# धान की फसल पर भूरा माहू का साया, रोपाई से पहले की गई ये तैयारी बचा सकती है पूरा खेत

> विंध्य क्षेत्र में धान की खेती शुरू होते ही ब्राउन प्लांट हॉपर का डर सता रहा है। जानिए बीज चयन से लेकर छिड़काव तक वे सभी उपाय, जिनसे यह खतरनाक कीट फसल को छू भी नहीं पाएगा।

**Type:** article · **Category:** व्यापार · **Published:** 2026-06-17 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/business/dhana-ki-phasala-para-bhura-mahu-ka-saya-ropai-se-pahale-ki-gai-ye-taiyari-bacha-1377 · **Language:** Hindi
**Tags:** भूरा माहू, धान की खेती, ब्राउन प्लांट हॉपर, बीपीएच नियंत्रण, बीजोपचार, सतना खेती, धान की किस्में, फसल सुरक्षा

सतना समेत पूरे विंध्य अंचल में मानसून दस्तक देते ही धान की खेती की हलचल तेज हो चुकी है। किसान नर्सरी तैयार करने से लेकर मुख्य खेत में रोपाई तक की योजना बनाने में जुटे हैं, लेकिन इस उत्साह के बीच एक छोटा सा कीट उनकी नींद उड़ाए हुए है। यह कीट है ब्राउन प्लांट हॉपर (बीपीएच), जिसे आम बोलचाल में भूरा माहू कहा जाता है। आकार में भले ही यह बेहद मामूली नजर आता हो, लेकिन अगर वक्त रहते इस पर लगाम न लगाई जाए तो यह कुछ ही दिनों में हरे-भरे खेत को सुखाकर रख देता है। कृषि जानकारों की मानें तो असली समझदारी फसल लगने के बाद नहीं, बल्कि बीज डालने और रोपाई से पहले ही दिखानी पड़ती है।

## कब और कैसे हमला करता है यह कीट
TrendKia से बातचीत में सतना के पेस्टीसाइड एक्सपर्ट अमित सिंह ने बताया कि धान के तैयार पौधों की मुख्य खेत में रोपाई आम तौर पर जून के तीसरे सप्ताह से लेकर जुलाई के तीसरे सप्ताह के बीच होती है। किस्म के हिसाब से फसल की पूरी अवधि 90 से 180 दिनों तक खिंच सकती है। उन्होंने बताया कि बीपीएच का प्रकोप अक्सर रोपाई के 35 से 40 दिन बाद उस समय शुरू होता है, जब पौधों में कल्ले फूटने लगते हैं। यह कीट पौधे के निचले हिस्से में छिपकर उसका रस चूसता रहता है, जिससे पौधा भीतर ही भीतर कमजोर होकर धीरे-धीरे सूखने लगता है। इसी हालत को कृषि वैज्ञानिक हॉपर बर्न कहते हैं।

## बीज डालने से पहले ही रख लें ये सावधानियां
अमित सिंह का कहना है कि इस कीट से लड़ाई की शुरुआत खेत में बीज गिरने से पहले ही हो जानी चाहिए। सबसे पहला कदम है ऐसी किस्मों को चुनना जो भूरा माहू के प्रति सहनशील मानी जाती हैं। इस लिहाज से Pusa Basmati-1, IR-64 और Swarna जैसी किस्में बेहतर विकल्प बताई जाती हैं। इसके साथ बीजोपचार को भी हल्के में नहीं लेना चाहिए। ट्राइकोडर्मा विरिडी, स्यूडोमोनास फ्लोरेसेन्स या ब्यूवेरिया बेसियाना जैसे जैविक एजेंटों से बीज का उपचार करने पर पौधों की रोग और कीटों से लड़ने की ताकत काफी बढ़ जाती है।

## खेत की सफाई और फसल चक्र की भूमिका
जानकार मानते हैं कि बीपीएच को सबसे पहले पनाह मेढ़ों पर उगी घास और पिछली फसल के बचे-खुचे अवशेष देते हैं। यही वजह है कि खेत की अच्छी तरह सफाई और पुराने अवशेषों को नष्ट करना बेहद अहम है। फसल चक्र अपनाने से भी इस कीट की संख्या काबू में रहती है। एक और कारगर तरीका यह है कि गांव या इलाके के किसान मिलकर एक ही समय में बुवाई और रोपाई करें, क्योंकि ऐसा करने से कीट के एक खेत से दूसरे खेत तक फैलने की गुंजाइश घट जाती है।

