डॉलर से किनारा करना क्यों है जोखिम भरा, श्रीकांत कोंडापल्ली ने समझाई पेट्रोडॉलर और ब्रिक्स की पूरी गणित ब्रिक्स सम्मेलन में डॉलर पर निर्भरता कम करने को लेकर चर्चा हुई, लेकिन जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के विशेषज्ञ श्रीकांत कोंडापल्ली ने चेतावनी दी है कि विकासशील देशों के लिए अचानक यह कदम उठाना वित्तीय संकट पैदा कर सकता है। ब्रिक्स सम्मेलन में एक प्रमुख मुद्दा लगातार चर्चा का केंद्र बना रहा कि क्या वैश्विक अर्थव्यवस्था डॉलर पर अपनी निर्भरता को सीमित कर सकती है। यह विचार पहली नजर में बेहद सरल और आकर्षक प्रतीत होता है कि डॉलर का त्याग किया जाए और आपसी व्यापार स्थानीय मुद्राओं में संचालित किया जाए। हालांकि इस आर्थिक समीकरण की वास्तविकता बेहद पेचीदगी भरी है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के चीनी अध्ययन विशेषज्ञ प्रोफेसर श्रीकांत कोंडापल्ली ने इस पूरी स्थिति की जटिलताओं को विस्तार से स्पष्ट किया है। उनका मानना है कि विकासशील देशों द्वारा बिना सोचे-समझे डॉलर से अचानक दूरी बनाना उनके लिए गंभीर वित्तीय संकट को न्योता दे सकता है। इसकी मुख्य वजह केवल डॉलर की मजबूती नहीं है, बल्कि इन देशों की अर्थव्यवस्थाओं का पश्चिमी बाजारों, वैश्विक वित्तीय स्थिरता, समुद्री व्यापार मार्गों और अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग व्यवस्थाओं के साथ गहराई से जुड़ा होना है। ऐसे हालात में किसी भी तरह का अचानक बदलाव इन अर्थव्यवस्थाओं के लिए भारी साबित हो सकता है। तेल के व्यापार का समीकरण इस पूरी व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण और दिलचस्प पहलू है। प्रोफेसर श्रीकांत कोंडापल्ली के अनुसार आज भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होने वाले पेट्रोलियम पदार्थों के कारोबार में अमेरिकी डॉलर की भूमिका सर्वोपरि बनी हुई है। इस व्यवस्था की ऐतिहासिक जड़ें 1970 के दशक तक जाती हैं। वर्ष 1972 में तत्कालीन अमेरिकी विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर की सऊदी अरब की यात्रा के बाद जिस पेट्रोडॉलर ढांचे की नींव रखी गई थी, वह इस पूरी कहानी का एक अनिवार्य हिस्सा है। वर्तमान समय में रूस-यूक्रेन संघर्ष और ईरान से जुड़े भू-राजनीतिक तनावों के कारण कच्चे तेल की कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव और दबाव देखा जा रहा है। ऐसे दौर में ब्रिक्स देश भले ही डॉलर से दूरी बनाने की सैद्धांतिक चर्चा कर रहे हैं, लेकिन वे रातों-रात इस स्थापित व्यवस्था से बाहर निकलने का बड़ा जोखिम उठाने से बच रहे हैं। प्रोफेसर श्रीकांत कोंडापल्ली ने इस पूरे आर्थिक और भू-राजनीतिक गणित को पांच प्रमुख बिंदुओं के माध्यम से समझाया है। विकासशील देशों पर बढ़ सकता है दबाव: प्रोफेसर श्रीकांत कोंडापल्ली का कहना है कि ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और भारत जैसे देश चीन की तरह पश्चिमी बाजारों से पूरी तरह कटे हुए नहीं हैं। इन राष्ट्रों की अर्थव्यवस्थाएं अभी भी अमेरिका और यूरोप के प्रमुख बाजारों पर काफी हद तक निर्भर करती हैं। इन्हें अपनी स्थिरता के लिए वैश्विक वित्तीय बाजारों की लगातार जरूरत पड़ती है। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार मार्ग और बैंकिंग तंत्र भी इनके लिए उतने ही आवश्यक हैं। यदि ब्रिक्स देशों द्वारा अचानक डॉलर से नाता तोड़ने की घोषणा कर दी जाती, तो कई विकासशील अर्थव्यवस्थाओं को व्यापार और वित्तीय मोर्चे पर बड़े झटके का सामना करना पड़ सकता था। शेयर बाजारों से लेकर विदेशी व्यापार तक इसके प्रतिकूल प्रभाव पड़ने का गंभीर खतरा था। यही मुख्य वजह रही कि ब्रिक्स के किसी भी साझा घोषणापत्र में डॉलर से पूरी तरह किनारा करने का कोई सीधा एलान नहीं किया गया। वैश्विक व्यापार में डॉलर का दबदबा कायम: प्रोफेसर श्रीकांत कोंडापल्ली ने अंतरराष्ट्रीय लेनदेन के आधिकारिक आंकड़े भी सामने रखे हैं, जिनके मुताबिक दुनिया भर में होने वाले कुल वित्तीय लेनदेन का लगभग 54 प्रतिशत हिस्सा अकेले अमेरिकी डॉलर में होता है। इसके बाद यूरोपीय संघ की मुद्रा यूरो, ब्रिटिश पाउंड और जापानी येन जैसे विकल्पों का स्थान आता है। इससे यह साफ जाहिर होता है कि आज भी वैश्विक वित्तीय व्यवस्था पर डॉलर की पकड़ बेहद मजबूत बनी हुई है। ऐसी स्थिति में ग्लोबल साउथ के विकासशील देश एक ही झटके में इससे अलग होने का व्यावहारिक फैसला नहीं ले सकते। इन देशों की स्थानीय मुद्राएं अभी तक उस मुकाम तक नहीं पहुंच पाई हैं कि वे बड़े पैमाने पर होने वाले अंतरराष्ट्रीय व्यापार के भारी बोझ को अकेले संभाल सकें। हेनरी किसिंजर की 1972 की यात्रा और पेट्रोडॉलर का प्रभाव: प्रोफेसर श्रीकांत कोंडापल्ली ने उस ऐतिहासिक कड़ी पर विशेष जोर दिया जिसका तेल और डॉलर के संबंधों से गहरा नाता है। उन्होंने वर्ष 1972 में हेनरी किसिंजर की सऊदी अरब यात्रा को इस समीकरण का अहम मोड़ बताया। इस यात्रा के बाद अस्तित्व में आए पेट्रोडॉलर ढांचे ने वैश्विक तेल व्यापार में डॉलर के वर्चस्व को और अधिक सुदृढ़ कर दिया। आज भी अधिकांश विकासशील देश अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए बड़े पैमाने पर तेल का आयात करते हैं। पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतें डॉलर में तय होने के कारण इन देशों को अनिवार्य रूप से डॉलर की आवश्यकता पड़ती है। यदि कोई राष्ट्र डॉलर से किनारा करना भी चाहे, तो ऊर्जा आयातों के समय यह पुरानी वित्तीय व्यवस्था सामने आ जाती है। रूस-यूक्रेन युद्ध और ईरान के साथ जारी तनाव के कारण तेल की कीमतें करीब 100 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचने का जो दबाव बना, उसने विकासशील देशों की अर्थव्यवस्थाओं को बुरी तरह प्रभावित किया। ब्रिक्स के भीतर चीनी युआन की बढ़ती हिस्सेदारी: डॉलर से दूरी की इन चर्चाओं के बीच ब्रिक्स संगठन के आंतरिक समीकरणों का एक और पहलू भी सामने