, मुजफ्फरपुर, कटिहार और भागलपुर जिलों के किसानों के लिए यह सलाह विशेष रूप से कारगर है। जलवायु परिवर्तन के असर के बीच यह फॉर्मूला फसल सुरक्षा और बेहतर कमाई सुनिश्चित करता है।\n• लागत में बचत: ड्रिप सिंचाई और फर्टिगेशन प्रणाली अपनाने से पानी और उर्वरक की खपत में 40 प्रतिशत तक की सीधी बचत होती है।\n• समय से पहले फसल: नीले या पारदर्शी पॉलीबैग से घौंद को ढकने की तकनीक से फल 7 से 10 दिन पहले बिकने के लिए तैयार हो जाते हैं।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. डॉ. एस.के. सिंह के अनुसार केले की पैदावार में कितनी वृद्धि हो सकती है?\nवैज्ञानिक तकनीक और 'अकेला' पौधा प्रबंधन अपनाने से केले की पैदावार में 20 से 35 प्रतिशत तक की वृद्धि हो सकती है।\n\n2. केले में 'अकेला' पौधा सिद्धांत क्या है?\nइस सिद्धांत के तहत मातृ पौधे के पास उगने वाले अवांछित सकर्स को हर 40-45 दिन में काट दिया जाता है ताकि मुख्य पौधे को पूरा पोषण मिले।\n\n3. ड्रिप सिंचाई और फर्टिगेशन से कितनी बचत होती है?\nड्रिप सिंचाई और फर्टिगेशन का उपयोग करने से पानी और खाद में 40 प्रतिशत तक की बचत की जा सकती है।\n\n4. केले की घौंद को पॉलीबैग से ढकने का क्या फायदा है?\nनीले या पारदर्शी पॉलीबैग से ढकने पर फल 7 से 10 दिन पहले तैयार हो जाते हैं और उनका रंग व आकर्षण भी बेहतर होता है।\n\n5. भारत में प्रतिवर्ष कितना केला उत्पादित होता है?\nभारत विश्व का सबसे बड़ा केला उत्पादक देश है जहाँ प्रतिवर्ष लगभग 3.7 करोड़ टन केले का उत्पादन होता है।",
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  "publishedAt": "2026-08-27",
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