धौलपुर के किसानों का नया फॉर्मूला: सिर्फ 600 रुपये का निवेश और मानसून में लखपति बनने का मौका बारिश के मौसम में खाली पड़े खेतों का इस्तेमाल कर किसान शानदार कमाई कर रहे हैं। कम लागत और नाममात्र की सिंचाई वाली यह मानसूनी फसल मिट्टी की सेहत सुधारने के साथ ही लाखों का मुनाफा दे रही है। रबी के सीजन में गेहूं की बंपर कटाई के बाद आमतौर पर ज्यादातर खेत मानसून के दौरान पूरी तरह से खाली छोड़ दिए जाते हैं। हालांकि, राजस्थान में धौलपुर जिले के बोरोली गांव के रहने वाले एक बेहद प्रगतिशील और जागरूक किसान रामलखन शर्मा ने इस खाली समय का फायदा उठाने का एक जबरदस्त तरीका खोज निकाला है। वह बरसात के इन सुहावने महीनों में ढैंचा की खेती कर रहे हैं और पारंपरिक फसलों के मुकाबले कहीं ज्यादा बड़ा आर्थिक मुनाफा कमा रहे हैं। उनका यह जमीनी तजुर्बा साफ तौर पर साबित करता है कि अगर सही योजना के साथ काम किया जाए, तो मात्र चंद रुपयों की शुरुआती लागत और बहुत ही कम शारीरिक मेहनत से कोई भी व्यक्ति खेती के जरिए तगड़ी कमाई कर सकता है। इस पूरी प्रक्रिया का सबसे शानदार और अनूठा पहलू यह है कि उन्नत किस्म के बीजों को बाजार में बेचकर तो अच्छी खासी नकदी आती ही है, साथ ही यह पौधा खेत की मिट्टी को पूरी तरह से प्राकृतिक रूप से रिचार्ज करके उसे अगली बुवाई के लिए कहीं ज्यादा सेहतमंद और उपजाऊ बना देता है। इस व्यवसाय को शुरू करने के लिए पैसों की जरूरत इतनी कम है कि कोई भी साधारण किसान इसे बिना किसी कर्ज के आसानी से अपना सकता है। रामलखन शर्मा के व्यक्तिगत अनुभव के अनुसार, गेहूं काटने के बाद जब खेत पूरी तरह से सूने पड़े होते हैं, तब जून और जुलाई के महीनों के बीच का समय इस फसल को खेत में डालने के लिए सबसे मुफीद होता है। खर्चे की बात करें तो एक बीघा जमीन में बुवाई करने के लिए बमुश्किल 2 किलोग्राम उन्नत बीजों की आवश्यकता होती है। बाजार में इतने बीज खरीदने के लिए आपको अपनी जेब से सिर्फ 600 रुपये के आसपास का बेहद मामूली खर्च करना पड़ता है। बस इस 600 रुपये की शुरुआती लागत को लगाकर खेती करने वाले लोग अपनी पूरी तरह से तैयार फसल को जब बाजार में उतारते हैं, तो उन्हें शुद्ध रूप से लाखों रुपये तक का मुनाफा बड़े ही आराम से मिल जाता है। सिंचाई का झंझट खत्म, प्राकृतिक बारिश से लहलहाते खेत इस खास मानसूनी पौधे की सबसे बड़ी और अहम खासियत इसका बारिश के पानी पर पूरी तरह से निर्भर होना है, जिससे किसानों के ऊपर पड़ने वाला सिंचाई का भारी आर्थिक बोझ एकदम खत्म हो जाता है। आसमान से बरसने वाले प्राकृतिक मानसून के पानी को पाकर यह फसल खेतों में बहुत ही तेज रफ्तार से और बड़ी ही आसानी के साथ बढ़ती है। इसी वजह से किसानों को अपने खेतों में ट्यूबवेल चलाने या महंगे डीजल का इस्तेमाल करके अलग से कोई भारी-भरकम सिंचाई करने की बिल्कुल भी जरूरत नहीं पड़ती। अगर किसी साल मौसम का मिजाज बिगड़ जाए और मानसूनी बारिश समय पर न हो या बहुत कम हो, तब भी किसानों को घबराने की कोई बात नहीं है। ऐसे हालात में बुवाई के ठीक 