आता है। प्रोफेसर श्रीकांत कोंडापल्ली के अनुसार ब्रिक्स सदस्य देशों के आपसी व्यापार का लगभग 1.7 ट्रिलियन डॉलर का जो कुल कारोबार है, उसका 47 प्रतिशत हिस्सा चीनी युआन के जरिए ही होता है। यही बात भारत, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों के मन में बड़े सवाल खड़े करती है। यदि डॉलर के स्थान पर किसी एक अन्य मुद्रा पर निर्भरता अत्यधिक बढ़ जाती है, तो उसके अपने भू-राजनीतिक और आर्थिक जोखिम हो सकते हैं। इसलिए ब्रिक्स समूहों के सामने असली चुनौती केवल डॉलर को छोड़ने की नहीं है, बल्कि यह भी है कि उसके बाद किस नई व्यवस्था पर भरोसा किया जाए और उस वैकल्पिक व्यवस्था की कमान किसके हाथों में होगी। डिजिटल करेंसी एक अंतरिम विकल्प: प्रोफेसर श्रीकांत कोंडापल्ली के अनुसार ब्रिक्स देशों के भीतर स्थानीय मुद्राओं के माध्यम से आपसी व्यापार बढ़ाने और केंद्रीय बैंकों की डिजिटल मुद्रा लाने को लेकर विचार-विमर्श हुआ है। इसका मुख्य उद्देश्य यह हो सकता है कि सदस्य देशों के केंद्रीय या सरकारी बैंक सीधे तौर परसौदा कर सकें और किसी संभावित वित्तीय आपातकाल की स्थिति में पूरी व्यवस्था को सुरक्षित रखा जा सके। हालांकि उन्होंने इस समाधान को कोई स्थाई उपाय मानने से इंकार किया है। उनके मुताबिक केंद्रीय बैंकों की डिजिटल मुद्राएं फिलहाल एक अंतरिम और शुरुआती रास्ता साबित हो सकती हैं। इसके जरिए स्थानीय मुद्राओं में कारोबार को बढ़ावा देने के प्रयास किए जा सकते हैं, लेकिन वैश्विक स्तर पर डॉलर की जगह पूरी तरह ले पाने की चुनौती अभी भी बनी हुई है। यही वजह है कि ब्रिक्स सम्मेलनों में डिजिटल करेंसी और स्थानीय मुद्राओं पर चर्चा तो जरूर हुई, लेकिन डॉलर से पूरी तरह नाता तोड़ने का कोई सीधा और अंतिम निर्णय नहीं लिया गया। इसका आप पर असर वैश्विक वित्तीय बाजारों में डॉलर की स्थिति और विकासशील देशों की रणनीतियों का सीधा असर आम नागरिकों की जेब और देश के आयात खर्च पर पड़ता है। • भारत में: यदि अंतरराष्ट्रीय व्यापार में मुद्रा का अस्थिरता बढ़ती है, तो कच्चे तेल के आयात पर अधिक भुगतान करना पड़ सकता है, जिससे देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतें प्रभावित हो सकती हैं। इससे घरेलू स्तर पर महंगाई बढ़ सकती है और आम आदमी का मासिक बजट बिगड़ सकता है। • वैश्विक स्तर पर: विकासशील अर्थव्यवस्थाओं द्वारा अचानक डॉलर से दूरी बनाने की स्थिति में अंतरराष्ट्रीय शेयर बाजारों और वित्तीय तंत्र में भारी उथल-पुथल मच सकती है, जिसका असर वैश्विक निवेशकों के पोर्टफोलियो पर पड़ेगा। ऐसा क्यों हुआ अंतरराष्ट्रीय व्यापार और कूटनीति में डॉलर का वर्चस्व दशकों पुरानी व्यवस्थाओं और भू-राजनीतिक वास्तविकताओं का परिणाम है, जिसे रातों-रात बदलना असंभव है। • पेट्रोडॉलर व्यवस्था का प्रभाव: वर्ष 1972 में हेनरी किसिंजर की सऊदी अरब यात्रा के बाद वैश्विक तेल कारोबार को डॉलर में बांध दिया गया था, जिसके कारण आज भी ऊर्जा आयात करने