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  "type": "article",
  "title": "डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ चेतावनियों के बीच ब्रिक्स देशों ने स्थानीय मुद्रा में व्यापार बढ़ाने का लिया फैसला",
  "summary": "ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान वित्त मंत्रियों और केंद्रीय बैंक गवर्नरों ने स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और सीमा पार भुगतान प्रणाली को मजबूत करने पर सहमति जताई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से 500 फीसदी टैरिफ की चेतावनियों के बावजूद सदस्य देश डॉलर पर निर्भरता घटाने के रास्ते पर आगे बढ़ रहे हैं।",
  "content": "भारत की मेज़बानी में आयोजित ब्रिक्स सम्मेलन की गतिविधियों के तहत सदस्य देशों के वित्त मंत्रियों और केंद्रीय बैंकों के गवर्नरों (एफएमसीबीजी) ने एक महत्वपूर्ण बैठक की है। इस उच्चस्तरीय बैठक में ब्रिक्स देशों ने आपस में स्थानीय मुद्राओं में व्यापार करने और सीमा पार भुगतान प्रणाली को बेहतर बनाने पर अपनी सहमति जताई है। यह कदम अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की उन सख्त चेतावनियों के बावजूद उठाया गया है, जिनमें उन्होंने अमेरिकी डॉलर के प्रभुत्व को चुनौती देने वाले देशों पर भारी टैरिफ लगाने की चेतावनी दी थी। ब्रिक्स देशों की इस पहल से एक बार फिर वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में डॉलर पर निर्भरता कम करने को लेकर बहस तेज़ हो गई है।\n\nस्थानीय मुद्रा व्यापार और सीमा पार भुगतान प्रणाली पर सहमति\nएफएमसीबीजी की ओर से जारी संयुक्त बयान में स्पष्ट किया गया है कि सदस्य देश कजान और रियो डी जनेरियो सम्मेलनों के घोषणापत्रों में निर्धारित दिशानिर्देशों का पालन करते हुए आगे बढ़ रहे हैं। इसके तहत एक व्यावहारिक और सुचारू क्रॉस बॉर्डर पेमेंट सिस्टम तैयार करने पर काम किया जा रहा है। बैठक के दौरान ब्रिक्स पेमेंट टास्क फोर्स (बीपीटीएफ) द्वारा किए गए अध्ययनों की समीक्षा की गई, जिसमें विभिन्न देशों की भुगतान प्रणालियों और मैसेजिंग माध्यमों को एक-दूसरे के अनुकूल बनाने पर ध्यान केंद्रित किया गया है। इसका मुख्य उद्देश्य सदस्य देशों के बीच व्यापारिक लेनदेन और निवेश को उनकी अपनी राष्ट्रीय मुद्राओं में प्रोत्साहित करना है।\n\nमंत्रियों ने इस बात पर जोर दिया कि वित्तीय एकीकरण की कोई भी योजना सभी देशों पर एक समान रूप से नहीं थोपी जा सकती। प्रत्येक देश की अपनी आर्थिक प्राथमिकताएं और जरूरतें होती हैं, इसलिए एक ऐसा लचीला तंत्र तैयार किया जा रहा है जो सभी के लिए लाभदायक हो। इस पहल से सदस्य देशों को विदेशी मुद्रा विनिमय दरों के जोखिम से सुरक्षा मिलेगी और क्षेत्रीय व्यापार को गति प्राप्त होगी।\n\nअंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों और बीडब्ल्यूआई में सुधार का आह्वान\nब्रिक्स देशों के वित्त मंत्रियों और केंद्रीय बैंक प्रमुखों ने अंतरराष्ट्रीय वित्तीय ढांचे में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने पर भी बल दिया है। बैठक में मुख्य रूप से ब्रेटन वुड्स संस्थानों (बीडब्ल्यूआई), विशेष रूप से अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) और विश्व बैंक में तत्काल सुधार की आवश्यकता दोहराई गई। समूह का मानना है कि इन संस्थानों को अधिक प्रभावी, निष्पक्ष, समावेशी और समकालीन आर्थिक वास्तविकताओं के अनुकूल बनाया जाना बेहद जरूरी है।