दिनेश जाखड़ के अनुसार अगस्त महीने में मिर्च फूलगोभी और बैंगन की नर्सरी लगाने का वैज्ञानिक तरीका खरीफ और रबी सीजन के बीच जुलाई के अंतिम सप्ताह से अगस्त का समय मिर्च, बैंगन और सितंबर में रोपे जाने वाली फूलगोभी की पौधशाला तैयार करने के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। खरीफ सीजन के समापन और रबी फसलों की प्रारंभिक योजना के मध्य का समय सब्जी उत्पादन से जुड़े किसानों के लिए अत्यंत निर्णायक साबित होता है। जुलाई महीने के अंतिम सप्ताह से लेकर पूरे अगस्त माह के दौरान मिर्च, बैंगन और सितंबर में खेतों में रोपे जाने वाली फूलगोभी की पौधशाला यानी नर्सरी तैयार करने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। यदि इस शुरुआती दौर में ही किसान पारंपरिक तरीकों की जगह आधुनिक एवं वैज्ञानिक प्रबंधन की विधियों को अपनाते हैं, तो पौधे अत्यधिक मजबूत और रोगप्रतिरोधी बनते हैं। मजबूत पौधों के कारण मुख्य खेत में रोपाई के पश्चात फसलों की वृद्धि बहुत तेजी से होती है और विभिन्न प्रकार के रोगों का प्रकोप न्यूनतम बना रहता है। इस विषय पर विस्तृत प्रकाश डालते हुए एग्रीकल्चर एक्सपर्ट दिनेश जाखड़ ने बताया कि स्वस्थ और गुणवत्तापूर्ण पौध ही किसी भी सफल सब्जी उत्पादन की मजबूत आधारशिला होती है। जब नर्सरी से तैयार पौध स्वस्थ होती है, तो बाद में पैदावार में भारी बढ़ोतरी होती है, जिससे किसानों को मंडियों में अपनी फसल का बेहतर बाजार मूल्य हासिल करने में काफी मदद मिलती है। जल निकासी और सही क्यारी निर्माण का वैज्ञानिक तरीका पौधशाला की स्थापना के लिए स्थान का चयन करते समय किसानों को विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। एग्रीकल्चर एक्सपर्ट दिनेश जाखड़ के अनुसार नर्सरी हमेशा ऐसे स्थान पर बनानी चाहिए जहां जल निकासी की उचित व्यवस्था हो और पूरे दिन भरपूर धूप आती रहे। यदि नर्सरी के स्थान पर पानी ठहरता है या जलभराव की समस्या होती है, तो वहां पौधों में जड़ सड़न, पौध गलन और फफूंद से फैलने वाली बीमारियों का जोखिम अत्यधिक बढ़ जाता है। इन समस्याओं से बचाव के लिए क्यारियों का निर्माण जमीन की सतह से 15 से 20 सेंटीमीटर ऊंचाई पर किया जाना आवश्यक है। क्यारी की चौड़ाई लगभग 1 मीटर रखी जानी चाहिए, जबकि लंबाई को किसान अपनी सुविधा और आवश्यकता के अनुसार निर्धारित कर सकते हैं। इस प्रकार की उठी हुई क्यारियां बनाने से पौधों की निराई-गुड़ाई, हल्की सिंचाई और दैनिक रखरखाव का कार्य बेहद आसान और सुविधाजनक हो जाता है। कीटरोधी नाइलोन जाली और शेडनेट से पौधों की सुरक्षा नर्सरी की अवस्था में कोमल पौधों को हानिकारक कीटों और प्रतिकूल मौसम से बचाना एक प्रमुख चुनौती होती है। मिर्च, बैंगन और फूलगोभी की नर्सरी में कीटरोधी नाइलोन जाली का प्रयोग करना वर्तमान समय में