छपरा के किसान ने जैविक मौसमी से बदली किस्मत, दो साल में फलों से लद गए पेड़, हर साल बढ़ रही कमाई खैरा प्रखंड के सैदूपुर मठिया गांव के किसान नर्वदेश्वर गिरी ने ‘न्यू सेलर बारी वन’ वैरायटी की मौसमी और समेकित कृषि अपनाकर बंपर मुनाफे की राह दिखाई है, जिसे देख आसपास के कई किसान भी इसी ओर बढ़ रहे हैं। बिहार के छपरा जिले में खेती की तस्वीर तेजी से बदल रही है। यहां के किसान अब सिर्फ गेहूं, धान या हरी सब्जियों तक सीमित नहीं रह गए हैं, बल्कि फल और फूल की बागवानी से अच्छी कमाई कर रहे हैं। आधुनिक बागवानी का सबसे बड़ा फायदा यह है कि एक ही खेत में अकेली फसल लगाने के बजाय किसान सह-फसली तकनीक अपनाकर फल, फूल और सब्जियां साथ-साथ उगा रहे हैं। इस तरीके से बागवानी की लागत और मेहनत का खर्च तो आसानी से निकल आता है, और मुख्य फल की बिक्री से होने वाला पूरा मुनाफा सीधे किसान की जेब में पहुंचता है। इसी सोच के साथ खेती करने वाले इलाके के प्रगतिशील किसान नर्वदेश्वर गिरी आज दूसरे किसानों के लिए मिसाल बन चुके हैं। खैरा प्रखंड के सैदूपुर मठिया गांव के रहने वाले गिरी पूरी तरह जैविक और प्राकृतिक विधि से एकीकृत कृषि करते हैं। मौसमी की शानदार बागवानी कर उन्होंने यह दिखा दिया है कि सही दिशा में मेहनत हो तो कमाई का नया रास्ता खुल सकता है। परंपरागत खेती के घाटे से शुरू हुई नई सोच नर्वदेश्वर गिरी भी कभी बाकी किसानों की तरह गेहूं और धान की पारंपरिक खेती करते थे। इसमें लागत ज्यादा लगती थी और मुनाफा कम मिलता था, कई बार तो नुकसान भी उठाना पड़ता था। इसी मुश्किल से बाहर निकलने के लिए उन्होंने कृषि विज्ञान केंद्र, मांझी के वैज्ञानिकों से संपर्क किया। वैज्ञानिकों की सलाह पर उन्हें छपरा के अलावा दूसरे राज्यों में भी कृषि प्रशिक्षण के लिए भेजा गया। इसी ट्रेनिंग के दौरान उन्हें मौसमी की बागवानी देखने और उसे समझने का मौका मिला, और यहीं से इस खेती का विचार उनके मन में आया। प्रशिक्षण से लौटने के बाद उन्होंने उन्नत नर्सरी से संपर्क कर मौसमी के पौधे मंगाए और अपने खेत में लगा दिए। नतीजा यह रहा कि पौधे लगाने के महज दो से तीन साल के भीतर ही पेड़ फलों से लद गए। ‘न्यू सेलर बारी वन’ वैरायटी ने पलटी बाजी सारण की धरती पर नर्वदेश्वर गिरी पूरी तरह जैविक तरीके से ‘न्यू सेलर बारी वन’ वैरायटी की मौसमी उगा रहे हैं। इस किस्म की खूबी यह है कि इसमें जबरदस्त पैदावार होती है और फलों का आकार भी आम मौसमी के मुकाबले काफी बड़ा रहता है। पूरी तरह प्राकृतिक और जैविक होने की वजह से यह मौसमी बेहद मीठी और रसीली निकलती है। इसी कारण बाजार में इसकी मांग और कीमत, दोनों ही सामान्य मौसमी से कहीं अधिक मिलती है। गिरी की कामयाबी देखकर अब छपरा के आधा दर्जन से ज्यादा किसान भी इसी वैरायटी की बागवानी करने लगे हैं। 