बिहार के मखाने ने यूरोप में बनाई पैठ, पूर्णिया से ग्रीस पहुंची खेप पर किसानों को मिले ऊंचे दाम पूर्णिया से एक मीट्रिक टन मखाने की पहली खेप ग्रीस के पिराएउस पोर्ट पहुंची है, जहां भारतीय उत्पादकों को घरेलू बाजार से अधिक दाम मिले हैं। अंतरराष्ट्रीय व्यापार के मंच पर बिहार के कृषि उत्पादों ने एक नई उपलब्धि दर्ज कराई है। राज्य के सीमांचल क्षेत्र में स्थित पूर्णिया जिले से तैयार मखाने का एक विशेष शिपमेंट सीधे यूरोपीय देश ग्रीस पहुंच गया है। घरेलू मंडियों में मिलने वाली सामान्य दरों के मुकाबले इस विदेशी निर्यात में उत्पादकों को काफी आकर्षक और ऊंची कीमतें हासिल हुई हैं। इस सफल व्यापारिक सौदे की आधिकारिक जानकारी देते हुए केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने सोशल मीडिया पर बताया कि यह कदम बिहार के स्थानीय मखाना किसानों को सीधे अंतरराष्ट्रीय सप्लाई चेन से जोड़ने की दिशा में बेहद अहम साबित हुआ है। पूर्णिया से मुंद्रा होते हुए पिराएउस पोर्ट तक का सफर इस निर्यात प्रक्रिया को कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (APEDA) के तकनीकी तथा लॉजिस्टिक सहयोग से अंजाम दिया गया। पूर्णिया से रवाना किया गया यह शिपमेंट कुल 1 MT यानी एक मीट्रिक टन मखाने का था। वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय द्वारा 2 अक्टूबर को साझा किए गए विवरण के अनुसार, इस मखाने को पूर्णिया जिले के बेलौरी में स्थित इंडो ग्लोबल एक्सपोर्ट से खरीदा गया था। इसके बाद दिल्ली स्थित निर्यातक कंपनी एस. एस. फूड्स एक्सपोर्ट्स प्राइवेट लिमिटेड के जरिए इसे विदेशी बाजार के लिए तैयार किया गया। भारत के पश्चिमी तट पर स्थित गुजरात के मुंद्रा बंदरगाह से जलमार्ग के जरिए इस माल को रवाना किया गया, जो सुरक्षित रूप से ग्रीस के प्रसिद्ध पिराएउस बंदरगाह पर पहुंचा। केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने भी X पर इस महत्वपूर्ण उपलब्धि की पुष्टि की। घरेलू मंडियों से ज्यादा मुनाफा और अंतरराष्ट्रीय मांग इस पूरे व्यापारिक लेनदेन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि निर्यातकों और उत्पादकों को देश की स्थानीय मंडियों के मुकाबले कहीं अधिक कीमत प्राप्त हुई। विश्लेषकों का मानना है कि यूरोपीय उपभोक्ताओं के बीच सेहतमंद सुपरफूड की बढ़ती मांग भारतीय मखाने के लिए अतिरिक्त मूल्य सृजन का बड़ा जरिया बन सकती है। जब छोटे जिलों के उत्पादक सीधे वैश्विक खरीदारों के संपर्क में आते हैं, तो बिचौलियों की भूमिका कम होती है और किसानों को उनकी कड़ी मेहनत का वास्तविक मूल्य मिल पाता है। यह निर्यात मॉडल साबित करता है कि विदेशी बाजार भारतीय पारंपरिक फसलों के लिए टिकाऊ मुनाफे की ठोस जमीन तैयार कर रहे हैं। देश के कुल उत्पादन में बिहार का भारी दबदबा दुनियाभर में मखाना उत्पादन के मामले में भारत पहले से ही शीर्ष स्थान पर काबिज है, और इस राष्ट्रीय उत्पादन की असली रीढ़ बिहार राज्य है। पूरे भारत में जितना भी मखाना पैदा होता है, उसका लगभग 80 से 85 प्रतिशत हिस्सा अकेले बिहार के जलमग्न क्षेत्रों और तालाबों से