बिठूर के किसानों ने रचा इतिहास, कानपुर का जैविक जामुन पहुंचा लंदन और यूरोप उत्तर प्रदेश के कानपुर स्थित बिठूर के 15 हजार से अधिक किसानों की मेहनत रंग ला रही है। यहां की विशेष 'कैप्सूल' किस्म का जैविक जामुन अब केवल घरेलू बाजारों तक सीमित नहीं है, बल्कि लंदन सहित यूरोपीय देशों में भारी मात्रा में निर्यात किया जा रहा है। उत्तर प्रदेश के ऐतिहासिक नगर कानपुर के पास स्थित बिठूर का इलाका अब केवल अपनी पौराणिक महत्ता के लिए ही नहीं जाना जाता। गंगा नदी के तट पर बसे इस क्षेत्र के किसानों ने एक नई व्यावसायिक क्रांति की शुरुआत की है। यहां के खेतों में तैयार होने वाला रसदार जामुन अब सिर्फ स्थानीय बाजारों या राज्य की सीमाओं तक ही सीमित नहीं है। इस फल ने हजारों किलोमीटर का सफर तय करते हुए लंदन सहित यूरोप के विभिन्न देशों के सुपरमार्केट में अपनी एक खास जगह बना ली है। बेहतरीन स्वाद, शत-प्रतिशत जैविक खेती और लंबे समय तक सुरक्षित रहने की अनूठी क्षमता के कारण विदेशी खरीदारों के बीच इसकी लोकप्रियता लगातार आसमान छू रही है। यह कृषि बदलाव कोई रातों-रात नहीं हुआ है, बल्कि इसके पीछे बिठूर और आसपास के कई ग्रामीण इलाकों के 10,000 से 15,000 किसानों का वर्षों का कड़ा संघर्ष और उनकी अटूट मेहनत छिपी है। इन हजारों परिवारों के लिए जामुन की खेती अब आजीविका और आर्थिक समृद्धि का सबसे बड़ा और विश्वसनीय साधन बन चुकी है। निर्यात का बढ़ता दायरा और विशाल उत्पादन गर्मी के मौसम में, विशेषकर मई से लेकर जुलाई के अंत तक, इस पूरे इलाके में फलों की तुड़ाई और पैकिंग का काम युद्ध स्तर पर चलता है। केवल एक सीजन के दौरान बिठूर के खेतों से डेढ़ लाख से लेकर दो लाख कैरेट तक जामुन का शानदार उत्पादन होता है। आपूर्ति श्रृंखला को व्यवस्थित रखने के लिए प्रत्येक कैरेट में सावधानीपूर्वक 25 किलो फल पैक किया जाता है। मांग का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहां से प्रतिदिन पांच हजार से लेकर 10 हजार कैरेट माल ट्रकों में लादकर देश-विदेश के अलग-अलग कोनों में भेजा जा रहा है। घरेलू स्तर पर दिल्ली, मुंबई, हैदराबाद, बिहार और पंजाब जैसे प्रमुख राज्यों के अलावा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लंदन और अन्य यूरोपीय मंडियों में इसकी भारी आपूर्ति हो रही है। सात समंदर पार भेजने के लिए निर्यातक विशेषज्ञ एक विशेष प्रकार की उन्नत पैकिंग तकनीक का इस्तेमाल करते हैं। इस खास पैकेजिंग का मुख्य उद्देश्य केवल यह सुनिश्चित करना होता है कि कई दिनों की लंबी और थकाऊ यात्रा के बाद भी फलों की मूल ताजगी, प्राकृतिक रंग और गुणवत्ता में कोई भी मामूली कमी न आए। जैविक खेती और कैप्सूल वेरायटी का दबदबा इस क्षेत्र में मुख्य रूप से दो अलग-अलग किस्मों की व्यावसायिक खेती की जाती है। इनमें पहली किस्म पारंपरिक देसी गोल जामुन है, जबकि दूसरी किस्म को लंबी 'कैप्सूल' या 