बेहद अनिवार्य हो चुका है। यह महीन जाली सफेद मक्खी, एफिड, थ्रिप्स और रस चूसने वाले अन्य सूक्ष्म कीटों को पौध तक पहुंचने से पूरी तरह रोकती है। यही रस चूसक कीट पौधों में लीफ कर्ल, मोजेक और अन्य जानलेवा विषाणु जनित यानी वायरल रोगों को फैलाने में मुख्य वाहक की भूमिका निभाते हैं। यदि नर्सरी के दौरान ही इन कीटों के प्रवेश पर रोक लगा दी जाए, तो आगे चलकर मुख्य खेत में वायरस जनित बीमारियों का खतरा न के बराबर रह जाता है। इसके अलावा अत्यधिक तेज धूप और भीषण तापमान से नन्हें पौधों का बचाव करने के लिए क्यारियों के ऊपर लगभग 6.5 फीट की ऊंचाई पर शेडनेट लगाना बहुत फायदेमंद साबित होता है। प्रमाणित बीज उपचार और बुवाई की सही प्रक्रिया सब्जियों की बेहतर पैदावार सुनिश्चित करने के लिए बीजों की गुणवत्ता पर ध्यान देना बहुत जरूरी है। एग्रीकल्चर एक्सपर्ट दिनेश जाखड़ की सलाह है कि किसान हमेशा अधिकृत दुकानों से प्रमाणित और पूर्णतः रोगमुक्त बीजों का ही चयन करें। बीजों को क्यारियों में बोने से पूर्व उनका उचित रासायनिक या जैविक उपचार करना अत्यंत आवश्यक है। बीज उपचार से बीजों का अंकुरण प्रतिशत बेहतर होता है और शुरुआती दौर में लगने वाले मृदा जनित एवं बीज जनित रोगों की संभावना काफी हद तक समाप्त हो जाती है। बुवाई करते समय बीजों को बिखेरने के बजाय एक निश्चित दूरी पर सीधी कतारों में बोया जाना चाहिए। कतारों में बुवाई करने से प्रत्येक पौधे को समान रूप से हवा, पर्याप्त स्थान और सूर्य का प्रकाश मिलता है, जिससे वे पतले या कमजोर नहीं होते। बीजों की बुवाई के पश्चात उन पर बारीक मिट्टी या भली-भांति सड़ी हुई गोबर की खाद की एक पतली परत बिछा देनी चाहिए और उसके बाद फव्वारे अथवा स्प्रेयर की मदद से हल्की सिंचाई करनी चाहिए। मिट्टी में पोषण प्रबंधन और डैम्पिंग ऑफ रोग से बचाव नर्सरी की मिट्टी की उर्वरता और संरचना का पौधों के विकास पर सीधा असर पड़ता है। क्यारी तैयार करते समय मिट्टी में अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद या वर्मी कम्पोस्ट मिला देने से शुरुआती विकास के लिए आवश्यक पोषक तत्व आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं। इसके साथ ही क्यारी की ऊपरी मिट्टी को भुरभुरी और खरपतवार मुक्त रखना चाहिए। बुवाई से पहले यदि मिट्टी का उपयुक्त उपचार कर लिया जाए, तो फफूंद और मिट्टी में मौजूद नुकसानदेह जीवाणुओं का प्रभाव काफी कम हो जाता है। पौधों के विकास के लिए मिट्टी में हल्की नमी बनी रहना आवश्यक है, लेकिन अत्यधिक सिंचाई से हमेशा बचना चाहिए। क्यारियों में ज्यादा पानी जमा रहने या अधिक नमी के कारण डैम्पिंग ऑफ यानी पौध गलन बीमारी बहुत तेजी से फैलती है, जो देखते ही देखते पूरी नर्सरी को नष्ट कर सकती है। संक्रमित पौधों की छंटाई और रोपाई के सुनहरे नियम नर्सरी की