वाले देशों को डॉलर की सख्त आवश्यकता पड़ती है। • पश्चिमी बाजारों पर निर्भरता: भारत, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका जैसे विकासशील देश अपनी आर्थिक स्थिरता के लिए पश्चिमी उपभोक्ता बाजारों और अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार मार्गों पर बहुत हद तक निर्भर हैं। • वैकल्पिक मुद्राओं की सीमाएं: वैश्विक वित्तीय लेनदेन का लगभग 54 प्रतिशत हिस्सा अभी भी डॉलर में होता है, और किसी भी विकासशील देश की स्थानीय मुद्राएं अभी तक इतने बड़े पैमाने पर अंतरराष्ट्रीय कारोबार संभालने में सक्षम नहीं हैं। • आंतरिक असंतुलन का जोखिम: ब्रिक्स के भीतर होने वाले व्यापार का 47 प्रतिशत हिस्सा चीनी युआन में होता है, जिससे अन्य सदस्य देशों के मन में यह चिंता रहती है कि डॉलर के बाद किसी एक अन्य देश की मुद्रा पर अत्यधिक निर्भरता नया जोखिम पैदा कर सकती है। सवाल-जवाब 1. ब्रिक्स सम्मेलन में किस मुख्य आर्थिक मुद्दे पर सबसे ज्यादा चर्चा हुई? सम्मेलन में मुख्य रूप से इस बात पर चर्चा हुई कि क्या विकासशील देश वैश्विक व्यापार में अमेरिकी डॉलर पर अपनी निर्भरता कम कर सकते हैं। 2. प्रोफेसर श्रीकांत कोंडापल्ली किस संस्थान से जुड़े हैं? प्रोफेसर श्रीकांत कोंडापल्ली जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में चीनी अध्ययन के विशेषज्ञ हैं। 3. पेट्रोडॉलर ढांचे की शुरुआत कब और कैसे हुई थी? इसकी शुरुआत 1972 में तत्कालीन अमेरिकी विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर की सऊदी अरब यात्रा के बाद हुई थी, जिसने वैश्विक तेल कारोबार को डॉलर से जोड़ दिया था। 4. वैश्विक वित्तीय लेनदेन में वर्तमान में डॉलर की हिस्सेदारी कितनी है? दुनिया भर में होने वाले कुल वित्तीय लेनदेन का लगभग 54 प्रतिशत हिस्सा आज भी अमेरिकी डॉलर में होता है। 5. ब्रिक्स देशों के आपसी व्यापार में चीनी युआन की कितनी हिस्सेदारी है? ब्रिक्स देशों के बीच होने वाले लगभग 1.7 ट्रिलियन डॉलर के कुल कारोबार का 47 प्रतिशत हिस्सा चीनी युआन में होता है। 6. विकासशील देश अचानक डॉलर से दूरी क्यों नहीं बना पा रहे हैं? इन देशों की अर्थव्यवस्थाएं पश्चिमी बाजारों, वैश्विक वित्तीय स्थिरता और अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग व्यवस्थाओं से गहराई से जुड़ी हुई हैं, और उनकी अपनी मुद्राएं इतने बड़े पैमाने पर अंतरराष्ट्रीय कारोबार संभालने के लिए पर्याप्त मजबूत नहीं हैं। 7. ब्रिक्स देशों ने डॉलर के विकल्प के रूप में किस रास्ते पर चर्चा की है? सदस्य देशों ने स्थानीय मुद्राओं के जरिए आपसी कारोबार बढ़ाने और केंद्रीय बैंकों की डिजिटल मुद्रा पर विचार किया है, जिसे फिलहाल एक अंतरिम रास्ता माना जा रहा है। https://trendkia.com/business/dolara-se-kinara-karana-kyon-hai-jokhima-bhara-srikanth-kondapalli-ne-samajhai-petrodolara-aura-brics-ki-puri-ganita-31760 TrendKia — Har trend, sabse pehle.