'पैंट्रा' के नाम से जाना जाता है। बनियापुरवा गांव के अनुभवी किसान रवि निषाद, जो पिछले बीस वर्षों से इस बागवानी से गहराई से जुड़े हुए हैं, बताते हैं कि बाजार में सबसे अधिक मांग कैप्सूल किस्म की ही देखने को मिलती है। यह लंबी किस्म स्वाद में कहीं अधिक मीठी होती है और सामान्य तापमान पर भी तीन से चार दिनों तक बिना खराब हुए सुरक्षित रहती है। वजन के लिहाज से देखा जाए तो एक देसी जामुन का वजन आमतौर पर 10 से 15 ग्राम के बीच ठहरता है, जबकि इसके विपरीत कैप्सूल किस्म के एक फल का वजन आसानी से 25 से लेकर 30 ग्राम तक होता है। सबसे खास बात यह है कि पर्यावरण और स्वास्थ्य को पूरी तरह से ध्यान में रखते हुए इन दोनों ही बहुमूल्य प्रजातियों को पूरी तरह से प्राकृतिक और जैविक खाद की मदद से उगाया जाता है, जिसमें रसायनों का कोई प्रयोग नहीं होता। मौसम की मार और बदलता बाजार भाव कृषि क्षेत्र हमेशा प्रकृति के मिजाज पर निर्भर रहता है और इस बार भी ऐसा ही हुआ। हाल ही में आई तेज आंधी और भयानक तूफानों के कारण कई पुराने पेड़ों को भारी नुकसान झेलना पड़ा। पेड़ों के गिरने और मौसम की इस मार के सीधा परिणाम स्वरूप कुल उत्पादन में गिरावट दर्ज की गई। सप्लाई घटने का असर स्थानीय मंडियों के खुदरा भाव पर स्पष्ट रूप से नजर आया। इतिहास में संभवत पहली बार, कानपुर और आसपास के स्थानीय उपभोक्ताओं को यह फल 200 से 250 रुपये प्रति किलोग्राम की रिकॉर्ड ऊंची कीमत पर खरीदना पड़ा। बाजार के जानकारों के अनुसार, आम दिनों में इसका खुदरा भाव 150 रुपये प्रति किलो के आसपास ही बना रहता है। वहीं दूसरी तरफ, जो फल निर्यातकों के माध्यम से विदेश भेजे जाते हैं, उनके लिए किसानों को औसतन 120 रुपये प्रति किलोग्राम का थोक भाव प्राप्त होता है। रवि निषाद अपने पुराने दिनों को याद करते हुए कहते हैं कि 2005-06 के दौर में बिठूर क्षेत्र के बहुत ही गिने-चुने लोग इस बागवानी में दिलचस्पी लेते थे, लेकिन जब आमदनी का ग्राफ तेजी से ऊपर जाने लगा, तो बड़े पैमाने पर नए बगीचे लगाकर इस व्यवसाय को विस्तार दिया गया। नई किस्मों का नवाचार और वैश्विक पहचान बिठूर के बागानों की बेजोड़ सफलता ने देश के अन्य हिस्सों के किसानों को भी बेहद प्रेरित किया है। इसी का नतीजा है कि दक्षिण भारत के किसानों ने बिठूर से ले जाए गए विशेष पौधों की मदद से 'केजी-10' नामक एक एकदम नई और उन्नत वैरायटी विकसित करने में सफलता पाई है। इस नई प्रजाति का आकार इतना बड़ा है कि इसके सिर्फ एक जामुन का वजन ही 50 ग्राम तक पहुंच जाता है। पंजाब जैसे कृषि प्रधान राज्य में भी वहां के स्थानीय किसान अब इन आधुनिक किस्मों को उगाने के नए प्रयोग कर रहे हैं। इस विशाल व्यापार से जुड़े एक बड़े निर्यातक विकास जायसवाल बताते हैं कि वह व्यक्तिगत रूप से पिछले पांच सालों से लगातार बिठूर का उच्च गुणवत्ता वाला उत्पाद पंजाब, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़ सहित देश के तमाम बड़े महानगरों की मंडियों में सुरक्षित रूप से पहुंचा रहे हैं। सिर्फ अपनी बेहतरीन गुणवत्ता और बेजोड़ स्वाद के दम पर इस छोटे से कस्बे की उपज ने विदेशों में अपनी एक बहुत ही मजबूत पहचान कायम कर ली है, और यही कारण है कि वैश्विक पटल पर इसकी मांग हर गुजरते साल के साथ नए रिकॉर्ड बना रही है। इसका आप पर असर • भारत में: कृषि उत्पादों के बढ़ते अंतरराष्ट्रीय निर्यात से ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत हो रही है, जिससे देश भर के किसानों को जैविक खेती अपनाने की भारी प्रेरणा मिलेगी। • कानपुर में: स्थानीय उपभोक्ताओं के लिए इस बार मौसम के कारण जामुन के दाम बढ़ गए हैं, लेकिन निर्यात से हजारों किसान परिवारों की आय में हो रही वृद्धि से पूरे क्षेत्र का आर्थिक विकास तेज होगा। सवाल-जवाब 1. बिठूर से जामुन किन देशों में भेजा जा रहा है? कानपुर के बिठूर का जामुन मुख्य रूप से लंदन सहित यूरोप के कई देशों के बाजारों में भारी मात्रा में निर्यात किया जा रहा है। 2. हर सीजन में बिठूर से कितने जामुन का उत्पादन होता है? मई से जुलाई के सीजन में यहां से लगभग डेढ़ से दो लाख कैरेट जामुन तैयार किया जाता है, जिसमें प्रत्येक कैरेट का वजन 25 किलो होता है। 3. बाजार में जामुन की किस किस्म की सबसे ज्यादा मांग है? बाजार में लंबी 'कैप्सूल' या 'पैंट्रा' किस्म की सर्वाधिक मांग है क्योंकि यह ज्यादा मीठी होती है और बिना खराब हुए तीन-चार दिन तक सुरक्षित रहती है। 4. इस बार स्थानीय बाजार में जामुन इतना महंगा क्यों बिका? आंधी-तूफान के कारण पेड़ों को भारी नुकसान हुआ जिससे कुल उत्पादन में कमी आई, इसी वजह से स्थानीय बाजार में दाम 200 से 250 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गए। 5. दक्षिण भारत में विकसित जामुन की नई वैरायटी का क्या नाम है? दक्षिण भारत के किसानों ने बिठूर के ही पौधों का उपयोग करके 'केजी-10' नामक एक वैरायटी विकसित की है, जिसका एक फल लगभग 50 ग्राम का होता है। प्रेरणा और सबक • छोटी शुरुआत से बड़ा मुकाम: 2005 में चंद किसानों से शुरू हुई यह पहल आज 15,000 परिवारों का व्यवसाय बन चुकी है, जो सिखाता है कि सही दिशा में निरंतर किए गए छोटे प्रयास विशाल बदलाव लाते हैं। • गुणवत्ता पर पूरा फोकस: रासायनिक खादों से बचकर पूरी तरह जैविक तरीके अपनाने से ही विदेशी बाजार में इस उत्पाद को विश्वसनीयता और जगह मिली है। • बाजार की मांग को समझना: किसानों ने सामान्य देसी किस्म के बजाय 'कैप्सूल' प्रजाति पर ज्यादा ध्यान दिया क्योंकि इसकी शेल्फ लाइफ और मिठास बेहतर है, जो अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है। https://trendkia.com/business/bithoor-ke-kisanon-ne-racha-itihasa-kanpur-ka-jaivika-jamuna-pahuncha-london-aura-europe-9361 TrendKia — Har trend, sabse pehle.