20 दिन गुजर जाने के बाद खेत में सिर्फ एक बार हल्की सी सिंचाई कर देना ही फसल को बचाने के लिए काफी होता है। इसके अलावा, ढैंचा की फसल प्राकृतिक आपदाओं को भी बड़ी मजबूती से झेल लेती है। ढैंचा की एक बहुत बड़ी खूबी यह है कि अगर लगातार होने वाली भारी बारिश की वजह से पूरे खेत में जलभराव की स्थिति पैदा हो जाए और पानी भर भी जाए, तब भी इसके मजबूत तनों को कोई खास नुकसान नहीं पहुंचता, जिससे किसान की पूरी मेहनत हमेशा सुरक्षित रहती है। हरी खाद से आगे बढ़कर व्यावसायिक बीज उत्पादन का नया दौर पुराने समय से ही भारत के कई ग्रामीण क्षेत्रों में इस फसल को सिर्फ खेतों में हरी खाद तैयार करने के सीमित मकसद से ही उगाया जाता रहा है, ताकि उसे वापस मिट्टी में जोता जा सके। लेकिन अब आधुनिक खेती के दौर में समय बहुत तेजी से बदल रहा है। आजकल के समझदार और आधुनिक किसान इसका पूरी तरह से व्यावसायिक इस्तेमाल कर रहे हैं और बड़े पैमाने पर सिर्फ बीज का उत्पादन ले रहे हैं। इस नए तरीके से काम करने के दो बहुत बड़े और सीधे फायदे किसानों को मिल रहे हैं। एक तरफ तो उन्हें मंडी में सीधे बीज बेचकर बेहतरीन नकद आमदनी हासिल हो रही है, वहीं दूसरी ओर उनके खेतों में मिट्टी की नाइट्रोजन फिक्सिंग की प्राकृतिक क्षमता और उसकी उर्वरता में जबरदस्त तरीके से सुधार हो रहा है। जब किसी खेत में एक बार ढैंचा की फसल पूरी तरह से ले ली जाती है, तो वहां की मिट्टी इतनी ज्यादा उपजाऊ हो जाती है कि उसके तुरंत बाद बोई जाने वाली किसी भी अगली मुख्य फसल में यूरिया और डीएपी जैसे महंगे रासायनिक खादों को डालने की जरूरत बहुत हद तक कम हो जाती है। इस प्राकृतिक बदलाव के कारण किसानों की खेती की कुल लागत अपने आप ही काफी नीचे आ जाती है। सिर्फ 100 दिन का इंतजार और लकड़ी से भी अतिरिक्त कमाई अपने खेत का सीधा अनुभव साझा करते हुए किसान शर्मा ने यह जानकारी दी है कि बुवाई वाले दिन से लेकर इस फसल के पूरी तरह से पककर कटाई के लिए तैयार होने में कुल मिलाकर लगभग 100 दिनों के भीतर का समय लगता है। इतने कम समय में ही सिर्फ एक बीघा खेत से 4 क्विंटल तक बेहतरीन क्वालिटी वाले उन्नत बीजों का उत्पादन बड़ी आसानी से प्राप्त किया जा सकता है। अगर आज के वर्तमान समय की बात करें, तो खुले बाजार में इन बीजों का भाव बड़ी ही सहूलियत के साथ 200 रुपये प्रति किलोग्राम तक मिल जाता है, जो सीधे तौर पर एक मोटा मुनाफा सुनिश्चित करता है। दिलचस्प बात यह है कि पैसों की यह बारिश सिर्फ बीजों तक ही सीमित नहीं रहती है। बीज निकाल लेने के बाद इस फसल की जो सूखी लकड़ियां बच जाती हैं, वे भी ग्रामीण इलाकों के स्थानीय बाजारों में लगभग 200 रुपये प्रति क्विंटल के अच्छे भाव पर हाथों-हाथ बिक जाती हैं। गांव-देहात में इस बेहद मजबूत सूखी लकड़ी की बहुत ज्यादा मांग रहती है, क्योंकि स्थानीय लोग इसका इस्तेमाल अपने घरों के लिए छप्पर बनाने, अनाज को सुरक्षित रखने वाले बड़े कूप तैयार करने और रोजमर्रा के कई अन्य छोटे-मोटे निर्माण कार्यों में बहुत बड़े पैमाने पर करते