\n\nइसके साथ ही, एफएमसीबीजी ने आईएमएफ कोटा और शासन सुधारों के संबंध में 'ब्रिक्स रियो डी जनेरियो विजन' की पुष्टि की है। ब्रिक्स नेताओं ने कहा कि कमजोर और विकासशील देशों को प्रभावी वित्तीय सहायता प्रदान करने के लिए एक मजबूत, कोटा आधारित और पर्याप्त संसाधनों वाले आईएमएफ की आवश्यकता है। इससे वैश्विक अर्थव्यवस्था में उभरते बाजारों की आवाज को अधिक मजबूती मिलेगी।\n\nन्यू डेवलपमेंट बैंक का दूसरा स्वर्णिम दशक और रणनीतिक भूमिका\nन्यू डेवलपमेंट बैंक (एनडीबी) के संचालन के दूसरे दशक में प्रवेश करने के अवसर पर ब्रिक्स देशों ने बैंक की बढ़ती भूमिका की सराहना की है। एनडीबी को ब्रिक्स और ग्लोबल साउथ के देशों में विकास तथा आधुनिकीकरण का एक प्रमुख रणनीतिक कारक माना गया है। बैठक में एनडीबी को सलाह दी गई कि वह स्थानीय मुद्राओं में वित्तपोषण का विस्तार करे, वित्तीय संसाधनों के स्रोतों में विविधता लाए और परियोजना-तैयारी सुविधाओं को अधिक मजबूत बनाए।\n\nएनडीबी का उद्देश्य सदस्य देशों में टिकाऊ और समावेशी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को वित्तीय सहायता प्रदान करना है। स्थानीय मुद्रा में ऋण देने से विकासशील देशों पर डॉलर के कर्ज का दबाव कम होगा, जिससे दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता हासिल करने में मदद मिलेगी।\n\nडोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ चेतावनियों के बावजूद बढ़ता ब्रिक्स का कदम\nब्रिक्स की इस बैठक में स्थानीय मुद्रा में लेनदेन का मुद्दा उठने से वाशिंगटन के साथ तनाव बढ़ने की संभावना है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पूर्व में ब्रिक्स देशों द्वारा डॉलर के विकल्प तलाशने के प्रयासों पर कड़ा ऐतराज जताया था। ट्रंप ने स्पष्ट रूप से कहा था कि डॉलर को चुनौती देने या उसका विकल्प बनाने की कोशिश करने वाले देशों से आयातित वस्तुओं पर 500 प्रतिशत तक का भारी टैरिफ लगाया जाएगा।\n\nइस तरह की सख्त चेतावनियों के बावजूद ब्रिक्स देशों का एकजुट होकर अपनी मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने का फैसला दर्शाता है कि सदस्य देश वैश्विक वित्तीय संतुलन में बदलाव लाने के लिए प्रतिबद्ध हैं। ब्रिक्स देशों की इस लगातार कोशिश से अंतरराष्ट्रीय व्यापार मंच पर डॉलर के एकाधिकार के खिलाफ एक नई रणनीति आकार ले रही है।\n\nइसका आप पर असर\nब्रिक्स देशों द्वारा स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने के फैसले का सीधे तौर पर वैश्विक व्यापार, विदेशी मुद्रा विनिमय दर और आयात-निर्यात से जुड़ी भारतीय कंपनियों पर असर पड़ सकता है।\n\n• भारतीय निर्यातकों के लिए: ब्रिक्स देशों के साथ रुपये में व्यापार आसान होने से विनिमय दर के जोखिम कम होंगे। इससे भारतीय व्यापारियों को अमेरिकी डॉलर में होने वाले करेंसी कन्वर्जन शुल्क से राहत मिलेगी।\n• आयात लागत में बदलाव: स्थानीय मुद्रा में व्यापार से आयातित कच्चे माल की लागत अधिक स्थिर रह सकती है। इससे घरेलू बाजार में निर्मित वस्तुओं की कीमतों में अप्रत्याशित उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने में मदद मिलेगी।\n• वैश्विक निवेश और शेयर बाजार: डॉलर पर निर्भरता घटने से अमेरिकी डॉलर सूचकांक और वैश्विक मुद्रा बाजारों में हलचल बढ़ सकती है। भारतीय निवेशकों को विदेशी फंड प्रवाह और करेंसी मार्केट में होने वाली अस्थिरता पर नजर रखनी होगी।