## संतुलित खाद और पानी ही सबसे बड़ा हथियार
अमित सिंह बताते हैं कि ज्यादा पैदावार की लालच में अक्सर किसान यूरिया और दूसरे नाइट्रोजन वाले उर्वरक जरूरत से ज्यादा डाल देते हैं। इससे पौधों में जो कोमल बढ़त आती है, वही भूरा माहू को सबसे तेजी से अपनी ओर खींचती है। इसलिए उर्वरकों का इस्तेमाल नाप-तौलकर ही करना चाहिए। खेत में हवा और रोशनी का आना-जाना बना रहे, इसके लिए बीच-बीच में खाली पट्टियां या अमली छोड़ना भी फायदेमंद रहता है। इसके अलावा खेत के पानी को बीच-बीच में सुखाकर दोबारा भरने की तकनीक अपनाने से कीट का प्रजनन चक्र ही टूट जाता है और उसका असर कमजोर पड़ जाता है।

## कीट दिखते ही न करें देर
विशेषज्ञ जोर देकर कहते हैं कि खेत पर लगातार नजर रखना सबसे जरूरी काम है। अगर एक पौधे पर 10 से 15 कीट दिखने लगें, तो इसे आर्थिक क्षति स्तर माना जाता है और यही वह घड़ी होती है जब फौरन कदम उठाने चाहिए। शुरुआती दौर में नीम आधारित उत्पादों से काम चलाया जा सकता है, लेकिन प्रकोप ज्यादा बढ़ने पर अनुशंसित रासायनिक दवाओं की मदद लेनी पड़ती है। एक बात हमेशा याद रखें कि छिड़काव पौधे के निचले हिस्से यानी जड़ के पास ही करें, क्योंकि बीपीएच वहीं छिपकर रस चूसता है।

## डॉमिनेंट दवा क्यों मानी जाती है असरदार
भूरा माहू पर काबू पाने के लिए डाइनोटफ्यूरान 20 प्रतिशत एसजी वाला Dominant कीटनाशक प्रभावी माना जाता है। अमित सिंह के मुताबिक प्रति एकड़ करीब 80 ग्राम दवा को 150 से 200 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव किया जा सकता है। बेहतर नतीजे के लिए इसमें सिलिकॉन आधारित चिपकाऊ भी मिलाया जा सकता है। छिड़काव से पहले खेत का पानी निकाल देना और दवा डालने के बाद दो से तीन दिन तक खेत को अपेक्षाकृत सूखा रखना लाभकारी रहता है। इससे दवा पौधों पर ज्यादा अच्छी तरह असर करती है और कीट पर नियंत्रण कारगर ढंग से हो पाता है।

## थोड़ी सी सतर्कता बचाएगी बड़ा नुकसान
कुल मिलाकर देखें तो धान किसानों के लिए बीपीएच ऐसी चुनौती है जो चंद दिनों में ही मोटे आर्थिक नुकसान की वजह बन सकती है। मगर सही किस्म का चुनाव, बीजोपचार, खेत की साफ-सफाई, संतुलित उर्वरक प्रबंधन और समय पर कीटनाशक का इस्तेमाल जैसे उपाय अपनाकर इससे आसानी से पार पाया जा सकता है। जानकारों की सलाह है कि किसान अभी से अपनी तैयारी में जुट जाएं और नियमित निगरानी बनाए रखें, ताकि धान की फसल सुरक्षित रहे और उत्पादन पर कोई आंच न आए।

## इसका आप पर असर
- **भारत में:** धान उगाने वाले किसान बीज चयन, बीजोपचार और संतुलित खाद के जरिए भूरा माहू से होने वाले बड़े नुकसान से बच सकते हैं, जिससे उत्पादन और आमदनी दोनों सुरक्षित रहती है।
- **सतना में:** विंध्य क्षेत्र के किसानों को जून के तीसरे हफ्ते से जुलाई के तीसरे हफ्ते तक चलने वाली रोपाई के दौरान और रोपाई के 35 से 40 दिन बाद खास सतर्कता बरतनी चाहिए।

## सवाल-जवाब

### 1. भूरा माहू का प्रकोप कब शुरू होता है?
यह कीट आम तौर पर रोपाई के 35 से 40 दिन बाद हमला करता है, जब पौधों में कल्ले निकलने लगते हैं।

### 2. कौन सी धान किस्में इस कीट के प्रति सहनशील मानी जाती हैं?
Pusa Basmati-1, IR-64 और Swarna जैसी किस्में भूरा माहू के प्रति सहनशील मानी जाती हैं।

### 3. कब छिड़काव करना जरूरी हो जाता है?
अगर एक पौधे पर 10 से 15 कीट दिखाई देने लगें तो इसे आर्थिक क्षति स्तर माना जाता है और तुरंत नियंत्रण उपाय करने चाहिए।

### 4. डॉमिनेंट दवा का इस्तेमाल कैसे करें?
प्रति एकड़ करीब 80 ग्राम डाइनोटफ्यूरान 20 प्रतिशत एसजी वाली दवा को 150 से 200 लीटर पानी में घोलकर पौधों के निचले हिस्से पर छिड़कें।

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