2016 में शुरुआत, 2018 में पहला फल और पहली कमाई आज नर्वदेश्वर गिरी सिर्फ एक कुशल किसान ही नहीं, बल्कि प्राकृतिक खेती के मास्टर ट्रेनर भी हैं। अपने सफर के बारे में उन्होंने बताया, “मैंने साल 2016 में प्रशिक्षण लेने के बाद मौसमी की बागवानी शुरू की थी। साल 2018 से पेड़ों में फल आने शुरू हो गए। पहली बार में ही मैंने ₹52,000 की मौसमी बेची थी, जिसके बाद हर साल पैदावार और कमाई दोनों बढ़ती गई।” समेकित कृषि से खेत का चप्पा-चप्पा उपजाऊ गिरी बताते हैं कि वह समेकित कृषि प्रणाली के तहत मौसमी के पेड़ों के बीच बची खाली जगह में अमरूद और सहजन के पेड़ लगाते हैं, और साथ ही जमीन पर हल्दी, अदरक और ओल (सूरन) जैसी फसलें भी उगाते हैं। इस मल्टी-लेयर फार्मिंग का सीधा असर यह है कि उनके खेत का कोई भी हिस्सा बेकार नहीं जाता और हर इंच जमीन से आमदनी होती है। आज दूर-दूर से किसान उनके पास यह तकनीक सीखने और प्रशिक्षण लेने आते हैं। कई किसान तो उन्हीं से पौधे ले जाकर अपने खेतों में लगा रहे हैं। नर्वदेश्वर गिरी का मानना है कि अगर सही वैरायटी चुनकर वैज्ञानिक तरीके से बागवानी की जाए, तो यह पारंपरिक और नकदी फसलों के मुकाबले कई गुना ज्यादा मुनाफा दे सकती है। इसका आप पर असर • भारत में: सही वैरायटी और समेकित कृषि अपनाकर किसान एक ही खेत से कई गुना मुनाफा कमा सकते हैं, जो परंपरागत गेहूं-धान के घाटे से निकलने का रास्ता दिखाता है। • छपरा (बिहार) में: स्थानीय किसान कृषि विज्ञान केंद्र, मांझी से जुड़कर प्रशिक्षण ले सकते हैं और नर्वदेश्वर गिरी जैसे किसानों से ‘न्यू सेलर बारी वन’ मौसमी के पौधे लेकर बागवानी शुरू कर सकते हैं। सवाल-जवाब 1. नर्वदेश्वर गिरी कौन हैं और कहां के रहने वाले हैं? वह खैरा प्रखंड के सैदूपुर मठिया गांव के प्रगतिशील किसान हैं, जो जैविक और प्राकृतिक विधि से मौसमी की बागवानी करते हैं और प्राकृतिक खेती के मास्टर ट्रेनर भी हैं। 2. उन्होंने कौन सी मौसमी वैरायटी लगाई है और इसकी खासियत क्या है? उन्होंने ‘न्यू सेलर बारी वन’ वैरायटी लगाई है, जिसमें जबरदस्त पैदावार होती है, फल आम मौसमी से बड़े होते हैं और जैविक होने के कारण बेहद मीठे व रसीले रहते हैं। 3. उन्हें पहली बार मौसमी से कितनी कमाई हुई थी? उन्होंने 2016 में बागवानी शुरू की, 2018 से पेड़ों में फल आने लगे और पहली बार में ही उन्होंने ₹52,000 की मौसमी बेची थी। 4. समेकित कृषि में वह और कौन सी फसलें उगाते हैं? मौसमी के पेड़ों के बीच वह अमरूद और सहजन के पेड़ लगाते हैं और जमीन पर हल्दी, अदरक तथा ओल (सूरन) जैसी फसलें भी उगाते हैं। https://trendkia.com/business/chhapara-ke-kisana-ne-jaivika-mausami-se-badali-kismata-do-sala-men-phalon-se-la-1390 TrendKia — Har trend, sabse pehle.