\n• ट्रंप के टैरिफ का असर: यदि अमेरिका ब्रिक्स देशों पर जवाबी टैरिफ लगाता है, तो वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित हो सकती है। इसका सीधा असर अंतरराष्ट्रीय व्यापार करने वाली भारतीय कंपनियों के मार्जिन पर पड़ सकता है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nब्रिक्स देशों द्वारा स्थानीय मुद्राओं में कारोबार और वैकल्पिक भुगतान प्रणाली को बढ़ावा देने के पीछे मुख्य कारण वैश्विक वित्तीय निर्भरता को कम करना और डॉलर के प्रभुत्व से जुड़े जोखिमों से बचना है।\n\n• डॉलर पर निर्भरता कम करना: वैश्विक वित्तीय प्रणालियों में अमेरिकी डॉलर के दबदबे से सदस्य देशों को अमेरिकी मौद्रिक नीतियों और प्रतिबंधों का खतरा बना रहता है। स्थानीय मुद्राओं में लेनदेन से इन जोखिमों को कम करने में मदद मिलती है।\n• सीमा पार भुगतान में आसानी: कजान और रियो सम्मेलनों के बाद सदस्य देश एक ऐसा अंतर-संचालनीय नेटवर्क बनाना चाहते हैं जो पश्चिमी वित्तीय संरचनाओं से स्वतंत्र हो। बीपीटीएफ का गठन इसी तकनीकी समाधान की तलाश के लिए किया गया था।\n• उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मांग: आईएमएफ और विश्व बैंक जैसे पारंपरिक संस्थानों में पश्चिमी देशों का वर्चस्व रहा है। ब्रिक्स देश लंबे समय से इन संस्थानों में कोटा सुधार और विकासशील देशों को अधिक प्रतिनिधित्व देने की मांग कर रहे हैं।\n• ट्रंप के साथ भू-राजनीतिक खिंचाव: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ चेतावनियों के बावजूद ब्रिक्स देश अपने आर्थिक हितों और मौद्रिक संप्रभुता को प्राथमिकता दे रहे हैं।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. ब्रिक्स बैठक में स्थानीय मुद्राओं को लेकर क्या निर्णय लिया गया?\nब्रिक्स के वित्त मंत्रियों और केंद्रीय बैंक गवर्नरों ने सदस्य देशों के बीच व्यापार और निवेश के लिए स्थानीय मुद्राओं के उपयोग को बढ़ावा देने और सीमा पार भुगतान प्रणाली विकसित करने पर सहमति जताई है।\n\n2. क्या ब्रिक्स देशों ने किसी नई भुगतान प्रणाली की घोषणा की है?\nब्रिक्स पेमेंट टास्क फोर्स (बीपीटीएफ) कजान और रियो घोषणापत्रों के आधार पर सदस्य देशों की भुगतान प्रणालियों और मैसेजिंग नेटवर्क को आपस में जोड़ने के व्यावहारिक तरीकों का अध्ययन कर रही है।\n\n3. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस पर क्या चेतावनी दी थी?\nडोनाल्ड ट्रंप ने पूर्व में चेतावनी दी थी कि जो देश अमेरिकी डॉलर को चुनौती देने या उसका विकल्प बनाने की कोशिश करेंगे, उन पर 500 प्रतिशत तक का भारी टैरिफ लगाया जाएगा।\n\n4. ब्रिक्स देश आईएमएफ और विश्व बैंक में क्या सुधार चाहते हैं?\nब्रिक्स देश ब्रेटन वुड्स संस्थानों में कोटा सुधार, अधिक पारदर्शिता और जवाबदेही चाहते हैं ताकि उभरती अर्थव्यवस्थाओं को अधिक प्रतिनिधित्व मिल सके।\n\n5. न्यू डेवलपमेंट बैंक (एनडीबी) की इसमें क्या भूमिका है?\nएनडीबी अपने दूसरे दशक में स्थानीय मुद्रा में वित्तपोषण का विस्तार कर रहा है और ब्रिक्स तथा ग्लोबल साउथ के देशों में टिकाऊ बुनियादी ढांचा परियोजनाओं का समर्थन कर रहा है।",
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  "category": "व्यापार",
  "publishedAt": "2026-09-11",
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