नियमित निगरानी करना और अवांछित तत्वों को हटाना पौध संरक्षण का अहम हिस्सा है। एग्रीकल्चर एक्सपर्ट के अनुसार यदि किसी पौधे में पत्तियां मुड़ने, पीली पड़ने, पत्तियों पर धब्बे बनने या पौधे का विकास रुकने जैसे असामान्य लक्षण दिखाई दें, तो ऐसे रोगग्रस्त पौधों को बिना देरी किए उखाड़कर तुरंत नष्ट कर देना चाहिए। इससे बीमारी का प्रसार आसपास मौजूद स्वस्थ और तंदुरुस्त पौधों तक नहीं हो पाता। इसके साथ ही नर्सरी के आसपास की जगह को पूरी तरह से खरपतवार मुक्त रखना चाहिए, क्योंकि अनेक हानिकारक कीट और रोगजनक फफूंद पहले खरपतवारों पर पलते हैं और बाद में मुख्य फसल पर हमला बोलते हैं। जब नर्सरी के पौधे 25 से 35 दिन की अवधि पूरा कर लें और उनमें 4 से 6 स्वस्थ पत्तियां निकल आएं, तब वे मुख्य खेत में रोपाई के लिए पूरी तरह तैयार माने जाते हैं। रोपाई का कार्य हमेशा शाम के समय या बादल छाए रहने वाले दिनों में ही करना चाहिए ताकि पौधों को कम से कम झटका लगे। रोपाई संपन्न होते ही खेत में हल्की सिंचाई कर देनी चाहिए, जिससे पौधे जमीन में जल्दी अपनी जड़ें जमा लेते हैं और उनकी बढ़वार तेजी से शुरू हो जाती है। इसका आप पर असर सब्जी उत्पादक किसानों के लिए: समय पर और वैज्ञानिक तरीके से पौधशाला तैयार करने से पौधों में रोगों का प्रकोप कम होगा, जिससे फसल उत्पादन बढ़ेगा और बाजार में बेहतर बिक्री मूल्य प्राप्त होगा। सवाल-जवाब 1. अगस्त के दौरान किन सब्जियों की पौधशाला तैयार करना सबसे उपयुक्त माना जाता है? जुलाई के अंतिम सप्ताह से अगस्त के दौरान मिर्च, बैंगन और सितंबर में मुख्य खेत में रोपे जाने वाली फूलगोभी की पौधशाला तैयार करना सबसे उपयुक्त माना जाता है। 2. पौधशाला के लिए क्यारी का निर्माण किस तरह किया जाना चाहिए? क्यारी हमेशा जमीन से 15 से 20 सेंटीमीटर ऊंची और लगभग 1 मीटर चौड़ी बनानी चाहिए ताकि जल निकासी बेहतर रहे और देखरेख आसानी से हो सके। 3. पौधशाला में नाइलोन जाली और शेडनेट का उपयोग क्यों जरूरी है? कीटरोधी नाइलोन जाली सफेद मक्खी, एफिड और थ्रिप्स जैसे रस चूसने वाले कीटों को रोकती है, जबकि 6.5 फीट की ऊंचाई पर शेडनेट लगाने से पौध तेज धूप और उच्च तापमान से बची रहती है। 4. पौधों को मुख्य खेत में रोपाई के लिए कब तैयार माना जाता है? जब पौध 25 से 35 दिन की हो जाए और उसमें 4 से 6 स्वस्थ पत्तियां निकल आएं, तब उसे शाम के समय या बादल वाले दिन मुख्य खेत में रोपाई के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है। 5. पौध गलन या डैम्पिंग ऑफ रोग से बचने के लिए क्या करना चाहिए? मिट्टी में अच्छी तरह सड़ी गोबर की खाद या वर्मी कम्पोस्ट मिलाएं, अत्यधिक नमी और जलभराव से बचें तथा रोगग्रस्त पौधों को देखते ही तुरंत उखाड़कर नष्ट कर दें। 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