आता है। राज्य के 10 प्रमुख जिलों में फैले 35,000 हेक्टेयर से अधिक कृषि क्षेत्र में मखाने की खेती की जाती है। इस पारंपरिक कृषि पद्धति को आधुनिक रूप देने के लिए सबौर स्थित बिहार एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी (BAU) और दरभंगा स्थित आईसीएआर-नेशनल रिसर्च सेंटर फॉर मखाना द्वारा किसानों को लगातार तकनीकी मार्गदर्शन और उन्नत शोध उपलब्ध कराया जा रहा है। कृषि निर्यात बास्केट में मजबूत होती हिस्सेदारी पूर्णिया से ग्रीस तक का यह सफल निर्यात अभियान दरअसल उन व्यापक प्रयासों का हिस्सा है, जिसके तहत क्षेत्रीय कृषि उत्पादों को वैश्विक पहचान दिलाने की कोशिशें की जा रही हैं। बिहार की संस्कृति, परंपरा और खानपान से गहराई से जुड़ा मखाना अब भारत की औपचारिक कृषि निर्यात सूची में एक प्रमुख व्यावसायिक उत्पाद के तौर पर अपनी जगह मजबूत कर चुका है। यूरोप जैसे गुणवत्ता-संवेदनशील बाजारों में भारतीय मखाने की स्वीकार्यता बढ़ना आने वाले दिनों में स्थानीय किसानों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए नए द्वार खोलने का काम करेगा। इसका आप पर असर बिहार के मखाने का यूरोपीय बाजार में पहुंचना किसानों और कृषि कारोबारियों के लिए आय के नए रास्ते खोल रहा है। • भारत में: कृषि निर्यात बास्केट में पारंपरिक फसलों की मांग बढ़ने से राष्ट्रीय स्तर पर कृषि व्यापार को मजबूती मिलेगी। इससे विदेशी मुद्रा अर्जन के साथ-साथ फूड प्रोसेसिंग सेक्टर में नए निवेश की संभावनाएं बढ़ेंगी। • बिहार में: मखाना उत्पादक किसानों को घरेलू मंडियों के मुकाबले विदेशी बाजारों से सीधे बेहतर और स्थिर दाम मिल सकेंगे। सीमांचल के 10 जिलों में 35,000 हेक्टेयर में काम कर रहे किसानों और स्थानीय प्रोसेसिंग इकाइयों की कमाई में सीधा सुधार होगा। • कृषि कारोबारियों के लिए: मुंद्रा से पिराएउस तक का सीधा समुद्री मार्ग अन्य छोटे निर्यातकों के लिए यूरोपीय बाजार के नियम समझने का रास्ता खोलेगा। इस मानक के सफल होने के बाद नए निर्यातक भी सीधे यूरोपीय खरीदारों से आपूर्ति समझौते कर सकते हैं। • उपभोक्ताओं के लिए: वैश्विक स्तर पर मांग और मानकों में सुधार से घरेलू बाजार में भी बेहतर ग्रेड और पैकेजिंग वाला मखाना उपलब्ध होगा। उत्पादकों को सही दाम मिलने से उत्पादन का रकबा बढ़ेगा और गुणवत्ता में सुधार आएगा। ऐसा क्यों हुआ यह निर्यात सरकारी प्रोत्साहन, मजबूत संस्थागत तंत्र और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय सुपरफूड की बढ़ती स्वीकार्यता के समन्वय से संभव हुआ है। • सीधा कारण: कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (APEDA) ने पूर्णिया के स्थानीय उत्पादक और दिल्ली के निर्यातक को जोड़कर 1 MT की खेप तैयार कराई। इस सुनियोजित तालमेल के चलते गुजरात के मुंद्रा पोर्ट से ग्रीस के पिराएउस पोर्ट तक माल भेजा गया। • अनुकूल परिस्थितियां: देश के कुल मखाना उत्पादन में बिहार का 80 से 85 प्रतिशत योगदान है और यहां 35,000 हेक्टेयर से अधिक रकबा इस फसल के अधीन है। सबौर स्थित बिहार एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी और दरभंगा के आईसीएआर मखाना अनुसंधान केंद्र से मिल रही तकनीकी मदद ने उत्पाद की गुणवत्ता निर्यात योग्य बनाई। • बाजार की जरूरत: घरेलू मंडियों की तुलना में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पौष्टिक उत्पादों के ऊंचे दाम मिलते हैं। इस मूल्य अंतर का लाभ उठाने के लिए उत्पादकों को वैश्विक खरीदारों से सीधे जोड़ने का प्रयास किया गया। • आगे की दिशा: यूरोपीय संघ के मानकों पर खेप की सफल डिलीवरी के बाद अन्य यूरोपीय देशों में भी नियमित व्यापारिक ऑर्डर मिलने की उम्मीद है। स्थानीय किसानों को सीधे विदेशी खरीदारों से जोड़ने का दायरा आने वाले समय में और बढ़ाया जाएगा। सवाल-जवाब 1. पूर्णिया से मखाने की कितनी खेप ग्रीस भेजी गई है? पूर्णिया से कुल 1 मीट्रिक टन (1 MT) मखाने की पहली खेप ग्रीस निर्यात की गई है। 2. इस खेप को किस बंदरगाह के जरिए ग्रीस पहुंचाया गया? यह खेप गुजरात के मुंद्रा बंदरगाह से रवाना होकर ग्रीस के पिराएउस पोर्ट पहुंची। 3. इस निर्यात में किन संस्थाओं और कंपनियों की भूमिका रही? इस सौदे में APEDA के सहयोग से पूर्णिया के इंडो ग्लोबल एक्सपोर्ट से माल लेकर दिल्ली की एस. एस. फूड्स एक्सपोर्ट्स प्राइवेट लिमिटेड के जरिए भेजा गया। 4. देश के कुल मखाना उत्पादन में बिहार की कितनी हिस्सेदारी है? भारत के कुल मखाना उत्पादन में बिहार की हिस्सेदारी लगभग 80 से 85 प्रतिशत है। 5. बिहार में कितने क्षेत्र में मखाने की खेती की जाती है? बिहार के 10 जिलों में 35,000 हेक्टेयर से अधिक कृषि भूमि पर मखाने की खेती की जाती है। 6. स्थानीय उत्पादकों को कौन से शोध संस्थान तकनीकी मदद दे रहे हैं? सबौर स्थित बिहार एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी (BAU) और दरभंगा स्थित आईसीएआर-मखाना अनुसंधान केंद्र तकनीकी मदद प्रदान कर रहे हैं। प्रेरणा और सबक पूर्णिया के पारंपरिक मखाना उत्पादकों की यह उपलब्धि साबित करती है कि स्थानीय हुनर और सही मार्गदर्शन से वैश्विक बाजार जीता जा सकता है। • स्थानीय पहचान को वैश्विक बनाना: अपने पारंपरिक उत्पाद को सिर्फ स्थानीय मंडियों तक सीमित न रखकर अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप तैयार करने से बड़ा बाजार खुलता है। पूर्णिया के किसानों ने साबित किया कि स्थानीय फसल भी वैश्विक मंच पर प्रीमियम कीमत पा सकती है। • संस्थागत सहयोग का लाभ उठाना: सरकारी संस्थाओं जैसे APEDA और कृषि विश्वविद्यालयों के अनुसंधान से जुड़कर छोटे उत्पादक भी लॉजिस्टिक्स की जटिलताएं पार कर सकते हैं। सही तकनीकी मार्गदर्शन साधारण खेती को सफल अंतरराष्ट्रीय कारोबार में बदल देता है। • बिचौलियों से परे सोचना: सीधे निर्यातकों और अंतरराष्ट्रीय खरीदारों के साथ संबंध बनाने से उत्पादक को उसकी फसल का उचित और ऊंचा मूल्य मिलता है। पारंपरिक व्यापारिक तरीकों से बाहर निकलकर नए रास्ते तलाशना ही वास्तविक प्रगति लाता है। https://trendkia.com/business/bihar-ke-makhane-ne-europe-men-banai-paitha-purnia-se-greece-pahunchi-khepa-para-kisanon-ko-mile-unche-dama-43954 TrendKia — Har trend, sabse pehle.