हैं। बिना किसी झंझट के मिट्टी की सेहत और शानदार मुनाफा आखिर में, इस खेती को सफलतापूर्वक कर रहे रामलखन शर्मा का यही स्पष्ट कहना है कि अगर वैज्ञानिक तरीके से काम किया जाए, तो इस फसल में किसी भी तरह की खास निगरानी, महंगे कीटनाशकों के छिड़काव या बहुत ज्यादा विशेष सुरक्षा की रत्ती भर भी आवश्यकता बिल्कुल नहीं पड़ती है। कुल मिलाकर देखा जाए तो अपनी बेहद कम लागत, पानी की बहुत कम खपत और सीधे बाजार में मिलने वाले शानदार दामों की वजह से यह फसल बरसात के सुहावने मौसम में देश भर के आम किसानों के लिए अतिरिक्त आय कमाने का एक बेहतरीन और पूरी तरह से भरोसेमंद साधन बन सकती है। इन सबके साथ ही, मिट्टी के पुराने स्वास्थ्य को प्राकृतिक तरीके से सुधारने में इसका जो सबसे महत्वपूर्ण योगदान है, वह आने वाले समय में दूसरी मुख्य फसलों के उत्पादन को भी पहले से कहीं अधिक बेहतर और उच्च गुणवत्ता वाला बनाए रखता है। इसका आप पर असर • भारत भर के किसानों के लिए: मानसून के दौरान खेत खाली छोड़ने के बजाय इस कम लागत वाली फसल को अपनाकर खेती की कुल लागत घटाई जा सकती है। • राजस्थान में: पानी की कमी वाले इलाकों में यह फसल बिना भारी सिंचाई के मिट्टी की सेहत और किसानों की आय दोनों सुधार सकती है। सवाल-जवाब 1. ढैंचा की फसल उगाने में कितना खर्च आता है? एक बीघा खेत में बुवाई के लिए करीब 2 किलोग्राम बीजों की जरूरत होती है, जिस पर लगभग 600 रुपये का खर्च आता है। 2. यह फसल कितने दिनों में पककर तैयार हो जाती है? ढैंचा की फसल बुवाई के बाद करीब 100 दिनों के भीतर पूरी तरह से पककर कटाई के लिए तैयार हो जाती है। 3. किसानों को ढैंचा की खेती से प्रति बीघा कितनी पैदावार मिलती है? एक बीघा खेत से किसानों को लगभग 4 क्विंटल तक बेहतरीन क्वालिटी वाले उन्नत बीजों का उत्पादन मिल सकता है। 4. बाजार में ढैंचा के बीजों की क्या कीमत मिलती है? वर्तमान समय में खुले बाजार में ढैंचा के बीज करीब 200 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से आसानी से बिक जाते हैं। 5. क्या ढैंचा की खेती से मिट्टी को कोई फायदा होता है? हां, यह फसल प्राकृतिक रूप से मिट्टी की नाइट्रोजन फिक्सिंग क्षमता बढ़ाती है, जिससे यूरिया और डीएपी जैसे रासायनिक खादों की जरूरत बहुत कम हो जाती है। प्रेरणा और सबक • खाली समय का सही इस्तेमाल: गेहूं कटाई के बाद खेतों को खाली छोड़ने के बजाय रामलखन शर्मा ने उस समय का उपयोग एक नई फसल उगाने के लिए किया। • कम लागत में बड़ा मुनाफा: सिर्फ 600 रुपये का निवेश यह साबित करता है कि अच्छी कमाई के लिए हमेशा बड़ी पूंजी की जरूरत नहीं होती, बल्कि सही चुनाव अहम है। • आधुनिक सोच को अपनाना: ढैंचा को सिर्फ खाद के रूप में देखने के बजाय व्यावसायिक रूप से इसके बीज बेचकर उन्होंने आमदनी का एक बिल्कुल नया जरिया खोज लिया। https://trendkia.com/business/dholpur-ke-kisanon-ka-naya-phormula-sirpha-600-rupaye-ka-nivesha-aura-manasuna-men-lakhapati-banane-ka-mauka-9005 TrendKia — Har trend, sabse pehle.